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भास्कर एनालिसिस:तालिबान ने इतनी तेजी से अफगानिस्तान में कैसे वर्चस्व जमा लिया? क्या अमेरिकी ट्रेनिंग वाली स्पेशल फोर्सेस पर भरोसा भारी पड़ा?

नई दिल्ली4 महीने पहलेलेखक: पूनम कौशल
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तालिबान ने बीते एक सप्ताह में अफगानिस्तान के 34 में से 19 प्रांतों पर कब्जा किया है और अब वह काबुल के बिलकुल नजदीक पहुंच गया है। तालिबान लड़ाकों की रफ्तार ने दुनियाभर के सुरक्षा विश्लेषकों को हैरान कर दिया है। तालिबान ने कई जिलों और शहरों पर बिना एक भी गोली चलाए कब्जा किया है। अमेरिकी लड़ाकू विमान अफगानिस्तानी सेना के समर्थन में हवाई हमले कर रहे हैं, लेकिन इसका बहुत असर नहीं हो रहा है।

इस समय कई प्रांतों और शहरों में भीषण लड़ाई चल रही है। तालिबान ने बल्ख की राजधानी और देश के तीसरे सबसे बड़े शहर मजार-ए-शरीफ को भी घेर लिया है और यहां भारी लड़ाई चल रही है। नॉर्थन अलाएंस का गढ़ मजार-ए-शरीफ तालिबान को टक्कर देता रहा है। काबुल घिर रहा है और दुनियाभर के देश अपने नागरिकों और राजनयिकों को बाहर निकाल रहे हैं। अमेरिका और ब्रिटेन ने अपने नागरिकों की सुरक्षा करने के लिए सैन्यबल भेजे हैं।

दैनिक भास्कर ने जिन तालिबान लड़ाकों से संपर्क किया है वे बहुत जोश में हैं। तालिबान लगातार आगे बढ़ने की तस्वीरें साझा कर रहा है। उसके लड़ाके अफगान सेना के भारी हथियारों पर कब्जा कर रहे हैं। तालिबान के एक लड़ाके ने भास्कर से कहा, ‘हमें खुद पर और अपनी ताकत पर विश्वास है। हमारे साथ अल्लाह की मदद है।’

शनिवार सुबह ही तालिबान ने बल्ख में भारत से अफगान सेना को मिले एक अटैक हेलीकॉप्टर को मार गिराने का दावा किया।

वहीं तालिबान की रफ्तार पर तालिबान प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने भास्कर से कहा, ‘हम जानते थे कि यदि शांति प्रक्रिया और वार्ता कामयाब नहीं होती है तो हम सैन्य रूप से ऐसी प्रगति कर सकते हैं। हमें अपनी ताकत पर पूरा भरोसा था।’

आखिर इतनी तेजी से कैसे आगे बढ़ रहा है तालिबान?
अब सवाल उठ रहा है कि तालिबान बिजली जैसी रफ्तार से कैसे आगे बढ़ रहा है? अफगान सेना इतनी जल्दी पस्त कैसे हो रही है? यही समझने के लिए हमनें अफगानिस्तान युद्ध पर लंबे समय से नजर रख रहे रक्षा विश्लेषकों से बात की।

कंधार और पश्चिम में हेरात प्रांत पर कब्जा जमाने के बाद तालिबानी अब काबुल के बेहद नजदीक पहुंच गए हैं।
कंधार और पश्चिम में हेरात प्रांत पर कब्जा जमाने के बाद तालिबानी अब काबुल के बेहद नजदीक पहुंच गए हैं।

फरान जैफरी कई सालों से अफगानिस्तान के युद्ध पर नजर रखे हुए हैं। वे ब्रिटेन स्थित आतंकवाद विरोधी संस्थान ITCT के डिप्टी डायरेक्टर हैं। पॉल डी मिलर अफगानिस्तान में रह चुके हैं। वे CIA और अमेरीका की सुरक्षा परिषद से भी जुड़े रहे हैं। अभी जॉर्जटाउन यूनीवर्सिटी के स्कूल ऑफ फॉरेन सर्विस में इंटरनेशनल अफेयर के प्रोफेसर हैं।

