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भास्कर इनसाइड स्टोरी:अशरफ गनी सरकार और सेना को लगातार कमजोर कर रहे थे, एक साल में तालिबान का विरोध करने वाले 6 कोर कमांडरों को जबरन हटाया

नई दिल्ली4 महीने पहलेलेखक: संध्या द्विवेदी
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अफगानिस्तान में तालिबानी एक के बाद एक प्रांत बिना ज्यादा मशक्कत के जीत रहे थे। उधर, सेना के कमांडर हथियार रख रहे थे। आखिर किसके कहने पर सेना ने हथियार डाले? किसी को कानों कान भनक तक नहीं हुई और देश के राष्ट्रपति अशरफ गनी भाग खड़े हुए हुए। इसको लेकर वहां की जनता ही नहीं, वहां के राष्ट्रपति भवन, एंटी तालिबान लीडरशिप के अलावा पूरी दुनिया के लोगों के मन में सवाल उठ रहे हैं।

क्या वहां के पूर्व राष्ट्रपति इस साजिश का हिस्सा थे? प्रेसिडेंट हाउस के सूत्रों के मुताबिक पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी के राइट हैंड समझे जाने वाले वाइस प्रेसिडेंट अमरूल्लाह सालेह को भी न तो सेना के हथियार डालने और न ही गनी के भागने की कोई भनक थी।

JNU में साउथ एशियन स्टडीज डिपार्टमेंट में प्रोफेसर संजय कुमार भारद्वाज कहते हैं, 'दो बातें तो साफ हैं, अशरफ गनी कई सालों से तालिबान से नेगोशिएशन कर रहे थे। दूसरी बात उन्हें अफगानिस्तान से निकलने का सेफ पैसेज तालिबानियों ने मुहैया करवाया।'

साथ ही, भारद्वाज इसका दूसरा पक्ष भी रखते हैं। वे कहते हैं, 'अमेरिकी फौज के वहां से निकलने के बाद गनी यह समझ चुके थे कि सत्ता ट्रांसफर करनी ही पड़ेगी।'

गनी अगर रुकते तो भी पावर ट्रांसफर को 1-2 महीने के लिए ही रोक सकते थे, लेकिन तब यह बहुत खून खराबे का दौर होता है। लिहाजा फौज के सरेंडर करने का आदेश सरकार की तरफ से आया या फिर फौज ने खुद यह निर्णय लिया, इस पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता।

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी तालिबान के काबुल पर कब्जा करने के पहले ही देश छोड़कर भाग गए। खबर है कि वे दुबई में हैं।
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी तालिबान के काबुल पर कब्जा करने के पहले ही देश छोड़कर भाग गए। खबर है कि वे दुबई में हैं।

उधर, रक्षा मामलों के जानकार उदय भास्कर कहते हैं, 'अशरफ गनी जिस तरह से भागे, उन्होंने अफगानिस्तान की जनता को धोखा दिया। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन वे डर की वजह से भागे या फिर सब कुछ पूर्व नियोजित था, यह स्पष्ट तौर पर नहीं कहा जा सकता।'

बात कुछ भी हो, लेकिन अब वहां की लीडरशिप और गनी के करीबी लोग अशरफ गनी पर कायर होने के साथ ही साजिश रचने का आरोप भी अंदरखाने लगाने लगे हैं। हालांकि, अभी लोग खुलकर गनी को साजिश का हिस्सा नहीं बताना चाहते, लेकिन नाम न बताने की शर्त पर वहां की लीडरशिप से जुड़े सूत्र इस 'साजिश की कहानी' की सभी कड़ियां जोड़कर बताते हैं।

पूर्व राष्ट्रपति के मंसूबे पर अब खड़े हुए सवाल

गनी सरकार में रहे एक आधिकारिक सूत्र के मुताबिक, 'पिछले करीब एक साल से गनी लगातार अपनी ही सरकार की इंटीरियर मिनिस्ट्री (लॉ) और डिफेंस मिनिस्ट्री को अस्थिर कर रहे थे। फोर्स में कुछ कमांडर्स को जबरन रिटायर किया जा रहा था, तो कुछ के तबादले दूसरे विभागों में किए जा रहे थे। इन सबके प्रमाण भी मौजूद हैं। अगर सारे प्रमाणों की क्रोनोलॉजी तैयार करें तो जो तस्वीर बनेगी, वह किसी पूर्व नियोजित 'साजिश' की ही होगी।'

'खूंखार तालिबान ने अशरफ गनी को इतनी बड़ी रकम के साथ आसानी से सुरक्षित जाने दिया! क्या यह गनी और तालिबान के बीच हुई पूर्व नियोजित डील को दर्शाने के लिए काफी नहीं है?' सूत्र तो यह भी कहते हैं कि गनी ने अपने अधिकारियों और दोनों वाइस प्रेसिडेंट समेत पूरे मंत्रिमंडल को अंधेरे में रखा। अगर सत्ता को शांतिपूर्वक ट्रांसफर करने का भी फैसला लिया जाना था तो इसकी चर्चा सरकार के भीतर पूरी कैबिनेट और जिम्मेदार अधिकारियों के साथ क्यों नहीं हुई?

