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12वीं के रिजल्ट पर भास्कर पैनल का जवाब:रिजल्ट के पूरे पैटर्न को बदलने का मौका; 3 घंटे के पेन-पेपर वाले एग्जाम के बजाए बच्चे की एक्टिविटी के हिसाब से मार्किंग हो

11 दिन पहलेलेखक: जनार्दन पांडेय

CBSE, ICSE और राज्यों के अधिकतर बोर्ड्स ने 12वीं की परीक्षाएं रद्द कर दी हैं या कर रहे हैं। फिलहाल सभी जगहों पर छात्रों को प्रमोट करने के तरीकों को लेकर विचार किया जा रहा है। UP बोर्ड 11वीं और प्री बोर्ड के मार्क्स पर विचार कर रहा है। MP बोर्ड 10वीं, 11वीं और 12वीं की हाफ-ईयरली परीक्षाओं के मार्क्स पर विचार रहा है। मंत्रियों व विशेषज्ञों की कमेटी बनाई जा रही है। बिहार बोर्ड परीक्षा ले चुका है।

ऐसे में 12वीं के छात्रों के मन में ऊहापोह की स्थिति है। खासकर के प्रमोट होने के तरीकों और आगे एडमिशन को लेकर। JEE, NEET या यूनिवर्सिटी के CET की रूपरेखा क्या होगी? तमाम सवाल घूम रहे हैं।

इसलिए भास्कर ने विशेषज्ञों का एक पैनल बनाया है। इसमें CBSE के मौजूदा सेक्रेटरी अनुराग त्रिपाठी, CBSE के पूर्व चेयरमैन अशोक गांगुली, NCERT की पूर्व डायरेक्टर प्रवीण सिंक्लेयर, इसी के पूर्व डायरेक्टर जेएस राजपूत और बड़े प्राइवेट स्कूलों के एसोसिएशन नेशनल प्रोग्रेसिव कॉन्फ्रेंस के पूर्व चेयरमैन अशोक पांडेय से चार प्रमुख सवाल पूछे।

मौजूदा वक्त के सबसे जरूरी चार सवाल

  1. 12वीं के छात्रों को प्रमोट करने का सबसे उपयुक्त फॉर्मूला क्या होना चाहिए?
  2. कुछ राज्यों के बोर्ड ने परीक्षाएं ले ली हैं। उन राज्यों के बोर्ड और जो बोर्ड प्रमोट कर रहे हैं, उनमें क्या कोई फर्क होगा? क्या इसका असर उस राज्य के बच्चों पर पड़ेगा।
  3. 12वीं के बाद यूनिवर्सिटी, IIT, NEET और मैनेजमेंट के इंस्टीट्यूट में एडमिशन होते हैं। इन इंस्टीट्यूट के लिए अगला कदम क्या होना चाहिए?
  4. बच्चों ने DU और कई मेरिट वाले संस्थानों की तैयारी की होगी। अब उनका कॉम्पिटिशन बढ़ जाएगा। क्या इसका कोई समाधान है?

एक्सपर्ट 1ः मूल्यांकन की पूरी प्रणाली को बदलने का सही वक्त आ गया है

अभी फॉर्मूला तय नहीं हो पाया है। इसके लिए 12 मेंबर की एक कमेटी बनाई है। इसमें UGC, NCERT, केंद्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय, दिल्ली सरकार और चंडीगढ़ सरकार के प्रतिनिधि हैं। यही कमेटी 15 दिन में फॉर्मूला देगी। अभी कुछ भी तय नहीं है। बस इतना कह सकते हैं कि बच्चे ये न सोचें कि केवल प्री-बोर्ड या मिड टर्म के आधार पर रिजल्ट आएंगे। कमेटी एक व्यापक फॉर्मूले पर विचार कर रही है। इसमें किसी बच्चे को अनावश्यक नुकसान या अनायास लाभ नहीं मिलेगा।

हम काफी समय से इस तैयारी में थे कि बच्चे को केवल 3 घंटे के पेपर पर न आंका जाए। कोविड ने हमें वो मौका दिया है कि बच्चे का आकलन उसके किए गए हर काम के आधार पर किया जाए। यह बहुत बड़ा अवसर है कि हम अपनी पूरी मूल्यांकन पद्धति को बदल सकते हैं।

