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भास्कर इंडेप्थ:भारत में पड़ने वाली भीषण गर्मी और हाड़ कंपाने वाली ठंड के लिए जिम्मेदार हैं अमेरिका जैसे विकसित देश

7 महीने पहलेलेखक: अनुराग आनंद

दुनिया भर का तापमान पिछले 150 सालों में 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ा। लेकिन इस सदी के अंत तक इसके 3 से 5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने का अनुमान है। ऊपर से धरती के दक्षिण ध्रुव के ऊपर ओजोन परत में हर साल बढ़ रहा छेद अंटार्कटिका से भी बड़े आकार का हो गया है। इसका भी ग्लोबल टेंपरेचर पर असर पड़ना तय है।

इतना ही नहीं तेल रिसाव और प्लास्टिक कचरे की वजह से बढ़ रहा समुद्री प्रदूषण भी किसी से छिपा नहीं है। डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट कहती है कि प्रदूषण बढ़ने और क्लाइमेट चेंज के कारण भारत में हर साल भीषण गर्मी से 83700 लोगों की जान जाती है। साथ ही अधिक ठंड के कारण मरने वालों का आंकड़ा 6.55 लाख है।

आप सोच रहे होंगे इस प्रदूषण और क्लाइमेट चेंज के लिए कौन जिम्मेदार है? तो बता दें कि इसके लिए सिर्फ पंजाब और हरियाणा के पराली जलाने वाले किसान या दिल्ली की सड़कों पर दौड़ने वाली डीजल गाड़ियां जिम्मेदार नहीं हैं। इसके लिए जिम्मेदार है अमेरिका जैसे विकसित देशों की महत्वाकांक्षा, जिसने आर्थिक लाभ के लिए बिना कुछ सोचे-समझे जमकर प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल किया है।

आइए जानते हैं भारतीय लोगों को आज जो झुलसा देने वाली भीषण गर्मी और खून जमा देने वाली ठंड का सामना करना पड़ता है, उसके लिए अमेरिका, ब्रिटेन जैसे विकसित देश कैसे जिम्मेदार हैं? कैसे इन उंगलियों पर गिने जाने वाले कुछ देशों की वजह से दुनिया भर का पर्यावरण प्रदूषित हुआ है और मौसम बदल रहा है?

विकसित देश कार्बन उत्सर्जन के लिए है जिम्मेदार
'अपना भरा जगत का भरा' कहावत तो आपने सुनी होगी। कोयले के उपयोग को लेकर पश्चिमी देशों के रवैये पर यह सटीक बैठती है। द लेसेंट प्लेनेटरी हेल्थ की रिसर्च के मुताबिक, 2015 तक अमेरिका दुनिया में 40 फीसदी कार्बन उत्सर्जन व यूरोपियन यूनियन 29 फीसदी कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार था। वहीं, G8 में शामिल 8 देश 85 फीसदी कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार थे। इन देशों की तुलना में भारत और चीन जैसे कई विकासशील देश अपनी सीमा में रहते हुए कार्बन उत्सर्जन कर रहे हैं। अमेजन और कैलिफोर्निया के स्कवॉया जंगल की आग ने भी तापमान को बढ़ाया है। यह दोनों जंगल चीन-भारत में नहीं बल्कि नॉर्थ पोल के देशों में है।

गलती खुद करके भारत-चीन के माथे फोड़ा ठीकरा
कार्बन उत्सर्जन सबसे अधिक कोयला के इस्तेमाल करने की वजह से होता है। ऐसे में साफ है कि कार्बन की मात्रा बढ़ने से ओजोन में छेद होने के लिए जिम्मेदार विकसित देश हैं। अब तक खूब कोयला इस्तेमाल करने वाले विकसित देश अब विकासशील देशों पर ऐसा नहीं करने का दवाब बना रहे हैं। इस बार भी ग्लासको क्लाइमेट चेंज सम्मिट (COP 26) के बाद इन देशों ने कहा कि भारत और चीन की वजह से ही कोयला के पूर्ण इस्तेमाल पर रोक नहीं लग सकी है। भारतीय मूल के ही कॉप 26 के अध्यक्ष और ब्रिटेन के मंत्री आलोक शर्मा ने तो कोयला के यूज को बंद नहीं करने के लिए भारत और चीन से जवाब तक मांग लिया है।

भारत-चीन और गरीब देशों के लिए कोयले का इस्तेमाल कम करना है मुश्किल
इसमें कोई दो राय नहीं कि समय आ चुका है कि न सिर्फ भारत और चीन बल्कि दुनियाभर की सरकारें कोयले के इस्तेमाल को बंद करें। लेकिन, विकासशील देशों के लिए यह इतना आसान नहीं है। क्योंकि बिजली उत्पादन से लेकर सामानों के प्रोडक्शन तक में कोयला ऊर्जा के सबसे सस्ता माध्यम के तौर पर इस्तेमाल होता है। ऐसे में कोयले पर निर्भरता को खत्म करने के लिए बड़े बदलावों और तकनीकों की जरूरत है। इसमें सबसे बड़ी अड़चन 90 फीसदी से अधिक कार्बन उत्सर्जन के जिम्मेदार विकसित देशों से जुर्माने के तौर पर उपयुक्त फंडिंग न मिलना भी है।

