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आज की पॉजिटिव खबर:कैंसर से पिता की मौत हो गई, पैसे की कमी के चलते पढ़ाई छोड़नी पड़ी; अब गोबर से वर्मीकम्पोस्ट बनाकर 20 लाख रुपए सालाना कमा रहे

मिर्जापुर10 महीने पहलेलेखक: नितिन अवस्थी
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मिर्जापुर के रहने वाले मुकेश पांडेय और चंद्रमौली पांडेय दोनों भाई हैं। दोनों मिलकर गोबर से वर्मीकम्पोस्ट तैयार कर रहे हैं। - Dainik Bhaskar
मिर्जापुर के रहने वाले मुकेश पांडेय और चंद्रमौली पांडेय दोनों भाई हैं। दोनों मिलकर गोबर से वर्मीकम्पोस्ट तैयार कर रहे हैं।

मिर्जापुर से लगभग 30 किमी दूर एक गांव है सीखड़। यहां के रहने वाले मुकेश पांडेय और चंद्रमौली पांडेय दोनों भाई हैं। ये लोग गोबर से वर्मीकम्पोस्ट तैयार कर रहे हैं। तीन साल पहले ही दोनों ने इसकी शुरुआत की थी। उनका ये काम अब बिजनेस का रूप ले चुका है। वे देश के 6 राज्यों समेत नेपाल, मालदीव और श्रीलंका में भी वर्मीकम्पोस्ट सप्लाई कर रहे हैं। इससे दोनों भाइयों को 20 लाख रुपए से ज्यादा की सालाना आमदनी हो रही है।

पिता की कैंसर से मौत हुई तो एक भाई की पढ़ाई रह गई अधूरी

चंद्रमौली कहते हैं कि 2008 में पापा को कैंसर हो गया। इलाज में लाखों रुपए लग गए। 5 से 7 लाख रुपए तो कर्ज लेना पड़ा। फिर पापा की मौत भी हो गई। पैसों की किल्लत के चलते मेरी पढ़ाई अधूरी रह गई। बाद में लखनऊ में 8 हजार महीने की सैलरी पर एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में 4 साल तक काम किया। इसके बाद 2012 में वाराणसी में कंस्ट्रक्शन के पार्ट्स की एक दुकान भी डाली, लेकिन वह भी बहुत नहीं चल पाई।

चंद्रमौली के भाई मुकेश पांडेय अहमदाबाद से MBA कर रहे थे। उन्हें भी घर के हालात कचोट रहे थे। वे कहते हैं कि जब भी दोनों भाई गांव आते तो गांव में फैला गोबर और यहां के युवकों की बेरोजगारी देखकर सोचते थे कि गांव में ही कुछ किया जाए। इस दौरान हमें जानकारी मिली कि गोबर से वर्मीकम्पोस्ट तैयार करके अच्छा बिजनेस किया जा सकता है। इसके बाद 2017 में हमने इसकी शुरुआत की।

वर्मीकम्पोस्ट तैयार करने का सबसे आसान तरीका है बेड सिस्टम। इसके लिए जमीन पर प्लास्टिक डाल दी जाती है। उसके अंदर गोबर डालकर उसे अच्छी तरह से फैला दिया जाता है।
वर्मीकम्पोस्ट तैयार करने का सबसे आसान तरीका है बेड सिस्टम। इसके लिए जमीन पर प्लास्टिक डाल दी जाती है। उसके अंदर गोबर डालकर उसे अच्छी तरह से फैला दिया जाता है।

30 हजार से शुरुआत की, अब है 78 लाख टर्नओवर

मुकेश बताते है कि गोबर की वजह से गांव में बहुत गंदगी रहती थी। बरसात में चलना भी दूभर होता था। तब हमने इससे वर्मीकम्पोस्ट बनाना शुरू किया। लगभग 30 हजार रुपए हमने लगाए और अब हमारी कंपनी का टर्नओवर 78 लाख है। हमने कलेक्टिव-वे में बिजनेस को बढ़ाया। कई ई-कॉमर्स साइट पर भी हमारे प्रोडक्ट्स हैं। अब हम यूपी समेत आधा दर्जन राज्यों में अपना प्रोडक्ट सप्लाई करते हैं। इसे शुरू करने में हमने नाबार्ड, कृषि विभाग इत्यादि की मदद भी ली।

डेढ़ महीने मार्केट रिसर्च किया, लोगों को समझाने के लिए नुक्कड़ नाटक किए

मुकेश बताते है कि बिजनेस शुरू करने से पहले हमने मार्केट रिसर्च किया। जिसमें तकरीबन डेढ़ महीने का वक्त लगा। जिसमें हमने अपना फोकस एरिया तय किया कि हम अपना प्रोडक्ट कहां और कैसे बेचेंगे। चंद्रमौली कहते है कि उस समय यूरिया को लेकर लंबी लंबी लाइन लगती थी, लेकिन गांव के किसान ऑर्गेनिक खाद पर भरोसा नहीं करते थे। इसके बावजूद शहरों में रिस्पॉन्स अच्छा था। लोगों को समझाने के लिए हम दोनों भाई नुक्कड़ नाटक भी किया करते थे। कभी-कभी तो ऐसा भी होता था कि हमें कोई सुनने वाला भी नहीं होता था। फिर भी जब कई शहरों में हमने ऐसा किया तो रिस्पॉन्स मिलना शुरू हुआ।

