ब्लैकबोर्डबेटी डोली चढ़ने वाली थी, उसकी अर्थी उठानी पड़ी:25 साल से मूवी नहीं देखी, सिनेमा का नाम सुनते ही कांप जाती हूं

नई दिल्ली9 दिन पहलेलेखक: दीप्ति मिश्रा

बच्चों की जिद पर मैंने मूवी की दो टिकट बुक की थी, मुझे नहीं पता था उनकी मौत का टिकट खरीद रही हूं। 25 साल गुजर गए, उस दिन के बाद कभी मूवी नहीं देखी। मूवी का नाम सुनते ही दोनों बच्चों का चेहरा आंखों में तैरने लगता है। कैसे मैंने उनके गालों को चूमते हुए कहा था- जल्दी आना।

इतना कहते-कहते दिल्ली की रहने वालीं नीलम कृष्णमूर्ति मुठ्ठी भींचने लगती हैं, फिर खुद को संभालकर आंसू पोंछते हुए कहती हैं- आज बेटी 42 साल और बेटा 38 साल का होता। भरा-पूरा परिवार होता। हम दादा-दादी और नाना-नानी होते।

अपने बच्चों की तस्वीरें दिखाती हुईं नीलम।
अपने बच्चों की तस्वीरें दिखाती हुईं नीलम।

13 जून, 1997 को दिल्ली के उपहार सिनेमा में आग लगी। जिसमें 59 लोगों की जान चली गई। नीलम कृष्णमूर्ति के दो बच्चे भी उसमें शामिल थे। अब इस पर एक वेब सीरीज आई है-'ट्रायल बाय फायर।' जिसके बाद उस अग्निकांड में अपनों को खोने वालों के जख्म फिर से हरे हो गए हैं। आज ब्लैकबोर्ड सीरीज में उन्हीं परिवारों की कहानी…

मैं देश की राजधानी दिल्ली से सटे शहर नोएडा पहुंची, यहां मेरी मुलाकात नीलम कृष्णमूर्ति से होती है। वे अपने पति के साथ रहती हैं। घर में अजीब सा सन्नाटा है। उन्होंने बच्चों के कमरे को ठीक वैसे ही सजाया है, जैसा उस दिन था। बेड पर बेटे की कैप वैसे ही रखी है, जैसे 25 साल पहले वह छोड़कर गया था। बेटी की वह साड़ी भी सहेज रखी है, जो उसने पहली बार पहनी थी। नीलम बाहरी लोगों को इस कमरे में नहीं आने देती हैं।

नीलम की बेटी उन्नति और बेटे उज्ज्वल की तस्वीर।
नीलम की बेटी उन्नति और बेटे उज्ज्वल की तस्वीर।

नीलम बताती हैं, ‘गर्मियों की छुट्टियां चल रही थीं। बेटी को फिल्में देखने का बहुत शौक था। वह फर्स्ट डे, फर्स्ट शो देखती थी। उस दिन सिनेमा घरों में बॉर्डर मूवी लगी थी। हमारा प्लान था कि सब एक साथ मूवी देखेंगे, लेकिन हम ऑफिस के काम में उलझ गए। बेटी बोली कि उसे आज ही मूवी देखनी है।

मैंने दोनों बच्चों के लिए टिकट बुक कर दिए। घर से जाते वक्त उसने मेरा गाल चूमा और कहा था- मम्मा, मैं आपके साथ दोबारा मूवी देख लूंगी। पीछे से बेटे ने कहा- मम्मा मैं भी। बस यही उनके आखिरी शब्द थे। उस वक्त उन्नति 17 साल और उज्ज्वल 13 साल का था।’

आपको खबर कब और कैसे मिली?

नीलम लंबी सांसें लेती हैं, फिर जवाब देती हैं- ऑफिस से शाम 7 बजे घर पर कॉल किया, पता चला बच्चे नहीं लौटे हैं। मुझे लगा कोई बात नहीं थोड़ी देर से लौट आएंगे। इसके बाद अपने काम में लग गई। करीब 9 बजे मैंने घर पर फोन किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।

अब मन में डर लगने लगा था कि बच्चों के साथ कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हो गई। इसके पहले वे जब भी कहीं जाते थे, वक्त पर लौट आते थे। मैं भगवान से दुआ कर रही थी कि बच्चे जहां भी हों, सुरक्षित हों। मैंने उपहार सिनेमा में फोन भी किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।

