मेगा एम्पायरगूगल अपनी मोनोपॉली की वजह से चर्चा में:क्लिक दर क्लिक इंटरनेट का बना राजा, आज करीब 232 कंपनियों का मालिक

2 महीने पहलेलेखक: आतिश कुमार

गूगल, ऐसी टेक कंपनी है जो किसी गुरू से कम नहीं है। आज जब भी हमारे मन में कोई सवाल उठता है तो सबसे पहले हम गूगल से जवाब मांगने पहुंच जाते हैं। गूगल ऐसा सर्च इंजन, जो आधे सैकंड से भी कम समय में आपको दस अरब से ज्यादा सर्च रिजल्ट दे सकता है। बस निर्भर इस पर होता है कि आपने पूछा क्या है। गूगल 10 लाख से ज्यादा सर्वर से सीधा जुड़ा है। गूगल (अब अल्फाबेट) मुख्य रूप से विज्ञापन से पैसा कमाता है। मौजूदा समय में गूगल करीब 232 कंपनियों का मालिक हैं। गूगल फिलहाल अपनी मोनोपॉली की वजह से चर्चा में है। गूगल की पेरेंट कंपनी अल्फाबेट को EU ने एंटी ट्रस्ट के तहत 32,000 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया है। दरअसल, गूगल एंड्रायड फोन निर्माताओं पर दबाव बना रहा है कि वे उसका सर्च इंजन ही इस्तेमाल करें। इसी मोनोपोली के विरोध में भारत, अमेरिका से लेकर यूरोपियन यूनियन तक ने भी गूगल पर कानूनी शिकंजा कस दिया है।

आज मेगा एम्पायर में जानिए आपके सारे सवालों के जवाब रखने वाले गूगल के बारे में…

कार गैरेज से शुरू हुई थी कंपनी, आज रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा

लैरी पेज और सर्गेई ब्रिन अपने गैरेज वाले ऑफिस में
लैरी पेज और सर्गेई ब्रिन अपने गैरेज वाले ऑफिस में

जब सर्गेई ब्रिन और लैरी पेज 22 और 23 साल के थे, तब 1995 में उनकी पहली मुलाकात कैलिफोर्निया की स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी में हुई। उस समय दोनों के बीच हमेशा बहस होती थी। किसी मामले में दोनों की एक राय नहीं थी, लेकिन फिर दोस्ती हुई तो जमाना उनकी मिसालें देने लगा। ये दोस्ती एक जैसी समस्या के कारण हुई। वो समस्या थी इंटरनेट इन्फॉर्मेशन वर्ल्ड में रिसर्च के दौरान किसी विशेष चीज को कैसे तलाशें। बस फिर क्या था, दोनों दोस्तों ने सितंबर 1998 में गूगल इनकॉरपोरेटेड के नाम से शुरुआत की। कंपनी की शुरुआत मेनलो पार्क कैलिफोर्निया के एक कार गैराज से हुई थी। सिर्फ दो वर्षों में ही गूगल का नाम दुनिया की जुबान पर था। इस तेज शुरुआत ने ही गूगल को रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बना दिया।

गूगल एक फ्री सेवा, इसकी कमाई यहां से होती है…

गूगल पूरी तरीके से मुफ्त है। वो आपसे सर्च करने के पैसे नहीं लेता। फिर सवाल आता है कि गूगल फ्री सेवा देकर कमाई कैसे करता है? दरअसल गूगल पूरी तरह से विज्ञापन के जरिए कमाई करता है। कंपनियां यूजर्स के बारे में जानकारियां गूगल से खरीदती हैं या उसे अपने विज्ञापनों के लिए पैसा देती हैं। विज्ञापन पर हर क्लिक के लिए गूगल कुछ सेंट से लेकर सैकड़ों डॉलर तक लेता है।

गूगल अपने नाम को लेकर काफी असुरक्षित

गूगल के फाउंडर्स ने पहले इसका नाम ‘बैकरब’ रखा था। इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट की माने तो गूगल का नाम एक नौ साल के बच्चे ने रखा था। उसने इसे गोगोल कहा था, बाद में इसे गूगल कहा जाने लगा। ये एक मान्यता पर आधारित था, जिसके आधार पर अगर एक के पीछे 100 जीरो रखे जाएं तो अनूठी संख्या गोगोल बनती है। यही गोगोल असल में गूगल बन गया। वैसे गूगल अपने नाम को लेकर काफी असुरक्षित लगती है। ये असुरक्षा ही है कि गूगल ने अपने नाम से मिलते जुलते कई नाम खरीद रखे हैं। जैसे: Gooogle.com, Gogle.com अगर आप इन पर क्लिक करेंगे तो आप सीधे गूगल होम पेज पर चले जाएंगे।

