बात बराबरी की:मर्दों से बर्थ कंट्रोल की उम्मीद करना, उन्हें जहर की फांक खिलाने जैसा है, भूलेंगे वे, भुगतेंगी औरतें

नई दिल्ली3 महीने पहलेलेखक: मृदुलिका झा
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एक कॉमेडियन हैं समय रैना। लंबी-चौड़ी फैन फॉलोइंग वाले इस शख्स ने हाल में एक ट्वीट किया। ट्वीट क्या निहायत सस्ते किस्म का चुटकुला, जो उनकी गर्लफ्रेंड से जुड़ा था। वे लिखते हैं- परसों मैंने आधा घंटा सोच के अपनी गर्लफ्रेंड पर एक फनी ट्वीट लिखा। पसंद नहीं आया तो उसने डिलीट करवा दिया। अब कल को मैं अबॉर्शन करवाने बोलूं तब मत बोलना- माय बॉडी माय चॉइस।

वे यहीं नहीं रुके। ट्रोल होने पर तुरंत दूसरा मजाक किया- जब गर्लफ्रेंड ट्वीट डिलीट करने को कह सकती है, तो मैं भी उसका फीटस (गर्भ में पलता बच्चा) डिलीट करने को कह सकता हूं।

बता दें कि ये वही कॉमेडीवीर हैं, जिनका दिल असम की बाढ़ पर भर-भर आता है। कबाड़ उठाने वालों की मदद भी वे भरी हुई आंखों से कई बार करते दिखे, लेकिन औरतों की बात अलग है। वे न तो बाढ़ पीड़ित हैं, न कबाड़ जमा करने वालीं। इन सबसे अलग वे तो चलती-फिरती वेंडिंग मशीन हैं, जिनका दो ही काम है- बच्चे पैदा करना- या न करना। इसमें उनकी कोई मर्जी नहीं। कस्टमर बटन दबाएगा और तय करेगा कि उसे कोल्ड कॉफी चाहिए, या डायट चिवड़ा।

मर्दों के पास 2 बातें हैं... हर औरत को प्रेग्नेंट होना चाहिए- नहीं होगी तो कैंसर और डिप्रेशन से मरेगी!

हद औरत हो! अमेजन का जंगल धू-धूकर जल रहा है और तुम्हें बच्चे की पड़ी है।

वो 1807 में अप्रैल का वक्त था, जब इटली के राजमहल में अफरातफरी मच गई। दाइयां एड़ियों के बल चल रही थीं। शाही मर्द तेजी से टहल रहे थे। इधर एक कमरे के मुंदे हुए दरवाजे के भीतर थीं वहां की रानी मारिया थैरेसा, जो प्रसव में थीं। 12वें बच्चे के जन्म के हफ्तेभर के भीतर ही वे इन्फेक्शन से खत्म हो गईं।

कहानी आधी विधवाओं की, सालों से उनकी कोई खबर नहीं; हंसना भी भूल गईं, लेकिन तीज-करवाचौथ कोई भूलने नहीं देता

बता दें कि करीब 16 साल की शादी में मारिया ने दर्जनभर बच्चों को जन्म दिया और पांच बार उनका गर्भपात हुआ। यानी जब तक रानी जिंदा रहीं, गर्भवती रहीं, या अगली प्रेग्नेंसी की तैयारी करती रहीं।

प्रेग्नेंसी के दौरान, या उसके बाद इन्फेक्शन से मरने वाली रानियों की लिस्ट बनाई जाए तो चांदनी चौक की भीड़ भी सन्नाटा लगने लगे। आम औरतों के हालात और खराब थे। वे दाल पकाते, या मवेशी चराते हुए ही बच्चे को जन्म देतीं और उसी दौरान कमजोरी से मर भी जातीं। इस सबमें मर्दों बस इतनी भूमिका थी कि वे मृतका के पति, या संतान के पिता होते। बीवी की मौत के बाद वे नई शादी रचाते और संतान जन्म का सिलसिला दोबारा चल निकलता।

आखिरकार 50 के दशक में वो क्रांतिकारी गोली बनी, जिसने औरतों को 'आजाद' कर दिया। गुलाबी-सफेद रंग की ये गोली पहली हॉर्मोनल बर्थ कंट्रोल थी। दवा बन तो गई, लेकिन इसे खिलाया किसे जाए! तो मर्द वैज्ञानिकों की टुकड़ी ने कैरेबियन द्वीप की पंद्रह सौ महिलाओं को चुना। उन्हें सालोंसाल ये दवा दी गई।

ट्रायल के दौरान खून का थक्का जमने से कई की मौत हो गई। कइयों ने डिप्रेशन में खुदकुशी कर ली तो कइयों को कैंसर हो गया। ये कई कितनी थीं, किसी को नहीं पता।

