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लक्षद्वीप के सांसद मोहम्मद फैजल बोले:बीफ खाना हमारा संवैधानिक अधिकार है, प्रशासक प्रफुल्ल पटेल हटाए जाएं; उनका तो BJP भी कर रही है विरोध

नई दिल्ली7 दिन पहलेलेखक: पूनम कौशल

आमतौर पर शांत, कोरल रीफ और अपने समुद्री तालों के लिए मशहूर लक्षद्वीप खबरों से दूर ही रहता है, लेकिन पिछले दो हफ्ते से ये सुर्खियों में है। वजह है, यहां के प्रशासक प्रफुल्ल पटेल के हाल के महीनों में उठाए गए कदम। दरअसल, दमन-दीव और दादरा-नगर हवेली के प्रशासक प्रफुल्ल पटेल को दिसंबर 2020 में लक्षद्वीप का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था। तब से उन्होंने यहां बीफ बैन कर दिया है, शराब पर लगी पाबंदी हटा दी है, नए डेवलपमेंट अथॉरिटी को असीमित अधिकार दे दिए हैं और एक सख्त कानून पारित किया है जिसके तहत किसी को भी एक साल तक बिना जमानत के जेल में डाला जा सकता है।

इसके खिलाफ यहां के लोग सड़कों पर हैं। उन्हें डर है कि उनकी जमीन, उनके अधिकार, रहन-सहन और संस्कृति खतरे में हैं। बता दें कि करीब 70 हजार की आबादी वाले लक्षद्वीप में 96% मुसलमान हैं। इन तमाम मुद्दों को लेकर दैनिक भास्कर ने लक्षद्वीप के सांसद पीपी मोहम्मद फैजल से बातचीत की। पढ़िए बातचीत के प्रमुख अंश...

सवाल: हमेशा शांत रहने वाला लक्षद्वीप अचानक चर्चा में क्यों हैं, ऐसा वहां क्या हो रहा है?

जवाब: लक्षद्वीप ऐसी जगह है जहां लोग शांति से रहते हैं। यहां की देशभक्ति और मेहमान नवाजी मशहूर है। अब ये छोटा सा टापू सुर्खियों में है। इसकी वजह सिर्फ वहां के नए प्रशासक प्रफुल्ल पटेल हैं। वो जिस तरह के कानून लाने की कोशिश कर रहे हैं, उसी के खिलाफ लोग सड़कों पर हैं।

सवाल: ये कानून या प्रस्ताव लाने से पहले क्या रिप्रेजेंटेटिव्स से चर्चा की गई, कोई बैठक या बातचीत हुई?

जवाब : मैं वहां का सांसद हूं। मुझे भी इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई। जब इसका ड्राफ्ट पब्लिश हुआ, तब मुझे पता चला। जिस तरह वहां के आम लोगों को इस बारे में पता चला, उसी तरह मुझे भी पता चला। पंचायत के प्रतिनिधियों को भी इसके बारे में ना कोई जानकारी दी गई थी और ना ही उनसे कोई चर्चा की गई थी। ये एकतरफा कानून हैं, जो लाए जा रहे हैं।

सवाल: लेकिन प्रशासन का ये तर्क है कि अभी ये सिर्फ प्रस्ताव हैं, इनका विरोध फिर क्यों हो रहा है?

जवाब: लोकतांत्रिक प्रक्रिया में प्री-लेजिस्लेटिव कंसल्टेशन (कानून बनाए जाने से पहले चर्चा ) का सिद्धांत होता है। लक्षद्वीप में किसी से भी इन प्रस्तावों के बारे में ना कोई बात की गई और ना ही कोई राय ली गई। ना सांसद से बात हुई, ना जिला पंचायत से बात हुई। जो ड्राफ्ट पब्लिश हुआ है वो सिर्फ अंग्रेजी भाषा में हैं, वहां के लोगों की मातृभाषा में नहीं है। लक्षद्वीप के अधिकतर लोग मलयालम बोलते हैं। ड्राफ्ट में क्या है, उसके अनुवाद के बिना स्थानीय लोग कैसे समझेंगे?

