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स्टार्टअप सीरीज:किताबों का पार्सल देखकर आया डीजल की होम डिलीवरी का आइडिया; रतन टाटा ने 15 मिनट का समय दिया लेकिन 4 घंटे चली मुलाकात

2 वर्ष पहलेलेखक: जनार्दन पांडेय

अगस्त 2016 की बात है। पुणे में भयंकर बारिश हो रही थी। कई घंटे से पूरे शहर की लाइट कटी हुई थी और एक पेट्रोल पंप के मालिक को उनके टाईअप वाली फैक्ट्री, कंस्ट्रक्‍शन साइट और अन्य इंडस्ट्री वालों के फोन पर फोन आ रहे थे। वे किसी भी हाल में जल्द से जल्द डीजल चाहते थे। किसी ने खुद की टंकी भेज दी थी तो किसी ने ट्रक में बड़े-बड़े ड्रम भेज दिए थे।

पिता राजेंद्र वालुंज को परेशान देख बेटे चेतन वालुंज और बहू अदिती भोसले वालुंज भी हड़बड़ा गए थे। तभी दरवाजे की घंटी बजी। अदिती ने देखा तो किताबों का पार्सल आया था, साथ में फोन पर एक मैसेज भी आ गया। तभी चेतन ने कहा- यार, अगर ऐसे ही हम डीजल घरों तक डिलीवर कर दें तो..., यहीं पर रेपोस एनर्जी की नींव पड़ी।

आइडियाः देशभर में डीजल की होम डिलीवरी
किताबों का पार्सल देखकर उठी बात को एक सही आइडिए का रूप देने में यंग कपल चेतन और अदिती को काफी दिक्कत आई। क्योंकि उन्होंने डीजल की होम डिलीवरी के ख्वाब देख लिए थे। लेकिन अब तक देश में ऐसा कहीं नहीं हो रहा था। सबसे बड़ी बात कि इसमें प्रशासनिक पेंच भी काफी थे। इसलिए आइडिया आने के बाद करीब दो महीने यही सोचते बीत गए कि क्या करेंगे? डीजल की बिक्री की अनुमति सरकार रजिस्टर्ड कंपनियों को ही देती है, फिर इसकी होम डिलीवरी कैसे कराएंगे, लेकिन दोनों ने मिलकर तय किया वो इसे करेंगे और अक्टूबर 2016 आइडिया पटल पर आ गया।

स्टार्टः न सरकार के पास कोई ब्लूप्रिंट था न घर वाले थे तैयार, फिर भी बढ़ते रहे
चेतन बताते हैं कि सबसे बड़ी चुनौती प्रशासनिक तरीके से इससे निपटने में थी। लेकिन भाग्य ने साथ दिया जिस वक्त ये आइडिया उनके दिमाग में आया ठीक उसी वक्त सरकार भी कुछ ऐसा करने की सोच रही थी। लेकिन कैसे करें ये सरकारी तंत्र भी नहीं समझ पा रहा था। चेतन के अनुसार उन्होंने एक लेटर लिखा और पेट्रोलियम मंत्रालय पहुंच गए। अपना आइडिया बताया तो उन्हें कहा गया कि वो खुद ही इस पूरे सिस्टम को खड़ा करें। पर आश्वासन मिला कि अगर वो ऐसा कोई सिस्टम खड़ा कर पाए तो उन्हें सरकार काम करने देगी।

अदिती कहती हैं कि बाहरी चुनौती के साथ घर में बड़ी चुनौती थी। चेतन और अदिती दोनों के परिवारों के पास अपने कई किस्म के जमे जमाए बिजनेस थे। लेकिन उसे छोड़कर ये अजीबोगरीब किस्म के कारोबार की सोच रहे थे। इसलिए उन्हें सबकी ओर से निराशा ही हाथ लगी। इसी बीच अक्टूबर 2016 में चेतन ने एक ऑफिस ओपन कर लिया और ऑफिस में बैठकर प्लानिंग करने लगे, तकनीक कैसे कम करेगी, इसलिए लोगों से मिलने लगे।

फंडिंगः रतन टाटा ने 15 मिनट का समय दिया था, लेकिन 4 घंटे सुनते रहे
अदिती बताती हैं कि पति और उनके परिवार का बिजनेस बैकग्राउंड होने के चलते बिजनेस में डालने के लिए पैसे थे, लेकिन उन्हें चारों ओर से इतनी ज्यादा नकारात्मक बातें सुनाई दे रही थीं कि उनके मन में शंका पैदा हो गई थी। तब दोनों ने तय किया वो अपने आइडिया के बारे में किसी बड़े बिजनेसमैन से मिलकर चर्चा करेंगे। थोड़े विचार-विमर्श के बाद तय हुआ कि वो एक लेटर में अपनी बात लिखकर रतन टाटा को देंगे।

