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भास्कर एक्सक्लूसिव:बूस्टर डोज ट्रायल के लिए नहीं मिल रहे ऐसे 160 लोग, जिन्हें कभी न हुआ हो कोरोना, इसलिए डेटा सबमिट नहीं कर पा रही कंपनियां

नईदिल्ली4 महीने पहलेलेखक: अक्षय बाजपेयी

देश में अब तक कोरोना के बूस्टर डोज लगना शुरू नहीं हुए हैं। अभी हेल्थ और फ्रंटलाइन वर्कर्स के साथ ही 60 साल से ऊपर के ऐसे बुजुर्गों को प्रिकॉशन डोज लगाए जा रहे हैं, जो किसी बीमारी से जूझ रहे हैं। इसमें एक शर्त ये भी है कि सेकंड डोज और थर्ड डोज के बीच कम से कम 9 महीनों का गैप होना चाहिए।

इसके उलट इंग्लैंड में 62% से ज्यादा लोगों को बूस्टर डोज लग चुका है और वहां की स्टडी में यह सामने आया है कि जिन्हें बूस्टर डोज लगा है, वो कोरोना से 90% तक सुरक्षित हैं। ऐसे में भारत में बूस्टर डोज अभी क्यों नहीं लगाए जा रहे?

इस सवाल के जवाब में नीति आयोग के टॉप एक्सपर्ट ने हमें बताया कि सरकार करीब 6 कंपनियों को बूस्टर डोज के ट्रायल के लिए परमिशन दे चुकी है, लेकिन अभी तक किसी ने भी ट्रायल का डेटा सबमिट नहीं किया है।

कंपनियों के सामने दिक्कत ये है कि, उन्हें ऐसे लोग मिलना मुश्किल हो रहे हैं, जिन्हें कभी भी कोरोना नहीं हुआ हो। ऐसे लोग मिल भी जाते हैं तो उन्हें वैक्सीन का दूसरा डोज लगे कम से कम 6 महीने हो जाना चाहिए, तभी उन पर बूस्टर का ट्रायल हो सकता है।

कोरोना का ओमिक्रॉन वैरिएंट सामने आने के बाद देश में बहुत तेजी से कोरोना का इंफेक्शन बढ़ा है। बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने टेस्ट नहीं कराया, लेकिन उनकी बॉडी कोरोना के संपर्क में आ चुकी है।

कम से कम 160 लोगों पर ट्रायल करना जरूरी
वैक्सीन तैयार करने वाली कंपनी को कम से कम 160 लोगों पर ट्रायल करना जरूरी होता है। नीति आयोग के टॉप सोर्स के मुताबिक, वल्नेरेबिलिटी टेस्ट में पता चला है कि देश के करीब 200 जिले ऐसे हैं, जिनमें कोरोना का इंफेक्शन कम हुआ है।

ऐसे में इन जिलों में जाकर लोगों को ट्रायल के लिए ढूंढा जा सकता है, लेकिन इसमें पैसा और मेहनत दोनों ही काफी लगेंगी, इसलिए शायद कंपनियां इससे बच रही हैं।

एक बड़ी बात ये भी कही जा रही है कि ओमिक्रॉन अधिकतर लोगों को होना तय है। ओमिक्रॉन के बाद बॉडी में जो एंटीबॉडी बनेगी, वो अगले 6 से 7 महीने तक रहेगी यानी हाल-फिलहाल बूस्टर डोज की जरूरत देश में नहीं पड़ने वाली है।

इसीलिए कंपनियां खुद भी वैक्सीन तैयार करके रिस्क नहीं लेना चाहतीं, लेकिन विदेशों में बूस्टर डोज दिया जा रहा है. इजरायल में तो चौथा डोज भी दिया जा चुका है, इसके बावजूद ओमिक्रॉन के केस वहां भी आ ही रहे हैं।

बूस्टर न देना दुनिया के ट्रेंड के खिलाफ जाना होगा

देश के जाने माने महामारी वैज्ञानिक डॉ. रमन गंगाखेडकर कहते हैं, यदि हम बूस्टर डोज नहीं देते हैं तो यह दुनिया के ट्रेंड के खिलाफ जाएगा, लेकिन हमे प्रमाणों के आधार पर यह तय करना होगा कि हमारे देश में बूस्टर डोज किस तरह दिया जाना सही होगा।

यूके में जो डाटा आया है, उससे यह पता चलता है कि बूस्टर डोज देने के बाद इंफेक्शन रेट कम हुआ है। गंभीर बीमारी नहीं हो रही है और हॉस्पिटल में एडमिट कराने की नौबत भी कम आ रही है। यदि एविडेंस हमारे फेवर में हैं तो हमे भी बूस्टर डोज देना चाहिए।

