पॉजिटिव स्टोरीमां बोली- खादी का काम छोड़ो, शादी करो:आज रिलायंस, रेमंड हमारे कस्टमर, एक साड़ी 32 हजार की; 2.5 करोड़ का टर्नओवर

3 महीने पहलेलेखक: नीरज झा

जिस उम्र में लड़कियां अपने शादी-ब्याह के बारे में सोचने लगती हैं। मां-बाप दरवाजे पर बारातियों का स्वागत करने की तैयारी के बारे में सोचना शुरू कर देते हैं। उस उम्र में मैं सिर्फ अपने स्टार्टअप के बारे में सोच रही थी।

घर के बाकी लोगों का भी काफी दबाव था कि शादी कर लो। उम्र बीत रही है। मां कहती थी, ‘लड़की हो, क्या करोगी, अच्छे कॉलेज में पढ़ने गई हो, तो अच्छी नौकरी करो। घर संभालो।' यहां तक कि पीएम मोदी से एक कार्यक्रम में बात करने के बाद घर गई, तो मां ने यही पूछा, 'ये सब तो ठीक है... शादी कब करोगी।'

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित ऑफिस में खादी, सिल्क और अलग-अलग फाइबर से बनी साड़ियों के बेजोड़ कलेक्शन को दिखाती हुई 30 साल की उमंग श्रीधर अपनी अब तक की जर्नी को शेयर कर रही हैं।

उमंग कहती हैं, ‘जब 2014-15 में उमंगश्रीधर डिजाइंस (पहले खादीजी) की शुरुआत की थी, तो भाई को भी यही लगता था कि मैं खादी के साथ काम करके अपना समय बर्बाद कर रही हूं। सिर्फ 30 हजार रुपए से एक NGO की शुरुआत की थी। आज हमारी टेक्सटाइल कंपनी का सालाना टर्नओवर 2.5 करोड़ का है। एक हजार से अधिक महिला-पुरुष काम कर रहे हैं।’

अपना स्टोर दिखाते हुए श्रीधर कहती हैं, 'जब लोगों से खादी के बारे में बात करती थी, तो वो चौंक जाते थे। भरोसा ही नहीं होता था कि 21 साल की लड़की ये स्टार्टअप चला सकती है।'
अपना स्टोर दिखाते हुए श्रीधर कहती हैं, 'जब लोगों से खादी के बारे में बात करती थी, तो वो चौंक जाते थे। भरोसा ही नहीं होता था कि 21 साल की लड़की ये स्टार्टअप चला सकती है।'

उमंग श्रीधर अपने सहयोगियों के साथ कपड़ों की बनावट, उसके कलर और प्रोडक्ट की क्वालिटी को लेकर डिसकस कर रही हैं।

इसी बीच उमंग अपने कॉलेज के दिनों में लौटते हुए बताती हैं, 'दिल्ली यूनिवर्सिटी से बी. कॉम करने के दौरान ही कई NGO के साथ काम करने का मौका मिला। मेरे साथ के दोस्त अच्छी-अच्छी जगहों पर नौकरी करना शुरू कर चुके थे, लेकिन पापा कहते थे, अपना बॉस खुद बनो।'

एमपी के दमोह जिले के किशनगंज जैसे छोटे गांव में पैदा हुई, जहां देखती थी कि आस-पास की महिलाओं को कोई काम नहीं मिलता था।

अपने लैपटॉप में कुछ पुरानी तस्वीर को दिखाते हुए उमंग कहती हैं, 'मां ने 30 हजार रुपए दिए थे। स्लम में रहने वाली महिलाओं के लिए काम करती थी। कई सारे छोटे-छोटे प्रोडक्ट उनके लिए लॉन्च किए।'

उमंग कहती हैं, ‘महिलाओं के पास स्किल नहीं होने की वजह से उन्हें मनरेगा में काम करना पड़ता हैं। सड़कों पर झाड़ू लगाकर, पत्थर तोड़कर, गड्ढे खोदकर गुजारा करती हैं। यदि ये महिलाएं किसी फैक्ट्री में काम करती हैं, तो इन्हें प्रताड़ित किया जाता है। हमने इन्हें ट्रेनिंग देनी शुरू की।'

उमंग बताती हैं कि कुछ लोग सालों पुराने तरीके से खादी और हैंडलूम का काम करते थे। मैं टेक्सटाइल फैमिली बैकग्राउंड से नहीं आती हूं और ना ही इसकी पढ़ाई की थी। गारमेंट्स के सेगमेंट को समझने के लिए फैशन इंडस्ट्री को समझना जरूरी था।