प्रोफेसर मिलर कहते हैं कि वे तालिबान की कामयाबी से हैरान नहीं है, लेकिन तालिबान की रफ्तार ने उन्हें चौंका दिया है। प्रोफेसर मिलर कहते हैं, 'मैं इस बात से बिलकुल भी हैरान नहीं हूं कि अमेरिका के अफगानिस्तान छोड़ने पर तालिबान युद्ध जीत रहा है, लेकिन तालिबान की गति ने मुझे हैरान कर दिया है। मुझे लगता है कि इसकी एक वजह ये है कि इस समय अफगान सेना के हौसले पस्त हैं।'

तालिबान की रफ्तार पर टिप्पणी करते हुए फरान जैफरी कहते हैं, 'तालिबान का इस रफ्तार से आगे बढ़ना कोई संयोग नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति का नतीजा है। तालिबानी चुपचाप जमीन पर अपना होमवर्क कर रहे थे। जो रिपोर्टें अब मिल रही हैं उनसे पता चलता है कि तालिबान के नेता अफगानिस्तान में कई राजनीतिक और सैन्य कमांडरों के संपर्क में थे।

जैफरी तालिाबन की रफ्तार के लिए काबुल प्रशासन की अक्षमता को जिम्मेदार बताते हुए कहते हैं, 'तालिबान जिस रफ्तार से आगे बढ़ा है उसने सुरक्षा विश्लेषकों को हैरान कर दिया है। मैं भी इससे हैरान हूं, लेकिन इतना नहीं जितने की दूसरे लोग हैरान हैं। मैं कई सालों से अफगानिस्तान में युद्ध पर नजर रख रहा हूं और एक बात जो मैंने सीखी है वह ये है कि काबुल की सरकार बहुत भ्रष्ट थी। सरकार को ये भी नहीं पता था कि काबुल के बाहर लोग क्या सोचते हैं? सरकार ने पिछले सालों के दौरान देशभर में स्थानीय नेताओं और मिलीशिया कमांडरों को निशाना बनाया और अब वे चाहते हैं कि यही तालिबान के खिलाफ लड़ाई में उनका साथ दें।'

जिस सेना को अमेरिका ने तैयार किया वह बिखर रही है

शनिवार की सुबह गजनी प्रांत में तालिबान ने अफगान सेना के दो और हेलीकॉप्टरों पर कब्जे का दावा किया है।
शनिवार की सुबह गजनी प्रांत में तालिबान ने अफगान सेना के दो और हेलीकॉप्टरों पर कब्जे का दावा किया है।

जैफरी कहते हैं, 'यदि ये रिपोर्ट्स सही हैं तो इसका मतलब यही है कि तालिबान लोकल मिलिट्री और राजनीतिक नेताओं को चुपचाप आत्मसमर्पण करने या मैदान छोड़ने के लिए मना रहा था। ये अभी स्पष्ट नहीं है कि अफगान सेना के बारे में इतनी गुप्त जानकारियां तालिबान को पहले से ही मिल गईं थीं, लेकिन ये तो पक्का है कि इस होमवर्क के बिना तालिबान इतनी तेजी से आगे नहीं बढ़ सकता था।'

वहीं प्रोफेसर मिलर का मानना है कि अफगान सेना के हौसले पस्त होने की वजह अमेरिका का रवैया है। प्रोफेसर मिलर कहते हैं, 'इसकी एक वजह ये भी है कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अमेरिका के अफगानिस्तान छोड़ने का एकतरफा फैसला लिया है। तालिबान ने कतर में 2020 में हुए समझौते की अपनी शर्ते पूरी नहीं की हैं, बावजूद इसके अमेरिका अफगानिस्तान से बाहर निकल रहा है। जब राष्ट्रपति बाइडेन ने अफग़ानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी का फैसला लिया तो उन्होंने अफगान लोगों को ये संदेश दिया कि आगे जो भी हो, अमेरिका तो छोड़कर जा रहा है। इससे अफगान सैनिकों को ये लगा कि उनके पास युद्ध लड़ने लायक संसाधन ही नहीं होंगे, ऐसे में वे इस नतीजे पर पहुंचे कि उनके पास लड़ने की कोई वजह ही नहीं है।'

अमेरिका 9/11 हमलों के बाद अल-कायदा को खत्म करने के लिए अफगानिस्तान आया था। तब अफगानिस्तान पर तालिबान का शासन था। अब 20 साल बाद अमेरिका अफगानिस्तान में स्थिरता और शांति लाने के अपने राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा किए बिना ही लौट रहा है। अभी अमेरिकी सेना पूरी तरह से अफगानिस्तान से गई भी नहीं है और जिस अफगान सेना को अमेरिका ने 20 सालों से तैयार किया था वह ताश के पत्तों की तरह बिखर रही है।

