आज की पॉजिटिव खबर:जमशेदपुर की रूपाली ने टीचिंग के साथ मिथिला पेंटिंग को भी बनाया करियर, पैशन को कमाई में बदला

3 महीने पहलेलेखक: नीरज झा

घर में शुरू से मिथिला पेंटिंग का माहौल था। इंट्रेस्ट बचपन से ही था। ननिहाल में मैंने अपनी मौसी और नानी से पेंटिंग बनानी सीखी।

दसवीं तक स्कूल लेवल पर कई कॉम्पिटिशन में शामिल होती थी। आगे चलकर जब मैं अपने पैशन को प्रोफेशन में बदलना चाह रही थी तो मम्मी-पापा कहते थे, ‘पहले सेटल हो जाओ फिर पेंटिंग बनाना।’

जमशेदपुर की रहने वाली 25 साल की रूपाली झा ये बातें कहती हैं। रूपाली मूल रूप से बिहार के मधुबनी जिले की रहने वाली हैं। वैसे तो वे अंग्रेजी की टीचर हैं, लेकिन साथ में मिथिला पेंटिंग के जरिए अपनी पहचान भी बना रही हैं।

रूपाली अंग्रेजी की टीचर हैं, लेकिन साथ में मिथिला पेंटिंग के जरिए अपनी पहचान भी बना रही हैं।
रूपाली अंग्रेजी की टीचर हैं, लेकिन साथ में मिथिला पेंटिंग के जरिए अपनी पहचान भी बना रही हैं।

रूपाली बताती हैं, 10वीं के बाद 2016 में रविंद्र भवन जमशेदपुर से फाइन आर्ट में डिप्लोमा की डिग्री ली। इसके बाद अंग्रेजी ऑनर्स में ग्रेजुएशन किया। अब टीचिंग के साथ-साथ मिथिला पेंटिंग का बिजनेस भी कर रही हूं। बचपन से पेंटिंग में इंस्ट्रेस्ट था, इसलिए अपने पैशन को प्रोफेशन में बदल दिया।

रूपाली कहती हैं, मुझे 9 बजे से 5 बजे वाली नौकरी पसंद नहीं है, इसलिए टीचिंग को चुना। यहां बच्चों से भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है। खाली समय में पेंटिंग बनाती हूं।

मिथिला पेंटिंग की डिमांड को लेकर रूपाली कहती हैं, बदलते वक्त के साथ इसका मार्केट भी बहुत बड़ा हो रहा है। पहले गांव में मिट्टी की दीवारों पर शादी-ब्याह के समय पेंटिंग की जाती थी, लेकिन अब बदलते वक्त के साथ पेपर, कैनवास, वस्तुओं, बर्तनों पर इसकी पेंटिंग की जा रही है। लोग इसे काफी पसंद कर रहे हैं।

रूपाली कहती हैं कि पेपर, कैनवास, वस्तुओं, बर्तनों पर इसकी पेंटिंग की जाती है। लोग इसे काफी पसंद कर रहे हैं।
रूपाली कहती हैं कि पेपर, कैनवास, वस्तुओं, बर्तनों पर इसकी पेंटिंग की जाती है। लोग इसे काफी पसंद कर रहे हैं।

रूपाली कहती हैं, अब मिथिला पेंटिंग को सजावट के तौर पर भी इस्तेमाल किया जा रहा है। लोग इंटीरियर डिजाइनिंग के लिए इसे खरीद रहे हैं। मैंने कई कैफे में जाकर पेंटिंग बनाई है।

रूपाली मिडिल क्लास फैमिली से आती हैं। अपनी पहली कमाई को लेकर बताती हैं कि एक पेंटिंग के 1500 रुपए मिले थे। धीरे-धीरे मांग बढ़ने लगी। अब अलग-अलग सीजन में डिमांड आती रहती है। यदि बेहतर कारोबार हो तो सालाना 3 लाख तक का बिजनेस हो जाता है।

