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एक्सपर्ट एनालिसिस:चीन दक्षिण सागर में अपना दायरा बढ़ा रहा है, अगर लक्षद्वीप के लोगों की नाराजगी दूर नहीं हुई तो वह इसका फायदा उठाकर सेंधमारी कर सकता है

नई दिल्ली10 दिन पहलेलेखक: पूनम कौशल
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केरल के कोच्चि से करीब 400 किलोमीटर दूर अरब महासागर में बिखरे लक्षद्वीप में इन दिनों प्रदर्शन हो रहे हैं। यहां के प्रशासक प्रफुल्ल पटेल का लोग विरोध कर रहे हैं। खासकर बीफ पर बैन लगाने, शराब से रोक हटाने और नई डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाने से यहां के लोगों में सबसे ज्यादा नाराजगी है। भारत सरकार इसे मालदीव की तरह टूरिज्म सेंटर के रूप में डेवलप करना चाहती है। इसको लेकर वो बदलाव का तर्क दे रही है।

लेकिन इसको लेकर सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स की क्या राय है? चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए लक्षद्वीप का सामरिक महत्व क्या है? क्या सरकार को यहां के लोगों की नाराजगी का ख्याल रखना चाहिए? ऐसे तमाम सवालों को लेकर हमने पूर्व वाइस एडमिरल बीएस रंधावा और डिफेंस एक्सपर्ट उदय भास्कर से बातचीत की।

भारत के लिए लक्षद्वीप इतना महत्वपूर्ण क्यों हैं?

लक्षद्वीप में 12 एटोल हैं, तीन रीफ हैं और 5 डूबे हुए द्वीप हैं। ये हिंद महासागर के विशाल डूबे हुए चागोस-लक्कादीव पहाड़ी का हिस्सा है। बड़े-बड़े जहाज और पूर्वी एशिया की तरफ जाने वाले तेल के टैंकर यहीं से होकर गुजरते हैं। कोच्चि में स्थित इंडियन नेवी की वेस्टर्न नेवल कमांड यहां से गुजरने वाले सभी कार्गो पर नजर रखती है।

पूर्व वाइस एडमिरल बीएस रंधावा कहते हैं, 'केवल लक्षद्वीप आइलैंड ही नहीं, बल्कि सामान्य तौर पर सभी आईलैंड सिक्योरिटी के लिहाज से बहुत अहम होते हैं, क्योंकि ये समुद्र में बिखरे होते हैं। इन्हें खुफिया ऑपरेशन के लिए अड्डे के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही शिपिंग पर नजर रखने, दुश्मनों के जहाजों को रोकने के लिए, पायरेसी को रोकने के लिए भी ये बेहद अहम होते हैं।'

लक्षद्वीप के प्रशासक प्रफुल्ल पटेल के नए आदेशों के खिलाफ यहां के लोग पिछले कुछ दिनों से लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं।
लक्षद्वीप के प्रशासक प्रफुल्ल पटेल के नए आदेशों के खिलाफ यहां के लोग पिछले कुछ दिनों से लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं।

रंधावा कहते हैं, 'इंडियन ओशन (हिंद महासागर) की शिपिंग भी लक्षद्वीप से होकर गुजरती है। युद्ध या आपात स्थिति में इस शिपिंग पर नजर रखने, इसे रोकने या इसके बारे में इंटेलिजेंस इकट्ठा करने के लिए ये आइलैंड बहुत जरूरी हैं। बिना किसी खास तैयारी के भारत यहां अपनी इंटेलिजेंस गैदरिंग कैपेसिटी डेवलप कर सकता है। लक्षद्वीप में इंडियन नेवी के अड्डे को दीप रक्षक भी कहा जाता है। इसका इस्तेमाल भी मैरीटाइम इंटेलिजेंस गैदरिंग के लिए किया जा सकता है।'

सिक्योरिटी और स्ट्रैटजिक दोनों नजरियों से बेहद अहम है लक्षद्वीप

डिफेंस एक्सपर्ट उदय भास्कर मानते हैं कि भारत ने अभी लक्षद्वीप की पूरी क्षमता का इस्तेमाल नहीं किया है। वे कहते हैं, 'लक्षद्वीप भारतीय नौसेना के लिए उसी तरह अहम है जैसे बंगाल की खाड़ी में अंडमान और निकोबार आइलैंड। अरब महासागर में अपनी स्थिति की वजह से लक्षद्वीप भारत को एक खास स्ट्रैटजिक भौगोलिक बढ़त देता है। भारत इसका कैसे इस्तेमाल करता है, ये भारत की स्ट्रैटजिक भूगोल को समझने की काबिलियत पर निर्भर करता है। कई कारणों की वजह से भारत अभी तक अपने इन द्वीपों की पूरी क्षमता का इस्तेमाल नहीं कर सका है।'

चीन को टक्कर देने में काम आएंगे ये द्वीप

हाल के वर्षों में चीन ने हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर में अपना प्रभाव बढ़ाया है। चीन अपनी नेवी को लगातार बड़ा कर रहा है। उदय भास्कर कहते हैं, 'चीन दक्षिण चीन सागर और हिंद महासागर में अपने द्वीप हासिल कर रहा है। वह कई द्वीपों में अहम राजनीतिक और कूटनीतिक निवेश कर रहा है। उदाहरण के तौर पर चीन ने मालदीव में बड़ा निवेश किया है। ऐसे में चीन को काउंटर करने के लिए भारत के लिए ये द्वीपसमूह और भी अहम हो जाते हैं।

