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बाटा के ब्रांड बनने की कहानी:भारत के लोग बाटा को समझते हैं देसी ब्रांड; 127 साल पहले चेकोस्लोवाकिया से हुई थी शुरुआत, आज रोजाना 10 लाख ग्राहक

3 महीने पहले

1925 में चेकोस्लोवाकिया के कारोबारी थॉमस बाटा भारत आए। वो अपनी जूता कंपनी के लिए रबर और चमड़ा खरीदना चाहते थे। कोलकाता की सड़कों पर घूमते हुए उन्होंने देखा कि यहां ज्यादातर लोग नंगे पैर हैं या उन्होंने बेहद खराब क्वालिटी के जूते पहन रखे हैं।

थॉमस बाटा की दूरदर्शी सोच ने भारत के पोटेंशियल मार्केट को समझ लिया। उन्होंने उसी वक्त भारत में अपनी एक जूता फैक्ट्री शुरू करने का फैसला किया। 1931 में बाटा ने पश्चिम बंगाल के कोन्नागर में पहली फैक्ट्री खोली, जो बाद में बाटानगर में बदल गई।

भारत में बाटा को आए 90 साल पूरे हो चुके हैं। आज भारत के 35% शू मार्केट पर बाटा का कब्जा है और ये नंबर-1 बना हुआ है। अधिकांश लोग बाटा को देसी ब्रांड ही समझते हैं, लेकिन इसकी शुरुआत चेकोस्लोवाकिया से हुई थी। आज की ब्रांड स्टोरी में हम आपको बाटा की शुरुआत, दुनिया भर में विस्तार, बिजनेस और मार्केटिंग का तरीका और भारत के लोगों की जिंदगी का हिस्सा बनने की कहानी सुना रहे हैं...

थॉमस बाटा के विजन से हुई शुरुआत
यूरोपीय देश चेकोस्लोवाकिया के एक छोटे से कस्बे ज्लिन में रहने वाला बाटा परिवार कई पीढ़ियों से जूते बनाकर गुजर-बसर कर रहा था। संघर्षों के बीच वक्त गुजरता रहा। 1894 में इस परिवार की किस्मत पलटी जब युवा थॉमस ने बड़े सपने देखे।

उसने फैमिली बिजनेस को प्रोफेशनल बनाने के लिए बहन एना और भाई एंटोनिन को अपना सहयोगी बनाया। बड़ी मुश्किल से भाई-बहनों ने मां को राजी किया और उनसे 320 डॅालर प्राप्त किए। इसके बाद उन्होंने गांव में ही दो कमरे किराए पर लेकर किस्तों पर दो सिलाई मशीनें लीं, कर्ज लेकर कच्चा माल खरीदा और कारोबार की शुरुआत कर दी।

शुरुआती दिनों में बाटा की फैक्ट्री में जूते बनाते कारीगर। बड़े स्केल पर जूता बनाने की वजह से उनकी लागत कम आती थी, जिससे बाटा के जूते कम दाम पर बेचे जाते थे।
शुरुआती दिनों में बाटा की फैक्ट्री में जूते बनाते कारीगर। बड़े स्केल पर जूता बनाने की वजह से उनकी लागत कम आती थी, जिससे बाटा के जूते कम दाम पर बेचे जाते थे।

वैश्विक हालात के हिसाब से खुद को ढाला
बाटा ने 1909 तक जूतों का एक्सपोर्ट शुरू कर दिया था। जल्द ही दुनिया पहले विश्वयुद्ध की गिरफ्त में चली गई। उसके बाद भयानक मंदी का दौर और फिर द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया। ये तीनों घटनाएं किसी भी बिजनेस के लिए बुरे सपने की तरह थीं।

बाटा के फाउंडर्स ने बदलते हालात के मुताबिक मॉडर्न प्रोडक्शन की सारी टेक्नीक को अपनाया। जब जूतों की मांग घटी तो उन्होंने कीमत आधी कर दीं। 1926-28 के दौरान बाटा के कर्मचारी 35% बढ़ गए और थॉमस बाटा चेकोस्लोवाकिया के चौथे सबसे अमीर शख्स बन गए।

भारत में बाटा की एंट्री
भारत में लेदर और रबर खरीदने आए थॉमस ने भारतीयों को जूते पहनाने का बीड़ा उठाया। करीब 90 साल पहले 1931 में हमारे देश में बाटा आ गया था। बाटा ने पहली फैक्ट्री पश्चिम बंगाल के कोन्नागर में खोली थी। इसके बाद बाटागंज (बिहार), फरीदाबाद (हरियाणा), पिनया (कर्नाटक) और होसुर (तमिलनाडु) समेत पांच फैक्टरियां शुरू हुईं।

