बात बराबरी की:कपड़ों को इतना छोटा और चुस्त करो कि महिलाएं खेल में चाहे जो करें, लेकिन देखने वालों का मनोरंजन भरपूर हो

नई दिल्ली3 महीने पहले
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ये उस दौर की बात है, जब यूनान दुनिया का राजा होता था। संस्कृति से लेकर विज्ञान पर यूनानी तर्क सबसे भरोसेमंद कहलाते। इसी दौर में वहां के चिकित्सकों ने दावा किया कि स्त्री-देह, पुरुषों की तुलना में काफी कमजोर होती है। औरतें गुड़िया की तरह सजकर मन बहला सकती हैं और छुटपुट घरेलू काम कर सकती हैं। इसके अलावा उनका सबसे अहम काम है- औलाद पैदा करना। अगर वे तेजी से साइकिल चलाएं, घुड़सवारी करें या ऊंची कूद लगाएं तो उनका गर्भाशय तहस-नहस हो जाएगा। इस तरह से औरतों का खेल-कूद में हिस्सा लेना कयामत से भी ज्यादा डरावना हो गया।

वक्त बीता। महिलाएं ओलिंपिक से जुड़ीं। उनका गर्भाशय फौलादी साबित हुआ। यहां तक कि मजबूत मांसपेशियों के बावजूद उनमें ‘औरत वाली’ तमाम खूबियां बाकी रहीं। तब एक काम ये हुआ कि महिला खिलाड़ियों की पोशाक नए सिरे से डिजाइन हुई। ऐसे कि उनकी जांघें, पिंडलियां और शरीर के दूसरे उतार-चढ़ाव आसानी से दिख सकें। हाल में जर्मन महिला टीम ने टोक्यो ओलिंपिक के दौरान इसके विरोध में अपना ड्रेसकोड बदल दिया। वे जांघ-दर्शना ड्रेस से पूरे कपड़ों पर आ गईं। इसके बाद ऐसा शोर मचा, जितना उन पहाड़ी गांवों में भी नहीं होता, जहां जंगली जानवरों के आने पर टीन की थालियां टनटनाती हैं।

दरअसल हुआ ये कि जर्मनी की महिला जिमनास्टिक टीम ने 'लियोटार्ड' यानी जांघों से भी पहले रुक जाने वाली पोशाक की बजाए 'यूनिटार्ड' पहना। उनका तर्क था कि इससे खेल में आसानी होती है। इसके अलावा टीम का ये भी कहना था कि जब पुरुष लंबे कपड़ों के साथ खेल सकते हैं तो महिला खिलाड़ियों पर जबरन बित्ता-भर कपड़े क्यों थोपे जा रहे हैं! ऊंची-पूरी जर्मन लड़कियां एड़ियों तक ढंके कपड़ों के साथ उतरीं। देखने वाले अवाक थे- ऐसी खिलाड़ियों का क्या काम, जिनके न बांहें खुलकर दिखती हैं, न पैर! लड़कियां यहीं नहीं रुकीं।

नॉर्वे की महिला हैंडबॉल टीम ने बिकनी बॉटम छोड़कर शॉर्ट्स पहनने का फैसला लिया। ये कपड़े भी दर्शकों की उम्मीद को तोड़ने वाले साबित हुए। भड़के हुए यूरोपियन हैंडबॉल फेडरेशन ने टीम पर हजारों पाउंड का जुर्माना लगा दिया। सोशल मीडिया पर इसके बाद से महिला खिलाड़ियों के साथ भेदभाव की दुंदुभी बज रही है। लोग बता रहे हैं कि कपड़ों से लेकर खानपान और ट्रेनिंग में भी महिलाओं के साथ कितना फर्क किया जाता है।

इस अंतर की शुरुआत हुई थी न्यूड परेड से। ये साठ के दशक की बात है। सोवियत संघ समेत कई कम्युनिस्ट देश शक के घेरे में थे। यूरोप को लगता था कि ये मुल्क महिला खिलाड़ियों के नाम पर पुरुषों को खेल में उतार रहे हैं। इस शक की उनके पास मजेदार वजह भी थी। हो ये रहा था कि उनकी महिलाएं खेल में काफी आगे थीं। यहां तक कि प्रदर्शन में वे पुरुषों को भी हरा सकती थीं। तो मान लिया गया कि महिलाएं तो इतना बढ़िया खेल ही नहीं सकतीं, यानी वे महिला के अवतार में पुरुष हैं। इसके बाद न्यूड परेड कराई जाने लगी। इस दौरान महिला खिलाड़ियों को पूरे कपड़े उतारकर कई देशों के डॉक्टरों की टीम के सामने आना होता। वे ठोक-बजाकर पक्का करते कि फलां खिलाड़ी महिला ही है।

