Sunday जज्बात:अंदर बेटे का पोस्टमॉर्टम चल रहा था, बाहर मैं चुटकुले सुना रहा था; जानता था कॉमेडी ही मुझे रिपेयर करेगी

2 महीने पहलेलेखक: राजीव निगम

मैं कायस्थ परिवार से था। घर में सब लोग पढ़े-लिखे थे। पापा चाहते थे कि मैं डॉक्टर बनूं, लेकिन मैं कॉमेडी परफॉर्म करना चाहता था। इसलिए 340 रुपए जेब में डाले और मुंबई आ गया। 1994 का वो दौर ही अलग था। अपने पास न मोबाइल न किसी का कॉन्टैक्ट। समझ नहीं आता था कि कहां जाए? किससे काम मांगे? मैं वसई में कानपुर के अपने एक पड़ोसी के ताऊ के यहां रहने लगा। उन्होंने 8 दिन ही अपने यहां रखा। इन 8 दिनों में मैं वसई के चौक-मोहल्ले में जाकर चुटकुले सुनाता था। लोगों से कहता कि आओ..आओ..नया जोक आया है। वहां यूपी-बिहार के लोग मुझे जानने लगे थे। मेरे पास पैसे तो थे नहीं। पूरे दिन में डेढ़ रुपए का एक वड़ा-पाव खाया करता था।

वहीं मुझे एक सज्जन मिल गए, जो रेलवे में नौकरी करते थे। उनके पास दो कमरे थे। उन्होंने कहा कि कुछ दिन मेरे साथ आकर रुक सकते हो। उन्होंने भी मुझे एक ही महीना रखा। मैं मुंबई तीन महीने रहा, लेकिन एक भी प्रोडक्शन हाउस का पता तक नहीं मिल सका। उसके बाद मैं वापस कानपुर चला गया। यहां तीन महीने रहने के बाद मैं फिर से मुंबई चला गया। मैंने शेयरिंग में वसई में एक कमरा लिया। मैं कॉमेडी एक्ट लिखता था। इस दफा किसी तरीके से टी-सीरीज के ऑफिस पहुंच गया।

उन दिनों टी-सीरीज नए नए लोगों को खूब मौके दे रही थी। टी-सीरीज वाले ने मुझसे कहा कि बाकी सब तो ठीक है, लेकिन तुम्हारा कैसेट बिकेगा कहां? कौन इसे खरीदेगा? हम उन कलाकारों के साथ काम करते हैं जो बिकते हैं। अब मैं यह सुनकर परेशान था कि मैं बिकूंगा कैसे?

मैंने महाराष्ट्र की लोकल ऑडियो कंपनी को अप्रोच किया। उन्होंने कहा कि पैसे नहीं देंगे। मैंने कहा कि ठीक है, मुझे मेरे नाम एक ऑडियो कैसेट चाहिए थी। पहली कैसेट आई तो मार्केट में खूब बिकी। कंपनी ने मुझसे कहा कि हम दूसरी कैसेट भी लाना चाहते हैं, लेकिन अब मैं मंच पर कॉमेडी परफॉर्म करना चाहता था। मैंने ऑर्केस्टा कंपनियों को अप्रोच करना शुरू किया। मैं चाहता था कि वह मुझे अपने शो के बीच कुछ सेकेंड कॉमेडी करने का मौका दे दें।

हर कंपनी मुझे कभी आज बुला लेती तो कभी कल। एक दफा मुझे कहीं से फोन आया कि आप तीन बजे दादर आ जाएं। मैं बहुत खुश हो गया कि आज तो मेरा परफॉर्मेंस है। मैं किसी तरह वसई से दादर गया देखा तो वहां कोई नहीं। मैंने कंपनी को फोन किया। उन्होंने बोला कि गाड़ी आ रही है। एक टैंपो आया, मुझे बोला कि इसमें सामान लोड करो। मैं खुश था कि मेरे सीनियर लोग हैं, सेवा-भाव से काम करना चाहिए। मैंने ऑर्केस्टा का सारा सामान गाड़ी में लोड कर दिया। शाम 6 बजे एक बस में मुझे सबसे पीछे की सीट पर बिठा दिया। दादर से घाटकोपर जाना था। वहां पहुंचने पर मैंने गाड़ी से सारा सामान उतारा। स्टेज पर लगाया। मैं खुश था।

मेरे घर में सब पढ़े-लिखे थे। पापा चाहते थे कि मैं भी पढ़-लिखकर डॉक्टर बनूं।
मेरे घर में सब पढ़े-लिखे थे। पापा चाहते थे कि मैं भी पढ़-लिखकर डॉक्टर बनूं।

