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बिहार में वोटिंग बढ़ी तो सरकार को फायदा:पिछले 20 साल में पांच बार विधानसभा के चुनाव हुए; तीन बार सीएम बदले, 6 बार नीतीश ने शपथ ली

पटनाएक वर्ष पहले
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  • 2015 के चुनाव में 56.91% वोटिंग हुई, 3.8 करोड़ लोगों ने मतदान किया, महागठबंधन को 1.59 करोड़ और एनडीए को 1.3 करोड़ लोगों ने वोट किया था
  • 1995 में 61.8% और 2000 में 62.6% वोट पड़े, राजद की फिर से सरकार बनी थी, 2005 से 2015 के चुनावों में वोट प्रतिशत बढ़ा और तीनों बार नीतीश की सरकार बनी

बिहार में चुनाव है और अब चुनाव की सुगबुगाहट तेज हो गई है। कोरोना के चलते रैलियां तो नहीं हो रहीं, लेकिन वर्चुअल रैलियां जारी हैं। दल-बदल, जोड़-तोड़ सब शुरू हो गया है। चुनाव आयोग ने अभी तारीखों का ऐलान तो नहीं किया है, लेकिन भाजपा 13 सितंबर से चुनाव प्रचार शुरू करने जा रही है।

अगर हम बिहार विधानसभा के पिछले 20 साल के दौरान हुए चुनावों पर गौर करें तो कई चीजें सामने आती हैं। इन 20 सालों में बिहार में 5 विधानसभा चुनाव हुए हैं, एक बार राष्ट्रपति शासन लागू हुआ। कुल आठ बार सीएम का शपथ ग्रहण हुआ। जिसमें नीतीश कुमार 6 बार, राबड़ी देवी एक बार और एक बार जीतन राम मांझी मुख्यमंत्री बने।

वोट प्रतिशत बढ़ने पर मौजूदा सरकार को फायदा

इन 20 सालों में हुए चुनावों को देखें तो एक चीज साफ होती है कि बिहार में जब-जब वोटिंग बढ़ी है, तब-तब मौजूदा सरकार को ही फायदा हुआ है, यानी उस सरकार की वापसी हुई है। 1995 के चुनाव में 61.8 फीसदी वोट पड़े थे और 2000 के चुनाव में 62.6 फीसदी, दोनों ही बार राजद गठबंधन की फिर से सरकार बनी। वहीं, अक्टूबर 2005 से 2015 के चुनावों को देखें तो तीनों बार वोटिंग बढ़ी है और तीनों ही बार नीतीश की सरकार बनी है। हालांकि इस बार के चुनाव में कोरोना संक्रमण के चलते वोटिंग घटने की आशंका है।

2015 : नीतीश की हैट्रिक

2015 का विधानसभा चुनाव कई मायनों में थोड़ा अलग और दिलचस्प था। इस चुनाव में वर्षों के यार जुदा हो गए थे और पुराने धुर विरोधी एक हो गए थे। 20 साल बाद लालू और नीतीश एक साथ मिलकर महागठबंधन (जिसमें कांग्रेस भी शामिल थी) के रूप में चुनाव लड़ रहे थे, जबकि दूसरी ओर भाजपा, लोजपा और रालोसपा मिलकर उनका मुकाबला कर रही थी।

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को भरपूर समर्थन मिला था। भाजपा गठबंधन ने 40 में से 31 सीटें जीती थीं और मोदी लहर भी अपने उफान पर थी। इसलिए ये माना जा रहा था कि मुकाबला जोरदार होगा, लेकिन परिणाम बेहद चौंकाने वाले रहे। अकेले राजद को जितनी सीटें मिली थीं उतनी सीटें तो भाजपा अपने सहयोगियों को मिलाकर भी नहीं हासिल कर पाई। नीतीश कुमार फिर से मुख्यमंत्री बने और तेजस्वी यादव डिप्टी सीएम। हालांकि, लालू और नीतीश का गठबंधन ज्यादा दिन नहीं रह सका। जुलाई 2017 में नीतीश ने इस्तीफा दे दिया और बाद में भाजपा के समर्थन से फिर से मुख्यमंत्री बन गए।

वो मुद्दे जो चुनाव में हावी रहे

बिहार विधानसभा चुनाव से कुछ दिन पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत का आरक्षण को लेकर एक बयान आया। उन्होंने कहा था कि आरक्षण की समीक्षा की जानी चाहिए। इस बयान को विपक्ष ने अपना प्रमुख हथियार बनाया। लालू यादव ने जमकर कास्ट फैक्टर और रिजर्वेशन का मुद्दा उठाया। चुनाव में महागठबंधन को इसका फायदा भी हुआ।

दूसरा मुद्दा इन्टॉलरेंस यानी असहिष्णुता का था, जो चर्चा में रहा। इस मुद्दे को लेकर जमकर सियासत हुई। विपक्ष ने केंद्र की भाजपा सरकार पर अल्पसंख्यकों की अनदेखी और असुरक्षा का आरोप लगाया। भाजपा इसे राजनीतिक साजिश बताती रही।

वोट शेयर में भाजपा आगे, लेकिन ज्यादा सीटें राजद को मिलीं

2015 के चुनाव में कुल 56.91% वोटिंग हुई थी, 2000 के बाद यह सबसे ज्यादा थी। 3.8 करोड़ लोगों ने मतदान किया था। इसमें से महागठबंधन को 1.59 करोड़ और एनडीए को 1.3 करोड़ लोगों ने वोट किया था। पार्टी के हिसाब से बात करें तो सबसे ज्यादा वोट शेयर भाजपा को मिला, लेकिन सीटें सबसे ज्यादा राजद को मिलीं। भाजपा का वोट शेयर 24.4% था, जबकि राजद को 18.4% वोट मिले। भाजपा के ज्यादा वोट शेयर के पीछे ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना भी कारण था। भाजपा ने 157 सीटों पर, जबकि राजद ने 101 सीटों पर चुनाव लड़ा था।

