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आज की पॉजिटिव खबर:ओडिशा की चंदानी बांस, घास और पत्तों से बना रही इको फ्रेंडली पैकेजिंग; 500 कारीगरों को काम दिया, हर महीने कमा रहीं एक लाख रुपए

3 महीने पहलेलेखक: सुनीता सिंह

आज-कल प्लास्टिक का इस्तेमाल तकरीबन हर तरह की पैकेजिंग के लिए किया जाता है। प्लास्टिक पर्यावरण के लिए काफी नुकसानदेह है, लेकिन बिना किसी विकल्प के इसका इस्तेमाल पूरी तरह से बंद भी नहीं किया जा सकता। प्लास्टिक पैकेजिंग की इस समस्या को देखते हुए ओडिशा की चंदानी खंडेलवाल ने 'इकोलूप' (Ecoloop) नाम से स्टार्टअप शुरू किया है।

'इकोलूप' में नेचुरल रिसोर्सेज जैसे बांस, घास और पत्तों से करीब 20 तरह की गिफ्टिंग और पैकेजिंग प्रोडक्ट बनाता है। 2021 में मात्र 20 हजार रुपए की लागत से शुरू किये गए स्टार्टअप से आज हर महीने एक लाख रुपए की कमाई हो रही है। चांदनी अपने स्टार्टअप के जरिए ओडिशा के कई कारीगरों को न सिर्फ रोजगार दे रही हैं, बल्कि कई ब्रांड्स को इको फ्रेंडली पैकेजिंग उपलब्ध करा रही हैं।

आज की पॉजिटिव स्टोरी में जानते हैं चांदनी और उनके स्टार्टअप 'इकोलूप' के बारे में …

बचपन से ही नेचर की तरफ रहा रुझान

बांस, सबाई घास और पेपर मैशे से पैकेजिंग प्रोडक्ट्स बनाती हैं।
बांस, सबाई घास और पेपर मैशे से पैकेजिंग प्रोडक्ट्स बनाती हैं।

26 साल की चांदनी खंडेलवाल ओडिशा की बारीपदा की रहने वाली हैं, जिन्होंने स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स में पढ़ाई की। पढ़ाई के बाद खुद का स्टार्टअप शुरू करना चाहती थीं जो पूरी तरह से इको फ्रेंडली हो। चांदनी बताती हैं, “ओडिशा में बहुत सी प्राकृतिक चीजों से क्राफ्ट बनाये जाते हैं। जैसे - बांस, सबाई घास और पेपर मैशे से। कारीगर इन सभी चीजों से बहुत अलग-अलग और सुंदर प्रोडक्ट्स बनाते हैं। मैं ऐसा कुछ करना चाहती थी जिससे कि इन कारीगरों को ज्यादा से ज्यादा काम मिले और हम अपनी शिल्पकला को जीवित रख सकें।”

चांदनी बताती हैं कि उन्होंने कॉलेज के समय से ही ऐसी लाइफ स्टाइल चुनी जिसमें नेचर को कम से कम नुकसान हो। वे कहती हैं कि “मेरा टिफिन पॉलिथीन में आता था तो मैंने दो सालों तक ये पॉलिथीन इकट्ठा की। एक भी पॉलिथीन को कचरे में नहीं जाने दिया, बल्कि रिसाइकिल के लिए दिया। इस तरह नेचर को ग्रीन रखने की कोशिश की।”

रेलवे के पुराने से कार्डबोर्ड से बनाया पैकेजिंग

रेलवे में इस्तेमाल किए गए पुराने कार्डबोर्ड, फ्लेक्स शीट से डलिया वैगरह बनाती हैं।
रेलवे में इस्तेमाल किए गए पुराने कार्डबोर्ड, फ्लेक्स शीट से डलिया वैगरह बनाती हैं।

चांदनी बताती हैं कि कॉलेज के आखिरी साल में अहमदाबाद के मशहूर ‘राइजोम’ फर्म के साथ इंटर्नशिप करने का मौका मिला। इंटर्नशिप के दौरान उन्हें रेलवे में इस्तेमाल किए गए पुराने कार्डबोर्ड, फ्लेक्स शीट से कई पैकेजिंग प्रोडक्ट बनाए। उन्होंने राइजोम के एक ब्रांड के लिए सस्टेनेबल पैकेजिंग का डिजाइन भी तैयार किया जिसे बहुत सराहना मिली।। और यहीं से चांदनी ने सस्टेनेबल और इको फ्रेंडली पैकेजिंग के क्षेत्र में आगे बढ़ने का इरादा किया।

इको फ्रेंडली के तर्ज पर शुरू किया ‘इकोलूप’

चांदनी को ओडिशा रूरल डेवलपमेंट और मार्केटिंग सोसाइटी के साथ काम करने के बाद स्टार्टअप का आइडिया आया।
चांदनी को ओडिशा रूरल डेवलपमेंट और मार्केटिंग सोसाइटी के साथ काम करने के बाद स्टार्टअप का आइडिया आया।

