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जानवरों से बदतर खाना मिला:मंदिर के प्रसाद से भूख मिटाई, बोरी पहनकर रातें काटीं; एक अनाथ के पिज्जा स्टॉल शुरू करने की कहानी

4 दिन पहलेलेखक: नीरज झा

जब 5 साल का था, तो मां की मौत हो गई। एक-डेढ़ साल बाद पापा भी चल बसे। उम्र इतनी छोटी कि समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। घर के लोग बताते हैं कि किसी गंभीर बीमारी ने दोनों की जान ले ली।

मैं मध्यप्रदेश के नर्मदा नदी घाट पर खेलते-कूदते बड़ा हुआ। अपने 6 भाई-बहनों में 5वें नंबर पर हूं। कहने को तो 4 बहनें और एक बड़ा भाई है, लेकिन मां-बाप के न होने की वजह से एक अनाथ की जिंदगी ही जिया। दुत्कार के साथ पाला-पोसा गया।

भोपाल के रहने वाले सुशील रायकवाड़ पहली नजर में देखने पर आर्मी के किसी जवान जैसे दिखाई देते हैं। शरीर एकदम गठीला, हट्टे-कट्टे। उम्र 20-22 साल, लेकिन वो पिछले कुछ महीने से अपनी दोस्त पूनम पाल के साथ पिज्जा स्टॉल ‘टॉम एंड जेरी’ नाम से चला रहे हैं।

सुशील तीन कैटेगरी की पिज्जा बेचते हैं, जिसकी कीमत 79 रुपए से लेकर 120 रुपए है।
सुशील तीन कैटेगरी की पिज्जा बेचते हैं, जिसकी कीमत 79 रुपए से लेकर 120 रुपए है।

अपनी कहानी में जैसे-जैसे सुशील आगे बढ़ते हैं, उनकी आंखें भरने लगती हैं, लेकिन आंसू नहीं निकलते, क्योंकि वो सुशील के संघर्ष के साथ सूख चुके हैं।

वो बताते हैं, जब मां-पापा की मौत हो गई, तो बहनों के साथ रहने लगा। शुरुआत में लगता था कि यही मेरे लिए भगवान हैं। दो बहनें जॉब और स्पोर्ट्स एकेडमी में हैं, लेकिन मां-बाप के बिना किसी बच्चे की जिंदगी कैसी बीतती है, आपको भी पता है। हर रोज ताने मिलते थे।

घर की कंडीशन ऐसी कि बरसात के दिनों में बाहर पानी कम, घर के अंदर ज्यादा बरसता था। खाने को कुछ नहीं होता था। कई रात भूखे पेट सोना पड़ता था। बहनें घर से बाहर रहती थीं, साल में कभी-कभार देखने चली आती थीं।

कह सकता हूं कि मेरी परवरिश ही नर्मदा घाट के किनारे हुई। मैं कहां हूं? क्या खा रहा हूं? क्या कर रहा हूं? घर के लोगों को मुझसे कोई मतलब नहीं होता। उम्र इतनी कम थी कि न कोई काम-धंधा कर सकता था और न ही हर दिन भूखा सो सकता था।

इसलिए स्कूल भी जाता तो सिर्फ खाना खाने के लिए। पढ़ने-लिखने से कोई मतलब नहीं होता था, लेकिन इतना पता था कि यदि स्कूल नहीं जाऊंगा, तो खाना नहीं मिलेगा।

होशंगाबाद स्थित नर्मदा मंदिर में लोग जो प्रसाद चढ़ाते थे, वही मैं रात में खा लेता। कभी-कभी वो लोग खाना भी खिला देते थे। नदी में चुंबक फेंककर पैसे चुनता था, ताकि चॉकलेट-बिस्कुट खरीद सकूं। बच्चों का दिल तो आप समझते ही हैं न!

इतना ही नहीं, भगवान पर चढ़े नारियल को भी बेच देता था, जिससे 10-15 रुपए इकठ्ठा हो जाते थे। ठंड के मौसम में सुतली की बोरी पहनकर, ओढ़कर सोता था, ताकि ठंड न लगे। आज भी उन लम्हों को याद कर ठहर जाता हूं।

जब थोड़ा बड़ा हुआ, तो नर्मदा नदी में मछली मारने लगा। सिंघाड़ा तोड़कर बेचने लगा। इसी दौरान धीरे-धीरे तैराकी सीख गया। फिर फेंसिंग (तलवारबाजी) में इंटरेस्ट आने लगा। एक कॉम्पिटिशन के जरिए स्पोर्ट्स में मौका मिला।

जिसके बाद सिस्टर्स ने मुझे अपनी एक फ्रेंड के यहां छोड़ दिया। यहां करीब 3 साल रहा। स्पोर्ट्स में करियर बनाने का सपना लेकर इनके घर आया था, लेकिन भूखे पेट क्या हो सकता है?

