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आज का इतिहास:तिब्बत पर चीन का कब्जा, 8 साल बाद दलाई लामा भारत चले आए, तब से यहीं से चलती है तिब्बती सरकार

एक महीने पहले
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आज ही के दिन 1951 में तिब्बत ने चीन के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते के साथ ही तिब्बत पर चीन का कब्जा हो गया था। यही वजह है कि तिब्बती लोग 23 मई को काला दिन मानते हैं, तो वहीं चीनी लोग इसे शांति के प्रयासों वाला दिन बताते हैं।

वर्षों पुराना है तिब्बत-चीन का विवाद
चीन और तिब्बत का विवाद बरसों पुराना है। चीन का दावा है कि तिब्बत 13वीं शताब्दी में चीन का हिस्सा था, इसलिए तिब्बत पर उसका हक है। तिब्बत चीन के इस दावे को खारिज करता है। 1912 में तिब्बत के 13वें धर्मगुरु दलाई लामा ने तिब्बत को स्वतंत्र घोषित कर दिया। तब चीन ने इस पर कोई आपत्ति नहीं जताई, पर जब 1949 में चीन में कम्युनिस्ट सरकार सत्ता में आई तो उसकी विस्तारवादी नीतियों के चलते तिब्बत की आजादी को खतरा पैदा हो गया। 6-7 अक्टूबर 1950 को चीनी सेना ने तिब्बत पर हमला कर दिया और 8 महीने चले संघर्ष के बाद तिब्बती सेना को मात दे दी।

चीन ने तिब्बत को समझौते पर बातचीत के लिए अपना प्रतिनिधि बीजिंग भेजने को कहा। आखिरकार 23 मई 1951 को तिब्बत ने चीन के साथ एक 17 बिंदुओं वाले समझौते पर हस्ताक्षर कर दिया, जिससे चीन ने तिब्बत पर अपने कब्जे को आधिकारिक जामा पहना दिया।

18 अप्रैल 1959 को तिब्बत के 14वें दलाई लामा ने घोषणा कि चीन ने ये समझौता जबरन करवाया था, इसलिए चीन का तिब्बत पर कब्जा अवैध है, लेकिन इसके बावजूद चीन अपनी हरकतों से बाज नहीं आया और तिब्बत पर उसका कब्जा आज भी कायम है। दलाई लामा तिब्बत के सबसे बड़े धार्मिक नेता को कहा जाता है। तिब्बत के वर्तमान दलाई लामा, उनके 14वें दलाई लामा तेनजिन ग्यास्टो हैं, जो 1959 से ही भारत में रहते हैं।

चीनी अत्याचार से बचने के लिए 1959 में तिब्बत के धर्मगुरु और वर्तमान दलाई लामा भारत चले आए थे
चीनी अत्याचार से बचने के लिए 1959 में तिब्बत के धर्मगुरु और वर्तमान दलाई लामा भारत चले आए थे

तिब्बत में चीन के खिलाफ बढ़ा गुस्सा
तिब्बत पर चीन के अवैध कब्जे से वहां के लोगों में चीन के खिलाफ गुस्सा बढ़ने लगा। 1955 के बाद पूरे तिब्बत में चीन के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन होने लगे। 1959 में राजधानी ल्हासा में हुए हुए पहले हिंसक विरोध प्रदर्शनों को चीन ने सैन्य कार्रवाई से बेरहमी से कुचल दिया, जिसमें हजारों तिब्बतियों की जान चली गई।

चीन से बचने के लिए दलाई लामा ने भारत में ली शरण
मार्च 1959 में चीन दलाई लामा को बंधक बनाना चाहता था। ये खबर फैलते ही हजारों की संख्या में लोग दलाई लामा के महल के बाहर जमा हो गए। आखिरकार एक सैनिक के वेश में दलाई लामा तिब्बत की राजधानी ल्हासा से भागकर भारत पहुंचे। भारत सरकार ने उन्हें शरण दी। चीन को ये बात नागवार गुजरी। माना जाता है कि 1962 के भारत-चीन युद्ध की एक बड़ी वजह ये भी थी।

