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सलाह:कोरोना लॉकडाउन से बने डर के माहौल में हेल्थकर्मी, पुलिस व काम में जुटे अन्य लोग देते हैं हौसला

कॉलम2 वर्ष पहले
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कैलाश सत्यार्थी, नोबेल शांति पुरस्कार विजेता - Dainik Bhaskar
कैलाश सत्यार्थी, नोबेल शांति पुरस्कार विजेता

आज पूरी दुनिया अनिश्चितता और खौफ के दौर में जी रही है। कोरोना वायरस से पीड़ितों की संख्या भले ही छह-सात लाख हो, लेकिन करोड़ों लोग बर्बाद हो चुके हैं। संसार की एक चौथाई आबादी घरों में लॉकडाउन है। लोग निराशा, डिप्रेशन, व्यग्रता आदि मानसिक स्थितियों से गुजर रहे हैं। घरेलू हिंसा, बच्चों में व्याकुलता और चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है। कुछ लोग लगातार अपने परिवार में साथ रहने की वजह से उकता गए हैं, दूसरी तरफ लाखों लोग अपनों के आसरे के लिए वापस गांवों की तरफ पैदल भाग रहे हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि करोड़ों लोगों के पास एकांत में रह सकने के लिए छोटी सी झोपड़ी तक नहीं है। देर-सवेर कोविड-19 के प्रकोप के बादल छंट जाएंगे, जैसे रात के बाद सवेरा होना तय है। परंतु अभी और बाद में मानवता के सामने जो चुनौतियां आएंगी, वे बहुत गंभीर हैं। मुझे दुनिया के करोड़ों मजदूरों, शरणार्थियों, युद्ध पीड़ितों और वंचित परिवारों की चिंता है। उनके बच्चे बाल मजदूरी, वेश्यावृत्ति, गुलामी, अशिक्षा, बीमारियां और हर तरह के शोषण के शिकार बनाए जा सकते हैं। हमें अभी से उनके बारे में संवेदनशील होना पड़ेगा, ताकि वे राजनीतिक और आर्थिक विमर्श से बाहर न रह जाएं। ऐसे में हमारे पास एक ही विकल्प है कि अंधेरे में धैर्य और मानसिक संतुलन खोने की बजाय एक छोटी सी मोमबत्ती जलाकर रोशनी की सच्चाई पर भरोसा बनाए रखें। दुनिया में लाखों नर्सें, डाॅक्टर व अन्य स्वास्थ्यकर्मी, पुलिस, सफाई कर्मचारी और जरूरी सेवाएं मुहैया कराने वाले ऐसी मोमबत्तियां नहीं तो और क्या हैं? आज कोरोना के अंधेरे को करुणा के उजाले में बदलने की जितनी जरूरत है, उतना ही उपयुक्त समय भी है। शायद पहली बार हर देश, मजहब, नस्ल और वर्ग के लोग एक साथ, एक वक्त में एक ही तरह के डर से ग्रसित हैं। मजबूरी में ही सही, यह शाश्वत सत्य फिर उजागर और महसूस हो रहा है कि हमारी समस्याएं और समाधान साझा हैं। इसलिए राष्ट्रों के बीच आपसी निर्भरता का भाव और सहयोग की जरूरत बढ़ी है। छोटे-छोटे प्रयासों से हम खुद में, परिवार में और समाज में करुणा का उजाला फैला सकते हैं। पहला, अपने बच्चों से दोस्ती करें। बात जरूर अटपटी है, लेकिन असलियत यही है कि ज्यादातर मां-बाप बच्चों से लाड़-प्यार तो करते हैं, लेकिन उनके दोस्त नहीं बन पाते। बच्चे स्कूल में छेड़खानी, बढ़ती उम्र के होने वाले शारीरिक-मानसिक बदलावों की परेशानियों, यहां तक कि यौन उत्पीड़न तक की घुटन को किसी से साझा नहीं कर पाते। माता-पिता से उनका रिश्ता एकतरफा होता है। अब आपके पास इतनी फुरसत है कि बच्चों के साथ बैठकर उनकी हर छोटी-छोटी बात रुचि और धैर्य से सुनकर उन्हें अपना दोस्त बनाएं। दूसरा, पति-पत्नी एक-दूसरे की कमियों पर छींटाकशी करने के बजाय खुद की कमजोरियों पर बातें करने का साहस जुटाएं और अपने साथी से मदद मांगें। एक-दूसरे की मजबूरियों, परेशानियों और तकलीफों को अपनी तकलीफ की तरह महसूस करके समाधान ढूंढने से करुणा जागेगी। घर में माता-पिता और दूसरे बुजुर्गों के पास बैठना विनम्रता और कृतज्ञता सिखाता है। कुछ देशों में जीवन की अंतिम घड़ियां गिन रहे ‘सफल’ कहे जाने वाले कई महानुभावों पर हुए अध्ययनों से पता चला कि उन्हें सबसे बड़ा अफसोस है कि वे अपनों के साथ ज्यादा वक्त नहीं गुजार पाए और किसी से दिल की बातें साझा नहीं कर सके, क्योंकि वे कॅरियर और दौलत बनाने में ही जुटे रहे। इसके विपरीत, पिछले 80 सालों से हार्वर्ड विश्वविद्यालय में ‘हार्वर्ड स्टडी ऑफ एडल्ट डेवलपमेंट’ नामक शोध से कई तथ्य निकल रहे हैं। तीन पीढ़ियों के इस अध्ययन से उद््घाटित हुआ कि जो लोग अपने माता-पिता, भाई-बहनों, जीवनसाथी, बच्चों और निकट के मित्रों के साथ ज्यादा वक्त गुजारकर खुशनुमा और दोस्ती के संबंध रखते हैं, वे न केवल लंबी उम्र जीते हैं, बल्कि हृदय रोगों, अल्जाइमर्स व पार्किंसन जैसी गंभीर बीमारियों से बचे रहते हैं।

सोशल मीडिया पर और फोन आदि वार्तालाप में सिर्फ प्रेरणास्पद और सकारात्मक घटनाओं का जिक्र करने के साथ ही कोरोना से बचने के उपायों की जागरूकता फैलाने से समाज में आशा का वातावरण बनेगा। अपने सहयोगियों, मातहतों, किराएदारों आदि की परेशानियों को अपनी परेशानी की तरह समझते हुए उनकी मदद करने से करुणा का दायरा बढ़ेगा। अगले कुछ हफ्ते पूरी मनुष्यता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हमारे नेता जो भी फैसले लेंगे, हम दूसरों के साथ जो भी बर्ताव या व्यवहार करेंगे और जैसा सामाजिक वातावरण बनाएंगे, वही वैश्विक राजनीति, आर्थिकी, स्वास्थ्य नीति आदि के अलावा भविष्य की सभ्यता, संस्कृति और नैतिकता का पुनर्निर्माण करेगा। उसी से निजता, मानवाधिकार, विकास आदि पुनर्परिभाषित होंगे। इसलिए यह आवश्यक है कि हम सामूहिक भय के अंधेरे में से वैश्विक करुणा का सूरज उगाएं, जो मानवता को सुरक्षित रखकर और भी उज्ज्वल बना सके। (यह लेखक के अपने विचार हैं।)

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