सिर्फ स्पेशल फोर्सेज के भरोसे रहना अफगान की बड़ी भूल

शनिवार सुबह तालिबान ने पक्तिया प्रांत की राजधानी शरना को भी कब्जे में ले लिया। इसके बाद तालिबान काबुल के काफी करीब पहुंच गया है।
शनिवार सुबह तालिबान ने पक्तिया प्रांत की राजधानी शरना को भी कब्जे में ले लिया। इसके बाद तालिबान काबुल के काफी करीब पहुंच गया है।

अमेरिका ने कुछ महीनों में ही तालिबान को सत्ता से हटा दिया था। बहुत से लोगों ने मान लिया था कि तालिबान अब खत्म हो जाएगा, लेकिन जैफरी कहते हैं कि ये आंकलन गलत था। वे कहते हैं, 'लोगों ने सालों पहले ही तालिबान को खत्म मान लिया था। यही सबसे बड़ी गलती थी। तालिबानी पूरी तरह अफगानिस्तान से कभी नहीं गए थे। जब अफगानिस्तान में नाटो और अमेरिकी सुरक्षा बल अपनी कामयाबी के शिखर पर थे, तब भी तालिबानी पूरी तरह खत्म नहीं हुए थे। हाल के सालों में तालिबान के फिर से उठ खड़े होने के कई कारण हैं। हलांकि, इसकी सबसे बड़ी वजह है कि अफगानिस्तान सरकार स्थानीय स्तर पर एक सक्षम सेना और पुलिस बल खड़ा करने में नाकाम रही।'

अमेरिका ने अफगानिस्तान सेना को खड़ा करने में अरबों डॉलर निवेश किए। उसे हथियार और प्रशिक्षण दिए, लेकिन अफगान सेना तालिबान के खिलाफ अब टिक नहीं पा रही है।

फरान जैफरी कहते हैं, 'अफगानिस्तान में कई जगह ऐसा होता रहा कि रेग्युलर आर्मी अपने ठिकाने बिना लड़े तालिबान को समर्पित करती रही। फिर सेना के स्पेशल फोर्सेज इन्हें तालिबान से मुक्त कराके रेग्युलर आर्मी को सौंपते और वे फिर से इन्हें गंवा देते। अफगानिस्तान के स्पेशल फोर्सेज देश में हर मोर्चे पर नहीं लड़ सकते थे। अफगान सरकार शहरों की सुरक्षा के लिए सिर्फ स्पेशल फोर्सेज पर ही निर्भर रही और ये भारी भूल साबित हो रही है।'

तालिबान के लड़ाकों ने कुंदूज में अफगानिस्तान के एक लड़ाकू विमान को कब्जे में लेने का दावा किया है।
तालिबान के लड़ाकों ने कुंदूज में अफगानिस्तान के एक लड़ाकू विमान को कब्जे में लेने का दावा किया है।

विश्लेषक मानते हैं कि अफगानिस्तान की सेना के पास हथियार और प्रशिक्षण तो था, लेकिन वह स्थानीय लोगों का भरोसा जीतने में नाकाम रही। फरान जैफरी कहते हैं, 'अफगान सेना की हार की एक और वजह ये है कि स्थानीय स्तर पर सेना का रिकॉर्ड बेहद खराब रहा है। कई सालों से अफगान सेना पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगते रहे हैं। स्थानीय लोगों के लिए सवाल ये था कि वे किसे ज्यादा नापसंद करते हैं। अफगान सरकार और उसके सुरक्षा बलों को, या तालिबान को। तालिबान ने हाल के सालों में स्थानीय स्तर पर कूटनीति का इस्तेमाल किया और लोगों को अपने साथ मिलाने की कोशिश की। यही वजह है कि बहुत से इलाके तालिबान ने एक भी गोली चलाए बिना ही कब्जा लिए।'

तालिबान ने बीते दो दिनों में कंधार और हेरात जैसे बड़े और अहम शहरों पर कब्जा किया है। उसके लड़ाके अब काबुल के बिलकुल नजदीक पहुंच गए हैं। अफगानिस्तान सरकार ने शुक्रवार को हुई सुरक्षा परिषद की बैठक में तालिबान का मुकाबला करने का फैसला किया है, लेकिन सवाल यही है कि काबुल कब तक तालिबान के सामने टिक पाएगा।

