ब्लैकबोर्डडाकू सलीम गुर्जर का गांव नमक-मिर्च को तरस रहा:150 घरों में ताले, कोई बीमार पड़े तो बुखार की गोली भी नहीं मिलती

13 दिन पहलेलेखक: चंबल के बीहड़ से मनीषा भल्ला

उत्तर प्रदेश के चंबल का बिलौंड गांव। चारों तरफ ऊंचे-ऊंचे पहाड़, जंगल, नदी और नाले। दिन के उजाले में भी डरावना अंधेरा। वीरान और सुनसान गलियां। दूर-दूर तक कोई हलचल नहीं। हल्की आवाज से भी मन सिहर उठता है। यहां 250 घर हैं। 150 में ताले लटके हैं। दो घरों को छोड़ दें तो बाकी सब कच्चे और खंडहर।

ये गांव है बीहड़ के खूंखार डाकू रहे सलीम गुर्जर का। करीब 100 लोगों का गैंग था इसका। इसमें 15-20 महिलाएं। यानी गांव के 80% लोग डकैत और सबसे ज्यादा महिला डाकुओं वाला गैंग। 15 साल तक इन लोगों ने खूब आतंक मचाया। अनगिनत हत्याएं की, लूटपाट किया। गांव वालों को खूब पैसे बांटे, लेकिन आज ये गांव नमक-मिर्च के लिए भी तरस रहा है।

UP के उरई जिले के इन्हीं रास्तों से 110 किलोमीटर का सफर करके मैं बिलौंड गांव पहुंची। सलीम गुर्जर भले मारा गया है, लेकिन उसका खौफ आज भी लोगों के मन में है।
UP के उरई जिले के इन्हीं रास्तों से 110 किलोमीटर का सफर करके मैं बिलौंड गांव पहुंची। सलीम गुर्जर भले मारा गया है, लेकिन उसका खौफ आज भी लोगों के मन में है।

गांव में स्कूल है, लेकिन टीचर नहीं। पान-गुटखा की एक दुकान तो है, लेकिन सर्दी-जुकाम की दवा या नमक-मिर्च भी खरीदनी हो, तो नदी पार करके 12 किलोमीटर दूर दूसरे गांव जाना पड़ता है। पुरुष तो जैसै-तैसे नदी पार करके चले जाते हैं, लेकिन महिलाएं भगवान भरोसे। गंभीर बीमारी हो गई, तो बचना नामुमकिन।

उरई जिला हेडक्वार्टर से 110 किलोमीटर का सफर करके मैं जालौन, इटावा और भिंड की सीमा पर बसे बिलौंड गांव पहुंची।

शाम 5 बजे का वक्त। एक घर के सामने कुछ लोग इकट्ठा हैं। लोग यानी मर्द, यहां औरतें पुरुषों के सामने नहीं आतीं। रात के अंधेरे में किसी की शक्ल ठीक से पहचान में नहीं आ रही। बिजली तो है, लेकिन ज्यादातर लोगों के पास कनेक्शन नहीं। इक्का-दुक्का घरों में टिमटिमाते बल्ब को छोड़ दें, तो सूरज ढलते ही ये गांव अंधेरे में डूब जाता है।

गांव में बिजली होते हुए भी इतना अंधेरा है कि मुझे मोबाइल का टॉर्च जलाकर लोगों का चेहरा देखना पड़ा।
गांव में बिजली होते हुए भी इतना अंधेरा है कि मुझे मोबाइल का टॉर्च जलाकर लोगों का चेहरा देखना पड़ा।

मैं पूछती हूं इस गांव का हाल ऐसा क्यों है? जवाब मिलता है- सलीम गुर्जर की वजह से।

सलीम गुर्जर कौन था, उसकी वजह से ये गांव क्यों सजा भुगत रहा?

