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आज की पॉजिटिव खबर:पुनीत ने नौकरी छोड़ एडिबल कप बनाना शुरू किया, इस्तेमाल के बाद इसे खा सकते हैं; 70 लाख टर्नओवर

नई दिल्ली5 महीने पहलेलेखक: इंद्रभूषण मिश्र

दिल्ली के रहने वाले पुनीत दत्त MBA ग्रेजुएट हैं। लंबे समय तक मार्केटिंग और बिजनेस फील्ड में काम किया है। अब वे गुड़ और अनाज से बने चाय के कप की मार्केटिंग कर रहे हैं। ये एडिबल कप हैं, यानी इस्तेमाल के बाद इन्हें आप खा भी सकते हैं। भारत के साथ ही विदेशों में भी उनके प्रोडक्ट की डिमांड है। हर दिन उन्हें सैकड़ों ऑर्डर मिल रहे हैं। इससे सालाना 70 से 80 लाख रुपए का वे बिजनेस कर रहे हैं। 50 लोगों को उन्होंने नौकरी भी दी है।

आज की पॉजिटिव खबर में आइए जानते हैं पुनीत के सफर और उनके बिजनेस के बारे में...

पुनीत बताते हैं कि लाइफ में सब कुछ सही चल रहा था। अच्छी नौकरी थी और काम में भी किसी तरह की दिक्कत नहीं थी। तब बिजनेस जैसी चीज हमारे दिमाग में थी भी नहीं। 4 साल पहले की बात है, हम परिवार के साथ दिल्ली से वृंदावन जा रहे थे। तभी रास्ते में यमुना नदी में कुछ बहता हुआ दिखा। मुझे वो चीज थोड़ी अनकॉमन लगी, उसकी लंबाई काफी ज्यादा दी। उस चीज को देखने के लिए मैं वहीं रुक गया और बाकी लोगों को जाने के लिए कह दिया।

यमुना नदी में कुछ अजीब चीज बहते देखा तो आया आइडिया
जब नदी के पास पहुंचा तो देखा कि बहुत लंबा थर्मोकोल बहता हुआ आ रहा है। ये वो दौर था जब देश में प्लास्टिक फ्री मुहिम शुरू हुई थी। मैं काफी देर तक सोचता रहा कि हम लोग अब तक जो कुछ भी कर रहे हैं, वो सब बेकार है। इन समस्याओं को दूर करने कोई अलग से नहीं आएगा, हमें खुद ही इसे दूर करना होगा।

पुनीत ने साल 2019 में गुड़ और अनाज को मिक्स करके एडबिल कप और प्लेट का बिजनेस शुरू किया।
पुनीत ने साल 2019 में गुड़ और अनाज को मिक्स करके एडबिल कप और प्लेट का बिजनेस शुरू किया।

मन में यही सोचते हुए मैं वृंदावन गया। वहां देखा तो सब प्लेट और थाली खत्म हो गई थी। भंडारे में भीड़ काफी ज्यादा थी। समझ नहीं आ रहा था कि प्रसाद कैसे लूं। तभी देखा कि एक बाबा जी पुड़ी को ही गोल बनाकर उसमें सब्जी डालकर खा रहे हैं। उन्हें प्लेट की जरूरत ही नहीं पड़ी। मेरे लिए वो सीन टर्निंग पॉइंट रहा। उसके बाद मैं कुछ अलग करने को लेकर प्लान करने लगा।

40 साल के पुनीत कहते हैं कि पॉल्यूशन फ्री मूवमेंट में इस बात पर फोकस किया जाता है कि हम कम से कम कचरा फेंकें, ज्यादातर लोग इसी कॉन्सेप्ट पर काम करते हैं, लेकिन मैंने तय किया कि कचरे पर रोक लगाने की बजाय हम क्यों न उन प्रोडक्ट को कचरे में शामिल करें जिसे फेंकने से किसी तरह का नुकसान नहीं हो, बल्कि उल्टे उससे फायदा हो। तब मेरे दिमाग में वो बाबा वाला सीन घूम रहा था।