इसी बीच उन्नति की एक दोस्त का फोन आया। उसके फिल्म देखने के शौक से सभी दोस्त वाकिफ थे। उसने पूछा- आंटी, उन्नति कहां है? मैंने बताया कि वो तो फिल्म देखने गई है उपहार सिनेमा। तब उसने बताया आंटी, वहां तो आग लग गई है।

इतना सुनते ही हम फौरन उपहार सिनेमा के लिए निकल गए। वहां पहुंचे तो देखा चारों ओर हहाकार मचा था। लोग अपने घरवालों को ढूंढने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे। पुलिस ने बैरिकेडिंग कर दी थी। हम लाख कोशिश के बाद भी बैरिकेडिंग के उस पार नहीं जा सके। इसी बीच किसी ने कहा कि अस्पताल जाकर ढूंढिए।

वहां से हम AIIMS पहुंचे। अस्पताल में भी अफरा-तफरी का माहौल था। थोड़ा आगे बढ़ी तो देखा लाशों का ढेर लगा है। उसी में मेरे दोनों बच्चे भी थे। ऐसे लग रहा था बस सो गए हैं। कहीं से जलने का कोई निशान नहीं था।’

नीलम कुछ देर खामोश रहती हैं। फिर कहती हैं, ‘मेरे बच्चों की जान, आग से नहीं, धुएं में दम घुटने से हुई थी। वे मरे नहीं थे, उन्हें मारा गया था। 13 दिन तक FIR दर्ज नहीं की गई। सरकार ने पीड़ितों को सांत्वना देने वाले दो शब्द नहीं कहे। ​अंसल परिवार ने न गलती मानी और न माफी मांगी। 26 साल गुजर गए, उनके इंसाफ के लिए लड़ रही हूं, हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट हर जगह।

हर सुबह ये सवाल परेशान करता है कि आखिर कातिलों को अब तक सजा क्यों नहीं मिली?'

मैंने पूछा- जिस वक्त आपके बच्चों के साथ हादसा हुआ, उस वक्त आपकी उम्र 34-35 रही होगी, आपने दोबारा बच्चा पैदा करने या फिर अडॉप्ट करने के बारे में क्यों नहीं सोचा?

जवाब मिलता है- ''हमने अपने बच्चे खोए थे। हमारे बच्चे कोई खिलौना नहीं थे, जो टूट गया तो दूसरा ले आओ। वे हमारी जान थे, दुनिया थे, उनको भूलकर किसी और को कैसे ला सकते हैं।''

यहां से मैं दिल्ली के अलकनंदा कॉलोनी में बने अरावली अपार्टमेंट में पहुंची। उपहार सिनेमा में अपने 20 साल के बेटे गंवाने वाले IIT, दिल्ली से रिटायर्ड मोहन लाल सहगल और उनकी पत्नी उषा सहगल यहां रहती हैं।

80 की दहलीज पर कदम रख चुके मोहन लाल को अब कानों से थोड़ा कम सुनाई देता है। बेटे की मौत के बाद से उषा अक्सर बीमार रहती हैं। मोहन लाल पहले फोन पर बात करने की गुजारिश करते हैं, फिर कुछ सोचकर घर में बुला लेते हैं।

मोहन लाल अपनी पत्नी उषा के साथ। वे अपने बच्चे विक्की की फोटो दिखाते हुए कहते हैं, 'मेरा बेटा जिंदा होता तो सेना में ऑफिसर होता।'
मोहन लाल अपनी पत्नी उषा के साथ। वे अपने बच्चे विक्की की फोटो दिखाते हुए कहते हैं, 'मेरा बेटा जिंदा होता तो सेना में ऑफिसर होता।'

मोहन लाल कहते हैं- ‘मेरा बेटा विक्की ग्रेजुएशन कर चुका था। उसे अपने बाबा की तरह लेफ्टिनेंट बनना था। उस दिन वह CDS का फॉर्म जमा करने गया था। मैंने उसे 200 रुपए दिए थे कि कुछ खा-पी लेना। उसे कार चलाने का बहुत शौक था। एक हफ्ते पहले ही उसे मारुति 800 दिलाई थी।

शाम को मैं IIT से घर लौट रहा था। रास्ते में बहुत जाम मिला। पूछने पर पता चला उपहार सिनेमा में आग लग गई है। तब तक जरा भी अंदाजा नहीं था कि आग की चिंगारी हमारा चिराग खाक कर दी है।