अकबर सिंह कुशवाहा सलीम की कहानी सुनाते हैं…

‘’सलीम 6 भाई था। सभी ऊंचे, लंबे और हट्टे-कट्टे। पिता नामी पहलवान थे। सिर्फ एक भाई ने शादी की थी और उसका एक ही बेटा था। सलीम का बीहड़ के नामी डाकू निर्भय गुर्जर और रज्जन गुर्जर के साथ उठना-बैठना था। निर्भय गुर्जर अक्सर सलीम के घर आता रहता था। इस वजह से गांव में सलीम की दबंगई चलती थी।

ये बात गांव के एक दबंग चौहान परिवार को पसंद नहीं थी। उसी परिवार के हरचंद चौहान पंचायत चुनाव में खड़े हुए और चुनाव हार गए। उन्होंने सलीम गुर्जर परिवार के साथ गाली-गलौज किया कि तुमने वोट दिया होता तो मैं जीत जाता।

धीरे-धीरे ये बहस लड़ाई-झगड़े में बदल गई। जब निर्भय गुर्जर को इस बात का पता चला तो वो गांव आया और रातों-रात चौहान परिवार के घर को घेर लिया। उसने पूरे गांव को धमकी दी कि किसी ने भी सलीम की तरफ आंख उठाकर देखा, तो उसे हम बर्बाद कर देंगे।

अगले दिन डर के मारे हरचंद चौहान का पूरा परिवार गांव से भागकर भिंड चला गया। कुछ दिनों बाद सलीम गुर्जर के इकलौते भतीजे की हत्या हो गई। आरोप लगा चौहान परिवार पर। बस यहीं से शुरू होती है सलीम गुर्जर के बागी बनने की कहानी।

पहले सलीम चोरी-छिपे निर्भय गुर्जर की मदद करता था, लेकिन अब उसने बंदूक उठा लिया। उसके ऊपर खून सवार हो गया। थोड़े दिन बाद ही सलीम ने चौहान परिवार के 3 नाबालिग लड़कों की गोली माकर हत्या कर दी।

इसके बाद तो बीहड़ में उसका खौफ सिर चढ़कर बोलने लगा। लोग उसके नाम से कांपने लगे। पुलिस भी यहां आने से डरती थी। करीब 15 साल तक सलीम ने बीहड़ में राज किया। 2006 में पुलिस एनकाउंटर में वो मारा गया। उसके दो भाई अभी जिंदा हैं, लेकिन वे कहां हैं किसी को नहीं पता।’’

अकबर कहते हैं,’सलीम गांव के बाहर ही तंबू लगाकर रहता था। वहां उसने अपना एक चबूतरा भी बनवाया था जो आज भी है। वह गांव वालों के बीच खूब पैसे बांटता था। इसी वजह से गरीबी की सताई हुईं कम उम्र की लड़कियां खुद उसके गैंग में शामिल हो जाती थीं। इतना ही नहीं, वह लड़कियों का अपहरण भी कर लेता था और फिर जबरन उनसे शादी भी करता था।

वह अपनी जरूरत की चीजें भी गांव के लोगों से ही मंगाता था और बचे हुए पैसे कभी मांगता नहीं था।

इतना ही नहीं, गांव में किसी की शादी हो, कोई बीमार हो या किसी के घर कोई मर गया हो, तो सलीम खुद उसके घर आकर उसकी मदद करता था। बिन मांगे भरपूर पैसे देता था। इस वजह से गांव के लोग उसे अपना मसीहा समझते थे। बदले में सलीम खाने के लिए गांव वालों से रोटियां मांगता था।’’

सलीम गुर्जर के गुनाहों की सजा गांव के बच्चे भी भुगत रहे हैं। इनके लिए स्कूल तो है, लेकिन पढ़ाई और टीचर नहीं हैं।
सलीम गुर्जर के गुनाहों की सजा गांव के बच्चे भी भुगत रहे हैं। इनके लिए स्कूल तो है, लेकिन पढ़ाई और टीचर नहीं हैं।