वॉशिंगटन स्थित वीमन्स लिबरेशन फ्रंट ने तब काफी हल्ला मचाया था। उनकी दलील थी कि औरतें गोली गटक रही हैं और मर्द उसके सेफ होने पर बयान दे रहे हैं।

लैब में वैज्ञानिक मर्द हैं। दवा कंपनी के प्रतिनिधि मर्द हैं। और तो और, अपनी औरतों तक दवा पहुंचाने वाले भी मर्द ही हैं। वे बताते हैं कि पिल लेने के बाद औरतों को पूरी जिंदगी प्रेग्नेंसी का बोझ नहीं सहना होगा। उसका शरीर फूल-सा हल्का रहेगा, और पेट तबले की तरह कसा हुआ। इससे ज्यादा भला एक औरत को क्या चाहिए! जल्द ही गोली अमेरिका से होते हुए पूरी दुनिया में फैल गई।

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अब स्त्री आजाद थी! हालांकि इस आजादी की बड़ी कीमत उनकी सेहत चुका रही थी। साल 1970 में अमेरिकी विज्ञान पत्रकार मॉर्टान मिंट्ज ने द्वीप की पंद्रह सौ औरतों का डेटा खोज निकाला और एक के बाद एक दो किताबें लिखीं।

‘द थैरेपेटिक नाइटमेयर: ए रिपोर्ट’ नाम की पहली किताब में था कि औरतों के शरीर को कैसे मर्द कंट्रोल कर रहे हैं। अपनी दूसरी किताब ‘द पिल: अलार्मिंग रिपोर्ट’ में मिंट्ज ने उस दौरान मिलती बर्थ कंट्रोल दवाओं के साइड इफेक्ट्स बताए। उन्होंने बताया कि किस तरह से क्लिनिकल ट्रायल की अनदेखी कर दुनिया के हर सूबे में ये गोलियां फैल गईं, जबकि इससे कैंसर, स्ट्रोक और खून का थक्का जमने से लेकर डिप्रेशन जैसी दिक्कतें भी होती हैं।

मैजिक पिल के मैजिक से कई औरतों की मौत होने लगी। तब वैज्ञानिकों ने कहा- ये मौतें, उनसे बहुत कम हैं, जो दर्जनभर बच्चे पैदा करने के दौरान होती थीं! बिल्कुल सही बात। औरतें होती ही एहसान फरामोश हैं। उनकी सेहत, उनकी आजादी के लिए मर्दों ने इतनी मेहनत की, और वे साइड-इफेक्ट्स को रोने लगीं!

इधर, औरतें एतराज जताने पर ही नहीं रुकीं, वे यह भी कहने लगीं कि पुरुष भी बर्थ कंट्रोल का आधा जिम्मा लें। आखिरकार कुछ साल पहले वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने खुद पहल करते हुए वो इंजेक्शन खोजा, जो पुरुषों के लिए बर्थ कंट्रोल बन सकता था। लगभग 9 हजार मर्दों पर इसका ट्रायल शुरू हुआ, लेकिन ज्यादा दिन नहीं चल सका।

कुछ मर्द बाल झड़ने की शिकायत करने लगे, कुछ की स्किन बदरंग होने लगी, तो कई मर्द खुशमिजाज से चिड़चिड़े हो गए। ट्रायल रोकना पड़ा। आधा-अधूरा ये नतीजा जर्नल ऑफ क्लिनिकल एंडोक्राइनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म में छपा। डराते हुए। ये दावा करते हुए कि पुरुषों से बर्थ कंट्रोल की उम्मीद करना, उन्हें जहर की फांक खिलाने जैसा है।

लेकिन सब मर्द एक-से नहीं। प्रेम में डूबे कई पुरुषों ने माना कि वो अपनी औरत के लिए बर्थ कंट्रोल अपनाने को तैयार हैं, ‘बशर्तें’ उनकी मर्दानगी पर आंच न आए। कइयों ने माना कि जन्म चूंकि औरत देती है, तो उसे रोकने की जिम्मेदारी भी उसकी है। सर्वे में 134 महिलाएं भी शामिल थीं। सब की सब डरी हुईं, कि जो पुरुष ब्याह की तारीख भूल जाते हैं, वे बर्थ कंट्रोल की दवा कैसे याद रखेंगे!

साल 2022! बीते महीने अटलांटा में एंडोक्राइन सोसायटी की बैठक हुई। वहां पुरुषों के लिए गोली पर बात करते हुए सभी (पुरुष) साइंटिस्ट सहमत थे कि दवा निकाली जानी चाहिए, लेकिन साइड-इफेक्ट्स को अच्छी तरह समझने के बाद! ये पक्का करने के बाद कि दवा से मर्द कम मर्दाना न हो जाएं!