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ठंडा मतलब कोका-कोला:एक फार्मेसी में रोज 9 गिलास कोका-कोला बिकने से हुई शुरुआत, अब रोज 190 करोड़ बोतल का कारोबार; 135 साल से सीक्रेट है बनाने का फॉर्मूला

एक वर्ष पहलेलेखक: आदित्य द्विवेदी
  • 1977 में भारत ने कोका-कोला को दिखा दिया था बाहर का रास्ता
  • 1993 में कंपनी ने दोबारा एंट्री मारी, कई कंपटीटर्स का अधिग्रहण किया
  • रोनाल्डो ने कोका-कोला की बोतल हटाई तो फिर चर्चा में आ गई सॉफ्ट ड्रिंक कंपनी

फुटबॉल की सबसे बड़ी चैम्पियनशिप में से एक यूरो कप की प्रेस कॉन्फ्रेंस चल रही थी। पुर्तगाल टीम के कप्तान क्रिस्टियानो रोनाल्डो ने टेबल पर रखी कोका-कोला की बोतल को उठाकर दूर रख दिया। उन्होंने पानी की बोतल उठा कर ऐसा इशारा किया कि कोका-कोला से अच्छा तो पानी है।

इसके बाद पांच दिनों से कोका-कोला के शेयरों की कीमत गिरती जा रही है। 14 जून को जिन शेयरों की कीमत 55.26 डॉलर थी वो 21 जून को घटकर 53.77 डॉलर पर आ गए हैं। शेयर में 3.5% गिरावट के साथ कंपनी की वैल्यूएशन करीब 83 हजार करोड़ रुपए कम हो गई। इसके बाद कोका-कोला को लेकर दुनिया भर में चर्चा हो रही है।

हम यहां आपको बता रहे हैं कि कोका-कोला की शुरुआत कैसे हुई? 135 साल से कोका-कोला का सीक्रेट फॉर्मूला तिजोरी में क्यों बंद है? कोका-कोला रोजाना 190 करोड़ सर्विंग बेचने की स्थिति में कैसे पहुंचा? साथ में बताएंगे कोका-कोला की भारत में एंट्री, एग्जिट और दोबारा एंट्री मारने की पूरी कहानी। चलिए, शुरू से शुरू करते हैं...

कोका-कोलाः फील द टेस्ट

साल था 1886। न्यूयॉर्क हॉर्बर में वर्कर स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी बना रहे थे। वहां से करीब 1200 किलोमीटर दूर अटलांटा के एक घर के बेसमेंट में जॉन पेंबरटन नाम के फार्मासिस्ट एक नई ड्रिंक का फ्लेवर बना रहे थे। 8 मई 1886 की एक दोपहर पेंबरटन को एहसास हुआ कि उन्होंने मनमाफिक फ्लेवर बना लिया है। अपना मिक्सचर लेकर वो पास की जैकब फार्मेसी पहुंचे। वहां उन्होंने इसे सोडा के साथ मिलाकर कुछ ग्राहकों को पिलाया। सभी ने एक सुर में कहा- ये ड्रिंक कुछ अलग है।

कैसे नाम पड़ा कोका-कोला?
पेंबरटन के बहीखाते की देखभाल करने वाले फ्रैंक मेसन रॉबिनसन ने इसका नाम रखा कोका-कोला (Coca-Cola)। वो इसलिए क्योंकि इसे बनाने में कोका के पत्ते और कोला के बीज का इस्तेमाल होता था। जैकब फार्मेसी ने इस ड्रिंक को 5 सेंट प्रति गिलास बेचना शुरू कर दिया। 29 मई 1886 को अटलांटा कॉन्स्टीट्यूशन अखबार में कोका-कोला का पहला विज्ञापन प्रकाशित हुआ। धीरे-धीरे अपने अलग टेस्ट की वजह से ये अटलांटा के लोगों में पॉपुलर होने लगा।

1892 में बनी 'द कोका कोला कंपनी'
पहले साल कोका-कोला के रोजाना सिर्फ 9 गिलास ही बिक पाते थे, जिससे करीब 26 डॉलर का घाटा हुआ। 1887 में बिक्री बढ़ने से मुनाफे में आती उससे पहले ही पेंबरटन बीमार हो गए। कोका-कोला के ज्यादातर शेयर फार्मासिस्ट आसा ग्रिग्स कैंडलर ने खरीद लिए। 16 अगस्त 1888 को पेंबरटन का निधन हो गया। 29 जनवरी 1892 को कोका-कोला एक प्रोडक्ट से कंपनी बन गई, जिसका नाम था- द कोका कोला कंपनी।

5 सितंबर 1919 को आर्नेस्ट बुडरफ और कुछ निवेशकों ने मिलकर कोका-कोला कंपनी को 2.5 करोड़ डॉलर में खरीद लिया। इसके बाद इसे न्यूयॉर्क के स्टॉक मार्केट में लिस्ट कर दिया गया।