पहले भी राज्य हमसे राय लेते रहे हैं। इस वक्त भी ले रहे हैं। जो राज्य बोर्ड हमारे पास आ रहे हैं, उन्हें डाटा से लेकर सभी जरूरी चीजें उपलब्‍ध करा रहे हैं। ताकि राज्यों के बोर्ड में कोई विषमता न हो। हर राज्य के बच्चे को समान अवसर मिले।

सभी हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूट को अभी से अपने यहां स्किल आधारित कोर्स की सीट्स बढ़ाने पर काम करना चाहिए। ग्रेजुएशन के बाद नौकरी वाली पढ़ाई के बारे में सोचने से ज्यादा जरूरी है कि 12वीं के बाद ही ऐसी पढ़ाई कराई जाए जिससे छात्र-छात्राओं को काम मिलने लगे। आने वाले दिनों में 12वीं में ही बच्चों को तीन घंटे के पेन पेपर से निकाल कर प्रैक्टिकल पर ज्यादा फोकस किया जाएगा। लीडरशिप बढ़ावा दिया जाएगा। इसलिए हायर एजुकेशन को भी यही तैयारी कर लेनी चाहिए।

यही समय है कि माता-पिता और पूरा समाज ये समझे कि नंबर रेस से निकलने की जरूरत है। रटकर नंबर पाने और किसी इंस्टीट्यूट में नाम लिखने से अब बच्चे की प्रतिभा साबित नहीं होती। इसलिए किसी संस्‍थान विशेष के‌ लिए होड़ नहीं लगानी चाहिए। अगर वाकई में कोई बच्चा प्रतिभाशाली है तो उसके लिए छात्रों की संख्या बढ़ने से ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा।

फिर भी कमेटी अंतरराष्ट्रीय बोर्ड से भी संपर्क में है। बच्चों को प्रमोट करने में हर तरीके, जरूरी मानकों को ध्यान रखा जाएगा ताकि उनके प्रमोशन में कोई खामी न रहे।

एक्सपर्ट 2ः कॉम्पिटिशन में 100 अभ्यर्थी बैठें या 200, प्रतिभाशाली स्टूडेंट्स के लिए कोई परेशानी की बात नहीं

CBSE ऐसी परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम है। पहले भी बाढ़ में कॉपियां बहने जैसी घटनाएं होती रही हैं। इसलिए इस वक्त विद्यार्थियों और उनके माता-पिता को धैर्य रखना चाहिए।

सभी राज्यों के बोर्ड्स चाहें तो अन्य बोर्ड के साथ एक संयुक्त चर्चा कर लें। फिलहाल ऐसे किसी फैसले से बचना चाहिए कि जिससे कि दूसरे राज्यों के बच्चों का नुकसान हो जाए। इसलिए राज्यों के बोर्ड को आपस में एक बार बात करना चाहिए।

किसी भी कॉम्पिटिशन की तैयारी कर चुके छात्र के लिए संख्या बढ़ने से कोई समस्या नहीं है। प्रतिस्‍पर्धा परीक्षा में 100 के बजाए 200 बैठें तो भी प्रतिभा पर कोई फर्क नहीं होगा।

संख्या बढ़ने से मुमकिन है कि कुछ छात्रों को इस साल एडमिशन मनचाहे संस्‍थानों में न मिल पाए, लेकिन यही वो समय है कि जब वे 18वें साल के इर्द-गिर्द होते हैं। उन्हें परिस्थितियों को संभालना सीखना होगा। 10 साल बाद यही छात्र बड़े निर्णय कर रहे होंगे। आज ही उनके निर्णय क्षमता को बेहतर करने की नींव पड़ जाएगी।

एक्सपर्ट 3ः राज्यों के बोर्ड को एक बार आपस में बात कर लेनी चाहिए

सभी बोर्ड को 100 नंबर को चार या पांच हिस्सों में बांट देना चाहिए। इनमें प्री-बोर्ड, मिड टर्म, 10वीं के रिजल्ट से लेकर यूनिट टेस्ट तक के मार्क्स के आधार पर मार्किंग करनी चाहिए। इसमें औसत मार्क्स और अधिकतम मार्क्स देने की सीमा भी तय करनी होगी। नहीं तो काफी अप्रत्याशित रिजल्ट आएंगे। इस वक्त अगर बहुत ज्यादा व्यापक स्तर पर मा‌र्किंग करने गए तो उलझने के आसार बढ़ जाएंगे।

