भास्कर इंडेप्थ:हड्डियों में छिपी खास कोशिकाओं से हारेगा ओमिक्रॉन, जानिए साउथ अफ्रीका से क्या सीख सकता है भारत

7 महीने पहलेलेखक: अनुराग आनंद

साउथ अफ्रीका में 25 नवंबर को ओमिक्रॉन का पहला केस सामने आया था। करीब 10 दिन बाद कोरोना संक्रमण के मामले हर रोज 25 हजार से ज्यादा सामने आ रहे थे। अब एक महीने बाद एक बार फिर से साउथ अफ्रीका में कोरोना के मामलों में कमी हो रही है।

साउथ अफ्रीका की सरकार ने कहा है कि देश में ओमिक्रॉन का पीक गुजर चुका है। जब दुनिया भर में ओमिक्रॉन के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं तो सवाल उठता है कि अफ्रीका ने इतनी जल्दी ओमिक्रॉन को मात कैसे दे दी?

इस सवाल का जवाब दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च में सामने आया है। इस रिसर्च में पता चला है कि हड्डियों (बोन मैरो) में छिपी खास कोशिकाओं 'टी सेल' से साउथ अफ्रीका ने ओमिक्रॉन को मात दी है।

अफ्रीका के गाउटेंग प्रॉविंस में ओमिक्रॉन पर यह रिसर्च की गई है। गाउटेंग प्रॉविंस वही जगह है, जहां सबसे पहला ओमिक्रॉन केस सामने आया था। ऐसे में साउथ अफ्रीका में हुई इस रिसर्च के जरिए इन 5 सवालों का जवाब जानते हैं-

1. हड्डी में छिपी खास कोशिकाएं क्या हैं और ओमिक्रॉन के खिलाफ लड़ाई में इनकी क्या भूमिका है?

2. ओमिक्रॉन वैरिएंट डेल्टा और बीटा से कितना कम या ज्यादा खतरनाक है?

3. अफ्रीका में ओमिक्रॉन के कितने प्रतिशत मरीजों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा?

4. ओमिक्रॉन से बचाव के कौन से तरीके हैं, जिसे साउथ अफ्रीका से सीखा जा सकता है?

5. क्या ओमिक्रॉन के साथ कोरोना खत्म हो जाएगा?

हड्डी में छिपी टी सेल कोशिकाएं और ओमिक्रॉन से लड़ाई में इनकी भूमिका

केप यूनिवर्सिटी की रिसर्च में सामने आया है कि ओमिक्रॉन को हराने में बोन मैरो में छिपी कोशिकाओं (टी सेल) ने काफी खास भूमिका निभाई है। इंसान के शरीर में दो तरह की सफेद रक्त कोशिकाएं (व्हाइट ब्लड सेल) होती हैं। यह इंसान के शरीर में होने वाले किसी वायरस अटैक को पहचानकर उसे हराने का काम करती है।

1. बी सेल्स- शरीर में बीमारी की पहचान करती हैं।

2. टी सेल्स- बीमारी के वायरस से लड़ने का काम करती हैं।

जब कोरोना वैक्सीन ले चुके या पहले कोरोना से संक्रमित हो चुके इंसान को ओमिक्रॉन हुआ तो इसके 70 से 80 फीसदी मरीजों में मौजूद टी सेल्स ने वायरस के खिलाफ अच्छा रिस्पॉन्स किया। टी सेल आपको संक्रमित होने से तो नहीं रोक सकता, लेकिन संक्रमण के बाद शरीर के अंदर वायरस पहुंचते ही उसे मार देता है। दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने लोगों के 'टी सेल्स' को मजबूत करने के लिए वैक्सीनेशन को तेज करके ओमिक्रॉन को हराया है।

साउथ अफ्रीका से भारत क्या सीख सकता है?

