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बात बराबरी की:मर्दों को लगता है... लड़कियां घास जैसी होती हैं, हर हफ्ते उनकी कटाई-छंटाई जरूरी है; फिर भी काबू में न आएं तो रेप है ही

नई दिल्ली15 दिन पहलेलेखक: मृदुलिका झा
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कहानी थोड़ी पुरानी है। दिसंबर 2012 की। तब फेसबुक महोबा या अकोला के धुएं से स्याह पड़े घरों तक नहीं पहुंचा था, बल्कि बड़े-मंझोले शहरों का तामझाम हुआ करता था। हां, पश्चिम में जरूर ये ऐसा प्लेटफॉर्म था, जहां क्रांति से लेकर कत्ल तक के किस्से रंगीन तस्वीरों और मोटे-मोटे लफ्जों में दिख जाते। रूई-रेशम और तांबे के भाव से लेकर डेट पर जाने के नुस्खे भी यहां मिलते। दुनिया मजे में चल रही थी कि तभी रंग-राग की कड़ाही में छन्न से पानी पड़ा और फेसबुक फैमिली खलबला गई। दरअसल आइसलैंड की एक युवती थोरलग अगस्टडॉतिर को फेसबुक पर एक ऐसा अड्डा दिखा, जहां लड़कियों से वर्चुअल रेप की साजिशें हो रही थीं।

‘मेन आर बेटर देन वीमन’ नाम के इस फेसबुक ग्रुप में एक लड़की की तस्वीर थी। बगैर कपड़ों की। देह का कोई हिस्सा निशानों से बाकी नहीं। वो घुटनों के बल मुड़ीतुड़ी-सी बैठी अपने अपराधी को आंखें फाड़कर देख रही थी। पेज स्क्रॉल करो तो ऐसी कई तस्वीरें भद्दे कमेंट्स के साथ दिखतीं।

आइसलैंडिक युवती ने पेज को रिपोर्ट करते हुए फेसबुक पर इस बाबत एक पोस्ट डाली। होना तो ये चाहिए था कि कुछ संवेदनशील बातें होतीं, और फेसबुक ऐसे वाहियात पेज के लिए कड़े कायदे बनाता, लेकिन हुआ एकदम उलट। लड़की की पोस्ट पर उसे रेप की धमकियां मिलने लगीं। एक फेसबुक यूजर ने लिखा- असल में तुम लड़कियां होती ही घास की तरह हो। हफ्ता-दस दिन में काटो-छांटो नहीं, तो काबू से निकल जाती हो।

तो घास की तरह हर ओर उग आने वाली और पसरते ही जाने वाली लड़कियों को कंट्रोल करने के लिए उन्हें बलभर पीटा जाए, और तब भी काम न बने, तो रेप तो है ही कायदा सिखाने के लिए! यही हुआ। पता खोज-खाजकर धमकीवीर लड़की के दरवाजे तक पहुंच गए। आखिरकार उसे प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलानी पड़ गई। तब जाकर पुलिस और फिर फेसबुक से मदद मिली। वर्चुअल रेप करने-कराने वाला वो पेज इतिहास बन गया, लेकिन ठहरिये! इतिहास अपने को दोहराता भी तो है। तो दोहराव हो रहा है।

नए साल के वीकेंड पर ट्विटर टाइमलाइन पर मुस्लिम महिलाओं की तस्वीरें दिखने लगीं, जिसके साथ कैप्शन था- आज की आपकी बुल्ली बाई है...। ऐप पर हाई-प्रोफाइल महिलाओं की फोटो और कई पर्सनल डीटेल की बोली लगने लगी। हालांकि तुरंत ही प्रशासन एक्शन में आ गया और धरपकड़ भी हुई, लेकिन यहां मुद्दा सरकारी एक्शन नहीं। मुद्दा एक खास मजहब की महिलाएं भी नहीं। असल मसला है औरतों का।

वे घरों में महफूज नहीं। सड़कों पर उनकी हिस्सेदारी नहीं। दफ्तर उनका संसार नहीं। इन तमाम जगहों पर वे शरीर हैं, या फिर वो बेशर्म घास, जो जबरन उगकर गार्डन की खूबसूरती छीने जाती हैं। तभी धीमे से आई वचुर्अल दुनिया। यहां औरतें खुद को इंसान मानने लगीं। हंसने-बतियाने लगीं। जवानी की दिलखुशी से लेकर बुलबुलों के नगमे कहने लगीं। और सबसे बढ़कर ये हुआ कि वे बोलने लगीं। बताने लगीं कि इतिहास मैदानों में मर्दाना युद्धों से नहीं बना, बल्कि इतिहास में वे गुमशुदा कहानियां भी जोड़ी जाएं, जहां घर जंग का मैदान होते और हारनेवाली होती औरतें। वे खुद अपनी हार को दर्ज कराना चाहती थीं ताकि उनकी बच्चियां सबक ले सकें।

