• Hindi News
  • Db original
  • Child Pornography Part 3 What Is Paedophilia Why People Like Children Sexually Psychology

चाइल्ड पोर्नोग्राफी पड़ताल पार्ट-3:70 लाख भारतीयों को बच्चों पर गंदी नजर डालने की बीमारी; इसलिए हम चाइल्ड पोर्न का गढ़

14 दिन पहलेलेखक: वैभव पलनीटकर

करीब 12 साल की बेटी का पिता अपने ही घर के कमरे में लैपटॉप खोलकर बैठा है। अपने परिवार वालों से छुपते-छुपाते हुए वो इंटरनेट पर ‘Children Nude Video’ सर्च करता है। उसे इस बात का अंदाजा है कि वो कुछ गलत कर रहा है, लेकिन जानते हुए भी वो अपनी इच्छाओं को काबू नहीं कर पाता है। चाइल्ड न्यूड वीडियो देखते हुए अचानक दरवाजे पर दस्तक सुनकर वो बुरी तरह डर जाता है और झटके से लैपटॉप बंद कर देता है।

ये सीन Dont Offend India के जागरुकता विज्ञापन का है, एड में आगे वैधानिक चेतावनी आती है- क्या आपको बच्चों के सेक्शुअल इमेज देखने की इच्छा होती है? इसे देखना बंद कर दीजिए। हम आपकी मदद करेंगे।

चाइल्ड पोर्नोग्राफी की पड़ताल की पहली रिपोर्ट में हमने आपको पीड़ित बच्चों की कहानियां बताईं, दूसरी रिपोर्ट में हमने चाइल्ड पोर्न रैकेट का खुलासा किया। अब सीरीज के तीसरे हिस्से में हम चाइल्ड पोर्न के इर्द गिर्द तैयार होने वाले मनोविज्ञान पर बात करना चाहते हैं। आखिर बच्चों की पोर्न फिल्म देखने वाली मानसिकता तैयार कैसे होती है? वहीं जो बच्चे पोर्न रैकेट का शिकार बनते हैं उनके दिमाग और मन पर इसका क्या असर होता है?

चाइल्ड पोर्न देखने वाला व्यक्ति पीडियोफीलिया नाम की बीमारी का मरीज होता है, ये एक गंभीर मानसिक बीमारी है, जिसका इलाज किया जा सकता है।

भारत में करीब 70 लाख लोग पीडोफीलिया के मरीज

बच्चों के प्रति यौन आकर्षण होने की बीमारी ‘पीडोफीलिया’ कहलाती है। रिसर्च के मुताबिक वयस्क पुरुष आबादी का करीब 1% हिस्से को बच्चों के प्रति सेक्शुअल फैंटसी होती है और वो पीडोफीलिया से ग्रसित हो सकते हैं। इस हिसाब से भारत में करीब 70 लाख लोग पीडोफीलिया के मरीज हो सकते हैं। महिलाओं में पीडियोफीलिया की बीमारी होती है, लेकिन इसकी संख्या बहुत ही कम है। इसलिए ICPF की रिपोर्ट में भी पता चला था कि चाइल्ड पोर्न को देखने वाले 90% पुरुष ही हैं।

कई लोगों को किशोरों (ऐसे बच्चे जिनका यौवन शुरू हो रहा होता है) को सेक्शुअली देखना पसंद होता है। इस बीमारी को हीबीफीलिया कहा जाता है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इन बीमारियों के पीछे क्या कारण हैं ये अभी साफ नहीं है, लेकिन कई लोग पीडोफीलिया और हेबीफीलिया से ग्रसित होते हैं, जो अपनी पसंद पर काबू रखने के लिए आसान रास्ता चाहते हैं।

फोर्टिस हेल्थकेयर में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट मीमांसा सिंह तंवर बताती हैं कि- ‘पीडियोफीलिया एक बीमारी है, जो एक एबनॉर्मल बात है। ये होना किसी भी व्यक्ति के लिए खतरनाक बात है। अगर किसी व्यक्ति को लगता है कि चाइल्ड पोर्न देखने पर उसे मजा आ रहा है, इसका मलतब है कि वो पीडियोफीलिया से ग्रस्त है।’

बच्चों के यौन आकर्षण की वजह क्या है?