घर पहुंचा और आदतन पूछा विक्की कहां है? छोटे बेटे ने बताया कि भइया अपने दोस्त के साथ उपहार सिनेमा में मूवी देखने गए हैं। फौरन उसे ढूढ़ने निकल गया। वहां भीड़ बहुत ज्यादा थी। लोगों ने हमें अंदर जाने ही नहीं दिया। इसके बाद हम अस्पताल के लिए निकल गए। अस्पताल पहुंचा तो देखा एक कोने में विक्की की लाश पड़ी थी। मैं कांपने लगा। ऐसा लगा चक्कर खाकर गिर जाऊंगा।’

बात करते हुए अचानक मोहनलाल खामोश हो जाते हैं। धीरे-धीरे बोलने लगते हैं। वे नहीं चाहते कि उनकी आवाज पत्नी तक पहुंचे। तब तक उनकी पत्नी भी आ जाती हैं। वे सोफे पर बैठ जाती हैं। पूछती हैं- आप वेब सीरीज वाली फिल्म देखने के बाद आई हैं? मैं जवाब में सिर हिलाकर हां कहती हूं।

इस तस्वीर को देखिए कैसे कंधे पर उठाकर लोग बच्चों की डेड बॉडी ले जा रहे हैं।
इस तस्वीर को देखिए कैसे कंधे पर उठाकर लोग बच्चों की डेड बॉडी ले जा रहे हैं।

उषा कहती हैं, ‘फिल्म देखने के बाद जख्म ताजा हो गया है। लगता है बेटा कहीं चला गया है, अभी लौट आएगा। उसकी डेड बॉडी रखी थी तो लग रहा था जैसे सो रहा है, अभी उठ जाएगा।’

मोहन लाल कहते हैं, 'बेटे को खोने के बाद कुछ दिनों तक सदमे में रहा। बीवी डिप्रेशन में चली गईं। छोटा बेटा पूरी तरह डिस्टर्ब हो गया। 3 साल तक पढ़ने नहीं गया। फिर समझा-बुझाकर उसकी आगे की पढ़ाई करवाई।'

मोहनलाल को रोकते हुए उषा कहती हैं, 'आज हमारा विक्की शायद आर्मी में ऑफिसर होता। उसका देश में नाम होता। उसकी फैमिली होती, बच्चे होते। जब से बेटा गया, तब से ना कुछ बनाने का मन करता है, ना खाने का। बस जीना सीख गए हैं। पहले कोई पूछता तो रोना आ जाता था, मुंह से शब्द निकलते ही नहीं थे।’

इसी बीच मोहन लाल बेटे की तस्वीर उठाकर लाते हैं। कहते हैं- 'देखिए, ऐसे ही मुस्कुराता रहता था। सबका लाडला था। बहुत समझदार था। उसने कुछ प्रतियोगी परीक्षाओं के एग्जाम दिए थे, जिनके रिजल्ट और CDS के एग्जाम का ए​डमिट कार्ड उसके मरने के बाद आया।'

फिर दोनों पति-पत्नी शांत हो जाते हैं।आसपास खामोशी पसर जाती है। एक आंसू लुढ़कर उषा के गाल पर ढुलक जाता है। मैं उन्हें चुप कराना चाहती हूं, लेकिन हिम्मत नहीं होती है। थोड़ी देर चुपचाप बैठे रहने के बाद चली आती हूं।

इसके बाद में दिल्ली के आनंद निकेतन पहुंची। यहां कारोबारी नवीन साहनी से मिली। नवीन साहनी ने अपनी इकलौती बेटी तारिका को उपहार अग्निकांड में खोया है।

नवीन कहते हैं, ‘बेटी 21 साल की हो चुकी थी। इंजीनियरिंग कर रही थी। एक NRI लड़के से उसका रिश्ता तय कर दिया था। शादी की तैयारियां कर रहे थे।’

अपनी बेटी की तस्वीर दिखाते हुए नवीन।
अपनी बेटी की तस्वीर दिखाते हुए नवीन।

नवीन कहते हैं, ‘मैं एक आइसक्रीम कंपनी में काम करता था। उपहार सिनेमा में ज्यादातर लोग मुझे जानते थे। तारिका ने मेरा नाम लेकर मैनेजर से टिकट ली थी। फिर कॉल कर बताया था- पापा, मैं पिक्चर देखने जा रही हूं। मैंने कहा कि रात में बात हुई थी कि हम साथ जाएंगे। फिर तुम अकेली क्यों जा रही हो? बोली- मैंने टिकट ले ली है, पापा मैं जा रही हूं।