अपने उन दिनों के बारे में कहते-कहते उमंग मुस्कुराने लगती हैं। बताती हैं, 'सबसे बड़ा चैलेंज बतौर महिला खादी में काम करना नहीं, बल्कि युवा होना था। क्योंकि खादी के साथ काफी उम्रदराज लोग काम कर रहे थे। लेकिन, आज जब बोलती हूं कि मेरे पास इस सेक्टर में काम करने का 10 साल का अनुभव है। तब लोग मेरी बातों को सुनते हैं। भले ही हमारे साथ के दूसरे बिजनेस में काम कर रहे एंटरप्रेन्योर्स का करोड़ों का टर्नओवर हैं, लेकिन मैंने खादी के क्राफ्ट को इसलिए चुना ताकि सोसाइटी में एक बदलाव ला पाएं।'

उमंग की कंपनी में सबसे पहले उनके परिवार वालों ने ही इन्वेस्ट किया था। फिर वो प्रेजेंटेशन देकर फंड जुटाने लगीं। उमंग कहती हैं, 'कोई भी इन्वेस्टर आइडिया में नहीं, फाउंडर की काबिलियत पर पैसा लगाता है।'

उमंग 5 राज्यों के 13 क्लस्टर में खादी के कपड़े बनाने का काम कर रही हैं। वो अपने प्रोडक्ट को आदित्य बिड़ला, रिलायंस, रेमंड जैसी बड़ी कंपनियों को सप्लाई करती हैं। बताती हैं, हमें सरकार से भी ऑर्डर और ट्रेनिंग के कई प्रोजेक्ट मिलते रहते हैं।

श्रीधर कहती हैं, 'कोरोना के दौरान सबसे अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। बहुतेरों लोग इस काम को छोड़कर दूसरे काम करने लगे थे। ऑर्डर मिलने बंद हो गए थे। लोग माइग्रेट करने लगे थे। जो ट्रेंड बुनकर थे, उनमें से कुछ की कोविड की वजह से मौत हो गई।

अब फिर से नए लोगों को ट्रेनिंग के जरिए अपने बिजनेस में जोड़ रही हूं। साथ ही हमारा लक्ष्य इन महिलाओं को एंटरप्रेन्योर बनाना है। ताकि ये अपना हैंडलूम प्रोडक्ट खुद से बनाकर, ऑनलाइन-ऑफलाइन बेच पाएं। अभी 200 महिलाओं को ट्रेनिंग दे रही हूं।'

उमंग मार्केटिंग को लेकर बताती हैं, कंपनी से ऑर्डर मिलने के बाद बुनकर डिमांड के मुताबिक कपड़े बनाते हैं। हम उन्हें धागे की सप्लाई करते हैं। धागा पर ही कपड़े की क्वालिटी डिपेंड करती है। पूरे प्रोसेस के बाद कपड़े को वेयरहाउस में लाया जाता है, और यहां से क्लाइंट को डिलिवर करते हैं।

इसमें थान के कपड़े, जिसे कंपनियां अपने मुताबिक गारमेंट्स बनाती हैं, होम फर्निशिंग- जैसे, पर्दा, दरी, कुशन और साड़ियां होती हैं। कपड़े खादी के अलावा, सिल्क, बैम्बू फाइबर, banana फाइबर, सोया फाइबर से बने होते हैं। धागा को अलग-अलग राज्यों से खरीदते हैं।

लेंथ और फाइबर के मुताबिक कपड़ों की रेट तय होती है। चंदेरी तार बूटी सिल्क साड़ी की कीमत 32 हजार रुपए तक की होती है। हम बिना सिले हुए कपड़ों की सप्लाई करते हैं। छोटे-छोटे डिजाइनर्स के साथ भी काम करते हैं। कपड़ा को विदेशों में भी एक्सपोर्ट करते हैं। हमारे यूरोप में भी क्लाइंट्स हैं।

उमंग कहती हैं, 'एक मीटर खादी को बनाने में 12 लोग शामिल होते हैं। गुस्से या लेजीनेस के साथ लूम चलाने पर कपड़ों की क्वालिटी पर भी अंतर पड़ता है। हम इन सारी चीजों का ध्यान रखते हैं। प्रोडक्ट को बनाने में धागा, चरखा, हैंडलूम मशीन, डाइंग यूनिट, स्टिचिंग यूनिट की जरूरत होती है।'

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