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मणिपुर में आर्मी पर अटैक की साइट से रिपोर्ट:घने जंगल से मिनटों में पहुंच सकते हैं म्यांमार, सड़क पर गाड़ी मोड़ना तक मुश्किल

16 दिन पहले

बड़े-बड़े गड्‌ढो से भरी हुई 10 फीट चौड़ी सड़क। दोनों तरफ घना जंगल और महज 8 से 10 किमी की दूरी पर म्यांमार। ये हाल उसी सड़क का है, जहां 13 नवंबर को सुबह करीब 10.30 बजे 46 असम राइफल्स के कमांडिंग ऑफिसर विप्लव त्रिपाठी, उनकी पत्नी और बच्चे सहित 4 जवान उग्रवादियों के हमले में शहीद हो गए।

भास्कर की टीम मौके पर पहुंची तो पता चला कि सड़क के जिस हिस्से में असम राइफल्स के काफिले को निशाना बनाया गया, उससे चंद कदम दूर ही बड़े-बड़े गड्ढे हैं, जहां न चाहते हुए भी गाड़ी की स्पीड कम करना ही पड़ती है।

मणिपुर की राजधानी इंफाल से करीब 120 किमी दूर बेहियांग गांव है। जो म्यांमार बॉर्डर से सटा हुआ, भारत का आखिरी गांव है। विप्लव त्रिपाठी बेहियांग से ही लौट रहे थे, तब उनके काफिले पर बेहियांग और एस सेहकेन गांव के बीच वाली सड़क पर हमला हुआ।

इंफाल से करीब 120 किमी दूर बेहियांग गांव है। इसी गांव से लौटते वक्त कमांडिंग ऑफिसर विप्लव त्रिपाठी परिवार सहित हमले का शिकार हुए थे।
इंफाल से करीब 120 किमी दूर बेहियांग गांव है। इसी गांव से लौटते वक्त कमांडिंग ऑफिसर विप्लव त्रिपाठी परिवार सहित हमले का शिकार हुए थे।

हमले में जिन 5 से 6 आईईडी बम का इस्तेमाल किया गया था, उनके निशान अब तक मौजूद हैं। सड़क के किनारे जिन झाड़ियों में छुपकर उग्रवादियों ने फायरिंग की, वहां भी उनके होने के सबूत दिखते हैं। वो रास्ता भी दिखता है, जहां से उग्रवादी भाग गए और बताया जा रहा है कि म्यांमार चले गए क्योंकि म्यांमार की यहां से दूरी महज 8 से 10 किमी ही है।

गांव के लड़के ने सब दिखाया, लेकिन खौफ के चलते नाम नहीं बताया
शुक्रवार सुबह जब हम एस सेहकेन गांव पहुंचे तो वहां हर किसी ने उग्रवादियों के बारे में पूछने पर यही कहा कि, हम कुछ नहीं जानते। गांव का ही एक लड़का हमारे साथ उस जगह तक गया जहां हमला किया गया था, लेकिन उसने अपना नाम नहीं बताया। मौके पर 5 से 6 ऐसी जगहें दिखीं, जहां से आईईडी प्लांट किया गया था, क्योंकि यहां की घास काफी साफ हो चुकी थी।

यहां दूर दूर तक सड़क खराब ही नजर आती है। हालात ऐसे हैं कि अगर एक बार बारिश हो जाए तो महीनों तक कीचड़ जम जाता है।
यहां दूर दूर तक सड़क खराब ही नजर आती है। हालात ऐसे हैं कि अगर एक बार बारिश हो जाए तो महीनों तक कीचड़ जम जाता है।

सड़क के किनारे से जंगल में जाता हुआ रास्ता भी नजर आया। हमारे साथ गए लड़के ने बताया कि, जंगल में अंदर ही अंदर रास्ता बना है, जो म्यांमार पहुंचा देता है। अक्सर वहां के लोग भी इन्हीं रास्तों से भारत में एंट्री लेते हैं और किसी को खबर तक नहीं होती। यहां से भी लोग म्यांमार जाते हैं। कई सामान वहां भारत की बजाय वहां सस्ते मिलते हैं।

जवानों ने गांव में घुसने से रोक दिया, फिर अपना दर्द सुनाया
मौके का मुआयना करने के बाद हम बेहियांग गांव पहुंचे, लेकिन असम राइफल्स के जवानों ने गांव में अंदर घुसने नहीं दिया। बोले, इसके आगे आप नहीं जा सकते, क्योंकि यहां से बॉर्डर सिर्फ 3 से 4 किमी दूर है और वो एरिया बिल्कुल सुरक्षित नहीं है। जिन लोगों के यहां घर हैं, सिर्फ वही गांव में जा सकते हैं।