जानें कैसे अपनी जवाबदेही से बच रहे हैं विकसित देश
पर्यावरण को कार्बन छोड़कर सबसे ज्यादा दूषित करने वाले विकसित देशों ने 2009 के कोपनहेगन समिट के दौरान विकाशील देशों को 2020 तक प्रति साल 10 हजार करोड़ डॉलर देने का वादा किया था। इस फंड का इस्तेमाल विकासशील देशों के कार्बन उत्सर्जन को कम करने में किया जाना था। लेकिन, ऐसा इसलिए नहीं हो सका, क्योंकि विकसित देशों ने इसके लिए वादा करके भी पैसा नहीं दिया। द हिंदू की रिपोर्ट में प्रोफेसर नवरोज के दुबाश ने लिखा कि क्लाइमेट फाइनेंस से मशहूर इस फंड से इस साल तक 7 हजार करोड़ डॉलर से अधिक खर्च होना था, लेकिन 4 हजार करोड़ डॉलर ही खर्च हो पाया, वो भी सही से नहीं। भारत को अब तक इस मद में पैसा न के बराबर मिला है।

भारत-चीन को जिम्मेदार बताने के बजाय उपभोग कम करें विकसित देश
इस पूरे मामले में एक बात यह भी है कि भारत और चीन में इस्तेमाल होने वाले ज्यादातर प्रोडक्ट का इस्तेमाल पश्चिमी देशों (अमेरिका समेत विकसित देश) के लोग ही करते हैं। इन समानों के बनाने में विकासशील व गरीब देश कोयला को ऊर्जा के लिए इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में ग्लोबल नॉर्थ (विकसित देश) को जरूरत है कि वो अपना उपभोग (कंजम्पशन) कम करें। डेटा गवाह है कि विकसित देशों में पूरी दुनिया की केवल 24 फीसदी जनसंख्या निवास करती है, जबकि वहां चीजों का इस्तेमाल दुनिया के खपत का 50 से 90 फीसद है।

इन चीजों का इस्तेमाल सबसे अधिक पश्चिमी देश करते हैं
मुट्ठी भर विकसित देशों में अनाज, दूध और मीट जैसे सामान्य प्रोडक्ट की खपत दुनिया में होने वाले कुल खपत का 48% से 72% के बीच है। इन देशों में फर्टिलाइजर के मामले में वैश्विक खपत का 60%, पेपर में 81%, कॉपर और एल्यूमिनियम में 86%, आयरन और स्टील में 80% और गाड़ियों के मामले में 92% है। साफ है कि मुट्ठी भर दुनिया के लोग चीजों का काफी ज्यादा खपत कर रहे हैं। इसका सीधा असर पर्यावरण पर हो रहा है, जिसे कम करने की जरूरत है।

ऐसे कम किया विकसित देशों ने कोयला का इस्तेमाल
भारत और चीन को प्रदूषण के लिए बदनाम करने वाले देशों ने दशकों तक कोयले का इस्तेमाल अपने देश की तरक्की के लिए किया। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश में नेचुरल गैस होने की वजह से भी कोयले का यूज कम करना संभव हुआ। 2012 तक यूके में बिजली उत्पादन के लिए कोयला का इस्तेमाल 41% और नेचुरल गैस की खपत 25% थी। इंग्लैण्ड ने कोयला आधारित ऊर्जा के उत्पादन को अब न के बराबर कर दिया है। भारत के पास भी ऊर्जा के लिए कई विकल्प हैं, लेकिन पूरी तरह से शिफ्ट करने में समय और रिसोर्स लगेंगे जिसकी तैयारी की भी जा रही है।

भारत के लिए 20वीं सदी डिकॉलोनाइजेशन तो, अब 21वीं सदी डिकार्बोनाइजेशन की है
अमेरिकी मैगजीन ‘द न्यूयॉर्कर’ के लिए लिखे एक लेख में रघु करनाड ने लिखा है कि 20वीं सदी में भारत का लक्ष्य पश्चिमी देशों के खिलाफ लड़ाई लड़कर देश को आजाद कराने का था। लेकिन, अब 21वीं सदी में भारत का लक्ष्य बदल गया है। अब भारत का लक्ष्य कार्बन उत्सर्जन को कम (डिकार्बनाइजेशन) करने का है। रघु करनाड ने उम्मीद जताई है कि भारत न केवल खुद कार्बन उत्सर्जन कम करेगा बल्कि दूसरे देशों को भी प्रेरणा दे सकता है।