औरतें पहली बार बोल रही थीं। लिहाजा आवाज में तुतलाहट थी, और भाषा भी कच्ची-पक्की। बस्स! मौका मिल गया। घर-सड़क-कारखाने-दफ्तरों में रुटीन मार-पिटाई से उकताए पुरुष बाज की तरह झपटे और इंटरनेट की दुनिया में अपनी ताकत दिखाने लगे।

ऑनलाइन डेटिंग ऐप बम्बल ने एक सर्वे में पाया कि देश में इंटरनेट पर एक्टिव 83% से ज्यादा औरतों ने कभी न कभी भद्दे कमेंट्स का सामना किया है। सर्वे की मानें तो हर 3 में से 1 लड़की हर हफ्ते ऑनलाइन एब्यूज का शिकार होती है। 70% ने माना कि कोविड के आने और लॉकडाउन लगने के बाद से वे वर्चुअल दुनिया में भी डरने लगी हैं। फोटो पोस्ट करने पर अश्लील मैसेज आते हैं। लेख डालने पर साड़ी की तारीफ होती है। यहां तक कि ऑफिस में मिला मैडल दिखाने पर बधाइयों के साथ मिलने का न्यौता मिल जाता है।

ये तो हुई उन बौड़म मर्दों की बात, जो मजे-मजे में औरतों को घास-पात और जाने क्या-क्या बोल पाते हैं, लेकिन सब एक से नहीं। कई ‘संवेदनशील’ पुरुष भी हैं। वे युवा लड़कियों की पोस्ट पर चमकता हुआ लाल दिल नहीं बनाते, और न ही बुढ़ाती औरतों की पोस्ट पर वाहियात कमेंट करते हैं। वे हरदम शालीन रहते हैं, लेकिन ठहरिये! ये जनाब ज्यादा खतरनाक हैं। वे औरतों की बतक्कड़ी का बदला दफ्तर में लेते हैं। ऑनलाइन मीटिंग में जैसे ही उनकी को-वर्कर बोलना शुरू करेगी, वे बात काट देंगे। कोई ढीठ युवती बोलती ही जाए, तो बीच में ही कोई सस्ता-सा चुटकुला सुनाएंगे, जिसपर कोरस में सारे के सारे मर्द ठठाकर हंसेंगे। मीटिंग का ऑफिशियल एजेंडा चाहे जो हो, लेकिन एक अनकहा एजेंडा हमेशा चलता है- औरत हो, औरत ही रहो!

कोविड के बाद से ढेरों-ढेर स्टडी आ चुकीं, जो बताती है कि रिमोट मीटिंग किस तरह औरतों को गूंगा बना रही है। येल यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान विभाग ने इस पर एक रिसर्च की। ‘हू टेक्स द फ्लोर एंड व्हाय’ नाम से इस शोध में पाया गया कि पुरुष कर्मचारी जब बोलता है, तो उसे ज्यादा जानकार माना जाता है, वहीं महिला कर्मचारी जब बोले, तो उसे चुलबुली का टैग मिलता है।

जानी-मानी ग्लोबल मैनेजमेंट कंसल्टिंग फर्म मैक्किंसे एंड कंपनी ने भी कुछ इसी तरह के नतीजे देखे। अलग-अलग देशों की 329 कंपनियों पर हुए सर्वे में लगभग 70 फीसदी महिलाओं ने माना कि बड़ी मीटिंग के दौरान उन्हें बोलने ही नहीं दिया जाता, वहीं 38 प्रतिशत ने कहा कि उनके आइडिया को पुरुषों के नाम से प्रेजेंट किया गया। ऐसा करने के पीछे मैनेजमेंट की दलील थी कि इससे आइडिया में ‘वजन’ आ जाएगा।

यानी किसी प्रोजेक्ट को वजनदार बनाने के लिए जरूरी है कि उसपर मर्दाना पसीने की मुहर लगी हो। औरतें बोलती हुई तो अच्छी लगती हैं, लेकिन तभी तक, जब वे कंघी-चोटी की बात करें। सोचती औरतें भी हसीन होती हैं, लेकिन तभी तक, जब उनकी सोच रात के खाने और पति को लुभाने के आसपास घूमे।

बहरहाल! बुल्ली बाई ऐप के तथाकथित मास्टर माइंड पकड़ाई में आ चुके। कार्रवाई होगी। अब शायद अगले कुछ हफ्तों या महीनों तक ऐसा कोई ऐप न दिखे, लेकिन इससे क्या सब ठीक हो जाएगा? रोज हर 3 में से 1 लड़की फेसबुक या किसी दूसरे प्लेटफॉर्म पर अश्लील कमेंट झेलेगी। दफ्तरों में काम करती लड़कियां मीटिंग में होकर भी नहीं होंगी। ये सब चलता रहेगा क्योंकि असल दुनिया की तरह ही वर्चुअल संसार में भी इन टुइयां बातों के लिए किसी के पास वक्त नहीं।