भारत से चलती है तिब्बत की निर्वासित सरकार
दलाई लामा आज भी भारत में रहते हैं और तिब्बत की निर्वासित सरकार हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला से चलती है। तिब्बत की इस निर्वासित सरकार का चुनाव भी होता है। इस चुनाव में दुनियाभर के तिब्बती शरणार्थी वोटिंग करते हैं। वोट डालने के लिए शरणार्थी तिब्बतियों को रजिस्ट्रेशन करवाना होता है। चुनाव के दौरान तिब्बती लोग अपने राष्ट्रपति को चुनते हैं जिन्हें 'सिकयोंग' कहा जाता है। भारत की ही तरह वहां की संसद का कार्यकाल भी 5 सालों का होता है। तिब्बती संसद का मुख्यालय हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में है।

चुनाव में वोट डालने और चुनाव लड़ने का अधिकार सिर्फ उन तिब्बतियों को होता है जिनके पास 'सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन' द्वारा जारी की गई 'ग्रीन बुक' होती है। ये बुक एक पहचान पत्र का काम करती है। मई 2021 में हुए चुनावों में पेंपा सेरिंग निर्वासित तिब्बती सरकार के नए राष्ट्रपति बने।

बछेंद्री पाल ने रचा था इतिहास
आज ही के दिन 1984 में बछेंद्री पाल दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह करने वाली भारत की पहली और दुनिया की पांचवीं महिला बनी थीं। संयोग से उनकी इस महान उपलब्धि के एक दिन बाद यानी 24 मई को उनका जन्मदिन पड़ता है। यानी अपने जन्मदिन से एक दिन पहले ही बछेंद्री पाल ने खुद को कीमती तोहफा दिया था।

बछेंद्री पाल का जन्म 24 मई 1954 को भारत के उत्तराखंड के गढ़वाल जिले के नकुरी गांव में हुआ था। उनके पिता एक व्यापारी थे जो अपने गेहूं, चावल और दूसरे सामान को खच्चरों पर लादकर तिब्बत ले जाते थे। इसी से परिवार का खर्चा चलता था। बछेंद्री पाल बचपन से ही पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद में भी आगे थीं।

बछेंद्री के परिजन नहीं चाहते थे कि वह पर्वतारोही बनें, लेकिन उनकी जिद के आगे घरवालों को झुकना पड़ा और उन्होंने नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग में दाखिला ले लिया। 1984 में भारत ने एवरेस्ट पर चढ़ने के लिए एक अभियान दल बनाया। इस दल का नाम “एवरेस्ट-84” था। दल में बछेंद्री पाल के अलावा 11 पुरुष और 5 महिलाएं थीं। मई की शुरुआत में दल ने अपने अभियान की शुरुआत की। खतरनाक मौसम, खड़ी चढ़ाई और तूफानों को झेलते हुए आज ही के दिन बछेंद्री ने एवरेस्ट फतह करते हुए नया इतिहास रच दिया था।

23 मई को देश-दुनिया के इतिहास में हुई अन्य महत्वपूर्ण घटनाएं:

2019: आम चुनावों में भाजपा ने प्रचंड बहुमत से जीत हासिल की। नरेन्द्र मोदी लगातार दूसरी बार भारत के प्रधानमंत्री बने।
2015: एक कार दुर्घटना में अमेरिकी गणितज्ञ जॉन नैश का निधन।
2010: मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की 3 सदस्यीय खंडपीठ ने बिना विवाह किए महिला और पुरुष का एक साथ रहना अपराध नहीं माना।
2008: भारत ने सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइल पृथ्वी-2 का सफलतापूर्वक परीक्षण किया।
2004: बांग्लादेश में तूफान के कारण मेघना नदी में नाव डूबने से करीब 250 लोगों की डूबकर मौत।
1995: प्रोग्रामिंग लैंग्वेज जावा को आधिकारिक तौर पर लॉन्च किया गया।
1994: सऊदी अरब में हज के दौरान भगदड़ मचने से 270 हजयात्रियों की मौत हुई थी।
1942: भारतीय फिल्म निर्देशक, निर्माता, पटकथा लेखक और कोरियोग्राफर के. राघवेंद्र राव का जन्म हुआ।
1788: साउथ कैरोलिना 8वें राज्य के रूप में संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में शामिल हुआ था।