जिस दिन गनी अफगानिस्तान से भागे, उस दिन प्रेसिडेंट हाउस में क्या हुआ था?

प्रेसिडेंट हाउस के आधिकारिक सूत्र के मुताबिक, 'रविवार के दिन राष्ट्रपति भवन के सभी अधिकारी, कर्मचारी और नेता वहां इकट्ठा थे। रणनीतिक तौर पर बातचीत चल रही थी कि कैसे तालिबानियों के खिलाफ मोर्चा लिया जाए? तभी फोर्स के कुछ लोग आए और हमें वहां से हटने के लिए कहा गया। हम सब वहां से निकल गए। तालिबानियों के सामने इस तरह से घुटने टेकने का प्लान बिल्कुल भी नहीं था। फिर अचानक हमें खबर मिली कि अशरफ गनी देश छोड़कर भाग गए हैं। हम सब हक्के-बक्के थे। इसके लिए कोई भी तैयार नहीं था, क्योंकि इससे पहले अशरफ गनी ने एक बार भी तालिबानियों के खिलाफ जंग न लड़ने का संकेत नहीं दिया था। गनी देश छोड़कर भागेंगे, इसकी भनक वहां के वाइस प्रेसिडेंट अमरुल्लाह सालेह, सेकेंड वाइस प्रेसिडेंट अब्दुल्ला अब्दुल्ला को भी नहीं थी। जबकि अमरुल्लाह तो राइट हैंड माने जाते थे।'

वे कहते हैं, 'अशरफ गनी ने अपने लोगों को धोखा दिया। अमरुल्लाह के बेहद करीबी सूत्रों के मुताबिक सेना के कमांडर ने सेना के जवानों को हथियार रखने और जंग न लड़ने के आदेश देने शुरू कर दिए थे। फौज के जवानों का गुस्सा बढ़ रहा था, क्योंकि वे इस तरह से हथियार नहीं रखना चाहते थे, लेकिन उन्हें मजबूर किया गया। उनकी राशन और हथियार की सप्लाई रोक दी गई थी।'

एक साल से सेना के कमांडर्स का करा रहे थे तबादला

राष्ट्रपति भवन के सूत्र के मुताबिक, 'अमेरिका द्वारा सेना हटाए जाने और तालिबान के आक्रामक होने के बीच ही अशरफ गनी लगातार मिलिट्री लीडर्स को बदल रहे थे।' वे कुछ उदाहरण दैनिक भास्कर से साझा करते हैं। वे कहते हैं- जैसे जून में ही नियुक्त हुए अफगान आर्मी चीफ लेफ्टिनेंट जनरल वली मोहम्मद अहमदजई को अफगान नेशनल आर्मी के स्पेशल ऑपरेशन्स कमांड मेजर जनरल हबीबुल्लाह अलिजाई से एक महीने के भीतर ही रिप्लेस कर दिया गया। इसी दरम्यान दो बार इंटीरियर मिनिस्टर्स को भी बदला गया। दोनों एक्टिंग मिनिस्टर ही थे, लेकिन परमानेंट मिनिस्टर क्यों नहीं दिया गया? दो एक्टिंग मिनिस्टर क्यों बदले गए?

तस्वीर काबुल एयरपोर्ट की है। लोग तालिबानियों के खौफ की वजह से देश छोड़कर जाने पर मजबूर हैं।
तस्वीर काबुल एयरपोर्ट की है। लोग तालिबानियों के खौफ की वजह से देश छोड़कर जाने पर मजबूर हैं।

इस मिनिस्ट्री की जिम्मेदारी देश में 'लॉ इन्फोर्समेंट' और 'सिविल ऑर्डर' बरकरार रखने और अफगान नेशनल पुलिस, अफगान पब्लिक प्रोटेक्टर फोर्स को भी मेंटेन करने की होती है। जब देश की सुरक्षा व्यवस्था खतरे में हो, ऐसे में देश का कोई भी जिम्मेदार मुखिया इतनी महत्वपूर्ण मिनिस्ट्री को अस्थिर नहीं करना चाहेगा। यही हाल डिफेंस मिनिस्ट्री के अधिकारियों का था।'

