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UP के मिनी पंजाब से ग्राउंड रिपोर्ट:यहां किसानों के पास बंगला तो है, लेकिन वे कर्ज में दबे हैं; ब्याज चुकाने में जमीनें तक बिक गई हैं, अब लोग बच्चों को विदेश कमाने भेज रहे हैं

लखीमपुर खीरी2 महीने पहले

लहलहाती फसलें, खेतों के बीच में बने बड़े मकान, आंखों को ठंडक देती हरियाली और दिल को सुकून देने वाली शांति। पहली नजर में ये इलाका जमीन पर जन्नत सा लगता है। उत्तर प्रदेश के पश्चिम में सहारनपुर के ऊपरी क्षेत्र से शुरू होकर पूर्व में कुशीनगर तक हिमालय के दक्षिण का ये दलदली इलाका तराई क्षेत्र कहलाता है। यहां रामगंगा, काली नदी और घाघरा समेत कई छोटी-बड़ी नदियां बहती हैं।

पहले यहां की जमीनें बंजर थीं और वन क्षेत्र था। 1940-50 के दशक में पंजाब से आए किसान यहां बसे, दिन-रात मेहनत की और खेती के लायक जमीन तैयार की। अब ये इलाका धान और गन्ने की उपज के लिए भारत ही नहीं बल्कि दुनियाभर में फेमस है। फिलहाल रामपुर, पीलीभीत और लखीमपुर खीरी के तराई क्षेत्र में सिखों की अच्छी-खासी आबादी है। पूरनपुर और पलिया जैसे क्षेत्र तो मिनी पंजाब की तरह हैं।

2020 में हरियाणा-पंजाब से शुरू हुए किसान आंदोलन का यहां अच्छा-खासा असर है। दिल्ली के गाजीपुर बॉर्डर पर अधिकतर प्रदर्शनकारी किसान इसी क्षेत्र से हैं। 3 अक्टूबर को लखीमपुर खीरी के नेपाल सीमा से सटे तिकुनिया कस्बे में हुई हिंसा में जो 8 लोग मारे गए, उनमें से 4 इसी क्षेत्र के सिख किसान हैं। इन्हीं में से एक थे 19 साल के लवप्रीत सिंह। लवप्रीत का परिवार निघानस क्षेत्र के चौखड़ा फार्म इलाके में रहता हैं, जो दुधवा नेशनल पार्क और नेपाल सीमा से सटा है।

19 साल के लवप्रीत की बहन और उनका परिवार। लवप्रीत अपने पिता के इकलौते बेटे थे, लखीमपुर हिंसा में उनकी जान चली गई।
19 साल के लवप्रीत की बहन और उनका परिवार। लवप्रीत अपने पिता के इकलौते बेटे थे, लखीमपुर हिंसा में उनकी जान चली गई।

लवप्रीत अपने पिता के इकलौते बेटे थे। उनका परिवार चौखड़ा फार्म क्षेत्र में दो एकड़ जमीन पर कृषि करता है। इसी खेत के बीच में उनका घर है जो अभी बन ही रहा है। लवप्रीत की बहन मनप्रीत कौर कहती हैं, 'उसने अभी 12वीं पास की थी। वह IELTS की तैयारी कर रहा था, विदेश जाकर नौकरी करना चाहता था, क्योंकि उसे लगता था कि खेती में भविष्य नहीं है।

मुश्किल में क्यों हैं किसान?

सुरेंद्र सिंह चौखड़ा फार्म में ही दो एकड़ जमीन पर खेती करते हैं, लेकिन उन्हें ये अंदाजा नहीं है कि सालभर में वे कितना कमा लेते हैं, क्योंकि खेती ऐसा पेशा है जिसमें आमदनी मौसम जैसे कई कारणों पर निर्भर है। वे कहते हैं, 'किसान की आमदनी किस्मत पर निर्भर है। कई बार तो लागत ही नहीं निकल पाती है। कई बार खड़ी फसल पानी में डूब जाती है। ये कहना मुश्किल है कि हम कितना कमाते हैं या कितना गंवाते हैं।

गन्ने के पेमेंट की उम्मीद में लोग खर्च चलाने के लिए कर्ज ले लेते हैं, लेकिन पेमेंट समय पर नहीं आ पाता। ऐसे में ब्याज देते-देते किसान कर्ज के बोझ तले दबता चला जाता है। यहां कोई परिवार ऐसा नहीं है, जो कर्ज में न हो, कर्ज का ब्याज उतारते-उतारते लोगों की जमीनें बिक गई हैं।