सुशील हर रोज भोपाल के एक चौराहे पर पिज्जा वैन लगाते हैं। साथ में उनकी दोस्त पूनम पाल होती हैं।
सुशील हर रोज भोपाल के एक चौराहे पर पिज्जा वैन लगाते हैं। साथ में उनकी दोस्त पूनम पाल होती हैं।

सुशील अपने इन गुजरे बरसों को एक-एक कर याद करते हैं। कहते हैं, जो काम इनके घर के बच्चे नहीं करते थे या नहीं कर पाते थे, वो मुझसे करवाया जाता था। मजदूर की तरह दिन-रात काम करवाया जाता।

कई बार ऐसा होता कि खाने को कुछ मिल गया तो ठीक, नहीं तो भूखे सो जाता। कई बार जिस खाने को गाय भी नहीं खा सकती है, वो खाना मुझे दिया जाता। मैं उसे कोने में रख देता।

इसी दौरान एक आर्मी ऑफिसर से मुलाकात हुई और मुझे बैरागढ़ कैंट में आकर ट्रेनिंग लेने का मौका मिला। ये करीब 6 महीने तक चला। बाद में उस ऑफिसर का ट्रांसफर हो गया। मेरी उम्र साढ़े 17 साल नहीं थी, तो आर्मी में जाने का सपना भी टूट गया।

हालांकि, स्पोर्ट्स में स्टेट और नेशनल लेवल पर कई कॉम्पिटिशन जीतता रहा, लेकिन मेडल से पेट तो नहीं भरता है न। जो पैसे कमाता था, वो सिस्टर्स को दे देता था।। मेरे पास कुछ नहीं था। एक-दो साल बाद स्पोर्ट्स छोड़ना पड़ा। दरअसल, इसके लिए भी पैसे चाहिए थे।

स्पोर्ट्स के लिए खाना-पीना बेहतर होना चाहिए था। मुझे आज भी याद है जब स्पोर्ट्स के सिलसिले में हमारी टीम एक जगह गई थी। पहले बताया गया कि रहने-खाने की फैसिलिटी फ्री ऑफ कॉस्ट है। कई दिनों तक होटल में रहने के बाद बताया गया कि मुझे 20 हजार रुपए देने हैं। मेरे पैर के नीचे से जमीन खिसक गई।

फिर स्पोर्ट्स छोड़कर जॉब के लिए इधर-उधर भटकने लगा। कई महीनों तक भटकने के बाद स्टारबक्स में काम मिला।

ये सुनते ही दोस्त पूनम मुस्कुराने लगती हैं।

सुशील पूनम की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं, वो KFC में काम करती थी, लेकिन हमें इतने कम पैसे मिलते थे कि गुजारा करना मुश्किल होता था। काम भी ज्यादा करना पड़ता था। कहने को तो शिफ्ट 9 घंटे की होती थी, लेकिन हम लोगों से 12-12 घंटे काम करवाया जाता। रात के 3 बजे तक बर्तन मांजना पड़ता था।

जिसके बाद कुछ अपना करने का सोचा। पूनम से मेरी मुलाकात स्कूल के दिनों में ही हुई थी। हम दोनों एक-दूसरे के लिए इतने खास बन गए कि मुझे घर से खाना नहीं मिलता, तो पूनम मेरे लिए खाना बनाकर लाती।

फिर कॉलेज और अब बिजनेस…

हम अपना पिज्जा स्टॉल चला रहे हैं। हर रोज औसतन 5,000 रुपए का सेल हो जाता है। दूसरों के यहां काम करने से तो अच्छा ही है अपना काम करना। हम बर्थडे पार्टी में भी वैन लेकर जाते हैं और पिज्जा स्टॉल लगाते हैं।

आखिर में सुशील कहते हैं, KFC और स्टारबक्स में काम करने की वजह से फूड आइटम्स के बारे में नॉलेज हो गया था, जिससे बिजनेस स्टार्ट करने में आसानी हुई। कुछ महीनों तक वैन के डिजाइन को लेकर प्लान किया। इसे शुरू करने के लिए भी जब मैंने अपनी बहन से पैसे मांगे थे, तो उन्होंने नहीं दिया। कहा- पागल हो गया है। सड़क पर स्टॉल लगाएगा। जो पैसे मैंने उन्हें कमाकर उन्हें दिए थे, वो भी देने से मना कर दिया।

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