दरअसल, राष्ट्रपति भवन को भी समझ नहीं आ रहा था कि आखिर इतनी जल्दी-जल्दी मिनिस्टर को क्यों बदले जा रहे हैं। करीब 7 महीनों में तीन इंटीरियर मिनिस्टर रहे। 23 दिसंबर 2018 से 19 जनवरी 2019 तक अमरुल्लाह सालेह गनी सरकार में इंटीरियर मिनिस्टर रहे।

6 कोर कमांडर रिशफल किए गए

फिर सालेह ने इलेक्शन टीम और वाइस प्रेसिडेंट के तौर पर पद संभालने के लिए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उसके बाद से 15 अगस्त तक इस मिनिस्ट्री को स्थाई मिनिस्टर नहीं मिल पाया। 19 जनवरी, 2019 से 19 मार्च, 2021 तक मसूद अंद्राबी और 19 मार्च, 2021 से 19 जून, 2021 तक एक्टिंग मिनिस्टर रहे हयातुल्लाह हयात इंटीरियर मिनिस्टर रहे । 19 जून, 2021 से 15 अगस्त, 2021 तक अब्दुल सत्तार मीर कव्वाल इस विभाग में बतौर मिनिस्टर रहे। साथ ही इस दरम्यान 6 कोर कमांडर भी रिशफल किए गए।

वे कहते हैं- करीब एक डेढ़ साल से जो वहां चल रहा था, उसको लेकर लोगों के भीतर संशय तो था, लेकिन गनी के इस तरह से सुरक्षित भागने की घटना ने इस शंका को और भी पुष्ट कर दिया। अब बची हुई अफगानिस्तान की लीडरशिप बिल्कुल भी अंधेरे में नहीं है।

सूत्र के मुताबिक, अभी वहां की लीडरशिप इस मसले पर खुलकर बोलने की जगह तालिबानियों से मोर्चा लेने पर पूरा ध्यान केंद्रित रखना चाहती है। वे अपना ध्यान गनी पर नहीं, बल्कि तालिबान को शिकस्त देने पर लगाना चाहते हैं।

ये तस्वीर काबुल के एक चेकपोस्ट पर बैठे तालिबानी लड़ाकों की है। 15 अगस्त को तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया था।
ये तस्वीर काबुल के एक चेकपोस्ट पर बैठे तालिबानी लड़ाकों की है। 15 अगस्त को तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया था।

खबरें आईं कि गनी चार गाड़ी भरकर रकम ले जा रहे थे। यह सब गनी के खिलाफ जनता में आक्रोश और अविश्वास भरेगा, लेकिन इसका दूसरा पक्ष उनका अतीत में तालिबानियों द्वारा पूर्व के राष्ट्रपति मो. नजीबुल्लाह की क्रूरता पूर्वक हत्या की वजह से पनपा डर भी हो सकता है। मो. नजीबुल्लाह अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति थे। अफगानिस्तान से 1989 में सोवियत संघ की सेना के हटने के बाद तालिबानियों ने आतंक मचाना शुरू कर दिया।

तालिबानियों का खौफ इतना था कि तत्कालीन राष्ट्रपति मो. नजीबुल्लाह के देश छोड़कर भागने के प्रयास को भी कामयाब नहीं होने दिया गया। 1992-1996 तक नजीबुल्लाह संयुक्त राष्ट्र के एक कैंप में रहे, लेकिन 1996 में उन्हें उस कैंप से घसीटकर तालिबानियों ने बाहर निकाला और पीट-पीटकर मार डाला। उनकी लाश को काबुल की सड़कों पर गाड़ी के पीछे बांधकर कई घंटे तक घसीटा गया। उसके बाद उनके बचे-खुचे शरीर को काबुल की आरियाना चौक के एक लैंप पोस्ट पर लटका दिया गया। उनकी लाश कई दिनों तक वहां लटकी रही और सड़-सड़कर उसके हिस्से गिरते रहे।

हालांकि अब अशरफ गनी का बयान आया है कि वे भगोड़े नहीं। अगर वे देश नहीं छोड़ते तो बहुत खून खराबा होता। उन्होंने यह भी कहा कि वे पैसा लेकर नहीं भागे हैं। उन्हें सुरक्षा बलों ने फौरन बाहर निकलने को कहा, उन्हें जूते पहनने का भी वक्त नहीं मिला। एक्सपर्ट फिलहाल उनके भगोड़ा होने पर एकमत हैं।

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