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भास्कर रिसर्चशादी नहीं हो रही! ये पूर्वजों के कर्म:40 साल पहले बिगड़ा सेक्स रेश्यो...आज शादी न होने से सुसाइड करने वाले 61% पुरुष

18 दिन पहले
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शादियां स्वर्ग में तय होती हैं या नहीं, ये तो नहीं कह सकते…लेकिन पूर्वजों के कर्म शादी में आड़े जरूर आते हैं। ये बात हम आंकड़ों के पुख्ता आधार के साथ कह सकते हैं।

राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) हर साल देश में होने वाली आत्महत्याओं के आंकड़े जारी करता है। 2021 के आंकड़े बताते हैं कि देश में 2647 लोगों ने शादी न होने की वजह से आत्महत्या कर ली…और इसमें से 61% पुरुष थे।

2016 से 2021 तक के आंकड़ों की पड़ताल बताती है कि शादी न होने की वजह से आत्महत्या करने वालों में पुरुषों की हिस्सेदारी लगातार बढ़ी है। इसमें भी सबसे ज्यादा संख्या 25 से 40 वर्ष के पुरुषों की है।

इसकी वजह जानने के लिए हमें 30-40 साल पहले के आंकड़े देखने होंगे। 1980 से 2010 के बीच का यही वो दौर था जब भारत में लिंगानुपात सबसे ज्यादा बिगड़ा था। 1970 में जहां 1000 लड़कों पर 965 लड़कियां थीं, वहीं 2010 में यह गिरकर 918 लड़कियों तक पहुंच गया था।

इस बिगड़े लिंगानुपात की वजह से ही उस दौर में पैदा हुए पुरुषों के लिए शादी होने का चांस भी कम हो गया। इसके साथ ही 1990 के दशक में शुरू हुए ‘बेटी बचाओ’ अभियान की वजह से उस दौर में जन्मी लड़कियों के लिए प्राथमिकता शादी के बजाय करिअर बन गया।

आंकड़ों की भाषा में समझिए, किस तरह आज शादी न हो पाना कैसे 30 से 40 साल पहले की सामाजिक सोच से प्रभावित हुआ है।

पहले समझिए, भारत में नैचुरल लिंगानुपात किसे माना जाता है

1960 के दशक में 1000 लड़कों पर थीं 976 लड़कियां…इसे ही नैचुरल सेक्स रेश्यो मानते हैं

कुल आबादी में महिलाओं और पुरुषों की संख्या में अंतर भले कम हो, मगर जन्म के समय का लिंगानुपात बिगड़ने से भविष्य पर असर दिखता है।
कुल आबादी में महिलाओं और पुरुषों की संख्या में अंतर भले कम हो, मगर जन्म के समय का लिंगानुपात बिगड़ने से भविष्य पर असर दिखता है।

PEW रिसर्च की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में ओवरऑल लिंगानुपात अब अपने नैचुरल स्तर पर लौट रहा है।

दरअसल, लिंगानुपात दो तरह से मापा जाता है। पहला तरीका है बर्थ सेक्स रेश्यो यानी 6 साल तक के बच्चों में प्रति 1000 लड़कों पर कितनी लड़कियां हैं।

दूसरा तरीका है ओवरऑल सेक्स रेश्यो यानी देश की आबादी में प्रति 1000 पुरुषों पर कितनी महिलाएं हैं।

1960 के दशक में चाइल्ड सेक्स रेश्यो काफी बेहतर था। प्रति 1000 लड़कों पर 976 लड़कियां थीं।

उस दौर में समाज में लड़कों को ही प्राथमिकता दी जाती थी और बेटियों का जन्म अच्छा नहीं माना जाता था। मगर जन्म ले चुकी बेटी की हत्या करने की घटनाएं कम होती थीं।

इस वजह से लड़कियों की संख्या लड़कों से बहुत कम नहीं थी।

1970 के दशक में अबॉर्शन लीगल हुआ…और शुरू हो गई कन्या भ्रूण हत्या

भारत में प्री-नेटल टेस्ट 1970 के दशक से शुरू हो गए थे, मगर भ्रूण के लिंग निर्धारण को अवैध ठहराने वाला पीसीपीएनडीटी एक्ट करीब 25 साल बाद 1994 में लागू हुआ।
भारत में प्री-नेटल टेस्ट 1970 के दशक से शुरू हो गए थे, मगर भ्रूण के लिंग निर्धारण को अवैध ठहराने वाला पीसीपीएनडीटी एक्ट करीब 25 साल बाद 1994 में लागू हुआ।