काफी हो-हल्ले के बाद न्यूड परेड को हटाकर क्रोमोजोम की जांच शुरू हुई, लेकिन तब तक इस सबका इतना हौआ हो चुका था कि भरपूर ताकत के बाद भी महिला खिलाड़ी अपने हुनर को दिखाने से बचने लगीं। उन्हें डर था कि बेहतर प्रदर्शन के कारण कहीं उन्हें भी न्यूड परेड में शामिल न होना पड़े।

मॉर्डन ओलिंपिक के पितामह कहलाने वाले बेरन पिअरे (Baron Pierre) ने ओलिंपिक का भविष्य बताते हुए ऐलान ही कर डाला था कि ये मर्दाना खेल है। पिअरे के मुताबिक औरतें कितनी ही मजबूत क्यों न हों, उनके शरीर की बनावट ऐसी है कि वे मेहनत नहीं झेल सकतीं। बस, फिर क्या था। उदारमना पुरुष बिरादरी ने भले ही खेलों में औरतों के लिए भी एक संकरी गली खोल दी, लेकिन साथ ही साथ ‘भूल-सुधार’ भी करते रहे। ऐसा ही एक सुधार था- महिला प्लेयर्स और जिमनास्ट के कपड़ों की कांट-छांट। कपड़ों को इतना छोटा और चुस्त करो कि महिलाएं खेल में चाहे जो करें, लेकिन देखने वालों का मनोरंजन भरपूर हो।

वैसे महिला खिलाड़ियों के कपड़ों पर प्रयोग का इतिहास काफी दिलचस्प है। असल में महिलाओं को खेलने की इजाजत तो दे दी गई, लेकिन आयोजक डरे हुए थे। उन्हें लगता था कि पसीना-पसीना हुई मजबूत स्त्री-देह पुरुष खिलाड़ियों का खेल से ध्यान हटा सकती है। इसे टालने के लिए महिलाओं को लंबे चोगेनुमा कपड़े पहनाए गए, जो एड़ी तक होते और जिनका गला भी ऊपर तक था।

साल 1908 में लंदन ओलिंपिक के दौरान पहली बार महिलाओं से ये परदा उठा। यहां से उनके घुटने तक का हिस्सा खुला रहने लगा। हालांकि शुरू में आजादी जैसा लगता ये कदम, गुलामी की नई शुरुआत निकला। औरतों के कपड़े लगातार छोटे होते गए। वहीं पुरुष खिलाड़ियों के लिए कपड़ों में आराम का पूरा ध्यान रखा गया।

साल 2012 में लंदन में ओलिंपिक के दौरान ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने द टेलीग्राफ को एक इंटरव्यू दिया था। जॉनसन ने इसमें ओलिंपिक को लेकर खुश होने की 20 वजहें गिनाई थीं। अंदाजा लगाएं कि इस बात का जिक्र यहां क्यों है! दरअसल जॉनसन ने एक वजह ये दी थी कि ओलिंपिक में अर्धनग्न खूबसूरत महिला खिलाड़ी होती हैं। लेखक ने आगे लिखा- महिलाएं वॉलीबॉल खेलती हुई ऊदबिलाव की तरह चमकती हैं, जिन्हें देखते मन नहीं भरता। तो कुल मिलाकर, किसी मुल्क का प्रधानमंत्री हो या फिर सोशल मीडिया पर कटखनी बिल्ली बना ट्रोलर- खेलती हुई लड़कियां सबके लिए केवल लड़कियां हैं, जो हल्के-फुल्के करतब दिखाकर मनबहलाव करती हैं।

इस दफे ओलिंपिक में देश की कई महिला खिलाड़ियों ने अपनी ऊर्जा से मिसाल कायम कर दी। वे लौटेंगी तो तालियों की गूंज और गेंदे की मालाओं के साथ, लेकिन कुछ महीनों या सालों बाद हमेशा के लिए खो जाएंगी, केवल एक लड़की होकर। हम ये नहीं कहते कि गुस्साई लड़कियां बागी हो जाएं। खेलों को किताबों से ढंक दें। या फिर ओलिंपिक का बहिष्कार कर दें। लेकिन हां, अगली बार कॉलेज की प्रतियोगिता में, या फिर किसी खाली जिम में पसीना बहाते हुए वे इन वाकयों को जरूर याद रखें।

वे याद रखें कि इस लंबे सफर को तय करते हुए कितनी महिला खिलाड़ी होम हुईं। कितनी महिलाएं सिर्फ ज्यादा मजबूत होने के कारण नग्न परेड से गुजरी होंगी। हमने आज तक कितने ही आंदोलन किए। समानता के इन आंदोलनों में एक हिस्सा खिलाड़ियों के नाम भी कर दें। इसलिए नहीं कि वे देश के लिए सोना जीतकर लाएं, बल्कि इसलिए कि उनकी हार भी आने वाली पीढ़ी के लिए जीत का रास्ता बनेगी।

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