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देसी सोशल मीडिया के लिए भारत की खोज:ट्विटर, फेसबुक, वॉट्सऐप के मुकाबले कहां खड़े हैं भारत के सोशल मीडिया ऐप्स; क्या अभी इन देसी प्लेटफॉर्म को जॉइन करना फायदे का सौदा है?

12 दिन पहलेलेखक: आदित्य द्विवेदी

सबसे पहले सोशल मीडिया के क्षेत्र में पिछले 1 साल की तीन बड़ी घटनाएं जान लीजिए। पहली, सीमा विवाद के बाद भारत ने ज्यादातर चीनी ऐप्स पर बैन लगा दिया। दूसरी, 2021 की शुरुआत से ही ट्विटर के साथ भारत सरकार की तनातनी चल रही है। तीसरी, 25 फरवरी को देश में नए आईटी नियम लागू कर दिए गए।

इन तीन घटनाओं की वजह से भारत के देसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को पनपने और फलने-फूलने का मौका मिला है। इसके बाद से ही देश में देसी और विदेशी सोशल मीडिया को लेकर एक चर्चा छिड़ी हुई है।

हम यहां आपको बता रहे हैं कि ट्विटर, वॉट्सऐप, फेसबुक और क्लब हाउस जैसे विदेशी प्लेटफॉर्म के भारतीय विकल्प क्या हो सकते हैं? इन देसी ऐप्स के सामने क्या चुनौतियां हैं? क्या यूजर्स के लिए विदेशी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को छोड़कर देसी ऐप्स जॉइन करना फिलहाल फायदे का सौदा है?

क्या Koo ऐप बन सकता है Twitter का इंडियन विकल्प?

  • मार्च 2020 में अपरामेय और मयंक ने कू ऐप लॉन्च किया। पिछले 14 महीने में इस ऐप ने करीब 250 करोड़ की फंडिंग जुटा ली है।
  • प्ले स्टोर पर कू ऐप के करीब 60 लाख डाउनलोड्स हो चुके हैं। जनवरी में ट्विटर और सरकार के विवाद के बीच कू ऐप के 30 लाख से ज्यादा डाउनलोड हुए। कू ऐप आत्मनिर्भर भारत चैलेंज का विनर भी है।
  • केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद, पीयूष गोयल समेत कई नेताओं, अनुपम खेर समेत कई सेलिब्रिटी ने कू एप जॉइन किया है। नेताओं ने देश के लोगों से भी इस देसी ऐप का इस्तेमाल करने की अपील की।
  • कू ऐप में निवेश करने वाली फर्म 3वन4 कैपिटल के फाउंडिंग पार्टनर सिद्धार्थ पई के मुताबिक, 'इंडियन स्टार्टअप्स को सही समय का इंतजार था। कम कीमत में डेटा, स्मार्टफोन का बढ़ता चलन और आत्मनिर्भर भारत की भावना कू जैसे देसी ऐप्स के लिए बिल्कुल मुफीद साबित हुई है।'

क्या Sandes ऐप बन सकता है Whatsapp का इंडियन विकल्प?

  • वॉट्सऐप से मुकाबले के लिए संदेश भारत सरकार का इंस्टेंट मैसेजिंग ऐप है। जिसे नेशनल इंफॉर्मेटिक्स सेंटर ने बनाया है।
  • संदेश के ज्यादातर फीचर वॉट्सऐप जैसे ही हैं, लेकिन कुछ अंतर भी है। जैसे वॉट्सऐप में सिर्फ मोबाइल नंबर के जरिए अकाउंट बनाया जा सकता है, जबकि संदेश में ई-मेल और मोबाइल नंबर दोनों का विकल्प है।
  • प्ले स्टोर पर संदेश ऐप के 50 हजार से ज्यादा डाउनलोड हो चुके हैं। शुरुआत में ये ऐप सरकारी अधिकारियों के इस्तेमाल के लिए था, लेकिन बाद में इसे सबके लिए उपलब्ध करवा दिया गया।

क्या Sharechat बन सकता है Facebook का इंडियन विकल्प?