प्रोफेसर मिलर कहते हैं, ''मैं नहीं जानता कि काबुल कितने दिन तक मुकाबला कर पाएगा। अफगानिस्तान का भविष्य अंधेरे में है। या तो अफगानिस्तान एक लंबे गृहयुद्ध में घिर जाएगा या फिर वही 1990 के दौर का तालिबान का शासन लौट आएगा। तालिबान बिना लड़े ही कई शहरों को जीत रहे हैं इसकी वजह यही है कि अफगान सैनिकों के हौसले पस्त हैं। उन्हें लग रहा है कि वे बिना अमेरिकी समर्थन के युद्ध नहीं जीत पाएंगे।'

तालिबान इस समय काबुल पर हमला करने की स्थिति में हैं और अपनी स्थिति को और मजबूत कर रहे हैं। फरान जैफरी कहते हैं, 'यदि तालिबान और सरकार के बीच जल्द ही कोई समझौता नहीं हुआ तो तालिबानी काबुल पर कब्जा करने का प्रयास कर सकते हैं। तालिबान फिलहाल अशरफ गनी का इस्तीफा चाहता है, क्योंकि उन्होंने कभी भी केंद्रीय सरकार को मान्यता नहीं दी थी। वे चाहते हैं कि अंतरिम सरकार बने और वे उससे समझौता करके भविष्य की सरकार में बड़ा हिस्सा हासिल करें।

बिना अमेरिका की मदद से तालिबान से टक्कर लेना संभव नहीं

ये अफगानिस्तान के लोगार की तस्वीर है, जहां तालिबान ने जेल को तोड़कर अपने बंधक लड़ाकों को रिहा करा लिया है।
ये अफगानिस्तान के लोगार की तस्वीर है, जहां तालिबान ने जेल को तोड़कर अपने बंधक लड़ाकों को रिहा करा लिया है।

तालिबान की सबसे प्रमुख मांग है देश में शरिया कानून (इस्लामी कानून) लागू करना। काबुल के पास अब बहुत ज्यादा वक्त नहीं है, क्योंकि तालिबान ने पड़ोसी प्रांत लोगार पर कब्जा कर ही लिया है। वे चारों तरफ से काबुल को घेर रहे हैं। ऐसे में तालिबान अब कभी भी काबुल पर हमला कर सकते हैं।'

अनुमान के मुताबिक तालिबान के साथ करीब 70 हजार लड़ाके हैं और अफगान के सरकारी सेना की संख्या साढ़े तीन लाख से अधिक है। अफगान सेना के पास वायुसेना भी है और विदेशी सैन्यबलों की मदद भी। तालिबान के पास कोई वायुसेना नहीं है। अफगान सेना के मुकाबले उनके पास भारी हथियार भी कम थे। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अफगान सेना इतनी पस्त क्यों साबित हो रही है?

इसके कारण समझाते हुए फरान जैफरी कहते हैं, 'अफगान सुरक्षा बलों की एक और सबसे बड़ी समस्या ये है कि उनके पास इतने सैनिक नहीं है जितने कि कागजों में हैं। इन्हें घोस्ट सोल्जर कहा जाता है। अफगानिस्तान पर नजर रखने वाले सभी लोग इस बारे में जानते हैं। अफगानिस्तान अंतरराष्ट्रीय समुदाय से उस सेना के लिए फंड हासिल कर रहा था, जो जमीन पर उस संख्या में मौजूद ही नहीं थी। इसमें कोई शक नहीं है कि अमेरिका और नाटो की मदद के बिना काबुल बहुत दिन तक तालिबान से टक्कर से नहीं ले पाएगा।'

'मैंने कभी भी ये अनुमान नहीं लगाया था कि तालिबान इतनी तेजी से कब्जा करेंगे। मैंने सोचा था कि तालिबान को इस तरह की बढ़त हासिल करने में कुछ महीनों का वक्त तो लगेगा ही। मैं हमेशा से ही अफगान सरकार की कार्यक्षमता का आलोचक रहा हूं, लेकिन शायद मैंने भी उनकी क्षमता को वास्तविकता से अधिक आंका था। अब लग रहा है कि मेरा आंकलन गलत था। अब काबुल कभी भी गिर सकता है।'

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