2010 : लगातार दूसरी बार सीएम बने नीतीश कुमार

नीतीश कुमार के पांच साल के कार्यकाल के बाद यह पहला चुनाव था। जिस तरह से उन्होंने पांच साल के दौरान रोड मैप दिया था, उससे साफ था कि इस बार चुनाव में कोई बड़ा उलटफेर नहीं होने वाला है। नीतीश कुमार लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत से सीएम बने थे। भाजपा-जदयू गठबंधन ने 206 सीटें हासिल की थीं। यानी 84 फीसदी सीटें इस गठबंधन के खाते में गई थीं।

तब कुल 52.71% वोटंग हुई थी यानी पिछले चुनाव के मुकाबले करीब 7 फीसदी ज्यादा। इन चुनावों में जदयू को सबसे ज्यादा 22.61% और राजद को 18.84 फीसदी वोट मिले थे। जबकि, भाजपा को 16.46 फीसदी वोट मिले। हालांकि, भाजपा को राजद की तुलना में सीटें ज्यादा मिली थीं। भाजपा ने 91 सीटें हासिल की थीं और राजद को महज 22 सीटें मिलीं थीं। चूंकि राजद ने 168 सीटों पर चुनाव लड़ा था इसलिए उसका वोट शेयर ज्यादा था। सबसे बुरा हाल कांग्रेस का हुआ था। कांग्रेस ने इस चुनाव में सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन सिर्फ चार सीट ही जीत सकी थी।

अक्टूबर 2005 : 15 साल का लालू राज खत्म

फरवरी में हुए चुनाव में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था, जिससे राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। अक्टूबर में फिर से चुनाव हुए, इस बार भाजपा-जदयू गठबंधन को बहुमत मिला और राज्य में 15 साल से शासन कर रहे लालू राज का अंत हुआ। नीतीश कुमार दूसरी बार सीएम बने। इससे पहले वे 2000 में सात दिन के लिए सीएम बने थे।

इस चुनाव में कुल 45.85 फीसदी वोट पड़े थे। इसमें सबसे ज्यादा राजद को 23.45 फीसदी मिले और जदयू को 20.46 फीसदी। लेकिन, राजद को सीटें काफी कम मिलीं। राजद ने 175 सीटों पर चुनाव लड़ा और जीत सिर्फ 54 पर मिली। जबकि, जदयू ने 139 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, जिसमें से 88 जीतकर आए।

फरवरी 2005 : किसी को बहुमत नहीं, राष्ट्रपति शासन

बिहार की राजनीति में यह चुनाव काफी महत्वपूर्ण रहा। इसे बिहार की राजनीति में टर्निंग प्वॉइंट कहा जा सकता है। इस चुनाव के बाद बिहार में राजद का ग्राफ गिरता चला गया। इस चुनाव में कुल 46.5 फीसदी वोटिंग हुई थी। पिछले चुनाव के मुकाबले करीब 16 फीसदी कम। इसमें राजद को सबसे ज्यादा 25.07 फीसदी और जदयू को 14.55 फीसदी वोट मिले।

अगर सीटों की बात करें तो राजद को 210 सीटों पर चुनाव लड़ने के बाद 75 और जदयू को 138 सीटों पर लड़ने के बाद 55 सीटें मिली थीं। किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला था। राजद ने सरकार बनाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन लोजपा ने सारा खेल बिगाड़ दिया। लोजपा को तब 29 सीटें मिलीं थी। उस समय सत्ता की चाबी लोजपा के पाले में थी। अगर लोजपा राजद को सपोर्ट करती तो कांग्रेस के समर्थन से उनकी सरकार बन सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका और आखिरकार राष्ट्रपति शासन लागू हो गया।

2000 : जब नीतीश महज सात दिन के लिए सीएम बने

तब बिहार का बंटवारा नहीं हुआ था, यानी झारखंड बिहार का हिस्सा था। उस समय कुल 324 सीटें हुआ करती थीं। चारा घोटाले में नाम आने के बाद लालू यादव की पत्नी राबड़ी देवी उनकी बागडोर संभाल रही थीं। इस चुनाव में कुल 62.6 फीसदी वोट पड़े। इसमें राजद को 28.3 फीसदी, भाजपा को 14.6 फीसदी और समता पार्टी जो बाद में जदयू हो गई उसे 8.7 फीसदी वोट मिले थे।

इस बार किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला था। हालांकि, समता पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन को बहुमत न होने के बावजूद तत्कालीन राज्यपाल सुंदर सिंह भंडारी ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। जिसको लेकर राजद ने जमकर विरोध किया। नीतीश की सरकार सात दिनों तक ही चली और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद कांग्रेस के समर्थन से एक बार फिर से राबड़ी देवी बिहार की मुख्यमंत्री बनीं।

एक समय था जब बिहार में कांग्रेस का एकक्षत्र राज हुआ करता था। आजादी के बाद 1989 तक कांग्रेस के 14 मुख्यमंत्री रहे, लेकिन उसके बाद कांग्रेस बिहार में कभी वापसी नहीं कर पाई। 1990 के चुनाव में कांग्रेस को 71 सीटें मिली थीं, 1995 में 29 सीटें, लेकिन उसके बाद कांग्रेस का ग्राफ लगातार गिरता गया। 2015 के चुनाव में नीतीश के साथ आने से जरूर कांग्रेस को फायदा हुआ, लेकिन पिछले 30 सालों कांग्रेस कभी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं आ सकी।

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