दक्षिण अफ्रीका में दिसंबर के मध्य तक एक दिन में औसतन 23 हजार ओमिक्रॉन के मामले सामने आ रहे थे। इसके बाद ओमिक्रॉन के मामले तेजी से करीब 30% तक नीचे गिरे। इस समय एक दिन में औसतन 11 हजार से ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं।

अफ्रीका ने ओमिक्रॉन को रोकने के लिए सबसे पहले मरीज के संपर्क में आने वाले लोगों को ट्रेस करके आइसोलेट करने और फिर वैक्सीनेशन को बढ़ाने का काम किया है। जानिए कैसे तीन स्टेप में अफ्रीका ने ओमिक्रॉन को हराया है।

जांच और ट्रेसिंग- साउथ अफ्रीका ने जांच में पॉजिटिव आए मरीजों से जुड़े सभी लोगों की ट्रेसिंग की और उन्हें अलग किया। कंटेनमेंट जोन में पाबंदी को कड़ाई से लागू किया।

वैक्सीनेशन- स्थानीय प्रशासन ने कंटेनमेंट जोन में टीकाकरण तेज किया। इससे लोगों में ओमिक्रॉन के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित हुई।

कड़े प्रतिबंध- नाइट कर्फ्यू के जरिए ओमिक्रॉन की चेन को तोड़ा गया। कंटेनमेंट जोन में प्रशासन के अलर्ट से ओमिक्रॉन को फैलने से रोका गया।

ओमिक्रॉन वैरिएंट डेल्टा और बीटा से कितना कम या ज्यादा खतरनाक है?

दक्षिण अफ्रीका के गाउटेंग प्रांत में की गई रिसर्च में राहत की बात सामने आई है। रिसर्च में यह पता चला है कि ओमिक्रॉन तेजी से लोगों को अपनी चपेट में लेता है। हालांकि एक राहत वाली बात यह भी है कि साउथ अफ्रीका में ओमिक्रॉन मरीज के संपर्क में आने वाले केवल 4.9% लोगों को ही अस्पताल में भर्ती होना पड़ा है।

इससे पहले साउथ अफ्रीका में बीटा मरीजों के संपर्क में आने पर 18.9% और डेल्टा के संपर्क में आने पर 13.7% मरीजों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था। इससे साफ है कि ओमिक्रॉन तेजी से भले फैलता हो, लेकिन डेल्टा और बीटा से कम खतरनाक है।

ओमिक्रॉन के कितने प्रतिशत मरीजों को होना पड़ा अस्पतालों में भर्ती?

रिसर्च में कोरोना के बीटा वैरिएंट के पहले चार सप्ताह (नवंबर से दिसंबर 2020), डेल्टा के मई 2021 और ओमिक्रॉन के नवंबर-दिसंबर 2021 की तुलनात्मक रिसर्च की गई है। साउथ अफ्रीका में ओमिक्रॉन से संक्रमित होने के बाद 28.8% मरीज अस्पताल में भर्ती हुए। इन मरीजों में ओमिक्रॉन के लक्षण सामने आए थे। वहीं, कोरोना के बीटा वैरिएंट में 60.1% और डेल्टा वैरिएंट में 66.9% मरीजों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा है। बीटा और डेल्टा के खतरनाक होने की वजह से अस्पताल में भर्ती होने वाले लोगों को वैंटिलेटर और ऑक्सीजन सपोर्ट की भी जरूरत हुई थी।

ओमिक्रॉन का असर किन 3 बातों पर करता है निर्भर

कुछ देशों में ओमिक्रॉन के मामले तब बढ़े, जब डेल्टा वैरिएंट का तेजी से फैलाव हो रहा था। वहीं, साउथ अफ्रीका की बात करें तो यहां ओमिक्रॉन की वजह से चौथी लहर तब आई, जब डेल्टा के काफी कम मामले सामने आ रहे थे।

रिसर्च में वैज्ञानिकों ने पाया कि ओमिक्रॉन का असर मुख्य तौर पर तीन बातों पर निर्भर करता है। इन्हीं तीन बातों पर ओमिक्रॉन मरीजों में ज्यादा या कम लक्षण देखने को मिलते हैं।

1. गंभीर बीमारी से पीड़ित- HIV, टीबी, डायबीटीज मरीजों में ओमिक्रॉन के लक्षण ज्यादा दिखते हैं।

2. कोरोना वैक्सीन- कोरोना वैक्सीन के दोनों डोज लेने वालों में ओमिक्रॉन का कम असर देखने को मिला है। रिसर्च में ओमिक्रॉन के खिलाफ लड़ाई में जॉनसन एंड जॉनसन और फाइजर वैक्सीन को बेस्ट माना गया।

3. पहले से संक्रमित मरीज- कोरोना के किसी भी वैरिएंट से पहले संक्रमित हो चुके लोगों में ओमिक्रॉन का असर कम दिख रहा है।