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खुद्दार कहानी:तंगहाली में बचपन गुजरा, पति की मौत के बाद मजदूरी करनी पड़ी, अब प्लास्टिक वेस्ट से प्रोडक्ट बनाकर लाखों कमा रही हैं

नई दिल्लीएक वर्ष पहलेलेखक: इंद्रभूषण मिश्र

गुजरात के कच्छ जिले की रहने वाली राजीबेन वांकर प्लास्टिक वेस्ट से बैग, पर्स, चटाई सहित दो दर्जन से ज्यादा प्रोडक्ट बना रही हैं। वे ऑफलाइन और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए देशभर में इसकी मार्केटिंग करती हैं। देश के बाहर भी उनके प्रोडक्ट की डिमांड है।

गरीबी और तंगहाली से ऊपर उठकर खुद के दम पर राजीबेन ने अपना कारोबार खड़ा किया है। इससे हर महीने वे एक लाख रुपए कमा रही हैं। इतना ही नहीं बड़ी संख्या में स्थानीय महिलाओं को उन्होंने रोजगार भी दिया है।

आज की खुद्दार कहानी में पढ़िए राजीबेन के संघर्ष और कामयाबी की कहानी...

राजीबेन का जन्म गरीब परिवार में हुआ। थोड़ी बहुत जमीन थी, उनके पिता खेती-किसानी करते थे। परिवार बड़ा था, मुश्किल से घर का खर्च चलता था। न गांव में स्कूल था न बेटियों को पढ़ने भेजा जाता था। लिहाजा वे पढ़ नहीं सकीं। उनके परिवार में कुछ लोग बुनाई का काम करते थे।

राजीबेन को बचपन से ही मुश्किलों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी हालात के सामने झुकना स्वीकार नहीं किया।
राजीबेन को बचपन से ही मुश्किलों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी हालात के सामने झुकना स्वीकार नहीं किया।

राजीबेन भी बुनाई सीखना चाहती थीं, अपने पिता की मदद करना चाहती थीं, लेकिन लड़कियों को इस काम की इजाजत नहीं थी। वे अक्सर अपने पिता से जिद करती थीं कि उन्हें भी कुछ सीखना है और काम करना है, लेकिन पिता राजी नहीं होते थे। उन्हें लगता था कि गांव में सब मजाक उड़ाएंगे कि वो बेटी की कमाई खा रहे हैं।

जिद करके बुनाई का काम सीखा
राजीबेन बताती हैं कि जब मैं 15 साल की थी तो पिता की तबीयत खराब हो गई। उन्होंने खेती करना छोड़ दिया। 7 भाई-बहनों में तीन बहनों की शादी हो गई थी। अब मैं सबसे बड़ी थी। बाकी दो बहन और एक छोटा भाई था। मुझे लगा कि कैसे भी करके पिता की मदद करनी चाहिए।

वे कहती हैं कि मेरे चाचा का एक लड़का बुनाई का काम करता था। मैं हर दिन उसके साथ कुछ देर बैठकर उसका काम देखती थी। एक दिन उसने मुझे ऑफर किया कि वह उसे बुनाई का काम सिखा सकता है। इसके बाद मैंने पिता से बात की। पहले तो वे तैयार नहीं हुए, लेकिन बहुत जिद करने पर राजी हो गए। उस दिन के बाद मैं बुनाई का काम सीखने लगी और उससे थोड़ी बहुत आमदनी भी होने लगी।

कम उम्र में शादी और फिर मुश्किलों का पहाड़

राजीबेन प्लास्टिक वेस्ट से एक से बढ़कर एक चीजें बनाती हैं। लोग उनकी कारीगरी की तारीफ करते हैं।
राजीबेन प्लास्टिक वेस्ट से एक से बढ़कर एक चीजें बनाती हैं। लोग उनकी कारीगरी की तारीफ करते हैं।

18 साल की उम्र में राजीबेन की शादी हो गई। पति मजदूरी करते थे, तंगहाली वहां भी कम नहीं थी। इसलिए पति की मदद के लिए राजीबेन काम करना चाहती थीं, लेकिन पति ने मना कर दिया। करीब 12 साल तक इसी तरह जैसे-तैसे करके वो गुजारा करती रहीं। इसी बीच अचानक उनके पति की तबीयत खराब हुई और कुछ वक्त बाद डेथ भी हो गई।

अब राजीबेन के सामने मुश्किलों का पहाड़ था। अकेले चार बच्चों की जिम्मेदारी संभालनी थी। ऊपर से न आमदनी का कोई सोर्स था न कहीं नौकरी। इसके बाद उनकी बड़ी बहन ने उन्हें अवधनगर बुला लिया। यहां एक फैक्ट्री में उन्हें काम भी मिल गया। वे मजदूरी करके अपने परिवार का गुजारा करने लगीं। करीब 2 साल तक उन्होंने वहां काम किया।

एक कंपनी में 100 रुपए रोजाना सैलरी पर नौकरी मिल गई
राजीबेन बताती हैं कि साल 2010 में अवधनगर में ही खमीर नाम से एक कंपनी शुरू हुई, जो बुनकरों के साथ मिलकर काम करती थी। तब उस एरिया में बहुत कम बुनकर महिला थीं। जैसे ही कंपनी वालों को किसी से मेरे काम के बारे में पता चला, उन्होंने मुझे मिलने के लिए बुलाया। इसके बाद मैं उनसे मिलने गई और अपना काम दिखाया। मुलाकात के बाद उन्होंने 100 रुपए रोजाना की सैलरी पर रख लिया।