गूगल हमारी जिंदगी का हिस्सा कैसे बनी

आमतौर पर जब कोई कंपनी सफल हो जाती है तो वो उसी उत्पाद पर ध्यान केंद्रित कर खुद का विस्तार करती है। लेकिन गूगल ऐसी कंपनियों से अलग है। वो लगातार नए-नए प्रोजेक्ट्स शुरू करती है। लगभग हर तीन महीने में गूगल का कोई ना कोई नया उत्पाद मार्केट में आ ही जाता है और ज्यादातर ये ऐसे उत्पाद होते है जो हमारे जीवन को सरल बना देते हैं।

गूगल का मशहूर 20% फॉर्मूला

गूगल दुनियाभर में अपने शानदार वर्क कल्चर के लिए जानी जाती है। कर्मचारियों को खाने-पीने से लेकर सोने तक की सुविधा ऑफिस में दी जाती है। वहीं सबसे अहम बात यह है कि इंजीनियर्स को यह छूट दी जाती है कि वे अपने कार्य समय का 20 फीसदी हिस्सा अपनी मनपसंद तकनीक या उत्पाद के विकास में लगा सकते हैं। इस समय में उनकी कंपनी के प्रति कोई जवाबदेही नहीं होती है। जबकि वे कंपनी के संसाधनों का पूरा इस्तेमाल कर सकते हैं। इसे गूगल का मशहूर ‘20 परसेंट’ टाइम कहा जाता है।

फेल होने से नहीं घबराती गूगल, हमेशा नए प्रयोगों का स्वागत करती है

गूगल हेल्थ, गूगल के नेक्सस टैबलेट, ऑर्कुट, इनबॉक्स, गूगल ग्लास और गूगल आन्सर आदि ऐसे प्रोजेक्ट हैं, जो सफल नहीं हो पाए, लेकिन गूगल ने कभी इसकी बहुत चिंता नहीं की। कंपनी लगातार नए प्रयोगों में लगी रही। कंपनी का मानना है कि हर असफलता कुछ ना कुछ सिखाती है। एक कार्यक्रम में कंपनी ने बताया कि वे बलून से इंटरनेट देने की योजना पर काम कर रहे थे, जिसे अब प्रोजेक्ट लून के नाम से जाना जाता है। शुरुआत के प्रयोगों में जिस सामग्री से बलून बनाया गया था, वह ठीक नहीं था। इसलिए बलून ऊपर जाते ही फट जाता था। हालांकि इंजीनियर को पता था कि ये मैटेरियल सही नहीं है। फिर भी उन्होंने बेहतर तरह से चीजों को समझने के लिए जानबूझकर बलून में उस मटेरियल का इस्तेमाल किया।

कोई कंपनी गूगल होमपेज पर एड नहीं दे सकती

गूगल का होम पेज बेहद साफ-सुथरा है। शुरुआत में इसे डिजाइनर न मिलने के कारण बेहद सादा रखा गया था, लेकिन बाद में यह यूजर्स को बहुत ज्यादा पसंद आया। गूगल ने यूजर्स की इस भावना को समझा और कभी भी अपने होमपेज पर विज्ञापन आदि नहीं लिया। जबकि आज दुनिया की चुनिंदा कंपनियां करोड़ों खर्च कर गूगल के होमपेज पर विज्ञापन दे सकती हैं। लेकिन गूगल इसके लिए कभी तैयार नहीं हुई।

गूगल के इतने सफल होने का रहस्य

गूगल के पहले सर्च इंजन थे और कई अच्छा प्रदर्शन भी कर रहे थे, लेकिन गूगल सबको पछाड़ने में कामयाब रहा। इंटरनेट पर किए जाने वाले 90% काम गूगल पर ही होते है और करीब 60% ऑनलाइन विज्ञापन भी यहीं से आता है। गूगल के अलगॉरिदम ने उसकी सफलता में काफी बड़ी भूमिका निभाई है। गूगल के फाउंडर्स ने 1999 में पेज रैंक वाइज अलगॉरिदम लेकर आए थे। ये किसी पेज को उपयोगिता के हिसाब से 1 से 10 के बीच रैंक करता है। गूगल की हेल्प साइट पर इसके क्रिएटर्स लिखते हैं, "आपको जवाब चाहिए, लाखों वेब पेज नहीं। हमारा सिस्टम ज़रूरत के मुताबिक रिज़ल्ट भेजता है।" लेकिन गूगल फाउंडर्स ने कई फॉर्मूले सीक्रेट रखे हैं, जो गूगल को दूसरों से बेहतर बनाते हैं। इसलिए वो इन्हे लगातार बदलते रहते हैं।

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