शाम का वक्त था। मैं घर से बाहर था। एक दोस्त ने बताया कि उपहार में आग लग गई है। मैंने घर पर फोन किया और कहा कि पता करो तारिका कहां हैं, कैसी है। इसके बाद मां, भाभी और पत्नी सफदरजंग और बेटा एम्स के लिए निकले। कुछ देर बाद बेटे ने कॉल किया- पापा, तारिका नहीं रही।’

नवीन बताते हैं, ‘बेटी के जाते ही परिवार में खालीपन आ गया। एक साल के भीतर मां चल बसीं। पत्नी की तबीयत खराब रहने लगी। 8 साल डायलिसिस पर रहने के बाद उसकी भी मौत हो गई। बेटा-बहू और पोता है, लेकिन अब रौनक नहीं रही घर में।'

59 लोग मरे, इनमें 23 बच्चे थे

आग लगने से उपहार सिनेमा पूरी तरह जल गया था।
आग लगने से उपहार सिनेमा पूरी तरह जल गया था।

साउथ दिल्ली के उपहार सिनेमा में 13 जून 1997 को फिल्म 'बॉर्डर' की स्क्रीनिंग चल रही थी। शाम करीब पौने पांच बजे सिनेमा हॉल के ग्राउंड फ्लोर पर लगे एक ट्रांसफार्मर में आग लगी। फिर आग ने पूरे हॉल को अपनी चपेट में ले लिया।

जो लोग भागने में कामयाब रहे वे बच गए। जो लोग बालकनी में फंसे रह गए, उनकी दम घुटने से मौत हो गई। हादसे में 59 लोग मारे गए और 103 से ज्यादा लोगों को चोटें आईं। इसमें 23 बच्चे भी मरे, जिनमें सबसे छोटा बच्चा महज 30 दिन का था।

इसांफ के लिए पीड़ित परिवारों ने बनाया एसोसिएशन

नीलम बताती हैं, 'बच्चों की मौत के अगले दिन अखबार से पता चला कि हॉल में बैठे 750 लोग बाहर आ गए। सिर्फ बालकनी में फिल्म देखने वालों की ही मौत हुई। मैं सोचने लगी कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि सिर्फ बालकनी में बैठने वालों की जान गई। बाद में पता चला कि बालकनी का दरवाजा बंद था। इसके बाद हमने इंसाफ के लिए मुहिम चलानी शुरू की।

13 दिन बाद 'एसोसिएशन ऑफ द विक्टिम्स ऑफ उपहार ट्रेजडी' (AVUT) बनाया। शुरुआत में लोग अपनों को खोने के सदमे में थे। सिर्फ नौ लोग ही साथ आए, लेकिन धीरे-धीरे सभी 28 परिवार शामिल हो गए।'

हादसे में मारे गए लोगों की याद में उपहार सिनेमा के पास में एक स्मृति उपवन बनाया गया है। हर साल 13 जून को पीड़ित परिवार यहां प्रार्थना के लिए आते हैं।
हादसे में मारे गए लोगों की याद में उपहार सिनेमा के पास में एक स्मृति उपवन बनाया गया है। हर साल 13 जून को पीड़ित परिवार यहां प्रार्थना के लिए आते हैं।

निचली अदालत ने दो साल की सजा सुनाई, सुप्रीम कोर्ट ने 30-30 करोड़ जुर्माना लगाया

22 जुलाई, 1997 को दिल्ली पुलिस ने उपहार सिनेमा के मालिक सुशील अंसल और उनके बेटे प्रणव अंसल को मुंबई से गिरफ्तार किया। दो दिन बाद मामले की जांच CBI को सौंपी गई। CBI ने 15 नवंबर 1997 सुशील अंसल समेत 16 आरोपियों के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दायर की।

2007 में अदालत ने सभी 16 आरोपियों को दोषी पाया, लेकिन तब तक चार लोगों की मौत हो चुकी थी। इन लोगों को सात महीने से लेकर सात साल तक की सजा सुनाई गई। अंसल बंधुओं को दो साल जेल की सजा हुई, जो उन पर लगे आरोप के लिए अधिकतम सजा थी।

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने अंसल बंधुओं की जेल की सजा माफ कर दी और उन पर 30-30 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया गया। इस जुर्माने की राशि को दिल्ली सरकार को देने की बात कही गई ताकि पीड़ितों के लिए ट्रॉमा सेंटर बनाया जा सके।

फैसले के दिन को याद करते हुए नीलम कहती हैं, ‘मैंने कोर्ट में सारे दस्तावेज फेंक दिए। कोर्ट से बाहर आ गई और फूट-फूट कर रोने लगी। वो पहली बार था, जब मैं सबके सामने रोई थी।