प्रोग्राम शुरू हुआ तो मैंने पूछा कि मेरा परफॉर्मेस कब होगा? वह आदमी बोला कि डोंट डिस्टर्ब...। मैं चुप हो गया। मैंने फिर पूछा। इस दफा उसने मुझे डांट दिया। देखते देखते प्रोग्राम खत्म हो गया, लेकिन मेरा परफॉर्मंस नहीं हुआ। मैंने आखिर में फिर पूछा तो इस पर वह आदमी बोला कि ऐसे पहले दिन काम नहीं मिलेगा, चलो गाड़ी में सामान लोड करो। मैंने सामान गाड़ी में लोड किया और रात के दो बजे दादर पहुंचा। लोकल ट्रेन छूट चुकी थी, उस रात मैं दादर स्टेशन पर ही सो गया।

यानी हालात ऐसे थे कि ऑर्केस्टा कंपनी में दो सेकेंड के परफॉर्मंस के लिए भी मारामारी थी। यही चलता रहा, कंपनियां बुलातीं, सामान उठाओ, लोड करो, रख दो। आ जाओ, चले जाओ। 1996 में मुझे एक ऑर्केस्टा कंपनी ने पहली दफा कुछ सेकंड का परफॉर्म करने का मौका दिया। उसके लिए 30 रुपए मिले जबकि मेरे जैसे बाकी आर्टिस्ट को 250 रुपए मिलते थे। मैं खुश था क्योंकि मुझे उस काम के पैसे मिले थे जिसके लिए मैं मुंबई आया था।

अपने गुजारे के लिए मैं दुकानों पर काम करता। वसई में टपरी पर कपड़े की दुकानें लगती थीं। वहां लोग अपना माल लेने जाते तो मुझे दो घंटे के लिए दुकान पर खड़ा कर जाते। मैं उनकी दुकान भी संभालता और चुटकुले सुनाकर माल बेच भी देता। मेरा गुजारा ऐसे अलग-अलग दुकानों पर काम करके चलता था। दिन में एक वड़ा पाव खाता था और चाय कोई भी पिला देता। ट्रेन में बिना टिकट के सफर करता था।

मैं जहां रह रहा था मुझे वह कमरा भी छोड़ना पड़ा। वहीं एक सैलून वाले से दोस्ती हो गई। उसने मुझे अपने सैलून में सामान रखने और रहने की इजाजत दे दी। बदले में मैं उसके सैलून में उसकी मदद कर देता। धीरे-धीरे मैं शेविंग और हेयरकट करना सीख गया। अब मैं उसके सैलून का नाई बन चुका था। वह भी मेरे भरोसे सैलून छोड़कर चला जाता। यह बात मैंने कभी अपने घर पर भी नहीं बताई, बता देता तो जूते पड़ते कि कायस्थ का लड़का होकर मुंबई में बाल काट रहा है।

फिर मैं किंग सर्कल के एक स्लम में रहने लगा था। लोग बताते थे कि जॉनी लिवर भी यहीं रहते थे। मुझे लगा कि इस जगह में कोई खासियत है कि जॉनी लीवर यहां रहते हुए चमके थे। शायद मैं भी चमक जाऊं। एक रात में कहीं से लौट रहा था। मैंने एक खिड़की से किसी के घर में झांका तो देखा कि टीवी पर शेखर सुमन का शो मूवर्स एंड शेखर चल रहा था। मैंने सोचा कि इससे अच्छे चुटकुले तो मैं लिख लेता हूं, किसी तरह शेखर सुमन से मुलाकात हो जाए। फिर कई लोगों ने मुझे शेखर सुमन से मिलवाने के चक्कर में खूब ठगा।

चुनौतियां तो बहुत थीं, लेकिन मैं कोशिश करता गया। आखिरकार मुझे मंच पर परफॉर्म करने का मौका मिला।
चुनौतियां तो बहुत थीं, लेकिन मैं कोशिश करता गया। आखिरकार मुझे मंच पर परफॉर्म करने का मौका मिला।

आखिरकार मैंने एक डायरेक्टरी के जरिए उनका लैंडलाइन नंबर निकाला। मैंने उस पर कॉल किया। उनकी पत्नी ने उठाया। मैंने रौब में कहा कि 'शेखर है क्या? अगर मैं उनसे यह बोलता कि मेरी शेखर सुमन से बात करवा दो.. यह है, वो है तो वह किसी कीमत पर मेरी उनसे बात न करवातीं। खैर उन्होंने शेखर सुमन से कहा कि तुम्हारा फोन है। मैंने शेखर सुमन से बात की, सर मैं ऐसे-ऐसे चुटकुले लिखता हूं। उन्होंने मुझे अपने क्रिएटिव डायरेक्टर का नंबर दे दिया।