भारत में अभी प्रिकॉशन डोज एक ही वैक्सीन का दिया जा रहा है यानी आपने पहला और दूसरा डोज कोवीशील्ड का लिया है तो तीसरा डोज भी कोवीशील्ड का ही लगेगा।

इसके उलट विदेशों में वैक्सीन की मिक्सिंग की जा रही है। ऐसा कहा जा रहा है कि मिक्सिंग से ज्यादा अच्छा रिस्पॉन्स मिलता है, लेकिन कितना अच्छा मिलता है, ये अभी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है।

यदि हम मिक्सिंग के बारे में सोचते हैं तो यह भी देखना होगा कि हमारी 90 प्रतिशत आबादी को कोवीशील्ड लगी है यानी मिक्सिंग करते हैं तो इतनी आबादी को कोवैक्सीन लगाना होगी। इसमें अवेलिबिलिटी का भी इश्यू होगा, क्योंकि कोवैक्सीन इतनी बड़ी मात्रा में उपलब्ध नहीं है।

क्या होती है वैक्सीन ट्रायल की प्रोसेस

बूस्टर डोज के ट्रायल पर डॉ. गंगाखेडकर कहते हैं, वैक्सीन ट्रायल की प्रोसेस पूरी तरह से साइंटिफिक है और इसके कई चरण हैं। जैसे, सबसे पहले क्लीनिकल ट्रायल रजिस्ट्री (CTRI) में कंपनी को रजिस्ट्रेशन करवाना होता है। इसके बाद फाइल ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) के पास जाती है।

DCGI की एक सब्जेक्ट एक्सपर्ट कमेटी होती है, जिसके सामने वैक्सीन बनाने वाली कंपनी को पूरा प्रोटोकॉल पेश करना होता है। फिर जिस हॉस्पिटल में ट्रायल होना है, वहां की एथिक्स कमेटी का अप्रूवल लगता है। इस पूरी प्रोसेस को फॉलो करने के बाद ही किसी वैक्सीन को अप्रवूल मिल पाता है।

कंपनियों के सामने ह्यूमन ट्रायल भी एक चुनौती की तरह होता है। पार्टिसिपेंट्स का पूरा खर्चा उन्हें उठाना होता है और उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेनी होती है। बूस्टर डोज के मामले में ह्यूमन ट्रायल ही सबसे ज्यादा चैलेंज है, क्योंकि रेग्युलेटरी से तो कोई दिक्कतें नहीं आ रहीं। कोरोना के बाद से वैक्सीन को अप्रवूल देने की प्रोसेस बहुत तेज हो चुकी है।

DCGI की सब्जेक्ट एक्सपर्ट कमेटी लगभग हर हफ्ते ही मीटिंग कर रही है। हालांकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कंपनियां जानबूझकर अभी बूस्टर की तरफ ध्यान न दे रही हों, क्योंकि ओमिक्रॉन से बड़ी आबादी में एंटीबॉडी पनपना तय है।

कोवैक्सीन में नेचुरल इंफेक्शन पता नहीं चल पाता
डॉ. गंगाखेडकर कहते हैं, जिन्हें कभी कोरोना न हुआ हो, यह पता करना कोवैक्सीन का डोज लगने पर कठिन हो जाता है। इस वैक्सीन में नेचुरल इंफेक्शन की वजह से एंटीबॉडी दिखती हैं यानी आपको कोरोना न भी हुआ हो, तभी भी यह कंफर्म कर पाना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि कोवैक्सीन में मरा हुआ वायरस होता है।

इसके उलट कोवीशील्ड स्पाइक प्रोटीन पर बेस्ड होती है, इसलिए इसमें यह आसानी से पता चल जाता है कि कोविड एक्सपोजर हुआ है या नहीं।

हालांकि, डब्लुएचओ सहित सभी एक्सपर्ट्स इस बात पर एकमत हैं कि जल्दी से जल्दी पूरी आबादी को वैक्सीन के दोनों डोज लगाना चाहिए। यदि एक भी व्यक्ति ऐसा रह जाता है, जिसे वैक्सीन नहीं लगी है तो वो दोबारा पूरी दुनिया को संक्रमित कर सकता है। क्योंकि वायरस को सर्वाइव करने के लिए जगह चाहिए। यदि आपके पास एंटीबॉडी है तो वायरस नहीं पनप सकेगा, लेकिन एंटीबॉडी नहीं है तो वायरस आपके घर को अपना घर बना लेगा। इसलिए वैक्सीन के दोनों डोज जरूर लगवाइए।

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