सबसे अधिक शादी के सीजन में मिथिला पेंटिंग की डिमांड होती है। रूपाली कहती हैं, बिहार, झारखंड, वेस्ट बंगाल समेत कई राज्यों में इसकी मांग है। बंगाल में लोग आर्ट को बहुत ज्यादा सपोर्ट करते हैं।

रूपाली कहती हैं, बिहार, झारखंड, वेस्ट बंगाल समेत कई राज्यों में इसकी मांग है। बंगाल में लोग आर्ट को बहुत ज्यादा सपोर्ट करते हैं।
रूपाली कहती हैं, बिहार, झारखंड, वेस्ट बंगाल समेत कई राज्यों में इसकी मांग है। बंगाल में लोग आर्ट को बहुत ज्यादा सपोर्ट करते हैं।

रूपाली करीब दो साल से अपनी पेंटिंग को प्रोफेशनल रूप दे रही हैं। वो कहती हैं, सोशल मीडिया और जानने वालों के जरिए ऑर्डर आते हैं। पेंटिंग को पहले से फ्रेम करके भी रखते हैं। ऑर्डर आने के बाद इसे अंतिम रूप से देकर कस्टमर तक पहुंचाया जाता है।

रूपाली बताती हैं कि एक पेंटिंग को बनाने में कुछ दिनों का वक्त लगता है। इसमें धैर्य की जरूरत होती है। यदि ऑर्डर जल्दी देना हो तो उसमें दिक्कतें आती हैं, इसलिए पहले से इसका फ्रेम तैयार कर रखते हैं।

रूपाली विदेशों में भी अपनी पेंटिंग को बेचती हैं। वो कहती हैं, विदेशों से भी ऑर्डर आते हैं। उन्हें पेपर या कैनवास पर बने मिथिला पेंटिंग को रोल कर सप्लाई किया जाता है।

इसकी कीमत को लेकर रूपाली बताती हैं, अलग-अलग स्क्वायर के हिसाब से पेंटिंग के रेट तय किए जाते हैं। एक पेंटिंग की कीमत 5,000 रुपए तक की होती है।

मिथिला पेंटिंग की कीमत को लेकर रूपाली कहती हैं, अलग-अलग स्क्वायर के हिसाब से पेंटिंग के रेट तय किए जाते हैं।
मिथिला पेंटिंग की कीमत को लेकर रूपाली कहती हैं, अलग-अलग स्क्वायर के हिसाब से पेंटिंग के रेट तय किए जाते हैं।

अब लोग ट्रैडीशनल फंक्शन के अलावा अपने घरों को सजाने के लिए भी मिथिला पेंटिंग को खरीद रहे हैं। इससे नए रोजगार के अवसर भी लोगों को मिल रहे हैं। घर खूबसूरत भी दिखता है। साथ में कल्चर को भी पेंटिंग के जरिए हम बताने की कोशिश करते हैं।

मार्केट में बढ़ती डिमांड के पीछे रूपाली बताती हैं, पहले लोग पूरी दीवार पर पेंटिंग करवाते थे, लेकिन अब ना तो लोग चाहते हैं कि पूरे दीवार पर पेंटिंग की जाए और ना ही पेंटिंग करने वाले लोग मिलते हैं।

रूपाली कहती हैं, पहले लोग पूरी दीवार पर पेंटिंग करवाते थे। अब लोग पेंटिंग खरीदते हैं।
रूपाली कहती हैं, पहले लोग पूरी दीवार पर पेंटिंग करवाते थे। अब लोग पेंटिंग खरीदते हैं।

इसलिए लोग पेंटिंग खरीदते हैं और उसे सजावट के तौर पर घरों में इस्तेमाल करते हैं।

नए दौर में अब मिथिला पेंटिंग पेपर पर या क्लॉथ-कैनवास पर बनाई जाती है। इसके लिए पेपर, पेंट, ब्रश और फ्रेम की जरूरत होती है। जबकि कैनवास पर बनने वाली पेंटिंग में नेचुअरल कलर का इस्तेमाल किया जाता है। इसे एक स्ट्रेचर की मदद से फ्रेम कर बनाया जाता है।