अब नंबर तो दे दिया, लेकिन मैं रोज प्रोडक्शन हाउस जाता। दो-दो घंटे बैठा रहता, लेकिन क्रिएटिव डायरेक्टर से मिलना नहीं हो सका। दस-बारह दिन ऐसा ही चलता रहा। आखिरकार एक दिन क्रिएटिवट डायरेक्टर अभिज्ञान झा ने मुझे बुलाया और कहा कि सुनाओ क्या सुनाना चाहते हो? मैंने कुछ चुटकुले सुनाए। अगले दिन उन्होंने मुझे एक स्क्रिप्ट लिखने के लिए कहा। उस दिन बारिश बहुत हो रही थी। जैसे-तैसे करके किसी तरह मैं प्रोडक्शन हाउस गया। वहां पता लगा कि आज स्टूडियो में पानी भर गया है, इसलिए शूटिंग कैंसिल।

मैं अगले दिन फिर प्रोडक्शन हाउस पहुंचा। मैने पहली दफा फॉरमेट में स्क्रिप्ट लिखी। शेखर सुमन ने स्क्रिप्ट पढ़ते ही कहा कि आज स्क्रिप्ट बहुत कमाल की थी, किसने लिखा है ? मैं दूर खड़ा सोच रहा था कि लपक कर बोल दूं कि मैंने लिखी है, लेकिन बेबस था। अभिज्ञान झा ने कहा कि नया लड़का आया है, उसने लिखी है। मुझे कभी शेखर सुमन के पास नहीं जाने दिया जाता था। उसके बाद मैंने जो स्क्रिप्ट लिखी तो मेरी स्क्रिप्ट उठाकर फेंक दी और बोला गया यह क्या बकवास लिखा है, इसमें कोई पंच नहीं है।

मैं घर आकर रोने लगा कि आखिर कब तक सुनता रहूंगा कि मैं नया हूं..नया हूं। एक दिन शेखर सुमन ने शूट करने से मना कर दिया कि स्क्रिप्ट में दम नहीं है। सब लोग घबरा गए, सभी ने बोला कि आप रुकें, बस आधा घंटा दे दें। फटाफट मुझे स्क्रिप्ट लिखने के लिए कहा गया, मैंने लिखा और उस दिन शूट हो गया। इसके बाद मुझे उस प्रोडक्शन हाउस ने रख लिया।

अब मैं हिसाब लगा रहा था कि अगर मुझे महीने के 500 रुपए मिलेंगे तो मेरा गुजारा हो जाएगा। अभी तक प्रोडक्शन हाउस ने मुझे पेमेंट नहीं दी थी। जब मैंने प्रोडक्शन हाउस से अपनी पेमेंट के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि एक फॉर्म भर दो। लगभग 12 दिन के बाद मुझे चेक मिला। मुझे एक स्क्रिप्ट के 6,000 रुपए मिले थे। एक महीने में 4 स्क्रिप्ट के 36,000 रुपए। लगा कि बस मैं राजा हो गया हूं, लेकिन घरवाले फिर खुश नहीं हुए। मैंने उनसे कहा कि मैं राइटर बन गया हूं। वे बोले वो तो ठीक है, लेकिन मुंबई में करते क्या हो?

एक के बाद एक कई शोज में मैं हिस्सा लेने लगा। लोग मुझे स्टैंड-अप कॉमेडियन के तौर पर जानने लगे।
एक के बाद एक कई शोज में मैं हिस्सा लेने लगा। लोग मुझे स्टैंड-अप कॉमेडियन के तौर पर जानने लगे।

अब मुझे टीवी पर आना था। उस जमाने में सिर्फ दूरदर्शन होता था। मुझे अभिज्ञान झा के जरिये दूरदर्शन का एक शो 'चोरी-चोरी, चुपक-चुपके' लिखने के लिए मिल गया। शो की निदेशक बोलीं कि राजीव इसमें एक रोल आप भी करो। मुझे छैलू का रोल मिला जो बहुत पॉपुलर हुआ। संघर्ष जारी था कि 2004 में मेरी शादी हो गई। मैंने अपनी पत्नी से कहा कि यह घर है, यह राशन, अब मैं काम करुंगा। मुझे लाफ्टर चैलेंज शो सीजन-1 लिखने के लिए मिल गया, लेकिन मैं परफॉर्म करना चाहता था।