बड़ी जमीनें, बड़े मकान, फिर भी किसान परेशान

यहां के ज्यादातर किसानों के पास अच्छी-खासी जमीनें हैं, बड़े मकान भी हैं, लेकिन अंदर से उनके हालात उतने ही कमजोर हैं।
यहां के ज्यादातर किसानों के पास अच्छी-खासी जमीनें हैं, बड़े मकान भी हैं, लेकिन अंदर से उनके हालात उतने ही कमजोर हैं।

वीरेंद्र सिंह का बड़ा घर किसी बंगले-सा लगता है। बाहर खेती के काम वाली बड़ी-बड़ी मशीनें खड़ी हैं। ट्रैक्टर हैं, ट्रॉलियां हैं, दर्जनों भैंसे पल रही हैं। दूर से देखने पर वह एक संपन्न किसान लगते हैं, लेकिन बात करने पर उनका भी वही दर्द छलकता है जो बाकी किसानों का है। वे कहते हैं कि दूर के ढोल सुहावने लगते हैं, हमारा भी वही हाल है। सब समझते हैं कि हम संपन्न हैं, लेकिन हम ही जानते हैं कि हम किन हालात में गुजारा कर रहे हैं।

वीरेंद्र के दादा 1950 के दशक में पंजाब के तरनतारन जिले से चौखड़ा फार्म इलाके पहुंचे थे और यहां सस्ती दर पर बंजर जमीन खरीद कर खेती शुरू की थी। उन्होंने यहां कच्चा घर बनाया था। उनका परिवार करीब 30 एकड़ जमीन पर खेती करता है। वीरेंद्र बताते हैं कि यहां की सबसे बड़ी समस्या है गन्ने का पेमेंट, गन्ना डाले हुए एक साल हो गया है, लेकिन 2020 वाला पेमेंट अभी तक नहीं मिला है। फैक्ट्री 11 नवंबर 2020 को चली थी और 6 दिसंबर 2020 तक हमने जो गन्ना डाला, उसका पेमेंट ही हमें मिला। अप्रैल में फैक्ट्री बंद हुई थी, लेकिन तब से हम अपने पेमेंट का इंतजार ही कर रहे हैं। नाराजगी भरे लहजे में वे कहते हैं कि सरकार दावा करती है कि चौदह दिन में पेमेंट मिल जाएगा। हम किसानों को तो पेमेंट मिला नहीं, तो फिर पैसा किसके खाते में गया?

वीरेंद्र कहते हैं कि अब बिना पैसे के कोई काम नहीं होता, एक साल में ही डीजल का रेट 60 रुपए से बढ़कर 90 रुपए हो गया, लेकिन हमें हमारा पेमेंट ही नहीं मिलता, हम पैसा कहां से लाएंगे, जाहिर है जरूरतें पूरी करने के लिए कर्ज लेंगे। आज यहां हर परिवार कर्ज में है। जिसका जितना बड़ा घर है, उस पर उतना ही कर्ज है। मैं भी कर्ज में हूं।

धान का MSP 1940 रुपए, किसानों को मिल रहा आधा दाम

वीरेंद्र कहते हैं कि सरकार दावा करती है कि चौदह दिन में पेमेंट मिल जाएगा। हम किसानों को तो पेमेंट मिला नहीं, तो फिर पैसा किसके खाते में गया?
वीरेंद्र कहते हैं कि सरकार दावा करती है कि चौदह दिन में पेमेंट मिल जाएगा। हम किसानों को तो पेमेंट मिला नहीं, तो फिर पैसा किसके खाते में गया?

वीरेंद्र कहते हैं कि हमें ना हमारी फसल का दाम मिलता है और ना समय पर पेमेंट। किसी का वेतन चार दिन लेट हो जाए तो वह सोचता है कि घर कैसे चलाएगा, लेकिन किसान को साल-साल भर पेमेंट नहीं मिलता। जब फसल बेचते हैं तो आधा दाम भी नहीं मिल पाता। अभी धान का MSP 1940 रुपए है, लेकिन मंडी में किसान को बमुश्किल 1100 रुपए मिल पा रहे हैं। इस दाम पर तो हमारी लागत ही नहीं निकल पाएगी।

तराई के इस इलाके की दो और समस्याएं हैं। एक पानी और दूसरा जानवर। यहां अक्सर बाढ़ आती है और खड़ी फसलें पानी में डूब जाती हैं। इस बार भी बारिश होने की वजह से निचले इलाके पानी में डूबे हैं और वहां फसले बर्बाद हो चुकी हैं। यानी किसानों को उनकी लागत भी नहीं मिल पाएगी। आवारा गायों के अलावा हाथी भी यहां फसलें नष्ट करते हैं।

