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आज की पॉजिटिव खबर:दिल्ली की दिव्या ने 4 दोस्तों के साथ तीन महीने पहले ऑनलाइन स्टार्टअप शुरू किया, अब हर महीने एक लाख रु. का बिजनेस

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: इंद्रभूषण मिश्र
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दिव्या राजपूत, पूजा अरोड़ा, सुरभि सिन्हा, आस्था और क्रिस्टीना ग्रोवर, ये पांचों मिलकर ऑनलाइन स्टार्टअप चला रही हैं। - Dainik Bhaskar
दिव्या राजपूत, पूजा अरोड़ा, सुरभि सिन्हा, आस्था और क्रिस्टीना ग्रोवर, ये पांचों मिलकर ऑनलाइन स्टार्टअप चला रही हैं।

दिल्ली की रहने वाली दिव्या राजपूत ने 20 साल से ज्यादा काम एजुकेशन सेक्टर में किया है। वे मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स में भी काम कर चुकी हैं। अभी दिव्या अपने चार दोस्तों के साथ मिलकर एक इको फ्रैंडली स्टार्टअप चला रही हैं। जहां वे रोजमर्रा की जरूरत की लगभग हर चीजें ऑनलाइन बेच रही हैं। अभी तीन महीने पहले ही इन लोगों ने अपना ऑनलाइन प्लेटफॉर्म लॉन्च किया है। हर महीने करीब 200 ऑर्डर आ रहे हैं और एक लाख रुपए तक का बिजनेस हो रहा है। इसके साथ ही दिव्या के साथ डायरेक्ट और इनडायरेक्ट रूप से 200 से ज्यादा महिलाएं जुड़कर खुद की जीविका चला रही हैं।

43 साल की दिव्या बताती हैं कि मेरी दोस्त काकुल रिजवी जो एक मार्केटिंग प्रोफेशनल थीं, कैंसर की शिकार हो गईं। डॉक्टर ने हमें ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्स इस्तेमाल करने की सलाह दी। उस दौरान हमें महसूस हुआ कि अभी भी देश में ऐसे प्लेटफॉर्म की संख्या कम है जो किफायती रेंज में ऑर्गेनिक प्रोडक्ट बेचते हों। तब हमने प्लान किया कि क्यों न खुद का एक प्लेटफॉर्म तैयार करें, जहां रोजमर्रा की जरूरत की हर चीज ऑर्गेनिक फॉर्म में मिल सके। इसके बाद मैंने जॉब छोड़ दी और काकुल इको नाम से अपना स्टार्टअप लॉन्च किया।

काकुल टीम के साथ 200 से ज्यादा महिलाएं जुड़कर खुद की जीविका चला रही हैं।
काकुल टीम के साथ 200 से ज्यादा महिलाएं जुड़कर खुद की जीविका चला रही हैं।

इस बीच दिव्या को एक बड़ा झटका लगा। स्टार्टअप लॉन्चिंग के कुछ दिनों बाद ही काकुल रिजवी की मौत हो गई, जिसके बाद दिव्या पूरी तरह अकेली पड़ गईं। उन्हें लगा कि अब आगे का सफर मुश्किल होगा, लेकिन फिर उन्होंने खुद को संभाला और काम जारी रखा। थोड़े दिनों बाद पूजा अरोड़ा, सुरभि सिन्हा, आस्था और क्रिस्टीना ग्रोवर भी उनसे जुड़ गईं। इस तरह कारवां बढ़ता गया।

दिव्या बताती हैं कि शुरुआत में हम लोग अलग-अलग जगहों पर एग्जीबिशन लगाकर अपने प्रोडक्ट बेचते थे, लेकिन लॉकडाउन में बाहर निकलना बंद हो गया। तब हमने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर फोकस किया और एक वेबसाइट लॉन्च की। अब हम लोग सोशल मीडिया के भी सभी प्लेटफॉर्म पर एक्टिव हैं। लोग वहां से ऑर्डर कर सकते हैं। इसके साथ ही हमने सब्सक्रिप्शन कैम्पेन भी लॉन्च किया है। हम जब भी कोई नया प्रोडक्ट लॉन्च करते हैं, लोगों के पास ऑटोमेटिक नोटिफिकेशन चला जाता है।

कैसे तैयार करती हैं प्रोडक्ट्स?

