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आसाराम के खिलाफ बोली तो रेप की धमकी मिली:एयर होस्टेस की जॉब छोड़ी, निर्भया के इंसाफ के लिए जंग लड़ी

16 दिन पहलेलेखक: योगिता भयाना

जब देश के किसी कोने में 4 साल, 6 साल की बच्ची के साथ रेप की घटना को सुनती हूं, तो दिल बैठ जाता है। कई रात सो नहीं पाती हूं। ज्यादातर पीड़िताएं गरीब परिवार से होती हैं। उनके माता-पिता जब मदद की गुहार लेकर हमारे पास आते हैं, तो उनके आंसू में हमारे भी आंसू मिल जाते हैं।

मुझे आज भी एक घटना याद है। एम्स दिल्ली में 4 साल की रेप पीड़िता से मिलने गई थी। जिस बेड पर वो एडमिट थी, वहां कोई नहीं था। मैं करीब 4 घंटे तक उसके पास बैठी रही। शाम हुई, तो उसकी मां आई।

मैंने उस महिला से पूछा, 'आपको पता है कि आपकी बच्ची के साथ रेप हुआ है।' उस महिला ने तपाक से अपनी भूख की पीड़ा को बयां करते हुए जवाब दिया, 'मेरे और भी बच्चे हैं। नहीं कमाऊंगी, तो खाऊंगी क्या?' दरअसल, वो कूड़ा बीनने वाली महिला थी।

मैं एंटी रेप एक्टिविस्ट योगिता भयाना, दिल्ली की रहने वाली हूं। ऐसी झकझोर देने वाले दर्जनों केस हर रोज हमारे पास आते हैं। मैंने ही 2012 में दिल्ली के निर्भया गैंग रेप के खिलाफ हुए प्रोटेस्ट को लीड किया था। निर्भया के दरिंदों को फांसी के फंदे तक पहुंचाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी।

निर्भया गैंग रेप के बाद ही मैंने PARI (पीपल अगेंस्ट रेप्स इन इंडिया) नाम से NGO की शुरुआत की।
निर्भया गैंग रेप के बाद ही मैंने PARI (पीपल अगेंस्ट रेप्स इन इंडिया) नाम से NGO की शुरुआत की।

12 साल पहले एयर होस्टेस की नौकरी छोड़ी, तब से रेप पीड़िताओं को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष कर रही हूं। देश में कहीं भी कोई रेप पीड़िता मदद की गुहार लगाती है, तो हम संस्था के जरिए कानूनी और आर्थिक सहायता करते हैं। हमारी यही कोशिश रहती है कि उनकी लड़ाई का हिस्सा बनें।

लेकिन ये सब मेरे लिए आसान नहीं रहा। बचपन से सामाजिक कामों में मन तो लगता था, लेकिन घरवाले इसके खिलाफ थे। जब 10वीं में गई, तो अपने घर के बाहर एक पेड़ के नीचे पड़ोस के गरीब बच्चों को फ्री में पढ़ाने लगी।

2002 में दिल्ली के मिरांडा हाउस से ग्रेजुएशन करने के बाद एक एयरलाइंस कंपनी में एयर होस्टेस की जॉब लग गई, लेकिन घरवालों को जॉब को लेकर भी ऐतराज था। दरअसल, मेरी फैमिली बिजनेस बैकग्राउंड से है, वहां महिलाओं को जॉब करने की मनाही थी।

पहले तो जॉब करने से रोका, लेकिन जब 2007 में एविएशन इंडस्ट्री की जॉब छोड़कर फुल टाइम सोशल वर्क करना शुरू किया, तो भी परिवार वालों ने इसका जमकर विरोध किया। उन्होंने कहना शुरू किया, 'कौन सेटल्ड जॉब छोड़कर सोशल वर्क करता है? इसमें ना पैसा है और ना ही बेहतर लाइफ।' लेकिन मैं अपने फैसले पर अड़ी रही।

मेरे जॉब छोड़ने के बाद मम्मी-पापा लंबे वक्त तक नाराज रहे। उनका कहना था कि अच्छी जॉब नहीं करोगी, तो शादी के लिए अच्छा लड़का नहीं मिलेगा। सोसाइटी ने हम महिलाओं को सेल्फ डिपेंडेंट होना कभी सिखाया ही नहीं। हालांकि, अब धीरे-धीरे बदलाव आ रहे हैं।

पहले मैं एयर होस्टेस थी, फिर मैनेजर और सीनियर मैनेजर की पोस्ट पर रही।
पहले मैं एयर होस्टेस थी, फिर मैनेजर और सीनियर मैनेजर की पोस्ट पर रही।