जब ये ड्राफ्ट निकाला गया, तब महामारी अपने चरम पर थी। लक्षद्वीप में लॉकडाउन चल रहा है। यदि किसी को ऑब्जेक्शन फाइल करना हो या वकील से राय लेनी है तो वो यह भी नहीं कर सकता है। एक महीने से लक्षद्वीप में तीन स्तरीय लॉकडाउन है। ऐसे में कोई भी इस ड्राफ्ट का विरोध करने की स्थिति में नहीं है।

सवाल: महामारी के समय इतनी जल्दबाजी में ये कानून क्यों लाए जा रहे हैं?

जवाब: सबसे बड़ा मुद्दा ये है कि लक्षद्वीप डेवलपमेंट अथॉरिटी लाने की जो कोशिश की जा रही है, उससे लोगों को लग रहा है कि उनकी जमीन खतरे में है। प्रशासन अथॉरिटी को लोगों की जमीन छीनने का अधिकार दे रहा है। इससे लोगों में दहशत का माहौल है।

लक्षद्वीप एक बहुत ही छोटी जगह है जिसकी इकोलॉजी बहुत नाजुक है। यहां किसी भी तरह के विकास के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही नोटिफिकेशन जारी किया हुआ है। भारत सरकार ने गजट में उसे लागू भी किया है। अब प्रफुल्ल पटेल जो कानून ला रहे हैं, वो इस नोटिफिकेशन का ही उल्लंघन है। लक्षद्वीप के लोगों में इस नए कानून को लेकर डर है और वो प्रदर्शन करके केंद्र सरकार को इससे अवगत करा रहे हैं। हम चाहते हैं कि कोई भी कानून पूरी प्रक्रिया का पालन करके ही लाया जाए। स्थानीय लोगों और पंचायत से चर्चा की जानी चाहिए।

सवाल: आप ड्राफ्ट की भाषा, टाइमिंग और नीयत पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन प्रशासन का तर्क है कि ये विकास के लिए बहुत जरूरी है?

जवाब: विकास का विरोध कौन करता है। सवाल ये है कि विकास के लिए गुंडा एक्ट की क्या जरूरत है। विकास के लिए एनिमल कंजर्वेशन रेगुलेशन की क्या जरूरत है। जहां शराब बंद है, वहां शराब बेचने की क्या जरूरत है। विकास के लिए पंचायत से दो बच्चों से अधिक वाले लोगों को बाहर करने की क्या जरूरत है। ये सब विकास के लिए नहीं हैं। विकास के लिए करना है तो प्रशासन को लक्षद्वीप के उद्यमियों को उनकी अपनी जमीन पर पर्यटन विकास की मंजूरी देनी चाहिए। वो पांच साल से परमिशन मांग रहे हैं, लेकिन नहीं मिल रही है।

लक्षद्वीप जैसे शांत प्रदेश में जहां देश में सबसे कम अपराध होते हैं, जेलें खाली हैं, वहां गुंडा एक्ट लाया जा रहा है ताकि सरकार का विरोध करने वालों को बिना कारण जेल में डाला जा सके। इन नए कानूनों का सीधा मकसद है कि सरकार के खिलाफ हर आवाज को बंद कर दिया जाए। कोई बोलने की हिम्मत ही ना करे। जहां तक विकास की बात है, प्रफुल्ल पटेल के पहले भी लक्षद्वीप में बहुत विकास हुआ है। हेल्थ सेक्टर में विकास हुआ है। ये एडमिनिस्ट्रेशन तो पहले से हुए कामों को बंद कर रहा है।

सवाल: तो फिर प्रशासन के इन कदमों की वजह क्या है? इनका असल मकसद क्या है?

