स्टार राइटर72% भारतीय कामगार सीख रहे नए डिजिटल स्किल्स:कंपनियों को देना होगा हर कर्मचारी को अपनी तरह से सीखने का मौका

8 दिन पहले
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अरुंधति भट्‌टाचार्य को ज्यादातर लोग भारत के सबसे बड़े पब्लिक सेक्टर बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की पूर्व चेयरपर्सन के तौर पर जानते हैं। भारत के फाइनेंशियल सेक्टर में 40 वर्षों से ज्यादा का अनुभव रखने वाली अरुंधति को SBI में डिजिटल क्रांति का प्रणेता माना जाता है। आज वह सेल्सफोर्स इंडिया की चेयरपर्सन और CEO हैं। अपने लंबे करिअर के दौरान अरुंधति को फोर्ब्स मैग्जीन ने ‘The World’s 100 Most Powerful Women’ लिस्ट में शामिल किया। साथ ही फॉर्च्यून मैग्जीन ने ‘Top 50 globally most powerful women in business’ और ‘World’s 50 Greatest Leaders’ में शुमार किया है। आज वह बता रही हैं कि डिजिटल स्किल्स बढ़ाना क्यों जरूरी है और कैसे कंपनियां हर कर्मचारी की जरूरत को समझ इस प्रोसेस को तेज कर सकती हैं…

कोरोना महामारी के बाद पूरी दुनिया में शुरू हुए इस्तीफों के दौर ने हर इंडस्ट्री को प्रभावित किया है। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ 2021 में ही दुनिया के वर्कफोर्स से 9.2 करोड़ कामगार कम हो गए।

यही नहीं, महामारी का दूसरा असर ये था कि रिमोट वर्किंग शुरू होने से डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन की रफ्तार दोगुना हो गई है। नतीजा ये कि पूरी दुनिया में ऐसे कामगारों की डिमांड सबसे ज्यादा है जिनके डिजिटल स्किल्स बहुत अच्छे हों।

कामगारों की डिमांड तो बढ़ी है, लेकिन साथ ही कंपनियों की जरूरतें भी ज्यादा जटिल हो गई हैं। सेल्सफोर्स के नए ग्लोबल डिजिटल स्किल्स इंडेक्स से यह बात और भी ज्यादा स्पष्ट होती है। 19 देशों के 23 हजार कामगारों पर किए गए इस सर्वे में सिर्फ 27% लोगों को लगता है कि सफलता के लिए जरूरी डिजिटल स्किल्स सीखने के लिए उनके पास पर्याप्त साधन हैं। भारत में ऐसा मानने वाले कामगार 66% हैं। यही नहीं, भारत में 72% लोगों ने कहा कि वे अभी डिजिटल स्किल्स सीखने में जुटे हैं ताकि भविष्य के वर्कफोर्स के लिए तैयार रहें।

वर्कफोर्स के डिजिटल स्किल्स की कमियों को दूर करना सिर्फ बिजनेस में ज्यादा कंपिटिटिव होने या कर्मचारियों का प्रदर्शन सुधारने भर के लिए जरूरी नहीं है। आज की डिजिटल फर्स्ट दुनिया में यह बात ज्यादा मायने रखती है कि हर स्तर पर हर किसी के डिजिटल स्किल्स इतने हों कि ऑपरेशन्स में वह बराबर की हिस्सेदारी रखे। और डिजिटल स्किल्स को इस स्तर पर लाने के लिए आप कौन से तरीके में इनवेस्ट करते हैं, यह बहुत अहम है।

चाहे कंपनी हो या व्यक्ति…पहले यह पहचाने कि किस स्किल में इनवेस्ट करना है

डिजिटल स्किल्स अब हमारी जिंदगी के हर पहलू का जरूरी हिस्सा बन गए हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी जमाने में ई-मेल बिल्कुल नया कॉन्सेप्ट था, मगर आज यह दुनिया के अरबों लोगों के लिए बिल्कुल आम बात हो गई है। आज ब्लॉकचेन और एआई जैसी टेक्नोलॉजी अब कुछ लोगों तक सीमित नहीं, यह अब सबकी जिंदगी में आ चुकी है।

तेजी से बदलती इस दुनिया में उन कंपनियों की तरक्की के मौके सबसे ज्यादा हैं जो खुद को डिजिटल तौर-तरीकों में तेजी से ढालने की रणनीति बना चुकी हैं। अपने मौजूदा और भविष्य के वर्कफोर्स के स्किल्स की सही पड़ताल करके ही कंपनियां खुद को भविष्य के लिए मजबूती से तैयार कर सकती हैं।

इस प्रक्रिया का पहला कदम है- यह पहचानना कि कौन सा स्किल सबसे जरूरी है जिसमें इनवेस्ट किया जाए। सेल्सफोर्स के सर्वे में शामिल लोगों के मुताबिक आज और अगले 5 साल को ध्यान में रखते हुए कंपनियों को 5 डिजिटल स्किल्स में इनवेस्ट करना चाहिए-

  • कोलैबोरेशन टेक्नोलॉजी स्किल्स
  • डिजिटल एडमिनिस्ट्रेटिव स्किल्स
  • एनक्रिप्शन एंड साइबर सिक्योरिटी स्किल्स
  • ई-कॉमर्स एंड डिजिटल मार्केटिंग स्किल्स
  • प्रोजेक्ट मैनेजमेंट टेक्नोलॉजी स्किल्स

