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  • As Soon As The Women Wear Clothes They Want, The Eyebrows Of Men Start Slanting, If Someone Misbehaves Then His Punishment Is Also Fixed.

बात बराबरी की:आज भी औरतें मर्जी से कपड़े नहीं पहन सकतीं, पुरुष ही उनका ड्रेस कोड तय करते हैं; अगर किसी ने गुस्ताखी की तो सजा भी मिलती है

नई दिल्ली4 महीने पहले
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लगभग 3 हजार साल पहले पुरुषों ने एक नियम बनाया। नियम स्त्री देह के लिए था, जिसके मुताबिक औरतों के शरीर का ऊपरी भाग और खासतौर पर वक्ष ढका होना चाहिए। वे मानते थे कि औरतों का शरीर उनमें कामना जगाता है। तो पुरुष रास्ता न भटकें, इसके लिए औरतें लबादे में लिपट गईं। वैसे ढके रहने का ये कायदा कुलीन औरतों के लिए था। बाकियों पर ज्यादा से ज्यादा खुला दिखने का दबाव था।

प्राचीन यूनान में गरीब औरतों को मनमुताबिक कपड़े चुनने पर सख्त सजा मिलती थी। यहां तक कि भारत में भी कई जगहों पर ब्रेस्ट टैक्स की बात होती रही। केरल में तथाकथित कमतर जाति की औरतों को सीने पर कपड़ा रखने की मनाही थी। अगर वे इसे ढकना चाहें तो उन्हें पैसे भरने होते थे। वहां माना जाता था कि मंदिर के देवता और पुरुषों के सामने नीच स्त्री को वस्त्रों की जरूरत नहीं।

पुरानी रीति अब भी जारी है। पुरुष अब भी स्त्री के शौक दुरुस्त कर रहे हैं और जो उनका कायदा तोड़े, उसे सजा भी मिल रही है। उत्तर प्रदेश के देवरिया में ऐसा ही एक मामला सामने आया। वहां 16 साल की लड़की को उसके चाचा और दादा ने पीट-पीटकर मार डाला। लड़की का जुर्म ये था कि वह मना करने के बावजूद जींस पहनने की गुस्ताखी कर बैठी। दरअसल लड़की काफी वक्त शहर में बिता चुकी थी। वहां रहते हुए उसने मर्जी से पहनना-ओढ़ना सीख लिया। ठीक वैसे ही, जैसे पुरुष सिगरेट या शराब पीना सीख जाते हैं।

गांव पहुंचकर भी लड़की आधुनिक कपड़े पहनती रही। चाचा ने पहले तो टोका। तब भी बात न बनी तो बिगड़ैल लड़की को सुधारने के लिए चाचा समेत परिवार के बाकी पुरुषों ने मिलकर उसे बुरी तरह पीटा और लाश पुलिया पर फेंक दी।

सबक मिल गया। अब तक शायद उस गांव की तमाम लड़कियों ने अपनी ‘मर्जी’ को किसी पोटली में बांधकर जला दिया होगा। जैसे कोई अपराधी अपना जुर्म छिपाता है, वैसे ही ये लड़कियां अपनी इच्छाएं छिपाती फिरेंगी। कत्ल या डकैती की इच्छा नहीं, बल्कि बहुत मासूम-सी इच्छा- जींस पहनने की, सतरंगी छापे वाली फ्रॉक की, या फिर खुले-खुले कंधों वाले कपड़े पहनने की।

वैसे जींस पहनने पर हत्या के लिए हम गांव को दोष नहीं दे सकते। अमेरिका जैसे मुल्क में भी अजीबोगरीब मामले आए, जहां लड़कियों को ‘लेडी-लाइक’ कपड़े पहनने की सीख मिली। साल 2019 में नॉर्थ कैरोलिना में गर्मियों की छुट्टी के दौरान स्कूलों से अभिभावकों के पास एक मेल आया। इसमें स्कूल प्रशासन ने कहा कि लड़कियां पैंट की बजाय स्कर्ट पहनने की आदत डाल लें। इसके लिए स्कूलों ने परंपरा का हवाला दिया था। सन्न पेरेंट्स और बच्चों को इतने मामूली से हक के लिए स्कूल प्रशासन से लड़ाई लड़नी पड़ी। अब वहां स्कूली बच्चियां पैंट पहनती तो हैं, लेकिन परंपरा-तोड़ने का कलंक माथे पर लगाकर।