एडिबल प्रोडक्ट का टिकाऊ होना सबसे चैलेंजिंग टास्क
भास्कर से बात करते हुए पुनीत कहते हैं, 'मैंने एडिबल प्लेट और कप को लेकर काम करना शुरू किया। इस फील्ड में काम कर रहे लोगों के बारे में जानकारी जुटाई। उनके कॉन्सेप्ट को समझा। काफी रिसर्च किया। इस पर अच्छी खासी रकम भी खर्च हुई। तब मुझे पता लगा कि पहले से जो लोग एडिबल कप या प्लेट बना रहे हैं, वो न तो अधिक वक्त तक टिकाऊ हैं और न ही खाने के लिए पूरी तरह सेफ हैं। इसलिए मैं लगातार रिसर्च करता रहा।'

पुनीत कहते हैं कि हमने कई लोकल चाय बेचने वालों को भी अपने कप प्रोवाइड किए हैं। उनके कस्टमर्स का भी अच्छा रिस्पॉन्स रहा है।
पुनीत कहते हैं कि हमने कई लोकल चाय बेचने वालों को भी अपने कप प्रोवाइड किए हैं। उनके कस्टमर्स का भी अच्छा रिस्पॉन्स रहा है।

वे बताते हैं, 'कहीं से ट्रैवल करते वक्त मुझे एक आदमी मिला। वो मुझे एक इमारत दिखा रहा था जो गुड़ के इस्तेमाल से बनी थी। पहले तो मुझे बहुत अजीब लगा, लेकिन जब जानकारी जुटाई तो पता चला कि पहले भी गुड़ से इस तरह की चीजें बनाई जाती रही हैं और हमारे पूर्वज लोग नींव के लिए भी गुड़ का इस्तेमाल करते रहे हैं। स्टडी में भी पता चला कि गुड़ की ऐसी प्रॉपर्टी है कि वह गर्म चीज को भी काफी देर तक सह लेगा। इसके बाद मैंने गुड़ से एडिबल कप बनाने को लेकर प्लान करने लगा।'

नौकरी छोड़ शुरू किया एडिबल प्लेट और कप का स्टार्टअप
साल 2019 में पुनीत ने नौकरी छोड़ दी और आटावेयर नाम से अपना स्टार्टअप शुरू किया। उन्होंने गुड़ और अनाज से बने कप, प्लेट, चम्मच बनाना शुरू किया। फिर जगह-जगह स्टॉल लगाकर मार्केटिंग शुरू की। धीरे-धीरे ही सही अच्छा रिस्पॉन्स भी मिलने लगा, लेकिन लागत के मुताबिक कमाई नहीं हो पा रही थी।

वे कहते हैं कि एक स्वदेशी संगठन ने मुझे अपने मेले में बुलाया। वहां मेरा स्टॉल लगवाया। तब दिल्ली के एक यूट्यूबर ने हमारी वीडियो बना ली। मैंने बहुत ध्यान भी नहीं दिया था, लेकिन कुछ ही दिनों में वो वीडियो वायरल हो गई और मेरे पास एक के बाद एक बहुत सारे कॉल आने लगे। तभी से मेरे काम को रफ्तार मिली। कई बड़ी कंपनियों ने हमसे टाइअप किया। कुछ ही महीने में मेरे काम को पहचान मिलने लगी, लेकिन तभी साल 2020 में कोरोना आ गया और बिजनेस ठप हो गया।

कोरोना में काम बंद हुआ तो बदली स्ट्रैटजी

पुनीत कहते हैं कि मेरी मुहिम को युवाओं का काफी सपोर्ट मिल रहा है। वे लोग इस तरह के इनोवेशन को पसंद कर रहे हैं।
पुनीत कहते हैं कि मेरी मुहिम को युवाओं का काफी सपोर्ट मिल रहा है। वे लोग इस तरह के इनोवेशन को पसंद कर रहे हैं।