  • शेयरचैट की शुरुआत साल 2015 में हुई थी। ये 15 भारतीय भाषाएं सपोर्ट करता है। इनमें हिंदी, मलयालम, गुजराती, मराठी, पंजाबी, तेलुगु, तमिल, बंगाली, उड़िया, कन्नड़, आसामीज, हरियाणवी, राजस्थानी, भोजपुरी और उर्दू जैसी भाषाएं शामिल हैं।
  • शेयर चैट ने अब तक कुल 5 हजार करोड़ से ज्यादा की फंडिंग जुटाई है। इससे इस देसी सोशल नेटवर्क की वैल्यूएशन 15 हजार करोड़ से ज्यादा हो गई है।
  • शेयर चैट के मंथली एक्टिव यूजर 16 करोड़ हो गए हैं। इसने 2020 में एक शॉर्ट वीडियो फॉर्मेट एप मोज लॉन्च किया था, जिसके सिर्फ 9 महीने में ही 12 करोड़ मंथली एक्टिव यूजर हैं।

क्या Leher बन सकता है Clubhouse का इंडियन विकल्प?

  • लहर एक ऑडियो-वीडियो डिस्कशन प्लेटफॉर्म है। इसे 2018 में अतुल जाजू और विकास मालपानी ने लॉन्च किया। ये एंड्रॉयड और आईओएस दोनों प्लेटफॉर्म पर मौजूद है।
  • लहर के डिस्कशन में अधिकतम 16 लोग शामिल हो सकते हैं। क्लब हाउस की तरह इसे भी इनवाइट के बाद ही इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • दिसंबर 2020 तक इस ऐप के 1.5 लाख से ज्यादा डाउनलोड हो चुके हैं। इसे अब तक 4.41 करोड़ रुपए की फंडिंग मिल चुकी है।

अब सवाल उठता है कि क्या देसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को जॉइन करने का ये सही वक्त है? एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसे एप्स के सामने दो बड़ी चुनौतियां हैं... नेटवर्क इफेक्ट और पूंजी।

1. नेटवर्क इफेक्टः जहां आपके दोस्त नहीं, वहां आप क्यों जाएंगे

मान लीजिए आपके 10 दोस्तों में से 8 लोग इंस्टाग्राम पर हैं और 2 लोग शेयरचैट पर हैं। ज्यादा संभावना है कि आप भी इंस्टाग्राम पर ही ज्यादा वक्त बिताना चाहेंगे। यही नेटवर्क इफेक्ट कहलाता है। भारतीय सोशल मीडिया ऐप के सामने सबसे पहली चुनौती है कि वो अमेरिकी कंपनियों के नेटवर्क इफेक्ट का मुकाबला कैसे कर पाएंगे?

ट्विटर और स्नैपचैट के पूर्व एग्जिक्यूटिव राहुल खुर्शीद कहते हैं, 'अगर कोई सेलिब्रिटी देसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जाता है, तो उसके फैन भी वहां पहुंच जाएंगे, लेकिन यहां सवाल है कि एलन मस्क कू क्यों जॉइन करेंगे?'

2. पूंजीः लंबे वक्त के निवेश के बाद होती है कमाई

सोशल मीडिया बिजनेस के बढ़ने और फलने-फूलने में पूंजी की कमी सबसे बड़ी बाधा है। ट्विटर ने अपने शुरुआत के चार साल में 7 हजार करोड़ से ज्यादा की फंडिंग जुटाई थी। इसके बाद कंपनी को फायदे में आने के लिए सात साल का वक्त और लगा। इंस्टाग्राम ने भी अपने शुरुआती दो साल में करीब 4 हजार करोड़ रुपए जुटाए थे। इसके बाद फेसबुक ने उसका अधिग्रहण किया।

वॉट्सऐप ने भी फेसबुक के अधीन आने से पहले करीब 5 हजार करोड़ रुपए की फंडिंग जुटाई थी। भारत के सोशल मीडिया ऐप्स के सामने ये बड़ी चुनौती है। भारत के देसी सोशल मीडिया में इतना बड़ा निवेश कैसे मिलेगा?

इनवेस्टर्स के पास देसी सोशल मीडिया ऐप्स का मोनेटाइजेशन भी एक बड़ी चुनौती है। जैसे फेसबुक और गूगल का भारत के डिजिटल एडवर्टाइजिंग मार्केट के 85% हिस्से पर कब्जा है। लेकिन भारत के प्रति यूजर रेवेन्यू की बात करें तो ये अमेरिका और यूरोप की तुलना में बेहद कम है।

फेसबुक का उदाहरण लेते हैं। फेसबुक अमेरिका के एक यूजर से हर तिमाही 1444 रुपए कमाता है, यूरोप में 437 रुपए और भारत जैसे देश में महज 153 रुपए रेवेन्यू कमाता है।

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