पैंटालून्स एंड पावर (Pantaloons and Power) के लेखक गेले फिशर ने अपनी किताब में जींस पर बात की है। फिशर कहते हैं- जींस, कपड़ों में अब तक की सबसे आरामदेह खोज है। इसमें शरीर ढका भी होता है और चलने से लेकर दौड़ने की भी सुविधा रहती है। पर लड़कियों को ये छूट नहीं। वे धीमी चलें और सांस थामकर बैठें- इस इरादे से स्कर्ट डिजाइन हुई। किसी धांसू प्रयोग में खोई किसी महिला वैज्ञानिक के दिमाग में एकदम-से कोई नई बात आए तो वो लपकती हुई प्रयोगशाला में नहीं घुस सकेगी। उसकी कमर से लिपटी स्कर्ट उसे लगातार औरत होने का रिमाइंडर देगी। जंग के मैदान में फड़कती भुजाओं वाली औरत भी घोड़े पर सवार होने से पहले ठिठक जाएगी। उसकी स्कर्ट उसे घुड़सवारी की छूट नहीं देती।

साल 1850 के दौरान दुनिया में जहां-तहां इंकलाब की चिंगारियां फूट रही थीं। एक क्रांति फ्रांस में भी सुगबुगा रही थी, जहां औरतें जमीन तक घिसटने वाली वाली स्कर्ट से आजादी मांग रही थीं। वे स्कर्ट और जींस के बीच का एक कपड़ा लेकर आईं, जिसे ब्लूमर कहा गया। हालांकि आजादी मांगते हुई भी ये औरतें सहमी हुई थीं। उन्होंने संभल-संभलकर तर्क दिया- लंबी स्कर्ट पहन सीढ़ियां चलते हुए अगर औरत ने एक हाथ में बच्चा और दूसरे में पानी का जग संभाला हुआ हो तो वो गिर सकती है।

ऐसे में दुधमुंहे बच्चे की मौत हो सकती है। पानी गिरने पर प्यासे पति को ज्यादा इंतजार करना पड़ सकता है। तो स्कर्ट की जगह ब्लूमर पहनने की इजाजत मिल सके तो हादसे टाले जा सकते हैं। कहने की बात नहीं कि उनका ये तर्क हवा में उड़ा दिया गया।

वक्त के साथ पश्चिमी मुल्कों के तरक्की पसंद पुरुष कुछ ‘उदार’ हुए। औरतों को पैंट पहनने की छूट मिल तो गई, लेकिन तयशुदा जगहों पर। रेस्त्रां या सिनेमा हॉल जैसी सार्वजनिक जगहों पर उनके मर्दाना कपड़े पहनते ही भौंहे आड़ी-तिरछी होने लगतीं। जर्मन-अमेरिकन अभिनेत्री मर्लिन डाइट्रिच को पैंट पहनकर जाने पर एक रेस्त्रां में घुसने की अनुमति नहीं मिली। मर्लिन उसके बाद कभी रेस्त्रां नहीं गईं।

कैरेबियन द्वीप प्यूर्टो रिको की लेखिका लुइसा केपेटिलो ने बिना किसी आड़ के खुलकर बराबरी की जंग छेड़ी। लुइसा का मानना था कि स्त्रियां भी आजाद हैं! अपने-आप में बेहद बगावत-भरा ये विचार ही जैसे काफी न हो, लुइसा ने पुरुषों की तरह ट्राउजर पहन लिया और घर से बाहर निकल गईं। वे कॉफी शॉप पहुंचीं, जहां क्रांति और दर्शन की बातें करते विचारवान पुरुष पलकें झपकाना भूल गए। वे बाजार गईं तो जैसे एकाएक सारी खरीदारी रुक गई। वे सड़कों पर टहलने लगीं। इतने में ही पुलिस ने आकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। ये साल 1919 की बात है। कैरेबियन लेखिका को ट्राउजर पहनने पर जेल मिली। यूपी की अनाम बच्ची को जींस पहनने पर मौत।

वक्त चाहकर भी थमा हुआ है, जैसे किसी जादुई कहानी में किरदार जम जाते हैं। इस जादू को तोड़ने कोई राजकुमार नहीं आएगा। औरतों को ही आगे आना होगा। आम औरत- खास औरत। सड़क बुहारती औरत- सरकार के सामने तर्क रखती औरत। क्योंकि बात यहां कपड़ों की नहीं, बात आजादी की है। चुनने की आजादी, फिर चाहे वह पोशाक हो या फिर जीवन।

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