ट्रेडमार्क बन गई कोका-कोला की बोतल
कोका-कोला की बिक्री बढ़ी तो मिसिसिपी के थोक व्यापारी जोसेफ बाइडेनहार्न से इसे बोतलों में भरकर बेचना शुरू किया। 1915 तक सैकड़ों जगह बोतलबंद कोका कोला मिलने लगा। कई कंपनियों ने कोका कोला की नकल करने की भी कोशिश की।

नकलचियों से बचने के लिए कंपनी ने कोका-कोला की बोतल का ऐसा डिजाइन तैयार करने का फैसला किया, जो सबसे अलग हो और अंधेरे में भी पहचानी जा सके। आखिरकार उस वक्त जो बोतल की डिजाइन तय की गई थी वही आज तक जारी है। 12 अप्रैल 1961 को कोका-कोला की बोतल को ट्रेडमार्क के रूप में मान्यता मिली।

1977 में छोड़ना पड़ा था भारत का बाजार
कोका-कोला कंपनी को दूसरे विश्व युद्ध के दौरान काफी फायदा मिला, जब विदेश में मौजूद अमेरिकी सैनिकों को कोका-कोला मुहैया कराई गई। इससे इसे दुनिया भर में फैलने में मदद मिली। भारत में कोका-कोला ने 1950 में एंट्री मारी। उन्होंने नई दिल्ली में पहला बॉटलिंग प्लांट लगाया।

1977 में मोरारजी देसाई की सरकार में उद्योग मंत्री बने जॉर्ज फर्नांडिस। उन्होंने कोका-कोला के सामने शर्त रखी कि अगर यहां बिजनेस करना है तो 60% हिस्सेदारी किसी भारतीय कंपनी को देनी पड़ेगी। कोका-कोला ने इससे इनकार कर दिया और भारत से जाने का फैसला किया।

15 साल के निर्वासन के बाद जैसे ही भारत में विदेशी कंपनियों के लिए अर्थव्यवस्था के दरवाजे खुले, कोका-कोला ने 1993 में दोबारा एंट्री मारी। इसके बाद कोका-कोला ने थम्स अप, लिम्का, गोल्ड स्पॉट और माजा जैसे ब्रांड्स का अधिग्रहण कर लिया।

दुनिया के कई हिस्सों में हुआ कोका-कोला का विरोध

  • सबसे पहले फ्रांस ने 1950 के दशक में इसे 'कोका कोलोनाइजेशन' का नाम दिया। वहां कोका-कोला के ट्रक पलट दिए गए और बोतलें तोड़ दी गईं।
  • सोवियत संघ भी कोका-कोला को लेकर आशंकित था इसलिए यहां इसकी मार्केटिंग नहीं हो सकी। इसका फायदा पेप्सी ने उठाया।
  • मिडिल-ईस्ट में भी कोका-कोला का बहिष्कार किया गया, क्योंकि इसकी बिक्री इजराइल में होती थी।
  • 2003 में इराक पर अमेरिकी कार्रवाई के विरोध में थाईलैंड में लोगों ने सड़कों पर कोका-कोला बहाया और वहां कुछ वक्त के लिए उसकी बिक्री भी रोक दी गई।
  • ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने भी कोका-कोला पर पाबंदी लगाने की धमकी दी थी।
  • वेनेज़ुएला के ह्यूगो चावेज ने लोगों से अपील की थी कि वे कोका-कोला और पेप्सी की बजाय स्थानीय तौर पर बने फलों का रस पिएं।

समय-समय पर विरोध और प्रतिबंधों के बावजूद आज 200 से ज्यादा देशों में कोका-कोला बेची जाती है। भारत, चीन और ब्राजील जैसे बाजारों में कंपनी का दबदबा बढ़ता जा रहा है। दुनिया में सिर्फ दो देशों में कोका-कोला नहीं खरीदी जा सकती। ये दो देश हैं- क्यूबा और उत्तर कोरिया। ऐसा अमेरिकी बैन की वजह से हुआ है।

कोका-कोला के ताजा विवाद के बाद एक पुराना किस्सा भी वायरल हो रहा है। नॉर्वे के लिए खेल चुके फुटबॉलर यान ओगे फियरटस ने सोलशेयर के हवाले से इसे शेयर किया था। उन्होंने बताया था, ‘रोनाल्डो एक बार नाश्ते के लिए आए तो उनके हाथ में कोक थी। ये देखते ही रयान गिग्स ने उन्हें धक्का देकर दीवार से सटा दिया और बोले- ये दोबारा मत करना।’

जानकार कहते हैं कि इसके बाद रोनाल्डो ने कभी कोक का इस्तेमाल नहीं किया। हालांकि इस किस्से की सच्चाई का पता नहीं क्योंकि उसके बाद रोनाल्डो कोका-कोला के ब्रांड एंबेसडर भी रह चुके हैं।