दोनों भाई मिलकर देश के 6 राज्यों समेत नेपाल, मालदीव और श्रीलंका में भी वर्मीकम्पोस्ट सप्लाई कर रहे हैं।
दोनों भाई मिलकर देश के 6 राज्यों समेत नेपाल, मालदीव और श्रीलंका में भी वर्मीकम्पोस्ट सप्लाई कर रहे हैं।

लोगों ने कहा- पढ़-लिख कर गोबर का ही काम करना है

चंद्रमौली बताते है कि चुनौतियों के नाम पर बस ताने ही सुनने को मिले हैं, लेकिन अब वही लोग इज्जत की निगाह से देखते हैं। लोग कहते थे कि पांडेय जी के लड़के पढ़-लिख कर गोबर का काम करने गांव आए हैं तो पढ़ने-लिखने क्यों गए थे। मुकेश कहते हैं कि इन तानों में यह भाव भी था कि पंडित होकर ऐसा काम कैसे कर सकते हो। बहरहाल, इस काम में सबसे बड़ी चुनौती लेबर की भी रही। गांव में लगभग हर घर में गोबर होता है, लेकिन जब उसी काम में हाथ बंटाने की तनख्वाह देकर मजदूर ढूंढना चाहा तो कोई तैयार नहीं हुआ। बड़ी मुश्किल से दो महिलाओं को अपने साथ जोड़ा। आज के समय में 25 लोग हमारी कंपनी से जुड़े हुए हैं।

सोशल आंत्रप्रेन्योरशिप के तौर पर बिजनेस शुरू किया

मुकेश कहते है कि हमेशा ही मेरा सोचना था कि हमें सिर्फ फायदा ही नहीं कमाना है बल्कि अपने किसानों को भी फायदा देना है। मुकेश बताते है कि हमने वर्मीकम्पोस्ट के बेड बनाए, फिर किसानों को जोड़ा और उन्हें भी सिखाया। अब हम वर्मीकम्पोस्ट उनसे खरीदते हैं। साथ ही हमने यह भी ऑप्शन रखा कि यदि आप हमें गोबर देंगे तो हम किसानों को उससे बनी 60% वर्मीकम्पोस्ट देंगे और उस कम्पोस्ट से वह जो सब्जियां उगाएंगे, उन्हें हम सीधे खरीद लेंगे। सब्जियों वाला कॉन्सेप्ट अभी डेढ़-दो साल पहले शुरू किया है। इससे हमें सालाना ढाई से 3 लाख का फायदा हो रहा है। चंद्रमौली बताते हैं कि हम किसी और से रॉ मैटीरियल भी लेते हैं। किसान हमें गोबर देते हैं और हम उन्हें एक ट्रॉली का लगभग 1500 रुपए देते हैं। इस तरह से किसानों को भी फायदा हो रहा है।

अपना बिजनेस शुरू किया तो कई गुना बढ़ गई कमाई

वर्मीकम्पोस्ट बनने के बाद ऊपर से खाद निकाल ली जाती है, नीचे जो बचता है, उसमें केंचुए होते हैं। वहां से जरूरत के हिसाब से केंचुए निकालकर दूसरे बेड पर डाले जा सकते हैं।
वर्मीकम्पोस्ट बनने के बाद ऊपर से खाद निकाल ली जाती है, नीचे जो बचता है, उसमें केंचुए होते हैं। वहां से जरूरत के हिसाब से केंचुए निकालकर दूसरे बेड पर डाले जा सकते हैं।

दोनों भाइयों में मुकेश जहां मार्केटिंग का हिस्सा संभालते हैं, वहीं चंद्रमौली प्रोडक्शन का हिस्सा संभालते हैं। लगभग पौने दो सौ से ज्यादा किसान इनकी कंपनी से जुड़े हुए हैं। आने वाले समय में 500 किसानों को जोड़ना इनका लक्ष्य है। चंद्रमौली बताते हैं कि जब हमारी वाराणसी में दुकान थी तो हम 30 से 35 हजार महीना कमाते थे। अब सालाना दस लाख से ज्यादा की इनकम है। जबकि मुकेश अहमदाबाद से 8 लाख सालाना की नौकरी छोड़ कर आए थे। अब उनके हिस्से में भी 10 लाख से ज्यादा सालाना आता है। यही नहीं, हमने वर्मीकम्पोस्ट के लिए शुरुआत में जरूरत के हिसाब से 35 हजार में केंचुए खरीदे थे। अब हम खुद अलग-अलग वैरायटी के केंचुए तैयार कर बेच रहे हैं। 5 लाख रुपए के केंचुए तो हमने इस बार ही बेचे हैं।

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