भारत में सर्वे में हिस्सा लेने वालों ने डिजिटल मार्केटिंग को टॉप वर्कप्लेस स्किल माना। सिर्फ 39% ने कहा कि उनकी कंपनी की डिजिटल मार्केटिंग स्किल्स बहुत अच्छी हैं।

ये स्किल्स कोडिंग या डेटा साइंस जैसे पारंपरिक स्किल्स से अलग हैं जो किसी भी स्कूल या इंस्टीट्यूट में पढ़ाए जाते हैं। यह तथ्य इस बात की जरूरत को और बढ़ा देता है कि स्कूल्स के बजाय दफ्तरों में ही लगातार नए डेवलपमेंट प्रोग्राम्स बनाए जाएं।

लेकिन हर एजुकेशन की तरह यहां भी अगर हर सीखने वाले को एक समान मान लिया जाए तो सफलता कभी नहीं मिलेगी। कंपनियों को पूरा समय लगाकर अपनी मौजूदा और भविष्य की वर्कफोर्स को समझना होगा। साथ ही यह भी तय करना होगा कि हर व्यक्ति खुद अपना काम और उसमें अपने डिजिटल स्किल्स को पहचाने।

हर एक को उसकी जरूरत के हिसाब से डिजिटल स्किल्स की ट्रेनिंग

ग्लोबल डिजिटल स्किल्स इंडेक्स के डेटा की मदद से सेल्सफोर्स ने सीखने वालों की 6 बिल्कुल अलग-अलग प्रोफाइल्स बनाई हैं। हर प्रोफाइल के लोगों के स्किल्स में अंतर है, स्किल्स सीखने की इच्छा और सीखने के तरीके में अंतर है।

यह प्रोफाइल्स इस बात को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं कि कंपनियां और खुद सीखने वाले भी एक तरह की समस्याओं को पहचानें, उसके आधार पर ग्रुप्स बनाएं ताकि हर ग्रुप के लिए सीखने का सही तरीका अपनाया जा सके।

पहले हिस्से में वह लोग आते हैं जिनके पास मजबूत डिजिटल स्किल्स हैं और वह नई चीजें सीखने में बहुत रुचि लेते हैं। यानी प्रोएक्टिव लर्नर्स और स्थापित स्किल सीकर्स।

दूसरे हिस्से में वो लोग आते हैं जो आज की टेक्नोलॉजी और डिजिटल स्किल्स के लिए तैयार हैं, मगर भविष्य के लिए कोई प्लान नहीं है। यानी अनप्रिपेयर्ड ‘प्रिपेयर्ड्स’ और लिविंग इन द नाउ’।

तीसरे हिस्से में वो लोग आते हैं जिनकी वर्कप्लेस डिजिटल स्किल्स सबसे कमजोर हैं फिर भी स्किल्स बढ़ाने में हिचकते हैं। यानी एव्रिडे स्किल्स और टिमिड यानी डरपोक लर्नर्स।

इन तीनों ग्रुप्स और 6 प्रोफाइल्स के बीच का अंतर इस बात को और जरूरी कर देता है कि डिजिटल स्किल्स की ट्रेनिंग मल्टी डायमेंशनल हो।

उदाहरण के लिए जिनके डिजिटल स्किल्स सबसे कमजोर हैं और साथ ही वे सीखने के मामले में डरपोक भी हैं, उन्हें स्किल्स बढ़ाने में सबसे ज्यादा दिक्कत होती है। उन्हें सख्त निर्देशों के साथ ही नई डिजिटल स्किल्स सीखने के लिए प्रोत्साहन की भी जरूरत होती है।

सीखने के तरीकों को गहराई से समझें तो कंपनियों को यह स्पष्ट होगा कि क्यों हर तरह के कामगार का स्किल सुधारने में बिल्कुल अलग तरीकों की जरूरत है। जबकि हर तरीके का उद्देश्य कामगार का स्किल लेवल बढ़ाना ही है।

डिजिटल फर्स्ट दुनिया में अपने वर्कफोर्स के डिजिटल स्किल्स बढ़ाने के लिए कंपनियों को पहचानना ही होगा कि हर किसी के सीखने का तरीका अलग होता है। जिन लोगों से कंपनी की वर्कफोर्स बनती है उन्हें समझने में समय देकर कंपनी यह पुख्ता कर सकती है कि अपनी पसंद के तरीके से हर कामगार डिजिटल स्किल्स को जल्द से जल्द बढ़ा ले।

सफलता के लिए जरूरी है टारगेटेड ट्रेनिंग

डिजिटल स्किल्स में कमी को पूरा करने में कंपनियों की बहुत अहम भूमिका है। वह हर कर्मचारी को अपनी ताकत पहचानने और समझने में मदद कर सकती है। साथ ही वह मौके दे सकती है जिनसे वह नई डिजिटल स्किल्स सीख सके।

लर्निंग प्रोग्राम्स तैयार करने में यह नहीं देखना चाहिए कंपनी वर्कर को क्या सिखाना चाहती है। बल्कि यह देखना चाहिए कि वर्कर वाकई में क्या चाहता है, वह क्या जानना-सीखना चाहता है। कंपनियां ऐसा वर्क कल्चर तैयार कर सकती हैं जिसमें हर कर्मचारी खुद को सक्षम महसूस करे, दूसरों से जुड़े-सीखे और तरक्की करे।