ठाणे के ‘ठाकरे’ महाराष्ट्र के नए CM:पिता फैक्ट्री मजदूर थे, मां ने घरों में काम किया; शिंदे ने परिवार पालने के लिए खुद ऑटो चलाया

मुंबई7 महीने पहले

महाराष्ट्र में मौजूदा राजनीतिक उथल-पुथल में जिस शख्स का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है, वे हैं एकनाथ शिंदे। ठाणे के ठाकरे कहे जाने वाले एकनाथ शिंदे का राज अब पूरे महाराष्ट्र में चलेगा। वह महाराष्ट्र के नए सीएम बने हैं।

ठाणे की कोपरी-पछपाखाड़ी विधानसभा सीट से विधायक और उद्धव सरकार में नगर विकास और सार्वजनिक निर्माण मंत्री रहे शिंदे की ठाणे में मजबूत पकड़ है। एकनाथ, एक नाम नहीं बल्कि अपने आप में एक पार्टी हैं। ठाणे की जनता उन्हें शिवसेना के संस्थापकों में से एक आनंद चिंतामणि दिघे के प्रतिबिंब के रूप में देखती है। यही वजह है कि लोग आंख बंद करके शिंदे के फैसले के साथ खड़े हैं।

दैनिक भास्कर ने भी 'शिंदे के साम्राज्य' में पहुंच कर ये पड़ताल की कि कैसे एक मजदूर पिता और घरों में काम करने वाली मां का ऑटो ड्राइवर बेटा संघर्ष करके सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर पहुंच गया। आप भी पढ़िए हमारी ये खास रिपोर्ट ...

पूरे ठाणे से उद्धव की फोटो गायब, हर तरफ दिखते हैं शिंदे

एकनाथ शिंदे के सीएम बनने के ऐलान के बाद पूरे ठाणे में शिवसेना में जश्न का माहौल है।
एकनाथ शिंदे के सीएम बनने के ऐलान के बाद पूरे ठाणे में शिवसेना में जश्न का माहौल है।

एकनाथ शिंदे के सीएम बनने के ऐलान के बाद पूरे ठाणे में शिवसेना में जश्न का माहौल है।

एकनाथ शिंदे के पीछे न सिर्फ ठाणे की जनता खड़ी है, बल्कि दो तिहाई से ज्यादा, यानी शिवसेना के 40 विधायक भी हैं। शिंदे ने उद्धव के खिलाफ बगावती सुर क्या बुलंद किए, पूरे ठाणे जिले में उनके समर्थन में बैनर और पोस्टर लग गए। इन पोस्टर्स में बाला साहब तो थे, लेकिन मौजूदा शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की तस्वीर गायब हो गई।

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राजनीति में एंट्री कर पानी की समस्या दूर की

शिंदे का बचपन ठाणे के किसन नगर वागले स्टेट 16 नंबर में बीता। आज यहां उनका एक फ्लैट भी है। इसमें वे अपने माता-पिता और तीन भाई-बहनों के साथ रहते थे। उनके बचपन के दोस्त जगदीश पोखरियाल बताते हैं कि एकनाथ शुरू से ही लोगों के लिए खड़े होने वालों में से थे। यहां पीने के पानी की भारी समस्या थी।

महिलाओं को दूर से पानी लाना पड़ता था। इस परेशानी को देखते हुए शिंदे को उनके एक दोस्त ने पॉलिटिक्स में उतरने की सलाह दी। शुरू में शिंदे ने मना किया, लेकिन बाद में वे RSS शाखा से जुड़ गए।

मुस्लिमों ने कराई शिवसेना में एंट्री

ये हफीजुर्रहमान चौधरी की दुकान है, जहां एकनाथ शिंदे ने ठाणे नगर निगम का चुनाव लड़ने का फैसला किया था।
ये हफीजुर्रहमान चौधरी की दुकान है, जहां एकनाथ शिंदे ने ठाणे नगर निगम का चुनाव लड़ने का फैसला किया था।

ये हफीजुर्रहमान चौधरी की दुकान है, जहां एकनाथ शिंदे ने ठाणे नगर निगम का चुनाव लड़ने का फैसला किया था।

ठाणे में शिंदे का कद कुछ ऐसा है कि शिवसेना का मूल कैडर यानी हिंदू ही नहीं, मुस्लिम भी उनके साथ खड़ा है। यही वजह है कि शिंदे के नाम पर दोनों समुदायों के लोगों ने उनके बेटे श्रीकांत शिंदे को चुन कर लोकसभा में भेजा। एकनाथ के PA रह चुके इम्तियाज शेख उर्फ ‘बच्चा’ ने बताया कि शिवसेना से जुड़ने से पहले शिंदे RSS शाखा प्रमुख थे और ऑटो रिक्शा चलाते थे।

आनंद दिघे एक दिन उनके इलाके में आए और उन्होंने लोगों से पूछा कि वे अपने पार्षद (नगर सेवक) के रूप में किसे देखना चाहते हैं। इस पर इम्तियाज समेत सैकड़ों मुसलमानों ने एक सुर में एकनाथ शिंदे का नाम आगे कर दिया। इसके बाद ही शिंदे की सक्रिय रूप से शिवसेना में एंट्री हुई।

यहीं फेब्रिकेशन की दुकान चलाने वाले हफीजुर्रहमान चौधरी ने बताया कि उनकी दुकान पर बैठ कर ही एकनाथ शिंदे ने नगर सेवक चुनाव लड़ने का फैसला किया था।