जवानों ने नाम न लिखने की शर्त पर बताया कि म्यांमार और मणिपुर के बीच 398 किमी की बाउंड्री है, लेकिन फेंसिंग महज 40 किमी में ही है। चारों तरफ से बॉर्डर खुली हुई है। घने जंगल भी है, ऐसे में कैसे उग्रवादियों को अंदर आने से रोकें। कहां-कहां नजर रखें?

सेना का जवान यहां पहरा देते हैं। सड़क और आसपास के हालात को देखकर पता चलता है कि उनकी ड्यूटी काफी चैलेंजिंग है।
सेना का जवान यहां पहरा देते हैं। सड़क और आसपास के हालात को देखकर पता चलता है कि उनकी ड्यूटी काफी चैलेंजिंग है।

बोले, हम बॉर्डर के पास बैठे हैं, लेकिन यहां न कनेक्टिविटी के लिए अच्छी सड़क है और नही दुरुस्त नेटवर्क। सड़क की हालत इतनी खराब है कि हमारी गाड़ियां आए दिन गड्‌ढों में फंस जाती हैं। एक बार भी पानी गिर जाए तो फिर महीनों तक कीचड़ जमा रहता है। ऐसे में उग्रवादियों को रोकना मुश्किल हो जाता है।

हम लोग रिमोट एरिया में रहते हैं, कोई हमें नहीं देखता…

सेना के जवानों के जरिए हमारी मुलाकात बेहियांग गांव की मुखिया एम जुबली से हुई। हमले के बारे में पूछने पर वे बोलीं कि गोलियों की आवाज सुनकर हम लोगों ने पुलिस को फोन किया था। बाद में आर्मी वालों को भी बताया। ब्लास्ट होने के बाद कुछ भी समझ नहीं आ रहा था।

उग्रवादियों के बारे में पूछने पर बोलीं, हमें इस बारे में कुछ भी नहीं पता। हमने पूछा कि गांव में म्यांमार से घुसपैठ तो होती है? तो बोलीं, कोरोना के बाद से ऐसा नहीं है। हां यदि सीरियस केस होता है तब कुछ लोग म्यांमार के अस्पताल जाते हैं, क्योंकि खराब सड़क होने के कारण हमे गांव से चुराचांदपुर पहुंचने में तीन से चार घंटे लग जाते हैं। विधायक-मंत्री सब आते हैं लेकिन सड़क कोई नहीं बनाता। वे लोग खुद देखकर गए, फिर भी नहीं बना रहे।

बेहियांग गांव की मुखिया एम जुबली से जब हमने हमले को लेकर पूछा तो उन्होंने कुछ भी बताने से इनकार कर दिया।
बेहियांग गांव की मुखिया एम जुबली से जब हमने हमले को लेकर पूछा तो उन्होंने कुछ भी बताने से इनकार कर दिया।

मिलिटेंट एक्टिविटी के यह एरिया डेंजर जोन

इस पूरे मामले में हमने BSF में एडिशनल डीजी के पद से रिटायर हुए और चुराचांदपुर में ड्यूटी कर चुके संजीव कृष्ण सूद से बातचीत की। उन्होंने बताया कि मिलिटेंट एक्टिविटी के चलते यह एरिया सालों से खतरनाक है। यहां कच्ची सड़क है। सैनिक आइसोलेशन में रहते हैं। नेटवर्क खराब है। राशन सप्लाई में भी दिक्कतें होती हैं। ऐसे में जवानों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

इस बार हमले की जिम्मेदारी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी और मणिपुर नागा पीपुल्स फ्रंट ने ली है। जबकि पीएलए ने पहले कभी इस एरिया में कोई ऑपरेशन नहीं किए। ऐसे में इस हमले में चीन का हाथ होने से इंकार नहीं किया जा सकता।

पीएलए नागा के साथ मिलकर ऑपरेशन कर रहा है, मतलब पुराने रिश्ते कायम हो रहे हैं। वे नागालैंड की डिमांड सालों से करते रहे हैं। हो सकता है कि वे मणिपुर चुनाव के पहले अपनी प्रेजेंस दिखाना चाहते हों इसलिए उन्होंने ये हमला किया हो।