इन सभी जगहों पर चमड़ा, रबर, कैनवास और PVC से सस्ते, आरामदायक और मजबूत जूते बनाए जाते हैं। आज भारत कंपनी का सबसे बड़ा इंटरनेशनल मार्केट है। भारत में बाटा ऐसा शू ब्रांड है, जिसका अपना लॉयल मध्यमवर्गीय ग्राहक समुदाय है।

भारत में बाटा का दिलचस्प सफर
जब बाटा ने भारत में कारोबार शुरू किया उस वक्त का शू मार्केट बिखरा हुआ था। सिर्फ जापान से इंपोर्ट किए जूते और देसी जूते ही मौजूद थे। कंपनी ने शुरुआत से ही दाम कम रखे, ताकि भारत के शू मार्केट पर अपनी पकड़ बना ली जाए। जूतों का नयापन, मजबूती और मार्केटिंग की बदौलत भारत की जनता ने बाटा को हाथोंहाथ लिया।

1939 तक भारत में बाटा की 86 दुकानों में करीब 4 हजार कर्मचारी काम करने लगे थे। कंपनी हर हफ्ते 3,500 जोड़ी जूते बेचने लगी थी। 1952 में कंपनी ने चमड़ा शोध के लिए मोकमेह घाट बिहार में टैनेरीज शुरू की।

1972 में कंपनी ने 6.7 करोड़ डॉलर रेवेन्यू जुटाया था। 70 के दशक में कंपनी ने सिर्फ जूते नहीं, जूते बनाने वाली मशीनों का एक्सपोर्ट भी शुरू कर दिया था। बाटा इंडिया 1973 में पब्लिक कंपनी बनी। ये दौड़ 1990 के दशक तक जारी रही।

1991 में भारत के बाजार खुल गए। दुनिया की कंपनियों ने भारत की तरफ रुख किया। बाटा के सामने लेबर यूनियनों का विवाद, प्रतिस्पर्धा और कीमतों में अनियमितता जैसी कई चुनौतियां थीं।

बाटा को बदलना पड़ा अपना ग्लोबल हेडक्वार्टर

चेकोस्लोवाकिया में कम्युनिज्म के उभार के बाद बाटा ने 1964 में अपना ऑपरेशन कनाडा से करना शुरू कर दिया। कंपनी 1989 में वापस आई जब उसे राष्ट्रीयकरण के लिए बाध्य किया गया। ये फैसला बिजनेस के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण साबित हुआ।

आखिरकार 2004 में बाटा का हेडक्वार्टर स्विट्जरलैंड के लुआसाने चला गया और मालिकाना हक थॉमस बाटा के पड़पोते थॉमस जे बाटा को ट्रांसफर कर दिया गया। खुद को दोबारा खड़ा करते हुए कंपनी ने अपने इंटरनेशनल ऑपरेशंस को खुद से काम करने की छूट देनी शुरू की। इसी मॉडल का नतीजा है कि फिलहाल बाटा इंडिया की सिर्फ 53% हिस्सेदारी ही पैरेंट कंपनी बाटा कॉर्पोरेशन के पास है।

भारत में बाटा टॉप पर बना रहा
बाटा ने भारत के शू मार्केट में बहुत जल्दी एंट्री मारी। इसका फायदा ब्रांड स्थापित करने में मिला। बाटा ने अपना पूरा फोकस किफायत और कंज्यूमर सेंट्रिक रखा। स्कूल शूज, प्रोडक्ट के कंफर्ट की वजह से ये फैमिली ब्रांड का दर्जा पा गया और बाजार में टिका रहा।

बाटा के लिए भारत टॉप-3 रेवेन्यू वाले देशों में शामिल है। पिछले 10 सालों में कंपनी के स्टॉक प्राइस में करीब 1600% की बढ़ोत्तरी देखने को मिली है। बाटा इंडिया की सालाना कमाई मार्च 2020 में 3156 करोड़ रुपए पहुंच गई थी। हालांकि, कोरोना महामारी की वजह से मार्च 2021 में ये घटकर करीब 1539 करोड़ रुपए रह गई। महामारी के बावजूद कंपनी लगातार अपने नए स्टोर्स खोलने की दिशा में बढ़ रहा है।