गवर्नमेंट जॉब का ऑफर छोड़ा, घर वालों ने पागल कहा:बल्ब बेचकर कमाता था 18 हजार, गारमेंट्स कंपनी ने बनाया करोड़पति

2 महीने पहलेलेखक: नीरज झा

पापा बैंक में थे। घर वाले कहते थे, ‘सरकारी नौकरी करो। लाइफ सेट रहेगी।’ लेकिन मैं चाहता था कि खुद का कुछ करूं। 2014 का साल था। भोपाल के राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (RGPV) से B.Tech करने के बाद मैंने दो गवर्नमेंट एग्जाम अगले 6 महीने में क्रैक कर लिए।

पहला- यूनिवर्सिटी एंट्री लेवल (UES) के तहत डिफेंस के लिए एसएसबी का

दूसरा- रीजनल ट्रांसपोर्ट ऑफिसर (RTO)

दोनों पोस्ट के लिए ऑफर लेटर आ चुके थे, लेकिन मैंने ज्वाइन नहीं किया। घर वालों को जब पता चला, तो सभी मुझे पागल कहने लगे। हर रोज घर में लड़ाई-झगड़े शुरू हो गए। जिसके बाद मैं 2014 में घर से भागकर दिल्ली आ गया और सेल्स एंड मार्केटिंग कंपनियों में जॉब करने लगा। बल्ब बेचने का काम करता था। तनख्वाह महीने के 18 हजार थे।

3 साल जॉब करने के बाद खुद का कुछ करने की ऐसी सनक चढ़ी कि 2017 में भोपाल वापस आ गया। खुद की गारमेंट्स मैन्युफैक्चरिंग यानी कपड़ा बनाने की कंपनी शुरू की, जिसका आज सालाना टर्नओवर एक करोड़ है।

बनावटी डॉट कॉम (Banawati.Com) के को-फाउंडर अंकित यादव को आज इस बात का कोई मलाल नहीं है कि उन्होंने गवर्नमेंट जॉब ज्वाइन नहीं की।

तस्वीर में 31 साल के अंकित यादव और 29 साल की उनकी बिजनेस पार्टनर राशि सोनी हैं। दोनों गारमेंट्स मैन्युफैक्चरिंग कंपनी बनावटी डॉट कॉम के को-फाउंडर हैं।
तस्वीर में 31 साल के अंकित यादव और 29 साल की उनकी बिजनेस पार्टनर राशि सोनी हैं। दोनों गारमेंट्स मैन्युफैक्चरिंग कंपनी बनावटी डॉट कॉम के को-फाउंडर हैं।

अंकित बताते हैं, छोटे शहरों में कपड़े बनाना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन हम वर्कर्स को स्किल्ड कर काम कर रहे हैं और सालाना 25 लाख का मुनाफा कमा रहे हैं। भोपाल में कुछ साल पहले तक गारमेंट्स बनाने वाले बड़े प्लेयर्स नहीं थे।

राशि जोशी की इस कंपनी में 50-50% की हिस्सेदारी है। दिलचस्प है कि उन्होंने अंकित यादव की कंपनी में कभी बतौर स्टाफ 2018-19 में ज्वाइन किया था।

अंकित अपने शुरुआती दिनों की ओर लौटते हैं। कहते हैं, 3 साल नौकरी करने से एक्सपीरिएंस बहुत ज्यादा मिला। सोचता था कि अपने लिए क्या कर रहा हूं। जब दूसरी कंपनियों का प्रोडक्ट बेच सकता हूं, तो अपना क्यों नहीं। दिल्ली में LED बल्ब और गाड़ियों के सीट कवर को सेल करता था।

आपको अपनी आखिरी कंपनी का नाम तो नहीं बता सकता, लेकिन मुझे याद है कि बॉस से जबरदस्त झगड़ा हो गया था, जिसके बाद रिजाइन कर मैंने अपना बिजनेस शुरू करने का फैसला किया।

तो आपने शुरुआत कैसे की? पूछने पर अंकित बताते हैं, पहले तो घर में ही 20 मशीनों के साथ प्रोडक्शन यूनिट लगाई, लेकिन सही कारीगर और वर्कर्स नहीं मिलने से दो-तीन महीने काफी नुकसान हुआ। प्रोडक्ट सही से नहीं बन पा रहे थे। ये 2017-18 की बात है। सही लोगों तक पहुंचने में कई महीने लग गए।

अब मुझे ट्रेनिंग की भी सख्त जरूरत थी, क्योंकि इस फील्ड में कोई नॉलेज नहीं थी। सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। ‘फैशन की ABCD’ भी नहीं जानता था। सबसे पहले दिल्ली के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी (NIFT) से तीन महीने की ट्रेनिंग ली। यहां एंटरप्रेन्योर्स के लिए शॉर्ट टर्म कोर्सेज चलाए जाते हैं।

अब बात फंड की थी। पैसे के लिए मैंने घर वालों से बात की। तब तक उन्हें विश्वास हो चुका था कि मेरी समझ गारमेंट्स इंडस्ट्री में पक्की हो चुकी है।

छोटे उद्योग के लिए केंद्र की एक क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट फॉर माइक्रो एंड स्मॉल एंटरप्राइजेज (CGTMSE) योजना है, जो 2 करोड़ तक का लोन देती है।