2019 में चांदनी ने अपनी डिग्री पूरी करने के बाद ओडिशा रूरल डेवलपमेंट और मार्केटिंग सोसाइटी के साथ काम किया। चांदनी बताती हैं, “ इस सोसाइटी के साथ काम करने के दौरान मुझे ओडिशा के ग्रामीण इलाकों के कारीगरों से मिलने का मौका मिला। जो हैंडमेड चीजें बनाते थे। तब मुझे लगा कि हमारे पास पहले से ही कई इको फ्रेंडली विकल्प मौजूद हैं, जिन्हें अगर सही तरह से लोगों के सामने लाया जाए तो न सर्फ ग्रामीण कारीगरों को रोजगार मिलेगा, बल्कि नेचुरल चीजों से बने प्रोडक्ट्स से प्रकृति को कोई नुकसान भी नहीं होगा। मैंने इसी तरह इको फ्रेंडली से तर्ज पर इकोलूप स्टार्टअप शुरू किया।”

20 हजार के निवेश से शुरू किया स्टार्टअप

चांदनी गांव की कई महिला कारीगर के साथ मिलकर काम कर रही हैं।
चांदनी गांव की कई महिला कारीगर के साथ मिलकर काम कर रही हैं।

चांदनी बताती हैं उनके पास कई कारीगर हैं जो जो अलग-अलग प्रोडक्ट्स की पैकेजिंग बनाते हैं। शुरुआत में चांदनी ने कुछ कारीगरों से पैकेजिंग प्रोडक्ट बनवाए और कुछ क्लाइंट्स को दिखाया। इसके बाद, जैसे-जैसे उनके पास ऑर्डर्स आने लगे उसके अनुसार उन्होंने अपने काम को आगे बढ़ाया। चांदनी कहती हैं , “मैंने लगभग 20 हजार रुपए के निवेश से स्टार्टअप शुरू किया और उसके मुनाफे से अपने काम को आगे बढ़ाया। फिलहाल हम गिफ्टिंग पैकेजिंग पर काम कर रहे हैं और 20 तरह के प्रोडक्ट बनाते हैं।”

बांस, सबाई घास और पत्तों से बनाती हैं फ्रेंडली पैकेजिंग

इकोलूप में घास से टोकरी, डिब्बे, चटाई जैसी चीजें बनाई जाती हैं।
इकोलूप में घास से टोकरी, डिब्बे, चटाई जैसी चीजें बनाई जाती हैं।

चांदनी बताती हैं पैकेजिंग से लिए सबाई घास, बांस, पेपर मैशे के अलावा टेरोकोटा और ताड़ के पत्तों के क्राफ्ट का इस्तेमाल किया जाता है। ये सभी रॉ मटेरियल नेचुरल हैं। सबाई घास एक जंगली घास है, जिससे ग्रामीण इलाकों में टोकरी, डिब्बे, चटाई जैसी चीजें बनाई जाती हैं। कई जगहों पर लोगों को इसी घास के बनाए प्रोडक्ट से रोजगार मिलता है। चांदनी कहती हैं, “नेचुरल और किफायती होने के बावजूद इस तरह के प्रोडक्ट बड़े स्तर पर अपनी पहचान नहीं बना पाते हैं। इसका कारण मार्केटिंग की कमी और आज की मांग के हिसाब से प्रोडक्ट्स न बन पाना है। मैं अपने स्टार्टअप के जरिए इन्हीं दो बातों पर काम कर रही हूं, ताकि लोगों की जरूरतों के हिसाब से प्रोडक्ट बना सकूं और सही मार्केटिंग कर लोगों तक पहुंचा भी सकूं।”

कुछ ही समय में प्रोडक्ट की अच्छी डिमांड है

अपने इस स्टार्टअप से चांदनी ने 500 कारीगरों को काम दिया है और हर महीने एक लाख की कमाई कर रही हैं।
अपने इस स्टार्टअप से चांदनी ने 500 कारीगरों को काम दिया है और हर महीने एक लाख की कमाई कर रही हैं।

चांदनी बताती हैं कॉमन प्रोडक्ट के अलावा, वो लोगों की जरूरत और मांग के हिसाब से भी प्रोडक्ट डिजाइन कर रहीं हैं। स्टार्टअप अभी शुरूआती स्टेज पर है, लेकिन चांदनी का कहना है कि धीरे-धीरे वो इस इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो रहीं हैं। उन्हें हर महीने तीन से चार बल्क ऑर्डर मिल रहे हैं।

चांदनी बताती हैं, “मेरा उद्देश्य इकोलूप को सस्टेनेबल पैकेजिंग के क्षेत्र में बड़ा ब्रांड बनाना, ताकि सिर्फ ओडिशा ही नहीं बल्कि अलग-अलग इलाकों के कारीगरों के साथ काम करने का मौका मिले । हमारे देश के हर कोने में कोई न कोई खास शिल्पकला देखने को मिलती है जो प्लास्टिक प्रोडक्ट्स का अच्छा विकल्प है। जरूरत है बस सही प्लेटफॉर्म और मार्केटिंग की।”

चांदनी बताती हैं हैं कि इकोलूप के साथ फिलहाल 500 से ज्यादा कारीगर जुड़े हुए हैं और हर महीने तकरीबन एक लाख रूपए की कमाई हो रही है।

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