जवाब: ये समझने के लिए हमें दमन और दीव जाना होगा। प्रफुल्ल पटेल ने जो वहां किया है, वही यहां करने की कोशिश कर रहे हैं। वहां उन्होंने लोगों को नौकरियों से निकाला है, कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे लोगों के कॉन्ट्रैक्ट खत्म किए हैं। 90 आदिवासियों के घर तोड़कर, स्कूल को जेल बनाकर उन्हें जेल में डाला है।

लक्षद्वीप में 15-20 मीटर चौड़ी सड़कें डालने की योजना बना रहे हैं। यदि यहां इतनी चौड़ी सड़कें बनाई जाएंगी तो नारियल के कितने पेड़ काटने पड़ेंगे। ये अपने निजी हित वाले कांट्रैक्टर को काम देने के लिए यहां वो विकास करना चाह रहे हैं जिसकी जरूरत ही नहीं है। इनकी मंशा कॉर्पोरेट को सपोर्ट करने की है और उसी के लिए ये नियम-कानून लाए जा रहे हैं।

सवाल: क्या आपको लगता है कि इन बदलावों की कोई और वजह भी हो सकती है?

जवाब : मुझे ऐसा लगता है कि इन सबके पीछे प्रफुल्ल पटेल के निजी हित हैं। वो अपनी पसंद के ठेकेदारों को लाना चाह रहे हैं। लक्षद्वीप के जो छोटे-मोटे ठेकेदार हैं, वो अब इन शर्तों और नियमों के तहत कोई काम ही नहीं कर पाएंगे। हमें लग रहा है कि अपनी पसंद के ठेकेदारों या कॉर्पोरेट कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए वो ये नियम ला रहे हैं। लक्षद्वीप में कई ऐसे दीप हैं जहां कोई नहीं रहता। उनकी मंशा उस जमीन को अपने मातहतों को देने की भी हो सकती है।

लक्षद्वीप में कई ऐसे द्वीप हैं जहां स्कूल हैं, सरकारी कार्यालय हैं, अस्पताल हैं। इनके लिए लोग पहले ही अपनी जमीन दे चुके हैं। यदि सरकार कुछ नया काम करना चाहती है तो इन जमीनों पर ही कर सकती है। पुराने स्ट्रक्चर तोड़कर नए बनाए जा सकते हैं। लक्षद्वीप में पहले से ही जमीन नहीं है। जो है उसे छीनने की बात ये लोग कर रहे हैं।

यदि इन्हें वाकई में कुछ करना है तो यहां फिशरी के डेवलपमेंट पर काम करें। इससे यहां रोजगार भी बढ़ेगा और भारत के GDP में इसका कंट्रीब्यूशन होगा। इनका मकसद विकास नहीं है बल्कि यहां जो भी जमीन है, उस पर कब्जा करना है। ये लक्षद्वीप में भी वही करना चाहते हैं जो इन्होंने दमन और दीव में किया है।

सवाल: जो नए कानून लाए जा रहे हैं, उनका लक्षद्वीप के वातावरण और इकोलॉजी पर क्या असर हो सकता है?

जवाब : बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है। लक्षद्वीप कोरल से बना है। दुनिया की सबसे नाजुक इकोलॉजी है ये। अगर इसे बरकार नहीं रखा गया तो ये द्वीप तबाह हो जाएंगे। यहां 15 मीटर चौड़ी सड़कें बनाने और खनन करने की योजना बनाई जा रही हैं। यदि ये हुआ तो लक्षद्वीप रहेगा ही नहीं। सुप्रीम कोर्ट पहले ही लक्षद्वीप को लेकर गाइडलाइन तय कर चुका है। वो रिपोर्ट बनाने में एक साल लगा था। भारत सरकार ने उसे स्वीकार किया और गजट में नोटीफाई किया, ये ड्राफ्ट उसके खिलाफ है। ये लक्षद्वीप को पूरी तरह बर्बाद कर देगा।

सवाल: इन नए कानूनों का आम लोगों के जीवन पर क्या असर हो सकता है?