देश में करीब 61 से ज्यादा बोर्ड हैं। परीक्षा को लेकर हुई आखिरी बैठक में शिक्षा मंत्री से केवल चार बोर्ड ने परीक्षा कराने की बात की थी। बाकी सभी परीक्षा रद्द करने के पक्ष में थे। निश्चित ही उन्होंने अपने फॉर्मूले तय किए होंगे। बेहतर होगा कि सभी राज्य बोर्ड आपस में एक बार और मीटिंग कर लें ताकि बच्चों के मार्क्स में एक किस्म की बराबरी हो।

इस बार एडमिशन के लिए हर हाल में कॉमन एंट्रेंस टेस्ट (CET) कराना चाहिए। अगर कोरोना के चलते इंस्टीट्यूट पहले की तरह परीक्षा नहीं भी करा पा रहे हैं तो उन्हें कम से कम 50% मार्क्स का ऑनलाइन टेस्ट ही करा लेना चाहिए। बाकी 50% भले ही वे 10वीं और 12वीं की मेरिट के आधार पर ले लें, क्योंकि इस बार हुए प्रमोशन किसी हाल में वैसे नहीं होंगे जैसे पहले होते थे।

ऐसे में किसी मेधावी बच्चे की मन में ऐसी भावना का शिकार नहीं होने देना चाहिए कि उसने जो मेहनत की वो सब बेकार चली गई।

अमेरिका, जर्मनी समेत कई ऐसे उदाहरण हमारे पास मौजूद हैं जिनमें बच्चे इंटरमीडिएट, यानी 12वीं के बाद परंपरागत कोर्सेज से ज्यादा स्किल सीखकर काम की तलाश में लगते हैं। इसलिए किसी बड़ी यूनिवर्सिटी के लिए तैयारी के बजाए कोई स्किल सीखने को तरजीह दें। ऐसे कोर्सेज की तलाश करें जिनके करने से जल्दी काम शुरू हो सके।

एक्सपर्ट 4ः नेशनल करिकुलम फ्रेम वर्क 2005 को मान लिया होता तो आज ये हालत न बनती

NCERT ने 2005 में एक नेशनल करिकुलम फ्रेम वर्क दिया था। इसमें बच्चों के सतत मूल्यांकन की बात थी। अगर उसे लागू कर दिया गया होता आज ये समस्या न खड़ी होती। उसमें बच्चे की मार्किंग उसकी क्लास में उपस्थिति, समय पर काम पूरा करने, स्कूल एक्टिविटी में पार्टिसिपेट करने से लेकर नियमित मूल्यांकन करते चलना था। मसलन अगर उसे 100 नंबर दिए जाने हैं तो पहले 30 नंबर शुरुआत के तीन महीने में तय हो जाएं। ताकि सेशन खत्म होते-होते उनके 100 नंबर फिक्स हो जाएं।

लेकिन पिछली सरकार ने या इस सरकार दोनों ने ही उसकी अनदेखी की। असल में इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी अपने शिक्षकों को उस तरह तैयार करना है, जो कोई भी सरकार नहीं कर पा रही है। फिलहाल जो भी फॉर्मूला बना लिया जाए वो बच्चों के साथ 100% न्याय नहीं कर सकता। इसलिए यही सही अवसर है कि उस फ्रेम वर्क पर गंभीरता से विचार किया जाए।

मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई ज्यादा फर्क पड़ेगा। क्योंकि बोर्ड परीक्षाओं में पहले भी भारी हेर-फेर होते थे। नकल की खबरें बहुत आम थीं। राज्यों की बोर्ड की परीक्षाओं को लेकर ढेर सारी शिकायतें आती रही हैं। बिहार बोर्ड की टॉपर को लेकर विवाद सामने आ चुके हैं। इसलिए चाहे वो प्रमोशन करें या परीक्षा उनमें ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा।