यहां से थोड़ा आगे बढ़ती हूं तो मुझे सद्दीक अली मिलते हैं। सद्दीक लोकगायक हैं। वे सलीम गैंग का मनोरंजन किया करते थे। कहते हैं, ’1990 की बात है। एक बार सलीम ने गांव में यज्ञ करवाया। उसमें मुझे भी बुलाया। मना करने का तो कोई सवाल ही नहीं था।

सलीम के पीछे 5-6 औरतें बंदूक लेकर खड़ी रहती थीं। उस रात सलीम सबके साथ जमकर नाचा। जाते-जाते मुझे 2600 रुपए दिया। उस जमाने में 2600 रुपए बहुत होता था।’

इसी गांव के राम खिलावन सिंह चौहान बताते हैं- ‘यह गांव चारों तरफ पहाड़ और जंगलों से घिरा है। सिंधू नदी बगल में है। डाकुओं के छिपने और बचने के लिए यह गांव हर तरह से मुफीद था।

डाकू मलखान सिंह, फूलन देवी, घनश्याम बाबा, मुस्तकीम बाबा, पुतलीबाई जैसे कई बड़े डाकुओं ने यहां लंबे वक्त तक डेरा जमाया है। इसी वजह से यह गांव कुख्यात होता चला गया।’

वे कहते हैं, ‘जब तक ये डाकू जिंदा रहे, गांव के लोगों को किसी चीज की दिक्कत नहीं हुई, लेकिन उसके बाद यह गांव हाशिए पर चला गया। आज हाल ये है कि आधे से ज्यादा घरों में ताले लगे हैं।

गांव के मर्द और लड़के सूरत-दिल्ली कमाने चले गए हैं। कई घर तो ऐसे हैं जहां अकेली औरत ही बची है। जब डाकू जिंदा थे तो गांव में पुलिस आती थी। मुखबिरी के शक में गांव के लोगों को पीटती थी। अब न पुलिस आती है, न प्रशासन।'

इस गांव के ज्यादातर घर कच्चे हैं। कुछ मिट्टी के बने हैं तो कुछ झोपड़ियां हैं। पक्के घर गिनती के बस दो हैं।
इस गांव के ज्यादातर घर कच्चे हैं। कुछ मिट्टी के बने हैं तो कुछ झोपड़ियां हैं। पक्के घर गिनती के बस दो हैं।
गांव में 250 घर हैं। इनमें से करीब 150 घरों में ताले लगे हैं। कई लोग सुविधाओं की कमी से तो कई लोग खौफ के चलते गांव छोड़कर जा चुके हैं।
गांव में 250 घर हैं। इनमें से करीब 150 घरों में ताले लगे हैं। कई लोग सुविधाओं की कमी से तो कई लोग खौफ के चलते गांव छोड़कर जा चुके हैं।

इसके बाद मेरी मुलाकात गांव की मूलादेवी से होती है। उनका बेटा हैदराबाद में बताशा बेचता है। वे कहती हैं, ’बेटा कभी एक हजार तो कभी दो हजार रुपए घर भेजता है, तो कभी वो भी नहीं भेज पाता।

नदी पार करना अब मेरे बस की बात नहीं रही और घर में कोई दूसरा है नहीं जो नदी पार जाकर सामान लाए। सलीम जिंदा था तो हमें किसी चीज की दिक्कत नहीं होती थी।’

बरसात में टापू बन जाता है गांव, नदी पर न पुल न नाव

गंगाजली के दो बेटे गुजरात में मजदूरी करते हैं। वे कहती हैं,’ जब बरसात आती है, तो गांव टापू बन जाता है, पूरी तरह अलग-थलग पड़ जाता है। बीमार पड़ जाएं तो कोई सुध-बुध लेने वाला नहीं। गांव में बुखार की गोली तक नहीं मिलती। मर्द तो तैरकर गांव से बाहर चले जाते हैं, लेकिन हम औरतें क्या करें? हमारे लिए एक नाव भी नहीं है।'