2002 से 2007 तक एविएशन इंडस्ट्री में काम करने के दौरान भी पार्ट टाइम सोशल वर्क करती थी। मुझे नई जॉब में प्रमोशन भी मिलने वाला था, लेकिन मैं जानती थी कि प्रमोशन मिलने के बाद जॉब नहीं छोड़ पाऊंगी। जॉब छोड़ना भी मेरे लिए आसान नहीं था, लेकिन एक घटना ने अंदर तक झकझोर दिया।

ये साल 2007 की ही बात है। बिहार के एक व्यक्ति का दिल्ली में रोड एक्सीडेंट हो गया था। मैं उसे नजदीकी गवर्नमेंट हॉस्पिटल ले कर गई। उससे पहले कभी गवर्नमेंट हॉस्पिटल नहीं गई थी। वहां देखा, तो ना कोई अटेंडेंट है और ना ही डॉक्टर। स्ट्रेचर तक की सुविधा नहीं थी। मैं भी खून से लथपथ थी। लंबे इंतजार के बाद एक डॉक्टर ने उस व्यक्ति को एडमिट किया। दुर्भाग्य से वो नहीं बच सका।

इसी के बाद मैं पूरी तरह से सोशल वर्क में जुट गई। ग्रेजुएशन के 7 साल बाद डिजास्टर मैनेजमेंट में डिप्लोमा किया और फिर ‘दास चैरिटेबल फाउंडेशन’ की स्थापना की। इसके जरिए एक्सीडेंट विक्टिम्स​​​​​ तक एंबुलेंस पहुंचाना, हेल्थ सेक्टर में काम करने लगी।

ये करीब 5 साल तक चलता रहा। 2012 निर्भया गैंग रेप के बाद जब पूरा देश सिहर उठा, तो मैंने भी रेप पीड़िताओं की आवाज बनने की ठानी।

मेरे साथ निर्भया की मां आशा देवी और पिता हैं। ये उस वक्त की तस्वीर है, जब हम निर्भया के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ रहे थे।
मेरे साथ निर्भया की मां आशा देवी और पिता हैं। ये उस वक्त की तस्वीर है, जब हम निर्भया के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ रहे थे।

जस्टिस वर्मा की कमेटी को यौन अपराधों से संबंधित आपराधिक कानूनों में जरूरी संशोधन के लिए कई बड़े सुझाव दिए, जिसके बाद कानून में बदलाव किए गए। इस कमेटी ने 2013 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी।

हम करीब एक दशक से सेक्सुअल वायलेंस और रेप पीड़िताओं को न्याय दिलाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। हमारे साथ लॉयर, साइकोलॉजिस्ट सभी जुड़े हुए हैं।

20 मार्च 2020 को निर्भया के दरिंदे को फांसी हुई, लेकिन समाज में इससे जो डर की भावना पैदा होनी चाहिए थी, वो नहीं हो पाई। क्योंकि, इसके 4 दिन बाद ही कोरोना की वजह से पूरे देश में लॉकडाउन लग गया और एक अलग माहौल बन गया।

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने हम सभी को हताहत कर दिया। कोर्ट ने छावला गैंग रेप मामले में फांसी की सजा पाए तीनों आरोपियों को बरी कर दिया। पुलिस की गलती की वजह से कोर्ट ने ये फैसला सुनाया। हालांकि, हम फिर से रिव्यू पिटीशन दायर करने जा रहे हैं। दिल्ली के राज्यपाल ने इसकी मंजूरी दे दी है।

सोसाइटी में महिलाओं की स्थिति सच में खराब है। इसमें फिल्म इंडस्ट्री का बड़ा हाथ है। बॉलीवुड सॉग्स में महिलाओं को एक वस्तु की तरह परोसा जाता है, जोकि रेप कल्चर को बढ़ावा दे रहा है। हालांकि, अब कुछ अच्छी फिल्में भी बन रही हैं, लेकिन उनकी संख्या नाममात्र की है।

मुझे भी हर रोज रेप और मर्डर की दर्जनों धमकियां आती हैं। आसाराम, राम रहीम जैसे कथित गॉडमैन के खिलाफ बोलती हूं, तो इन धमकियों की बाढ़ आ जाती है। मानहानि से लेकर गिरफ्तारी की तलवार लटकती रहती है, लेकिन मुझे कोई डर नहीं।

हालियां आकड़ों के मुताबिक रेप के मामलों में जिस तरह का उछाल आया हैं, वो चिंता की बात है। रेप पीड़िताओं को न्याय न मिलना या मिलना भी तो दशकों बाद, ये न्यायपालिका के सामने चुनौती है। दरअसल, फास्ट ट्रैक के बावजूद कोर्ट में रेप केस प्रायोरिटी में नहीं है। हमें सोचने की जरूरत है कि कानून बनाने से नहीं, लागू करने से बदलाव होगा।

ये सारी बातें योगिता भयाना ने दैनिक भास्कर के नीरज झा से शेयर की हैं

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