राजीबेन अलग-अलग जगहों से प्लास्टिक वेस्ट कलेक्ट करती हैं। फिर उसे अच्छी तरह से साफ करके बुनाई में इस्तेमाल करती हैं।
राजीबेन अलग-अलग जगहों से प्लास्टिक वेस्ट कलेक्ट करती हैं। फिर उसे अच्छी तरह से साफ करके बुनाई में इस्तेमाल करती हैं।

वे कहती हैं कि खमीर के साथ काम करना मेरे लिए टर्निंग पॉइंट रहा। आमदनी के साथ बहुत कुछ सीखने को भी मिला। अक्सर मैं काम के लिए अलग-अलग जगहों पर जाती थी। एक वर्कशॉप के लिए मुझे लंदन भी जाने का मौका मिला। इस दौरान मैंने कई महिलाओं को भी बुनाई की ट्रेनिंग दी और काम सिखाया।

साल 2012 में जिस कंपनी के लिए राजीबेन काम करती थीं। वहीं एक फ्रेंच लड़की कटेल गिल्बर्ट का आना हुआ। वह फैशन डिजाइनर थी और प्रोडक्ट की डिजाइनिंग को लेकर काम करती थी। उस लड़की ने राजीबेन को प्लास्टिक वेस्ट से बुनाई करने की ट्रेनिंग दी। इसके बाद राजीबेन प्लास्टिक वेस्ट की मदद से बैग, चटाई, पर्स, मोबाइल कवर सहित अलग-अलग तरह के प्रोडक्ट बनाने लगीं। इस तरह उनकी अच्छी खासी कमाई होने लगी। करीब 8 साल तक उन्होंने खमीर के साथ काम किया।

2018 में खुद का स्टार्टअप शुरू किया
राजीबेन कहती हैं कि जब मैं अच्छी तरह से काम करना सीख गई। मार्केटिंग की भी समझ हो गई तो कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि मुझे खुद का काम करना चाहिए। चूंकि मैं पढ़ी-लिखी नहीं थी, इसलिए थोड़ा चैलेंजिंग टास्क था। फिर भी मैंने कोशिश की और किस्मत अच्छी रही कि कामयाब भी रही।

उन्होंने सबसे पहले कुछ स्थानीय महिलाओं को अपने साथ रखा। फिर उन्हें काम की ट्रेनिंग दी, पूरा प्रोसेस समझाया। इसके बाद वे नए-नए प्रोडक्ट तैयार करने लगीं। मार्केटिंग के लिए उन्होंने कारीगर क्लिनिक के फाउंडर नीलेश प्रियदर्शी से मदद ली। उन्होंने राजीबेन के लिए एक ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म डेवलप कर दिया। जिसके जरिये वे अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग करती हैं। भारत के साथ ही विदेशों में भी उनके प्रोडक्ट की डिमांड है। इसके साथ ही देशभर में एग्जीबिशन लगाकर भी वे मार्केटिंग करती हैं।

जहां तक रॉ मटेरियल और प्लास्टिक वेस्ट की बात है, इसके लिए उन्होंने स्थानीय लेवल पर खुद का नेटवर्क तैयार किया है। कबाड़ी वालों से टाइअप किया। साथ ही अलग-अलग स्कूलों को भी अपने साथ जोड़ा है जहां बच्चे प्लास्टिक वेस्ट को एक बॉक्स में इकट्ठा करते हैं। वहां से राजीबेन की टीम प्लास्टिक कलेक्ट कर के वापस अपने यूनिट लाती है। इसके बाद उससे कई तरह के प्रोडक्ट बनते हैं। उनकी टीम में 30 महिलाएं अभी काम कर रही हैं।

अपने इस काम के जरिए राजीबेन ने कई स्थानीय महिलाओं को रोजगार से जोड़ा है।
अपने इस काम के जरिए राजीबेन ने कई स्थानीय महिलाओं को रोजगार से जोड़ा है।

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राजस्थान के बाड़मेर जिले की रहने वाली रूमा देवी, नाम जितना छोटा काम उतना ही बड़ा, जिसके सामने हर बड़ी उपलब्धि छोटी पड़ जाए। 4 साल की थीं तब मां चल बसीं, पिता ने दूसरी शादी कर ली और चाचा के पास रहने के लिए छोड़ दिया। गरीबी की गोद में पल रही रूमा को हंसने-खेलने की उम्र में खिलौनों की जगह बड़े-बड़े मटके मिले, जिन्हें सिर पर रखकर वो दूर से पानी भरकर लाती थीं। 8वीं में पढ़ाई छूट गई और 17 साल की उम्र में शादी।

पहली संतान हुई वो भी बीमारी की भेंट चढ़ गई। रूमा के सामने मुश्किलों का पहाड़ था, सबकुछ बिखर गया था, लेकिन उन्होंने हौसले को नहीं टूटने दिया। आज वे अपने आप में एक फैशन ब्रांड हैं। देश-विदेश में ख्याति है और 22 हजार महिलाओं की जिंदगी संवार रही हैं। (पढ़िए पूरी खबर)

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