जवाब: जब आइलैंड ही नहीं रहेगा तो लोग कहां रहेंगे। यदि ये कानून लागू हुआ तो जमीन अथॉरिटी के पास चली जाएगी। जो जगह अथॉरिटी को चाहिए होगी, वो उसे ले लेंगे। लोगों को वहां से हटा देंगे। इससे जाहिर है कि लोग डरे हुए हैं और परेशान हैं। उन्हें डर है कि जो भी छोटी-मोटी जमीन उनके पास है, वो भी छिन जाएगी। इसलिए ही तो प्रदर्शन हो रहे हैं।

सवाल: सोशल मीडिया पर कई पोस्ट किए गए, जिनमें दावा किया गया कि लक्षद्वीप में कुछ मस्जिदों को भी तोड़ा जा रहा है?

जवाब: शुरू में ऐसी रिपोर्टें आईं थीं कि प्रशासक हाउस के पास एक मस्जिद को हटाया जाएगा। दरअसल प्रफुल्ल पटेल के आने के बाद वहां के कलेक्टर ने मस्जिद के मुतवल्ली को बुलाकर पूछा था कि क्या मस्जिद और कब्रिस्तान को हटाकर कहीं और पहुंचाया जा सकता है? लेकिन सवाल ये है कि क्या ये पूछने की बात है? ये ऐसी चीज है कि इस बारे में कोई सोच भी नहीं सकता। प्रफुल्ल पटेल पहले प्रशासक नहीं हैं। उनसे पहले तो किसी को मस्जिद और कब्रिस्तान से कोई शिकायत नहीं हुई। हालांकि अभी किसी मस्जिद को नहीं तोड़ा गया है।

सवाल: बीफ बैन को लेकर आपका क्या कहना है?

जवाब: लक्षद्वीप में लोग इतने सालों से बीफ खा रहे हैं। हमारी ईटिंग हैबिट हमारा संवैधानिक अधिकार है। ईटिंग हैबिट में दखलअंदाजी करने की कोशिश है। यहां के बच्चों के मिड डे मील से नॉनवेज आइटम निकाले जा रहे हैं। ये हमारे संवैधानिक अधिकारों पर चोट है। ये सही नहीं है।

सवाल : आपने इस मुद्दे पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से भी मुलाकात की है। उनके साथ क्या बात हुई, क्या भरोसा मिला?

जवाब: अमित शाह जी के साथ हमने इस पर लंबी चर्चा की है, गुंडा एक्ट, एनिमल एक्ट, पंचायत नियमों और विवादित डेवलपमेंट अथॉरिटी के मुद्दे को उनके सामने उठाया है। उन्होंने भरोसा दिया है कि इनमें से किसी को भी ऐसे ही पास नहीं किया जाएगा बल्कि लक्षद्वीप के लोगों, पंचायत सदस्यों और संसद सदस्यों के साथ चर्चा करके ही कानून पारित किया जाएगा। ऐसा कोई कानून पारित नहीं किया जाएगा, जो लक्षद्वीप के लोगों के हित में ना हो।

सवाल: अब आगे की रणनीति क्या है?

जवाब: हमने सेव लक्षद्वीप फोरम शुरू किया है। इसमें बीजेपी सहित लक्षद्वीप की सभी पार्टियां शामिल हैं। हमने सोमवार को हंगर स्ट्राइक की, जिसमें पूरा लक्षद्वीप शामिल रहा। इसके अलावा देश और दुनियाभर में रह रहे लक्षद्वीप के लोगों ने 12 घंटे की भूख हड़ताल की है। जब तक प्रफुल्ल पटेल को वापस नहीं बुलाया जाएगा, तब तक हमारे प्रोटेस्ट जारी रहेंगे। लक्षद्वीप को ऐसे प्रशासक की जरूरत है जो यहां के लोगों को समझे, यहां के रिप्रेजेंटेटिव्स का सम्मान करे। प्रफुल्ल पटेल ने जो भी आदेश पारित किए हैं, उन्हें वापस लिए जाने तक हमारा प्रोटेस्ट चलता रहेगा।

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