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बात बराबरी की:तलाक के बाद मानो स्त्री न हुई, टूथब्रश हो गई, एक ने इस्तेमाल कर लिया तो दूसरे के लिए बेकार है

नई दिल्ली6 महीने पहलेलेखक: मृदुलिका झा
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एक वेबसाइट है कोरा, जहां लोग सवाल पूछते हैं। जहां पेरिस से लेकर चांदनी चौक तक के लोग अपनी समझ से जवाब दे सकते हैं। साइट पर 'पपीते को रातभर में कैसे पकाएं' से लेकर 'कैंसर के दौरान ली जाने वाली खुराक' तक पर बात होती है। ऐसे में जाहिर है कि यहां मर्द-औरत के रिश्ते पर भी डिस्कशन होगा। यहीं पर डाइवोर्स को लेकर कई मासूम सवाल हैं, जो उन शौहरों की ओर से हैं, जिनका तलाकशुदा औरत में मन रम गया।

एक शौहर फरमाते हैं, 'वैसे तो मेरी पत्नी बड़ी नेकदिल और हसीन है, लेकिन जब भी हम करीब आते हैं, मुझे उससे ‘सेकेंड-हैंड फीलिंग’ आती है। याद आता है कि मुझसे पहले भी किसी पुरुष ने उसे हाथ लगाया है। इस सोच से छुटकारा कैसे पाऊं?' सवाल परफेक्ट अंग्रेजी में है, जिससे ये अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि पति महोदय का स्कूल-कॉलेज से वास्ता रहा होगा। वे दफ्तर में काम करते होंगे और बहुतेरी महिला दोस्त भी होंगी। शायद इक्का-दुक्का प्रेमिकाएं भी रही हों, लेकिन तलाकशुदा पत्नी से उन्हें सेकेंड-हैंड बू आती है।

ठीक यही महक ट्रोल्स को दक्षिण भारतीय फिल्म एक्ट्रेस सामंथा रुथ से भी आने लगी है। करीब दो महीने पहले ही सामंथा का अपने पति और एक्टर नागा चैतन्य से तलाक हुआ। इसके बाद से वे सोशल मीडिया के करतब-बाजों के निशाने पर हैं। हाल में पुष्पा फिल्म में सामंथा ने जबर्दस्त डांस किया। ऊंघ रहे करतबी फटाक से एक्शन में आ गए। डांस को अश्लील तो कहा ही, साथ ही एक्ट्रेस को तलाकशुदा सेकेंड-हैंड आइटम बता दिया।

कुछ इसी तरह की बात TV एक्ट्रेस काम्या पंजाबी के बारे में भी कही गई। जब उन्होंने तलाक के 7 साल बाद दूसरे रिश्ते में जाने का फैसला किया। ट्रोलर्स ने होने वाले पति से संवेदना जताते हुए ये तक पूछ लिया कि आखिर कैसे वे इस्तेमाल की हुई औरत के संग रह सकेंगे! मानो स्त्री न हुई, टूथब्रश हो गई। एक ने इस्तेमाल कर लिया तो किसी भी दूसरे के लिए वो बेकार है। खराब हुए टूथब्रश से भी हम हिंदुस्तानी कई काम निकाल लेते हैं। कंघी साफ होती है, आईना चमकाया जाता है, लेकिन डाइवोर्स से गुजरी स्त्री की हैसियत सेकेंड-हैंड ब्रश से भी कमतर है।

औरतों को इस कमतरी के अहसास से बचाने के लिए कई तरीके खोजे गए। यहां तक कि मंडी लगाकर उन्हें बेचा जाने लगा ताकि वो बिकाऊ भले कहलाएं, लेकिन छोड़ी हुई नहीं। 16वीं सदी के ब्रिटेन में पत्नी से ऊबे हुए पति वाइफ-सेलिंग मार्केट में पहुंचते और बोलियां शुरू हो जातीं।

जुलाई 1797 के द टाइम्स अखबार में छपा- वो शुक्रवार की दोपहर थी, जब एक जल्लाद स्मिथफील्ड मार्केट पहुंचा। उसके साथ एक स्त्री थी, जिसकी गर्दन में रस्सी बंधी हुई थी। कमर पर भी एक रस्सी लिपटी हुई थी। स्त्री को रेलिंग से बांधकर जल्लाद सुस्ताने लगा। थोड़ी देर में लोग आने लगे। वे औरत का ऊपर से नीचे तक मुआयना करते और कीमत सुझाते। पति नाखुशी से सिर हिला देता। तभी एक आदमी आया, जिसकी गाड़ी में सुअर जुते हुए थे। उसने पति को 3 गिनीज (उस दौर के पैसे) दिए और स्त्री को लेकर चला गया। अब पति आजाद था और बिक चुकी स्त्री भी तलाक के पाप से बच गई।