सीजन -2 के लिए मैंने ठान लिया कि मै परफॉर्म करुंगा, लेकिन शो के निर्देशक पंकज सारस्वत ने मना कर दिया कि अरे यार, तुम लिखो। तुम परफॉर्म अच्छा नहीं करते हो। मैंने देखा है तुम्हारा एक्ट, एकदम बकवास है। मैंने उनकी मिन्नतें कीं कि सर मुझे 50वें नंबर पर ही रख लें लेकिन वह जिद पर अड़े रहे।

एक दिन मैंने देखा कि 50वें कॉन्टेंस्टेंट पर सवालिया निशान लगा था तो मैं दोड़ कर पंकज के पास गया कि प्लीज सर मुझे रख लिजिए। एक सीट खाली हो गई है। वह बोले ठीक है तू सुना लियो अपने 3-4 जोक। मुझे बहुत खराब लगा कि वह मुझे 50 की लिस्ट में भी नहीं गिन रहे हैं।

घरवाले पूछते कि तुम कहां बर्तन धो रहे हो, क्या कर रहे हो मुंबई में। मैंने बताया कि मैं स्टेज पर परफॉर्म करता हूं, मेरी ऑडियो कैसेट आई है, लेकिन उन्हें लगता कि मुंबई जाकर अगर कोई टीवी पर नहीं आ रहा है तो वह जरूर कहीं बर्तन ही धो रहा होगा।

शूट से ठीक तीन दिन पहले मुझे मेरी पत्नी को अंधेरी के अस्पताल में एडमिट करवाना पड़ा। उन दिनों वह प्रेग्नेंट थीं। अब मेरी एक टांग अस्पताल में और एक कॉमेडी लिखने और रिहर्सल में। कुछ समझ नहीं आ रहा था। मुझे लगता था कि ऐसा न हो कि मुझे कॉमेडी शो से निकाल दिया जाए। मैंने अपने पड़ोस की एक भाभी की मिन्नत की कि वह मेरी पत्नी के साथ अस्पताल रह लें। मेरा शूट हुआ और मैं सेमीफाइनल में पहुंच गया।

फाइनल वाले दिन सभी को उम्मीद थी कि मुकाबला मैं ही जीतूंगां। मुझे भी उम्मीद थी। जीतने वाले को कार मिलनी थी, लेकिन पहले नंबर पर मुकाबला पाकिस्तान के राउफ लाला ने जीता। मैं एकदम मौन हो गया। पहली दफा मैं घर आकर बहुत रोया था। फिर कॉमेडी का सफर जारी रहा। लाइव शो शुरू कर दिए, स्टार प्लस पर हर शाख पर उल्लू बैठा है वगैरह..वगैरह।

जिंदगी अच्छी चल रही थी। किसी चीज की कमी नही थी। मेरा छोटा बेटा सात साल का देवराज मुझसे बहुत प्यार करता था। मेरे आने पर ही सोता था। उस रोज मैं रात को एक पार्टी से बहुत लेट आया। घर आने पर उसने बताया कि आज मैं मम्मी के साथ मॉल गया था और मैंने कपड़े खरीदे। फिर वह रोने लग गया कि उसके सिर में तेज दर्द हो रहा है। हमने सोचा वैसे ही हो रहा होगा। किसी तरह से उसे सुलाया।

मेरा बेटा देवराज में मेरे जन्मदिन के दिन ही मुझे छोड़कर चला गया। मेरी दुनिया वीरान हो गई, लेकिन कॉमेडी जारी है।
मेरा बेटा देवराज में मेरे जन्मदिन के दिन ही मुझे छोड़कर चला गया। मेरी दुनिया वीरान हो गई, लेकिन कॉमेडी जारी है।

सुबह मैंने सोचा मैं उसे बिना जगाए चुपचाप घर से निकल जाऊंगा, लेकिन अचानक मैंने देखा कि उसके मुंह से लार गिर रही है। मैंने जैसी ही उसके मुंह की लार साफ की तो उसकी गर्दन झूल गई। मैं उसे कंधे पर उठाकर नंगे पांव नीचे भागा। कार में डाला और सीधे अंबानी अस्पताल ले गया। मेरे पीछे से मेरी पत्नी अस्पताल आई। वह कहने लगी कि आप यहां रुको मैं मंदिर जा रही हूं।

डॉक्टरों को कुछ समझ नहीं आ रहा था। वह कोमा में जा चुका था। तीन दिन के बाद डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए, लेकिन मेरी पत्नी अपनी भक्ति में बैठी रही। उसे भरोसा था कि उसका बेटा जरूर उठेगा। शो के बाद मैं सीधे अस्पताल जाता था। मेरे जाने पर मेरी पत्नी घर जाती थी। तीन महीने ऐसे ही चलता रहा। तीन महीने तक बेटा कोमा में रहा। फिर मेरी पत्नी की भगवान ने सुन ली। बेटे को होश आया, लेकिन डॉक्टरों ने कहा कि इनकी आंखों की रोशनी चली गई है और अब यह अपनी सेंस में नहीं रहा।

