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एविएशन के इतिहास में पहली बार:पायलट्स की या तो सैलरी कट रही या नौकरी जा रही; 7 साल बाद जनवरी से जुलाई के बीच डोमेस्टिक पैसेंजर्स कम हुए

नई दिल्ली8 महीने पहले
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  • इस साल जनवरी से जुलाई के बीच 3.72 करोड़ डोमेस्टिक पैसेंजर्स ने यात्रा की, इससे पहले 2013 में जनवरी से जुलाई के बीच 3.58 करोड़ पैसेंजर्स आए थे
  • एयर इंडिया के पूर्व चीफ को-ऑर्डिनेटर हर्षवर्धन कहते हैं, इस साल एविएशन इंडस्ट्री को 1 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हो सकता है

मार्च में जब देश में कोरोनावायरस के मामले बढ़ने शुरू हुए, तो सरकार ने सबसे पहले वीजा सस्पेंड किए। फिर 23 मार्च से इंटरनेशनल फ्लाइट्स और 25 मार्च से डोमेस्टिक फ्लाइट्स भी बंद कर दीं। इंटरनेशनल फ्लाइट्स तो अभी भी बंद ही हैं, लेकिन 25 मई से डोमेस्टिक फ्लाइट्स शुरू हो गई हैं। हालांकि, फ्लाइट्स शुरू होने के बाद भी पैसेंजर्स आ नहीं रहे हैं। कारण है डर। कोरोना का डर। आंकड़े भी इस बात की गवाही देते हैं।

आपको पता है 7 साल में ये पहली बार है, जब देश में जनवरी से जुलाई के बीच डोमेस्टिक पैसेंजर्स की संख्या सबसे कम रही है। डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन, यानी डीजीसीए, का डेटा बताता है कि इस साल जनवरी से जुलाई के बीच 3.72 करोड़ डोमेस्टिक पैसेंजर्स ने हवाई सफर किया। इससे पहले 2013 में जनवरी से जुलाई के बीच 3.58 करोड़ पैसेंजर्स आए थे।

डीजीसीए की वेबसाइट पर मौजूद डेटा ये भी बताता है कि इस साल जनवरी से मार्च के बीच डोमेस्टिक पैसेंजर्स की संख्या 3.29 करोड़ से कुछ ही ज्यादा थी। अप्रैल में तो फ्लाइट्स पूरी तरह से बंद थीं। मई में फ्लाइट्स शुरू हो तो गईं, लेकिन उसके बाद जुलाई तक तीन महीनों में सिर्फ 45 लाख के आसपास ही डोमेस्टिक पैसेंजर्स आए।

हमारे देश में हर साल तकरीबन 14 करोड़ डोमेस्टिक और 6 करोड़ इंटरनेशनल पैसेंजर्स हवाई यात्रा करते हैं। लेकिन, कोरोनावायरस की वजह से एविएशन इंडस्ट्री की हालत बेहद खराब हो गई है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने 2020 से 2022 के बीच इंडियन एयरलाइंस कंपनियों को 1.3 लाख करोड़ रुपए का रेवेन्यू लॉस होने का अनुमान लगाया है।

एक्सपर्ट भी इस बात की ओर ही इशारा करते हैं। एयर इंडिया के पूर्व चीफ को-ऑर्डिनेटर और एविएशन एक्सपर्ट हर्षवर्धन मानते हैं कि देश की एविएशन इंडस्ट्री की हालत 4 से 5 साल पहले तक सुधरने की कोई गुंजाइश नहीं है। वो कहते हैं कि एक साल में ही कम से कम इंडस्ट्री को 90 हजार करोड़ रुपए का रेवेन्यू लॉस और 35 से 40 हजार करोड़ रुपए का नेट लॉस होने का डर है। इसके अलावा एयरपोर्ट, सपोर्ट स्टाफ, सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन का नुकसान अलग। कुल मिलाकर 1 लाख करोड़ रुपए का नुकसान होने वाला है।

पैसेंजर्स की कम संख्या पर हर्षवर्धन कहते हैं कि अभी भी सरकार लोगों में इतना कॉन्फिडेंस नहीं जगा पाई है कि उनके लिए हवाई यात्रा करना पहले की तरह सेफ है। लोगों को अभी भी डर लग रहा है। स्टाफ भी डरा रहता है। उनका मानना है कि इंटरनेशनल फ्लाइट्स शुरू होने में भी 4 से 5 महीने का वक्त लग सकता है।