गांव छोड़कर कमाने विदेश जा रहे हैं युवा

लहलहाते खेतों के बीच सुरेंद्र पाल सिंह के परिवार के बड़े-बड़े बंगले हैं। एक घर के ऊपर विमान बना है। उन्होंने हाल ही में जो बड़ा बंगला बनवाया है उसकी छत पर उड़ता हुआ बाज बना है। सुरेंद्र कहते हैं, "ये घर देखकर लोगों को लगता है कि खेती में बहुत पैसा होगा। सच ये है कि ये घर विदेश की कमाई से बने हैं। विमान वाला घर मेरे भाई ने बनवाया था जो जर्मनी में रहता है। अब मैंने भी जर्मनी में रह रहे अपने दो बेटों की कमाई से बड़ा घर बनवाया है। मेरा सबसे छोटा भाई यहीं रहता है, वह ऐसा बड़ा घर नहीं बनवा पाया है।

सुरेंद्र पाल सिंह कहते हैं कि हमारा मकान बड़ा है, लेकिन यह खेती की कमाई से नहीं बना है। दो बेटे विदेश में रहते हैं, उन्हीं की कमाई से यह बना है।
सुरेंद्र पाल सिंह कहते हैं कि हमारा मकान बड़ा है, लेकिन यह खेती की कमाई से नहीं बना है। दो बेटे विदेश में रहते हैं, उन्हीं की कमाई से यह बना है।

सुरेंद्र के पिता पंजाब से आए थे और यहां खेती शुरू की थी। सुरेंद्र के परिवार के पास इस समय 30 एकड़ के करीब जमीन हैं। उनकी धान की फसल भी पकी खड़ी है, लेकिन वो कटवा नहीं रहे हैं। वे कहते हैं कि धान का दाम नहीं है और गन्ने का पेमेंट नहीं मिल रहा। सरकारी केंद्रों पर खरीद नहीं हो रही है। यदि दाम मिल रहा होता तो हमने फसल काटकर डाल दी होती।

उत्तर प्रदेश सरकार ने 4 साल बाद गन्ने के दाम 25 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ाए हैं और अब गन्ने का सरकारी दाम 350 रुपए क्विंटल हो गया है। किसानों में इस दाम बढ़ोतरी को लेकर ना खुशी है और ना ही आक्रोश है। एक किसान कहते हैं, 'चुनाव हैं तो सरकार ने कुछ रुपए बढ़ा दिए, अगर चुनावी साल ना होता तो शायद ये भी ना बढ़ते। सरकार वाकई किसानों के लिए कुछ करना चाहती है तो MSP पर खरीद और समय पर पेमेंट सुनिश्चित करे।

मजदूरों का हाल और भी बुरा

किसानों की हालत तो यहां खराब है ही, लेकिन उससे भी बुरा हाल यहां के मजदूरों का है। उनके पास न ढंग का काम है, ना आमदनी है, ना मकान है।
किसानों की हालत तो यहां खराब है ही, लेकिन उससे भी बुरा हाल यहां के मजदूरों का है। उनके पास न ढंग का काम है, ना आमदनी है, ना मकान है।

छोटेलाल नेपाल सीमा से सटे चंदन चौकी गांव से यहां खेतों में मजदूरी करने आए हैं। सुबह 8 बजे से लेकर शाम को 5 बजे तक मेहनत के बाद उन्हें सिर्फ 200 रुपए दिहाड़ी मिलती है। वे कहते हैं कि इतने में हमारा खर्च तो नहीं चल पाता है, लेकिन इधर-उधर से उधार लेकर काम चला लेते हैं। कोई काम है नहीं तो खाली रहने से अच्छा है यहीं खेतों पर मजदूरी करना। यहां अच्छी-खासी संख्या में मजदूर काम करते हैं जिनकी दिहाड़ी न्यूनतम वेतन से भी कम है। इनके विषय में ना कोई बात करता है और ना ही इनके मुद्दे उठाता है।

तमाम समस्याओं के बावजूद किसान कहीं ना कहीं अपनी जिंदगी में यहां खुश हैं। वीरेंद्र कहते हैं, यहां साफ हवा और पानी है। घर की खेती है। खाने-पीने का सभी सामान भी घर का ही होता है। शहर के मुकाबले यहां की जिंदगी बहुत अच्छी है। कोई शोर-शराबा नहीं है, कोई भागदौड़ नहीं हैं। यदि खेती से जुड़ी समस्याओं का समाधान हो जाए तो स्वर्ग सा दिखने वाला ये इलाका सही में स्वर्ग बन जाए।

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