यह एक बड़ा साल होने जा रहा है। जरूरी है कि यूनिवर्सिटी स्तर पर भी बदलाव किया जाए। ओपन यूनिवर्सिटी पर ध्यान बढ़ाया जाए। क्योंकि प्रमोशन के बाद हमारे राज्य और केंद्र की यूनिवर्सिटी में इतनी सीट्स नहीं होंगी कि सभी को एडमिशन मिल पाए। इसलिए पत्राचार कोर्स भी बढ़ाने चाहिए।

यह बड़ी गलत भावना हमारे देश में तैयार हो गई है। इसके पीछे सबसे बड़ी भूमिका कोचिंग्स ने निभाई है। चाहे DU-JNU की बात हो NEET-JEE की। कोचिंग्स के चलते गला काट प्रतियोगिता का चलन बढ़ा है। पहले जितना महत्व इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में पढ़े स्टूडेंट का था, उतना ही दिल्ली यूनिवर्सिटी का। कोचिंग वालों ने इसमें फर्क बच्चों को समझा दिया है। इन्होंने पढ़ाई के तरीके को बिगाड़ दिया है। कुछ लोग छठी कक्षा से अपने बच्चों को कोचिंग कराना शुरू कर देते हैं। बच्चों में निराशा की ये एक बड़ी वजह है। इससे हटकर बच्चे को सीखने और स‌िखाने वाले मोड में लाएं। हर बच्चा बड़ी यूनिवर्सिटी में पढ़ने के लिए नहीं बना है। वो कोई स्किल वाला एक साल कोर्स कर के जिंदगी में बहुत आगे तक जा सकता है।

एक्सपर्ट 5ः 100 नंबर को अधिकतम 5 हिस्से में बांट कर करें मूल्यांकन

केवल CBSE के पास ही 12वीं में करीब 15 लाख बच्चे हैं। पूरे देश में यह संख्या करोड़ से भी ज्यादा है। ऐसे में कुछ लोग मिलकर कोई ऐसा फॉर्मूला नहीं बना सकते जो परीक्षा जैसी हो, जो सभी मान्य हो। इसलिए सभी बोर्ड को चाहिए कि बहुत ज्यादा विकल्पों के बारे में सोचने के बजाए 100 नंबर को अधिकतम 5 हिस्से में बांटें। इसमें प्रोजेक्ट वर्क से लेकर 10वीं की परीक्षाओं तक नंबर को आधार बनाकर आगे बढ़ जाएं।

इसमें बहुत बड़ी भूमिका CBSE की है। पहले कई बोर्ड परीक्षा कराने की ताक में थे, लेकिन जैसे ही CBSE ने 12वीं की परीक्षा रद्द की, MP और UP जैसे ज्यादा संख्या वाले बोर्ड ने भी परीक्षाएं रद्द कर दीं। ऐसे में राज्यों के बोर्ड भी CBSE के पैटर्न को ही फॉलो करते नजर आ रहे हैं। इसमें कोई बुराई भी नहीं है।

पिछले साल ही हायर एजुकेशन वाले संस्थानों में एडमिशन की व्यवस्था चरमराई हुई है। पिछले साल कई यूनिवर्सिटीज ने मेरिट के आधार पर एडमिशन लिए, जो हमेशा टेस्ट लेती थीं। इस बार ऐसे आसार हैं कि पहले से ज्यादा बच्चे 12वीं पास होंगे। ऐसे में तीन प्रमुख कदम इन इंस्टीट्यूट और छात्रों को उठाने चाहिए-

  1. स्टेट यूनिवर्सिटी में इस वर्ष 5 से 10 प्रतिशत सीट बढ़ा दी जाएं
  2. ग्रेजुएशन के अलावा और संभावनाओं को तलाशें, इसमें कोई 1 साल कोर्स हो सकता है
  3. JEE, NEET से जुड़ी सीटें भी बढ़ा देनी चाहिए

सही कहें तो इस साल इसका समाधान नहीं है। मुमकिन है कि इस बार बहुत से छात्रों को कहीं एडमिशन न मिले। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि कोई बहुत चिंताजनक बात है। बहुत से बच्चे 12वीं के बाद तैयारी के लिए एक साल दो साल का समय लेते रहे हैं। बच्चे इस साल को संभाल लेंगे।

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