पहली बार ऐसा जब पायलट्स तक की सैलरी में कटौती हो रही
कोरोनावायरस की वजह से दो महीने तक बंद पड़ी एविएशन इंडस्ट्री में लाखों नौकरियों पर भी खतरा है। इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (आईएटीए) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इंडियन एविएशन इंडस्ट्री और इससे जुड़े सेक्टर्स की 20 लाख से ज्यादा नौकरियां खतरे में हैं। ज्यादातर एयरलाइंस ने अपने स्टाफ को बिना सैलरी के ही छुट्टी पर भेज दिया है।

एविएशन इंडस्ट्री में नौकरी के खतरे को लेकर हर्षवर्धन कहते हैं, इंडियन एविएशन इंडस्ट्री के इतिहास में ये पहली बार है, जब पायलट्स और इंजीनियर्स को भी या तो नौकरी से निकाल दिया जा रहा है या फिर उनकी सैलरी में कटौती हो रही है। उनके मुताबिक, दुनियाभर में करीब 40% पायलट बेरोजगार हो गए हैं।

एयरलाइन कंपनियां पहले ही घाटे में चल रहीं
हमारे देश में एयरलाइन कंपनियों की माली हालत हमेशा से उतनी अच्छी नहीं रही है। कंपनियां शुरू तो हो जाती हैं, लेकिन फिर उन्हें या तो हर साल घाटा उठाना पड़ता है, या फिर कर्ज और घाटे की वजह से बंद हो जाती हैं। जेट एयरवेज और किंग्फिशर एयरलाइंस इसका उदाहरण भी हैं। जबकि, सरकारी कंपनी एयर इंडिया बिकने के लिए खड़ी है, लेकिन कोई खरीदार नहीं मिल रहा।

इसी साल लोकसभा में 19 मार्च को एयरलाइन कंपनियों की माली हालत को लेकर सवाल किया गया था। इस सवाल के जवाब में सिविल एविएशन मिनिस्टर हरदीप सिंह पुरी ने बताया था कि 2018-19 में एयरलाइन कंपनियों को 7 हजार 87 करोड़ रुपए से ज्यादा का घाटा हुआ था। जबकि, 2017-18 में कंपनियां 913 करोड़ रुपए के फायदे में थीं।

सबसे ज्यादा घाटे में सरकारी कंपनी एयर इंडिया रही। एयर इंडिया को 4 हजार 178 करोड़ रुपए का घाटा हुआ था। इसमें अकेले एयर इंडिया को 4 हजार 330 करोड़ रुपए का घाटा हुआ था; जबकि, एयर इंडिया एक्सप्रेस को 459 करोड़ और एलायंस एयर को 308 करोड़ रुपए से ज्यादा का घाटा हुआ था।

इस बारे में एविएशन एक्सपर्ट कहते हैं, हमारे देश में एयरलाइन कंपनियों की हालत बहुत खराब है। कौन सी कंपनी कब बंद हो जाए, कोई नहीं कह सकता। इसके लिए एक्सपर्ट सरकार को जिम्मेदार मानते हैं।

हर्षवर्धन बताते हैं, जिस चीन से कोरोना शुरू हुआ, वहां की सरकार ने सभी एयरलाइन कंपनियों को फाइनेंशियल सपोर्ट किया। कंपनियों से कह दिया है कि उनका घाटा सरकार उठाएगी। अमेरिका ने 1.5 लाख करोड़ रुपए की मदद की है। जर्मनी ने 80 हजार करोड़ रुपए दिए हैं। लेकिन, हमारे यहां की सरकार ने कोई मदद नहीं की। कंपनियों की उनकी हालत पर छोड़ दिया।

आईएटीए का डेटा भी यही कहता है। 15 मई को आई आईएटीए की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में 2019 में एयरलाइन कंपनियों को टिकटों की बिक्री से 1.72 लाख करोड़ रुपए का रेवेन्यू मिला था, उसकी तुलना में कोरोना के दौर में सरकार ने कोई मदद नहीं की।

2019 में कंपनियों को टिकट बिक्री से जितना रेवेन्यू मिला, उसकी तुलना में भारत ने कुछ मदद नहीं की

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