जब देवराज आईसीयू में था मुझे तब तो रोना नहीं आया, लेकिन जब डॉक्टरों ने कहा कि इनकी आंखों की रोशनी जा चुकी है और अब यह पहले जैसे नहीं रहेंगे। उस पर मैं बहुत रोया कि मेरे बेटे की दुनिया वीरान हो गई है। अपने शो के बाद मैं लोगों से हाथ जोड़कर कहता कि मेरा बेटा आईसीयू से घर लौटा है, उसकी सेहत के लिए दुआ करें। लोग बहुत दुआएं करते थे। कोई रोजा रखता, कोई पूजा करता, कोई नमाज करता, कोई लंगर लगाता।

धीरे-धीरे हमारी और डॉक्टरों की मेहनत से बेटे के आंखों की रोशनी लौट आई। फिर भी हम पति-पत्नी पूरी तरह 24 घंटे बेटे पर ही लगाते। मैंने कुछ दिनों के लिए काम कम कर दिया था। पत्नी सारा-सारा दिन पूजा पाठ पर बैठी रहती।

पिछले साल आठ नवंबर को मेरा जन्मदिन था। बेटे को मेरा जन्मदिन मनाने का बहुत शौक था। मैंने दो केक मंगवाए। दोनों बच्चे अपार्टमेंट में नीचे खेल रहे थे। मैंने उन्हें ऊपर बुलाया। बड़े बेटे से पूछा कि देवराज कहां है? उसने बताया कि देवराज लिफ्ट में है। मैं लिफ्ट तक देखने गया, लेकिन वह कहीं नहीं दिखा। फिर बिल्डिंग के बच्चों ने बताया कि वह पीछे की तरफ गिरा पड़ा है। हम भागे-भागे उसे देखने गए तो वहां गिरा हुआ था। वह 7वें फ्लोर से नीचे गिरकर मर चुका था। दो दिन के बाद दीवाली थी। उसके लाए पटाखे और मिठाइयां ऐसे ही रखी रह गईं।

पुलिस केस बन चुका था। उसका पोस्टमॉर्टम चल रहा था और मैं पोस्टमॉर्टम रूम के बाहर बैठा चुटकुले सुना रहा था। मेरा भाई जब वहां पहुंचा तो दहाड़ मारकर रो रहा था, मैंने उसे डांटा और झटक दिया कि ऐसे क्या रो रहा है, क्या हुआ है, चुप हो जा। मेरी मां मुझे डांटती कि तेरा बेटा मरा है और तू खी..खी..खी.. करता रहता है। मैंने सोचा कि मैं क्या कर सकता हूं। मेरे साथ जो हुआ, उससे ज्यादा और बुरा क्या हो सकता था?

पोस्टमॉर्टम रूम के बाहर ही अपने को चाबी देनी शुरू कर दी थी कि अगर मैं डिप्रेशन में चला गया तो कभी नहीं निकल पाउंगा। मेरी पत्नी और बड़े बेटे को कौन संभालेगा? मैं कमज़ोर महसूस करुंगा तो मेरे लाखों चाहने वालों का क्या होगा? कॉमेडी ही एक ऐसी चीज थी, जो उसे रिपेयर कर सकती थी। मैंने बेटे की मौत के वक्त ही ठान लिया था कि ठीक है, मुझे अपने को संभालना है।

मैं पॉलिटिकल सटायर करता था। कुछ दिन बाद सोशल मीडिया पर मेरे खिलाफ हैशटैग-अच्छा हुआ तेरा बेटा मर गया, चलने लगा। मेरा मन हुआ कि जवाब तो देना ही होगा। ऐसे टाइम में जवाब दिया जब मुझे वे लोग बहुत कमजोर मान रहे थे। मैंने अपना यूट्यूब चैनल बनाया और फिर से उसी रफ्तार में काम में जुट गया। अब मुझे पैसे की इच्छा नहीं है। मैं काम तो अपने बेटे के खर्च उठाने के लिए करता था। अब वो नहीं रहा तो किसके लिए कमाना? लेकिन मेरा कॉमेडी का सफर जारी रहेगा। मुझे कॉमेडी वीडियो बनाकर एनर्जी मिलती है।

मशहूर स्टैंड-अप कॉमेडियन और अभिनेता राजीव निगम ने ये सारी बातें दैनिक भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से शेयर की हैं..