हम मुआवजा लेकर क्या करेंगे। क्या पैसे से हमारे बच्चे वापस आएंगे। हमारे पास पैसा था, लेकिन हम अपने बच्चों को एक इंजेक्शन भी नहीं दिला सके। हमें पैसा नहीं, इंसाफ चाहिए। हमें सिर्फ जजमेंट सुनाया गया, जस्टिस नहीं मिला।’

केटीएस तुलसी ने मुफ्त में लड़ा पीड़ित परिवारों का केस

इसके बाद मैं सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट केटीएस तुलसी से मिली। एडवोकेट तुलसी ने बिना फीस लिए इस केस को लड़ा।

वे बताते हैं, 'उन दिनों मैं पंजाब में केस लड़ रहा था। अखबार पढ़ा तब पता चला कि एक परिवार के सात लोग मर गए, सिर्फ बुर्जुग बचा है। मैं श्मशान घाट पहुंचा तो वह बुजुर्ग मुझे पकड़ रो पड़े कि कुछ नहीं बचा।

मैंने कहा- अभी लड़ाई बाकी है। लोगों में बहुत गुस्सा था, यही वजह थी कि मैंने इस केस को पर्सनली इन्वॉल्व होकर लड़ा।

इस दौरान काफी मुश्किलें भी फेस करनी पड़ीं। जिन्होंने हादसा देखा वे बचे नहीं। जो लोग बचे वे गवाही देने को तैयार नहीं थे। पीड़ित परिवारों को धमकियां मिलीं। फिर भी हम डटे रहे।'

अब ब्लैकबोर्ड सीरीज की इन तीन कहानियों को भी पढ़ लीजिए

1. हमारी ही बेटी से गैंगरेप और हम ही कैद हैं:बेटी की जान गई, बेटे को नौकरी नहीं दे रहे; गांव वाले उल्टा हमें ही हत्यारा बोलते हैं

बहन के गैंगरेप को दो साल बीते। तब से हम घर पर हैं- होम अरेस्ट! जवान हैं, लेकिन नौकरी पर नहीं जा सकते। बेटियों को स्कूल नहीं भेज सकते। तीज-त्योहार आए- चले गए। न कोई बधाई आई, न आंसू पोंछने वाले हाथ। बहन की अस्थियां इंतजार में हैं। हमारी जिंदगियां इंतजार में हैं। इंसाफ मिले, तो वक्त आगे बढ़े। ये वो घर है, जहां वक्त दो साल पहले के सितंबर में अटका हुआ है। (पूरी रिपोर्ट पढ़ने के लिए क्लिक करें)

2. कहानी आधी विधवाओं की, सालों से उनकी कोई खबर नहीं; हंसना भी भूल गईं, लेकिन तीज-करवाचौथ कोई भूलने नहीं देता

छुटकी पेट में थी, जब वो बॉम्बे (मुंबई) चले गए। एक रोज फोन आना बंद हुआ। फिर खबर मिलनी बंद हो गई। सब कहते हैं, तीज-व्रत करो, मन्नत मांगो- पति लौट आएगा। सूखे पड़े गांव में बारिश भी आ गई, लेकिन वो नहीं आए। मैं वो ब्याहता हूं, जो आधी विधवा बनकर रह गई। इंटरव्यू के दौरान वो नजरें मिलाए रखती हैं, मानो पूछती हों, क्या तुम्हारी रिपोर्ट उन तक भी पहुंचेगी! (पूरी रिपोर्ट पढ़िए)

3. लड़कियां लोहे के दरवाजों में बंद हैं:रात 2 बजे दिन की शुरुआत; बाबा कृष्ण बनकर, लड़कियों को रास रचाने के लिए उकसाता था

इस रिपोर्ट में कोई सिसकी नहीं। कोई डबडबाई आंख यहां नहीं दिखेगी। न कोई चीख मारकर रोएगा, न खतरे गिनाएगा। यहां सिर्फ एक इमारत है। बंद दरवाजे और लड़कियां हैं। दुनिया से कट चुकीं वो लड़कियां, जो यूट्यूब पर 'बाबा' के वीडियो देखकर घर छोड़ आईं और रोहिणी के एक आश्रम में कैद हो गईं। वो कैदखाना, जहां से बाहर जाने का कोई रास्ता नहीं। (पढ़िए पूरी खबर)

खबरें और भी हैं...