उदय भास्कर कहते हैं, 'दूसरे देशों के पास भी महासागरों में अपने द्वीप हैं। अमेरिका ने हिंद महासागर में स्थित डिएगो गार्शिया द्वीप को ब्रिटेन से हासिल किया है। फ्रांस के पास भी अपने द्वीप हैं। नेवी के लिए द्वीपों की अपनी अहमियत होती है। चीन दक्षिण सागर में कृत्रिम द्वीप बना रहा है, क्योंकि चीन ने महसूस किया है कि आइलैंड के अपने कई स्ट्रैटजिक और सिक्योरिटी फायदे होते हैं। हम ये तो नहीं कहेंगे कि भारत को चीन के ही नक्शेकदम पर चलना चाहिए, लेकिन भारत को अपने पास उपलब्ध द्वीपों का पूरा इस्तेमाल जरूर करना चाहिए।'

अमेरिका, चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए भारत के साथ हाथ मिला रहा है। इसका एक कारण ये भी है कि भारत के पास हिंद महासागर में अहम द्वीप समूह हैं जो चीन की बढ़ती नौसेना को रोकने में काम आ सकते हैं। ये द्वीप महासागर में भारत के शक्ति प्रदर्शन का अहम थिएटर भी साबित हो सकते हैं।

इकोनॉमी के लिए भी जरूरी हैं ये आइलैंड

32 वर्ग किलोमीटर के ये द्वीप समूह अरब महासागर में भारत को करीब बीस हजार वर्ग किलोमीटर का स्पेशल इकोनॉमिक जोन देते हैं। यहां भारत अंडर वाटर मिनरल एक्सप्लोरेशन के अलावा मछलियां भी पकड़ता है।

एडमिरल रंधावा कहते हैं, 'जहां तक सामरिक महत्व का सवाल है, आइलैंड देश को बहुत बड़ा स्पेशल इकोनॉमिक जोन देते हैं। आइलैंड चाहे छोटे हैं, लेकिन उनके सराउंडिंग वाटर का एरिया काफी ज्यादा होता है। इसकी वजह से हमारा मैरीटाइम इकोनॉमिक जोन काफी बढ़ जाता है। ये फिशिरी के लिए बेहद अहम होते हैं। अंडर वाटर मिनरल्स की तलाश के लिए भी ये महत्वपूर्ण हैं।'

क्या भारत को लक्षद्वीप के लोगों की नाराजगी मोल लेनी चाहिए?

एडमिरल रंधावा कहते हैं, 'इस सवाल का जवाब सिर्फ लक्षद्वीप के लिहाज से नहीं देना चाहिए। हमारी राष्ट्रीय नीति ऐसी होनी चाहिए कि देश के किसी भी हिस्से में सरकार की नीतियों का कोई विरोध नहीं होना चाहिए। जो समझदार सरकार होती है, वो असंतुष्ट पक्षों से बात करती है और उनके असंतोष के कारणों को समझकर असंतोष को कम करने के लिए कदम उठाती है।'

वहीं उदय भास्कर कहते हैं, 'ऐसी नीतियां लागू नहीं करनी चाहिए, जो स्थानीय आबादी में असंतोष को जन्म दे। लक्षद्वीप में कभी भी असंतोष नहीं देखा गया है। ऐसे में यदि वहां के लोगों में कोई नाराजगी है तो उसकी जायज वजहें होंगी। भारत को इन वजहों को समझना चाहिए।'

रंधावा कहते हैं, 'लक्षद्वीप की अधिकतर आबादी मुसलमान हैं, लेकिन वहां कभी भी भारत के खिलाफ भावना नहीं देखी गई है। ऐसे में भारत सरकार के लिए ये जरूरी हो जाता है कि वो लक्षद्वीप के रिप्रजेंटेटिव्स और लोगों से बात करे। उनके विरोध की वजह को समझे। सरकार को इस असंतोष को खत्म करने के लिए प्रयास करने चाहिए।'

क्या लोगों की नाराजगी भारत के लिए चिंता की बात है?

एडमिरल रंधावा मानते हैं कि ये भारत के लिए चिंता की बात है। वे कहते हैं, 'लक्षद्वीप में अधिकतर लोग मुसलमान हैं जो भारत में अल्पसंख्यक हैं। लक्षद्वीप समुद्र में भारत से काफी दूर है। यहां भारत के खिलाफ काम करने वाली ताकतें लोगों को लुभाने का प्रयास कर सकती हैं। बाहरी ताकतें विवाद को सांप्रदायिक रूप देकर भारत के खिलाफ भावनाएं भड़काने का प्रयास कर सकती हैं। ऐसे में भारत को और अधिक सावधान रहने की जरूरत है।'

एडमिनिस्ट्रेशन का तर्क है कि नए कदम लक्षद्वीप के विकास के लिए उठाए गए हैं। उदय भास्कर मानते हैं कि भारत के पास स्रोतों की कमी है और इस वजह से भारत ना ही अंडमान और निकोबार और ना ही लक्षद्वीप की पूरी क्षमता को डेवलप कर पाया है। वो कहते हैं कि लक्षद्वीप को डेवलप किया जाना भारत की सिक्योरिटी के लिहाज से जरूरी है। वहीं लक्षद्वीप के स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां डेवलपमेंट प्रोजेक्ट लाने से इकोलॉजी बर्बाद हो सकती है।

उदय भास्कर कहते हैं, 'मुझे लगता है कि पर्यावरण की सुरक्षा और सामरिक महत्व के विकास में संतुलन बनाया जा सकता है। सिर्फ पर्यावरण के नाम पर भी विकास को नहीं रोकना चाहिए। संतुलित विकास होना चाहिए जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थानीय लोगों की जरूरतों, दोनों का ध्यान रखा जाए। लक्षद्वीप में अभी भारत की जरूरत ऐसा ही संतुलित विकास करने की है।'

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