दिव्या और उनकी टीम कुछ प्रोडक्ट खुद तैयार करती हैं तो कुछ वे असम, मेघालय जैसे राज्यों के लोकल कारीगरों से भी लेते हैं।
दिव्या और उनकी टीम कुछ प्रोडक्ट खुद तैयार करती हैं तो कुछ वे असम, मेघालय जैसे राज्यों के लोकल कारीगरों से भी लेते हैं।

दिव्या बताती हैं कि हमारी टीम किसी भी प्रोडक्ट को बनाने के पहले बहुत रिसर्च करती है। जब हम श्योर हो जाते हैं कि यह प्रोडक्ट इको फ्रैंडली है तो फिर प्रॉसेस शुरू करते हैं। वे कहती हैं कि हमारे पास 20 से 25 महिलाओं की टीम है। कुछ प्रोडक्ट हम खुद तैयार करते हैं तो कुछ बाहर से मंगाते हैं। हमारी टीम ने असम, हिमाचल, मेघालय सहित कई राज्यों के लोकल कारीगरों और किसानों से टाईअप किया है। वे अपना उत्पाद तैयार कर ऑर्डर के हिसाब से हमारी कंपनी को भेजते हैं। जैसे हम हल्दी पाउडर मेघालय से मंगाते हैं, क्योंकि वहां की हल्दी स्वास्थ्य के लिए ज्यादा बेहतर और इम्यून बूस्टर होती हैं। इसी तरह हम लोग नगालैंड, मणिपुर, राजस्थान जैसे राज्यों से भी अपने प्रोडक्ट मंगाते हैं।

क्या-क्या प्रोडक्ट तैयार करती हैं?

दिव्या की टीम करीब 100 तरह के उत्पाद अभी तैयार कर रही है। इनमें स्टेशनरी के सामान, एग्री वेस्ट मग, जूट और कैनवास बैग, हर्बल इम्यूनिटी बूस्टर, हल्दी, हैंडमेड क्राफ्ट, वेलनेस प्रोडक्ट्स शामिल हैं। इसके साथ ही जरूरत और त्योहार के हिसाब से भी कई प्रोडक्ट तैयार किए जाते हैं। इन सभी प्रोडक्ट की पैकेजिंग में बायोडिग्रेडेबल चीजों का यूज किया जाता है।

दिव्या की टीम करीब 100 तरह के उत्पाद अभी तैयार कर रही है। इनमें रोजमर्रा की जरूरत वाली स्टेशनरी से लेकर वेलनेस प्रोडक्ट्स तक शामिल हैं।
दिव्या की टीम करीब 100 तरह के उत्पाद अभी तैयार कर रही है। इनमें रोजमर्रा की जरूरत वाली स्टेशनरी से लेकर वेलनेस प्रोडक्ट्स तक शामिल हैं।

दिव्या बताती हैं कि आने वाले दिनों में हम और भी नए प्रोडक्ट लॉन्च करने वाले हैं। हमारी कोशिश है कि छोटे-छोटे जगहों पर जो कारीगर प्रोडक्ट तैयार करते हैं, उनको बड़े मार्केट में जगह मिले। लोग उनकी चीजों को खरीदें। अभी भी देश में छोटे कारीगरों को बेहतर सामान बनाने के बाद भी मार्केट में जगह बनाने के लिए जूझना पड़ता है। उन्हें सही दाम नहीं मिल पाता है। कई लोगों के तो सामान ही नहीं बिकते हैं। इसलिए हमारा पूरा फोकस है कि उन कारीगरों के काम को मार्केट में जगह दिलाऊं।

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