हमने इंफ्लूएंसर्स, लिंक्डइन, इंस्टाग्राम, यूट्यूब समेत अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग करनी शुरू की। इससे पूरे देश के कस्टमर जुड़ते चले गए। जींस, टी शर्ट, शर्ट, पैंट, कोर्ट, ब्लेजर समेत कई अन्य गारमेंट्स की मैन्युफैक्चरिंग कर बेचने लगा, लेकिन ऑर्डर काफी कम मिल रहे थे।

कई बार ऐसा हो रहा था कि जो ऑर्डर हमें मिलने चाहिए थे, वो नहीं मिल पा रहे थे। कई बड़े-बड़े क्लाइंट्स सैंपल देखने के बाद मना कर देते थे। कई बार ऐसा हुआ कि खुद इस्तेमाल करने के लिए सैंपल के बहाने प्रोडक्ट मंगवा लेते थे। तब हमें लगा कि कंपनी की मार्केटिंग स्ट्रेटजी और प्रोडक्ट की क्वालिटी में सुधार की जरूरत है।

तो राशि सोनी कब और कैसे आपके साथ जुड़ी? इस सवाल पर अंकित मुस्कुराने लगते हैं।

राशि खुद ही अपनी कहानी बताना शुरू करती हैं। कहती हैं, 2014-15 में भोपाल से फैशन टेक्नोलॉजी में स्टडी कंप्लीट करने के बाद इंदौर की एक कंपनी में काम करने लगी। करीब 5 साल तक अलग-अलग कई कंपनियों में जॉब करने का सिलसिला चलता रहा।

लेकिन 2019 में मेरी तबियत खराब हो गई, तो वापस अपने शहर भोपाल आना पड़ा। कुछ महीने बाद फिर से जॉब सर्च करना शुरू किया, लेकिन मैंने तय कर लिया था कि अब अपने स्किल को बिजनेस में कंवर्ट करूंगी। जॉब नहीं करूंगी।

एक रोज की बात है। गूगल पर भोपाल में गारमेंट्स मैन्युफैक्चरिंग को लेकर जॉब सर्च कर रही थी, तो अंकित से बात हुई। मैंने पहले बतौर स्टाफ कंपनी ज्वाइन किया। चूंकि, मैंने फैशन की बारीकियों की स्टडी की है, तो समझने में आसानी हुई कि कंपनी में कहां-कहां दिक्कतें हैं।

अंकित से जब बात हुई, तो इन्होंने बिजनेस पार्टनर बनने का न्योता दे दिया। मुझे भी बिजनेस करना था। कंपनी के प्रोडक्शन पार्ट को मैंने संभालना शुरू किया, और अंकित ने ब्रांड, मार्केटिंग, सेल्स और फंड अरेंज की जिम्मेदारी संभाली।

2020 का साल बीत रहा था, कोरोना ने दस्तक दे दी थी। ऑफलाइन चीजें ठप हो गई थी। इसी दौरान हमने अपने ब्रांड ‘बनावटी’ को रजिस्टर करवाया और अपने ब्रांड नेम से ऑनलाइन मार्केटिंग करना शुरू किया। इससे पहले हम सिर्फ दूसरी कॉर्पोरेट और कंस्ट्रक्शन कंपनियों, होटल्स के लिए ड्रेस, गारमेंट्स बनाते थे।

राशि ने बतौर करियर जब इस फील्ड को चुना, तो जेंडर आड़े हाथ आ गई। वो कहती हैं, लड़की होने की वजह से घर वाले चाहते थे कि मैं इंजीनियरिंग की पढ़ाई करूं। फैशन इंडस्ट्री को आज भी लोग अच्छा नहीं मानते हैं। लोगों को लगता है कि ये दर्जी का काम है। हमारे साथ भी ऐसा हुआ, लेकिन इसमें हर तरह की स्किल्स की जरूरत होती है।

कपड़ों की क्वालिटी को दिखाते हुए अंकित कहते हैं, रेमंड, विमल, ओसवाल, भास्कर जैसे मिल्स से हम थान में कपड़े मंगवाकर गारमेंट्स तैयार करते हैं। लुधियाना से होजियरी, गुजरात से कॉटन, भीलवाड़ा से डेनिम और कॉटन, त्रिपुरा से टी शर्ट के फाइबर मंगवाते हैं। गारमेंट्स को देश के अलावा कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, दुबई, यूएई और साउथ अफ्रीका के देशों में सप्लाई करते हैं।

अब अंकित की कंपनी ऐसा सिस्टम लॉन्च करने जा रही है, जिसमें कोई भी कस्टमर अपने शहर में ही किसी भी स्टोर से कपड़े को घर बैठकर खरीद सकता है। इसके लिए वो लोकल दुकानदारों को जोड़ रहे हैं।

अंकित कहते हैं, हमारे साथ अभी 100 से अधिक लोगों की टीम काम कर रही है। 65 से ज्यादा सिलाई मशीन वर्क कर रही है। महिलाएं अपने घरों पर रहकर ऑर्डर के मुताबिक हमारे लिए प्रोडक्ट बनाती हैं। अब हम ऑफलाइन मार्केट में भी उतरने की तैयारी कर रहे हैं।

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1995 की बात है। बेंगलुरु में जॉब करता था। उस वक्त सैलरी साढ़े 7 हजार रुपए प्रति महीने थी, लेकिन फैमिली प्रॉब्लम्स की वजह से 1997 में दिल्ली लौटना पड़ा। घर वालों का कहना था कि दिल्ली में ही काम करूं। आज हमारी दो कंपनियां हैं। 500 करोड़ का सालाना टर्नओवर है। 5,000 से ज्यादा लोग काम करते हैं। (पूरी खबर पढ़िए)

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