मीमांसा सिंह बताती हैं कि जब हम किसी भी मानसिक रोग की वजह ढूंढने की कोशिश करते हैं तो हम उलझते जाते हैं। जबकि हमें समझने की जरूरत है कि हमारा समाज धीरे-धीरे ज्यादा आक्रामक होता जा रहा है, पीडोफीलिया भी इसी का साइड इफेक्ट है। पोर्नोग्राफी का कंटेंट पहले से ही आक्रामक किस्म का होता है और दूसरी तरफ चाइल्ड पोर्न और भी ज्यादा आक्रामक किस्म का होता है।

पीडियोफीलिया या हेबीफीलिया का इलाज क्या है?

एक्सपर्ट बताते हैं कि अगर आप महसूस करते हैं कि बच्चों से जुड़ा यौन कंटेंट आप देखना चाहते हैं या देखने में मजा आ रहा है तो सबसे पहले समझें कि ये नॉर्मल नहीं है ये एक बीमारी/लत है। इस बीमारी का इलाज भी उपलब्ध है। आपको सबसे पहले किसी मनोवैज्ञानिक (साइकोलॉजिस्ट) से ट्रीटमेंट लेना चाहिए। इसे अनदेखा करना आपके लिए ही खतरनाक हो सकता है।

‘चाइल्ड पोर्न के पीड़ितों के घाव कभी नहीं भरते’

जब किसी का यौन उत्पीड़न (सेक्शुअल अब्यूज) या रेप होता है, ये घटना व्यक्ति के मनोविज्ञान पर गहरे जख्म दे जाती है। वक्त के साथ ये घाव भरता जाता है, लेकिन अगर सेक्शुअल अब्यूज का वीडियो वायरल हो जाए तो ये जख्म कभी नहीं भर पाते। इंटरनेट और सोशल मीडिया बार-बार इन जख्मों को कुरेदते रहते हैं। इन जख्मों को भरने के लिए सही इलाज की जरूरत होती है। बच्चों के मामले में तो और भी सेंसेटिव केयर जरूरी है।

बाल अधिकार कार्यकर्ता सुनीथा कृष्णन एक चाइल्ड पोर्न रैकेट के पीड़ित का केस बताते हुए कहती हैं कि- ‘चाइल्ड पोर्न से जुड़े क्राइम का पीड़ित पर असर बार-बार होता रहता है, क्राइम को क्लोजर मिलना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसकी वजह है कि वीडियो वायरल हो जाता है।’

पेरेंट्स को विक्टिम बच्चों से कैसे डील करना चाहिए?

मनोवैज्ञानिक मीमांसा सिंह बताती हैं कि किसी भी व्यक्ति की निजता पर चोट होना, उसे मनोवैज्ञानिक स्तर पर हिलाकर रख देता है। बच्चों में असुरक्षा का भाव विकसित होना शुरू हो जाता है। उसे लगने लगता है कि उसे कहीं भी सेक्शुअली अब्यूज किया जा सकता है। पेरेंट्स को समझना चाहिए कि बच्चों के मनोविज्ञान पर इसका बहुत ही गहरा असर होता है। बच्चों को महसूस होना चाहिए कि आप अच्छी या बुरी, हर परिस्थिति में उनके साथ हैं। बच्चों में ये विश्वास होना चाहिए कि वो अपनी हर एक पर्सनल बात आपसे सहज रूप से शेयर कर सकें। पेरेंट्स को डिजिटल मीडिया और इंटरनेट के बारे में भी बच्चों को जागरूक करना होगा और इसके खतरों को लेकर आगाह करते रहना होगा। अगर बच्चों के व्यवहार में बहुत ज्यादा फर्क दिख रहा है तो किसी मनोवैज्ञानिक से संपर्क करें।

आखिर में एक काम की बात- अगर आपको चाइल्ड पोर्न से जुड़ा कोई भी कंटेंट कहीं पर भी दिखता है तो बतौर सजग नागरिक आप क्या करेंगे? बाल अधिकारों पर काम करने वाले NGO आरंभ इंडिया के सदस्य सिद्धार्थ पिल्लई बताते हैं कि- ‘अगर आपको कोई भी ऐसा वीडियो या इमेज इंटरनेट पर दिखे जिसमें बच्चे का यौन शोषण हो रहा हो, तो आपको इसे तुरंत रिपोर्ट करना होगा, ताकि इंटरनेट या सोशल मीडिया पर इस कंटेंट को ब्लॉक किया जा सके और ये आगे शेयर होने से रुक सके।’