पिता गत्ते की कंपनी में और मां घरों में काम करती थीं

शिंदे आज भले ही महाराष्ट्र के नए CM बन गए हैं, लेकिन एक वक्त ऐसा भी था जब उनके घर की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। 1990-92 के बीच एकनाथ शिंदे की गाड़ी चला चुके हलीम शेख ने बताया कि उनके पिता संभाजी शिंदे एक गत्ते की कंपनी में और मां घरों में काम किया करती थीं। इतनी गरीबी के बावजूद शिंदे ने कभी कोई गलत रास्ता नहीं चुना और हमेशा अपनों की मदद के लिए तैयार रहते थे।

दो बच्चों की मौत के बाद छोड़ दी थी पॉलिटिक्स

एकनाथ शिंदे का कहना है कि उन्हें राजनीति में लाने और अहम जिम्मेदारियां देकर नेतागीरी सिखाने वाले आनंद दिघे ही थे। इस तस्वीर में शिंदे अपने गुरु आनंद दिघे के साथ मौजूद हैं।
एकनाथ शिंदे का कहना है कि उन्हें राजनीति में लाने और अहम जिम्मेदारियां देकर नेतागीरी सिखाने वाले आनंद दिघे ही थे। इस तस्वीर में शिंदे अपने गुरु आनंद दिघे के साथ मौजूद हैं।

2 जून 2000 की बात है। एकनाथ शिंदे अपने 11 साल के बेटे दीपेश और 7 साल की बेटी शुभदा के साथ सतारा गए थे। बोटिंग करते हुए एक्सीडेंट हुआ और शिंदे के दोनों बच्चे उनकी आंखों के सामने डूब गए। उस वक्त शिंदे का तीसरा बच्चा श्रीकांत सिर्फ 14 साल का था।

इस हादसे के बाद शिंदे इस कदर टूट गए कि उन्होंने राजनीति से संन्यास का ऐलान कर दिया। शिंदे के साथ पिछले 40 सालों से रह रहे देविदास चालके ने बताया कि बच्चों की मौत के बाद एकनाथ ने खुद को एक कमरे में कैद कर लिया। वे किसी से नहीं मिलते थे और न ही किसी से बात करते थे। फिर उनके राजनीतिक गुरु और शिवसेना के कद्दावर नेता आनंद दिघे ही उन्हें वापस राजनीति में लाए थे।

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मजदूर बने, मछली छीलने का काम भी किया

देविदास चालके ने यह भी बताया कि परिवार को आर्थिक तंगी से उबारने के लिए एकनाथ शिंदे ऑटो चलाने के साथ-साथ लेबर कॉन्ट्रैक्टर के रूप में भी काम करते थे। कई बार ऐसा हुआ कि काम ज्यादा आ गया और मजदूर कम होते थे। ऐसे वक्त में खुद शिंदे ने बतौर लेबर काम किया। वे अपने हाथों से मछलियां भी साफ करते थे।

भाषण देते-देते चली गई थी शिंदे की आवाज

शिंदे के बचपन के तीन दोस्त, जिन्होंने तमाम वाकयों का जिक्र कर बताया कि शिंदे जनता के बीच कैसे लोकप्रिय हुए।
शिंदे के बचपन के तीन दोस्त, जिन्होंने तमाम वाकयों का जिक्र कर बताया कि शिंदे जनता के बीच कैसे लोकप्रिय हुए।

शिंदे के बचपन के तीन दोस्त, जिन्होंने तमाम वाकयों का जिक्र कर बताया कि शिंदे जनता के बीच कैसे लोकप्रिय हुए।

देविदास ने आगे बताया कि एकनाथ शिंदे की लाइफ में एक वक्त ऐसा भी आया, जब उनकी आवाज तकरीबन 15 दिनों के लिए चली गई थी। यह वक्त 2014 के लोकसभा चुनावों का था।

शिंदे ने पूरे महाराष्ट्र में इतना प्रचार किया कि उनकी आवाज ही चली गई थी। हालांकि डॉक्टर्स के प्रयास से उसे फिर से वापस लाया गया। इसके बावजूद वे शिवसेना के लिए लड़ते रहे और आज उन पर बागी होने का आरोप लगाया जा रहा है। उन पर आरोप वे लोग लगा रहे हैं, जो कभी लोगों से मिलते तक नहीं थे।

पानी में डूबते मोहल्ले को शिंदे ने बचाया था

एकनाथ शिंदे के मित्र और सुख-दुःख के साथी रहे मिलिंद झांडे ने एक पुराने किस्से को याद करते हुए बताया कि एक बार किसन नगर इलाके से गुजरने वाली वाटर पाइपलाइन फट गई और इलाके में पानी भरने लगा। निगम के कर्मचारियों को आने में देर हो रही थी।

यह जानकारी जैसे ही एकनाथ शिंदे को मिली, वे मौके पर पहुंचे और पानी में कूद गए। निगम के कर्मचारियों के आने से पहले ही उन्होंने टूटी हुई पाइपलाइन ठीक कर दी और इलाके को डूबने से बचा लिया।

राशन खत्म हुआ तो शिंदे ने गोदाम ही खुलवा दिया

शिंदे के बचपन के दोस्त पोपट धोत्रे ने बताया कि एक बार उनकी चॉल में राशन की कमी हो गई थी। स्थानीय लोगों को न चावल मिल रहा था और न ही चीनी। यह जानकारी जब एकनाथ को हुई तो वे सीधे इन्हें पैक करने वाली कंपनियों के गोदाम में पहुंचे और वहां से राशन उठा कर कमला नगर में रहने वालों तक पहुंचाया। धोत्रे ने आगे बताया कि एकनाथ शिंदे, अपने राजनीतिक गुरु आनंद दिघे के नक्शेकदम पर चलते हैं।