पुनीत कहते हैं कि कोरोना के दौरान लॉकडाउन लगने से हमें काफी नुकसान हुआ। कोई भी प्रोडक्ट बाहर नहीं जा पाया। एक्सपायर होने के डर से सारे प्रोडक्ट हमने गोशाला में ले जाकर गायों को खिला दिए कि चलो बेकार होने से अच्छा है कि पैसे न सही, पुण्य ही कमा लिया जाए। इसके बाद हमने अपनी स्ट्रैटजी बदली और प्रोडक्ट की वैराइटी को कम कर दिया। प्लेट और चम्मच के बजाय चाय के कप पर फोकस कर दिया, क्योंकि देश में सबसे ज्यादा अगर किसी चीज का इस्तेमाल होता है तो वो चाय का कप ही है।

इसके बाद बड़ी संख्या में उन्होंने चाय के कप तैयार किए और फिर सोशल मीडिया के जरिए मार्केटिंग पर फोकस किया। जल्द ही उन्हें ऑर्डर मिलने लगे और उनका कारोबार एक बार फिर से जम गया। महामारी के बाद भी उन्हें दूसरी लहर के दौरान 3 से 4 लाख रुपए का मुनाफा हुआ। फिर कई चाय बेचने वाले लोगों ने उनसे संपर्क किया। बड़े दुकानदारों और होटल वालों से डील हुई। जिसका बिजनेस के लिहाज से काफी फायदा मिला।

अलग-अलग 9 फ्लेवर के एडिबल कप
पुनीत कहते हैं कि मार्केटिंग के दौरान चाय बेचने वाले दुकानदारों से हमें एक फीडबैक मिला। दरअसल उनका कहना था कि लोग ग्रुप में चाय पीने आते हैं और अलग-अलग वैराइटी की डिमांड करते हैं। कोई अदरक फ्लेवर तो कोई इलाइची फ्लेवर तो कोई बिना शक्कर की चाय की डिमांड करता है। ऐसे में उन्हें अलग-अलग फ्लेवर की चाय बनाने में दिक्कत होती है। इसलिए मैंने तय किया कि कप की वैराइटी ही बढ़ा दी जाए जिससे अलग-अलग फ्लेवर की चाय बनाने का टेंशन ही नहीं रहे।

धार्मिक आयोजनों में बड़े लेवल पर प्लास्टिक का यूज होता है। इसलिए उन जगहों पर जाकर अपने प्रोडक्ट को लेकर पुनीत जागरूकता फैला रहे हैं।
धार्मिक आयोजनों में बड़े लेवल पर प्लास्टिक का यूज होता है। इसलिए उन जगहों पर जाकर अपने प्रोडक्ट को लेकर पुनीत जागरूकता फैला रहे हैं।

इसके बाद उन्होंने 9 तरह के कप लॉन्च किए। इसमें अदरक, इलाइची, कॉफी, वैनिला, तुलसी जैसे फ्लेवर शामिल हैं। इसमें नॉर्मल चाय भरने से उसका टेस्ट कप के फ्लेवर के हिसाब से हो जाता है।

इस्तेमाल के बाद कप को खाइए या फेंकिए फायदा ही होगा
पुनीत कहते हैं कि इसके इस्तेमाल के बाद हम सजेस्ट करते हैं कि लोग कप को भी खा जाएं, लेकिन कई लोग इसे खाना पसंद नहीं करते हैं। दोनों ही कंडीशन में कोई दिक्कत नहीं है। आप खाएंगे तो भी अच्छी बात है और आप कहीं फेंक भी देते हैं तो दिक्कत नहीं है। जो भी जानवर इसे खाएंगे उससे उनका भला होगा। अगर इसे डीकंपोज भी किया जाता है तो कोई नुकसान नहीं है। हालांकि, हम लोगों को सलाह देते हैं कि वे इधर-उधर कप फेंकने के बजाय ऐसी जगह फेंके जहां उसे जानवर खा लें।

वे कहते हैं कि हमारे कप में 5-6 घंटे तक गर्म चीज रखी जा सकती है। उस पर कोई असर नहीं होगा। इतना ही नहीं 6 महीने तक इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे खाने से किसी तरह का साइड इफेक्ट नहीं होगा। जहां तक कीमत की बात है। एक कप की कीमत 10 से 12 रुपए पड़ती है।

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