जैसे भेड़-बकरियों की मंडियां सजती हैं, वैसे ही हर शुक्रवार को बीवियों की भी खरीद-फरोख्त होती। जितनी अच्छी त्वचा, जितना कसा हुआ शरीर, नस्ल उतनी ही बढ़िया मानी जाती और पति को ऊंचे दाम मिलते। कई बार ऐसा भी होता कि किसी स्त्री का कोई खरीदार हफ्तों न जुट सके। ऐसे में ‘एक के साथ एक फ्री’ का ऑफर भी मिलता। जैसे पत्नी के साथ शिकारी कुत्ता या घोड़ा मुफ्त देने का ऑफर होता। तब ‘बेकार’ पत्नी भी हाथोंहाथ बिक जाती।

वैसे वाइफ-सेलिंग के इस बिजनेस में पत्नी के साथ निहायत क्रूरता होती हो, ऐसा भी नहीं था। उनके गले और कमर पर जो रस्सियां बांधी जाती थीं, वो रेशम की हुआ करतीं। कई बार उन्हें नई दुल्हन की तरह सजाकर भी पेश किया जाता। मंडी में ज्यादा वक्त खड़ा रहना पड़े तो उनके लिए खाने-पीने का भी इंतजाम रहता। 18वीं सदी के मध्य तक लोग इस प्रथा का विरोध करने लगे। बीवियां बेचने निकले शौहरों पर पत्थर फेंके जाने लगे। बर्कशायर हिस्ट्री में इसका विस्तार से जिक्र है कि किस तरह वाइफ-सेलिंग की प्रथा का अंत हुआ।

धीरे-धीरे तलाक को कानूनी मान्यता मिली। इसके नियम आसान हुए ताकि मुर्दा रिश्ते में जी रहे लोग खुलकर सांस ले सकें। हमारे यहां भी नियम बना, लेकिन बासी चावल में नया पानी डालने से ताजा खिचड़ी नहीं पक जाती। तो तलाकशुदा औरत अब भी सेकेंड-हैंड बनी हुई है।

अड़ोसी-पड़ोसी से लेकर जिनसे भी वो मिले, हरेक के दिल में उसके चरित्र को लेकर लगातार सवाल खदबदाते हैं। वो हंसकर बात करे तो खोट। बिसूरे तो अपशगुन। दोस्ती करे तो घरतोड़ू। भौंहें चढ़ाए रखे तो घमंडी। नौकरी करे तो करियर-ऑबसेस्ड। यहां तक कि बच्चे अगर मां के पास हैं और परवरिश के लिए वो गुजारा-भत्ता मांग ले तो तुरंत लालची कहलाने लगती है।

तलाकशुदा महिलाओं के इस लालच को जांचने के लिए इकोनॉमिक रिसर्च फाउंडेशन ने एक सर्वे किया। इसमें 405 औरतों से लंबी बातचीत हुई, जिसमें कई बातें निकलकर आईं। पाया गया कि लगभग 86% मामलों में तलाक के बाद बच्चे मां के साथ रह रहे थे। इनमें से सिर्फ 1.7% महिलाएं ऐसी थीं, जिनकी कमाई 35 हजार से ज्यादा थी, वहीं 42% के पास कोई नौकरी नहीं थी।

ऐसे में घर चलाने के लिए उन्होंने गुजारा-भत्ता देने की मांग की, लेकिन ज्यादातर मामलों में एलिमनी या तो नाममात्र को मिलती है, या फिर मिलती ही नहीं। हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मेंटेनेंस के मामलों की सुनवाई के दौरान ये भी पाया कि एलिमनी देने के डर से पति गलत पता लिखवाकर गायब हो जाते हैं। थक-हारकर औरतें चुप हो जाती हैं।

वैसे बीते कुछ सालों में 'तलाक की बजाय कुएं में कूद जाऊंगी', वाली सोच घटी है। ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट के मुताबिक अब 1000 में से 13 शादियां तलाक पर खत्म हो रही हैं। सर्वे का ये नतीजा कोई खुशखबरी नहीं, लेकिन पैर का जख्म जब जान पर बना दे तो मौत की बजाय पांव काटना ही बेहतर है।

औरतें भी यही कर रही हैं। तलाक के बाद भी उनका दिल 1 मिनट में 72 बार धड़क रहा है। पलकें हर मिनट 15 बार झपक रही हैं। पति से छूटकर वे घर को अपनी कब्र नहीं बना रहीं, बल्कि बाहर निकलकर जीने का जश्न मना रही हैं। ठीक सामंथा की तर्ज पर- जो पुष्पा फिल्म में झूमकर नाचती हैं और ट्रोलर्स को कहती हैं- ईश्वर, तुम्हें शांति दे!