इस गांव से रामपुरा कस्बा नदी के रास्ते 12 किलोमीटर दूर है और सड़क के रास्ते 26 किलोमीटर। यहां सरकारी राशन मिलता है। छोटी-मोटी दुकानें हैं, जहां रोजमर्रा की चीजें मिल जाती हैं।

जिनके पास बाइक है, वे 26 किलोमीटर चलकर सामान लाते हैं, लेकिन बरसात के दिनों में उनके लिए भी आफत आ जाती है। सड़क पानी से भर जाती है। गांव में दो से तीन लोगों के पास ही बाइक है।

गांव में सड़क के नाम पर यही रास्ता है। 26 किलोमीटर चलने के बाद रामपुरा कस्बा मिलता है। बरसात हो तो ये सड़क भी बंद हो जाती है।
गांव में सड़क के नाम पर यही रास्ता है। 26 किलोमीटर चलने के बाद रामपुरा कस्बा मिलता है। बरसात हो तो ये सड़क भी बंद हो जाती है।

सांप के डसने से कई लोग मरे, इलाज के लिए 110 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है

गंगाजली देवी कहती हैं, 'बीमारी की वजह से गांव के कई लोगों ने जान गंवाई है। दो महीने पहले ही एक औरत को सांप डंस लिया। नदी पार करके उसे हम ले नहीं जा सकते थे। गाड़ी की व्यवस्था करने और फिर उरई ले जाने में काफी वक्त लग गया। हम अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टर ने कहा कि अब औरत बची ही नहीं, इलाज क्या करें।'

जंगल और नदी-नाले की वजह से इस गांव में सांप खूब निकलते हैं। हर साल कुछ लोगों की जान भी जाती है। वजह ये कि आसपास सांप काटने के इलाज की व्यवस्था नहीं है। इसके लिए उरई जाना पड़ता है। उरई यहां से 110 किलोमीटर दूर पड़ता है। ऐसे में वहां पहुंचने से पहले ही लोगों की जान चली जाती है।

नाव चलाने के नाम पर सलीम से जुड़े लोग कमीशन मांगते हैं

गांव के एक बुजुर्ग कहते हैं कि नदी पर बहुत दिनों से पुल बन रहा है, लेकिन आज तक काम पूरा नहीं हुआ। प्रशासन की इसमें दिलचस्पी नहीं है। एक-दो बार गांव के लोगों ने नाव चलाने की पहल की, लेकिन सलीम गुर्जर से जुड़े लोग धमकी देने लगे। वे कहने लगे कि नाव की कमाई में हमारा भी हिस्सा रहेगा। तब से कोई नाव चलाने की बात ही नहीं करता है।

ये सिंधु नदी है। इसी नदी को पार करके रामपुरा कस्बा जाना पड़ता है। उस पार जाने के लिए नाव तक की सुविधा नहीं है।
ये सिंधु नदी है। इसी नदी को पार करके रामपुरा कस्बा जाना पड़ता है। उस पार जाने के लिए नाव तक की सुविधा नहीं है।

सवाल पूछने पर अधिकारी ने फोन काट दिया

नदी पर अब तक पुल क्यों नहीं बना? आखिर गांव वालों को नाव क्यों नहीं मिलती? ये सवाल मैंने जालौन के मुख्य विकास अधिकारी डॉ. अभय कुमार श्रीवास्तव से किया। उन्होंने मेरी पूरी बात सुनी और फिर फोन काट दिया। इसके बाद मैंने कई बार फोन किया, लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया।

चंबल के डाकुओं का डॉक्युमेंटेशन करने वाले और चंबल विद्यापीठ के अध्यक्ष शाह आलम राणा बताते हैं कि इस गांव पर बागियों की मार रही है। गांव खंडहर बन चुका है। ज्यादातर लोग पलायन कर चुके हैं। जो नहीं कर पाए उनके घर के बच्चे गांव से जा चुके हैं। रोजगार के नाम पर कुछ भी नहीं है।

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