मगर 1970 के दशक में देश में प्री-नेटल टेस्ट शुरू हुए। यानी जन्म से पहले बच्चे के लिंग का पता लगाने की सुविधा लोगों को मिली।

इसके साथ ही 1971 में मेडिकल कारणों से डाक्टरों के कहने पर किया गया अबॉर्शन कानूनन वैध ठहरा दिया गया।

इन दोनों कदमों की वजह से पहले ही लड़कों को वंश चलाने वाला मानने वाला भारतीय समाज कन्या भ्रूण हत्या की ओर बढ़ गया।

अब साल-दर-साल के आंकड़ों से समझिए कैसे आज की समस्या पूर्वजों की देन है

2021: 1616 पुरुषों ने शादी न होने की वजह से जान दे दी

  • NCRB के मुताबिक 2021 में कुल 2647 लोगों ने शादी न हो पाने की वजह से आत्महत्या कर ली। इसमें से 61.1% यानी 1616 पुरुष थे, जबकि 1031 महिलाएं।
  • इन 1616 पुरुषों में से 1507 की उम्र 18 से 45 के बीच थी। जबकि आत्महत्या करने वालों में 18 से 45 की उम्र की महिलाएं 958 ही थीं।
  • लड़कों की शादी की कानूनी उम्र तो 21 साल है, मगर भारत में लड़कों की शादी की औसत उम्र 20 से 24 साल होती है।
  • इस उम्र के जिन पुरुषों ने शादी न होने की वजह से आत्महत्या की, उनका जन्म 1997 से 2001 के बीच हुआ था। इस दौर में भारत में चाइल्ड सेक्स रेश्यो अपने सबसे निचले स्तर पर 918 के आस-पास था।

2020: 1372 लड़कों ने शादी न होने से जान दी…इनमें 92.5% 18 से 45 की उम्र के

  • 2020 की स्थिति 2021 से कुछ खास अलग नहीं थी। NCRB के मुताबिक 2020 में कुल 2237 लोगों ने शादी न होने की वजह से आत्महत्या की।
  • इनमें 1372 पुरुष और 865 महिलाएं थीं। यानी आत्महत्या करने वालों में पुरुषों की तादाद 61.4% थी।
  • इन पुरुषों में भी 1270 यानी 92.5% की उम्र 18 से 45 के बीच थी। 18 से 30 की उम्र के 716 पुरुषों ने आत्महत्या की।
  • आत्महत्या करने वाले पुरुषों में सबसे ज्यादा संख्या 18 से 30 वर्ष के पुरुषों की ही थी। इनका जन्म 1990 से 2002 के बीच हुआ था।
  • इस दौर में चाइल्ड सेक्स रेश्यो 930 से 914 के बीच रहा था।

2019: शादी न होने से आत्महत्या करने वालों में पुरुषों का शेयर 60% से कम था

  • 2019 की NCRB की रिपोर्ट के मुताबिक शादी न हो पाने की वजह से कुल 2331 लोगों ने आत्महत्या की थी।
  • इसमें से 1294 पुरुष और 1037 महिलाएं थीं। पुरुषों का शेयर 55% से ज्यादा था, मगर फिर भी 2020 और 2021 के मुकाबले पुरुषों का शेयर कम था।
  • आत्महत्या करने वाले पुरुषों में सबसे बड़ी संख्या 30 से 45 की उम्र वालों की थी। खास बात ये भी है कि इस आयुवर्ग में आत्महत्या करने वाले पुरुष, महिलाओं से करीब दोगुने थे।
  • आत्महत्या करने वाले पुरुषों में 577 की उम्र 18 से 30 के बीच थी। यानी इनकी पैदाइश 1989 से 2001 के बीच की थी।
  • इस दौर में चाइल्ड सेक्स रेश्यो अपने सबसे बुरे दौर से ठीक पहले की स्थिति में था। NFHS-1 के मुताबिक 6 साल तक के बच्चों में प्रति 1000 लड़कों पर करीब 932 लड़कियां थीं। मगर 2001 तक यह घटकर 927 रह गई थीं।