दोनों की नजर में उनके आइडिया के लिए रतन टाटा सबसे उपयुक्त लगे। हाथ में लेटर लेकर कार से दोनों रतन टाटा के घर निकल पड़े। अदिती कहती हैं सुबह करीब दस बजे से शाम के छह-सात बजे तक वो रतन टाटा तक अपने लेटर के पहुंचाए जाने का इंतजार करते रहे और उन्हें लगता रहा कि शायद मुलाकात का अवसर मिल जाए, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। वे थोड़े हताश होकर लौट आए।

एक दिन अचानक फोन बजा, उठाने पर आवाज आई- अदिती से बात हो सकती है, मैं रतन टाटा बोल रहा हूं। आपने लेटर में 15 मिनट की मुलाकात के लिए रिक्वेस्ट की थी। कृपया आप एक दिन बाद आ जाएं। अदिती के अनुसार, वो 15 मिनट की मुलाकात कब तीन-चार घंटे में तब्दील हो गई पता ही नहीं चला। उसके बाद से टाटा ग्रुप से उन्हें कई तरह की सहायताएं मिलती रहती हैं।

बिजनेस मॉडलः रेपोस एनर्जी से डीजल बुक करने वाले को प्रति लीटर 40 पैसे ज्यादा देने होते हैं
चेतन कहते हैं कि चाहे किसान हों या कोई भी इंडस्ट्री अगर उन्हें डीजल का इस्तेमाल जेनरेटर, सिंचाई की मशीन या किसी ऐसी चीज के लिए करना है जो चलकर पेट्रोल पंप तक नहीं आती तो वो कोई न कोई इंतजाम तो करते ही हैं। हम इसी स्पेस में काम करते हैं। हम उन लोगों का समय और कई तरह की चुनौतियों को खत्म करते हुए उनके दरवाजे पर डीजल की डिलीवरी करा देते हैं। इसके बदले में हम नाम मात्र की कन्वेनेंस फीस के तौर पर प्रति लीटर 40 पैसे तक लेते हैं।

अभी तक उनके रोजाना के करीब 1500 यूजर्स हैं जो 2000 लीटर से 4000 लीटर के बीच डीजल ऑर्डर करते हैं। उन्होंने 2016 में केवल दो लोगों से शुरुआत की थी। सही रूप में काम शुरू होते-होते, सरकार की तरफ पूरी कागजी कार्रवाई होते-होते 2019 बीत गए थे। 2020 में उनकी विधिवत शुरुआत हुई तो महज एक साल में ही उन्हें 400 कर्मचारी रखने पड़े हैं।

रेपोस एजर्नी के फाउंडर्स के अनुसार वो इस वक्त मध्य प्रदेश, राजस्‍थान, बिहार, झारखंड के टीयर-3 शहरों तक पहुंच चुके हैं। फिलहाल देश के प्रमुख राज्यों के प्रमुख 150 शहरों में रेपोस एनर्जी अपने ऐप के जरिए लोगों से डीजल का ऑर्डर ले रही है और अपनी मोबाइल गाड़ी से उन तक डीजल पहुंचा रही है।

टारगेटः अफ्रीका समेत कई देशों तक ले जाना चाहते हैं रेपोस एनर्जी को
चेतन कहते हैं कि उनके सामने प्रमुख चुनौती लोगों तक ये मैसेज पहुंचाना था कि ऐसा भी कुछ हो सकता है। पहले उनके काम को लेकर कई लोगों में ऐसी धारणा बनती थी कि ये तो संभव ही नहीं है। ऐसे में लोगों को सरकार की ओर से लिए हुए कागजात दिखाने पड़ते थे, लेकिन अब लोगों में जागरूकता आई है। जागरूकता के साथ यह विश्वास भी जगा है कि इससे देश में एक बेहतर असर पड़ेगा।

चेतन और अदिती दोनों ही चाहते हैं कि देश में रेपोस एनर्जी पर मेहनत करते हुए इसे गांव-गांव तक ले जाएं। इसके साथ ही वे रेपोस एनर्जी को अफ्रीकी, अरब के देशों समेत दुनियाभर में ले जाने के उद्देश्य के साथ आगे बढ़ रहे हैं।

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