2018: 31% बढ़ गई थी शादी न होने से आत्महत्या करने वालों की संख्या

  • NCRB की रिपोर्ट के मुताबिक 2018 में कुल 2585 लोगों ने शादी न होने की वजह से आत्महत्या की थी।
  • यह संख्या 2017 के मुकाबले 31% ज्यादा थी। इसमें भी पुरुषों का शेयर 59.8% और महिलाओं का 40.2% ही था।
  • 2018 के आंकड़ों में आत्महत्या करने वालों का आयुवर्ग के हिसाब से अलग आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। मगर ट्रेंड के हिसाब से देखें तो इसमें भी 40 से 50% संख्या 25 से 35 की उम्र वालों की होनी चाहिए।
  • इनका जन्म 1983 से 1995 के बीच हुआ था। इस दौर में चाइल्ड सेक्स रेश्यो 2001 जितना कम तो नहीं था। मगर 1981 से 1991 के बीच आई गिरावट सबसे तगड़ी थी।

2017: शादी न होने से आत्महत्या करने वालों की संख्या में सबसे बड़ा उछाल

  • NCRB के मुताबिक 2017 में शादी न होने से आत्महत्या करने वालों की कुल संख्या 1972 थी।
  • यह संख्या 2016 के मुकाबले 35.2% ज्यादा थी। आत्महत्या करने वालों का आयुवर्ग के हिसाब से आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
  • हालांकि ट्रेंड के हिसाब से अगर इसमें ज्यादा संख्या 30 से 35 वर्ष के लोगों की मानी जाए तो उनका जन्म 1982 से 1987 के बीच हुआ था।
  • 1981 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक तब चाइल्ड सेक्स रेश्यो प्रति 1000 लड़कों पर 962 लड़कियों का था। मगर यही दौर था जब देश में कन्या भ्रूण हत्या के मामले सबसे तेजी से बढ़े भी थे।

2016: शादी न होने से आत्महत्या करने वालों में महिला और पुरुष लगभग बराबर

  • NCRB के मुताबिक 2016 में शादी न होने से आत्महत्या करने वालों की कुल संख्या 1459 थी।
  • इसमें 750 पुरुष और 709 महिलाएं थीं। यानी पुरुषों का शेयर 51.5% और महिलाओं का 48.5% था।
  • 2016 के आंकड़ों में भी आत्महत्या करने वालों का आयुवर्ग के हिसाब से अलग आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। मगर ट्रेंड के हिसाब से अगर इनमें ज्यादा संख्या 30 की आयु वालों की मानी जाए तो उनका जन्म 1981 या इससे पहले हुआ था।
  • 1971 की जनगणना में प्रति 1000 लड़कों पर लड़कियों की संख्या 964 थी। 1981 तक यह घटकर 962 तक रह गई थी। यानी स्थिति तब इतनी खराब नहीं थी।

अभी दो और पीढ़ियों को झेलनी होगी शादी के लिए दिक्कतें

NFHS-4 के मुताबिक 2015-16 में भी चाइल्ड सेक्स रेश्यो अच्छा नहीं था। प्रति 1000 लड़कों पर 919 ही लड़कियां थीं।

NFHS-5 के मुताबिक 2019-21 में भी 1000 लड़कों पर 929 लड़कियां ही थीं। यानी अभी तक हम 1960 या 1970 के दशक का चाइल्ड सेक्स रेश्यो भी दोबारा नहीं पा सके हैं।

हालांकि NFHS-5 के मुताबिक आबादी में ओवरऑल सेक्स रेश्यो काफी सुधर गया है। प्रति 1000 पुरुषों पर 1020 महिलाएं हैं। लेकिन चाइल्ड सेक्स रेश्यो खराब होने की वजह से भविष्य में यह अनुपात भी खराब हो सकता है।

2015 में जन्मा लड़का 2045 में 30 वर्ष का होगा। 2015-16 के खराब सेक्स रेश्यो का मतलब है कि तब तक शादी की उम्र की लड़कियों की संख्या इस उम्र के कुल लड़कों से कम होगी।

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