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  • Even After 6 Years, The Case Of Akhlaq's Murder Stuck In The Sessions Court Itself, Justice Was Not Received Even After More Than 100 Hearings In The Rakbar Khan Case

3 राज्यों के 3 लिंचिंग केस की पड़ताल:6 साल बाद भी अखलाक केस सेशन कोर्ट में अटका, रकबर के मामले में 100 से ज्यादा सुनवाई; 3 केस में 28 में से 25 आरोपी जमानत पर बाहर

नई दिल्ली22 दिन पहलेलेखक: वैभव पलनीटकर

आज से ठीक 6 साल पहले नोएडा के दादरी में मोहम्मद अखलाक नाम के एक शख्स की भीड़ ने पीट-पीट कर हत्या कर दी। देशभर में इस घटना ने सुर्खियां बंटोरी, प्रदर्शन हुए, नारेबाजी हुई, 100 से अधिक बार मामले की सुनवाई हुई, लेकिन वारदात के 6 साल बाद भी केस सेशन कोर्ट में ही अटका पड़ा है। सभी आरोपी जमानत पर बाहर हैं। इतना ही नहीं इस मामले में सबूतों पर भी सुनवाई पूरी नहीं हो सकी है। ये आलम सिर्फ अखलाक लिंचिंग केस का नहीं है। देश में इस तरह के कई मामले हैं जो लंबे वक्त के बाद भी न्याय से महरूम हैं।

इसे समझने के लिए हमने अखलाक के साथ ही हरियाणा और राजस्थान से भी लिंचिंग के एक-एक केस लिए। हमने जाना कि लिंचिंग के इन मामलों में कोर्ट की कार्यवाही कहां तक पहुंची है? फैसले में हो रही देरी के क्या कारण हैं? पीड़ित परिवारों पर क्या बीत रही है और उनकी न्याय की उम्मीद कितनी जिंदा है?

केस-1 : मोहम्मद अखलाक, दादरी, उत्तर प्रदेश

28 सितंबर 2015 को रात करीब साढ़े 10 बजे दादरी के बिसाहड़ा गांव में मोहम्मद अखलाक नाम के शख्स के घर में कुछ लोग लाठी-डंडे लेकर घुसते हैं। लोगों को कथित तौर पर घर में गाय का मांस होने का शक था। 50 साल के अखलाक की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी और अखलाक के बेटे दानिश की जमकर पिटाई की। दानिश की दादी और अखलाक की मां के साथ भीड़ ने कथित तौर पर छेड़छाड़ भी की।

केस का स्टेटस क्या है?

अखलाक पक्ष के लिए सेशन कोर्ट में पैरवी कर रहे वकील यूसुफ सैफी बताते हैं कि ‘वारदात के 6 साल बाद भी केस में फैसला आने में अभी और कितना वक्त लगेगा कुछ नहीं कहा जा सकता। 16 आरोपियों में से सभी के सभी बेल पर रिहा हैं। अभी केस में सबूतों पर सुनवाई चल रही है और बयानात दर्ज किए जा रहे हैं। यूपी सरकार सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का पालन नहीं कर रही है। अभी भी सेशन कोर्ट का फैसला आने में एक डेढ़ साल या उससे ज्यादा भी लग सकता है।’

जिंदा रहते न्याय मिलेगा इसकी उम्मीद कम

मोहम्मद अखलाक के छोटे भाई जान मोहम्मद सैफी बताते हैं कि जब ये वारदात हुई है तभी पूरे परिवार ने बिसाहड़ा गांव छोड़ दिया था और अब वो दादरी कस्बे में रहते हैं। घटना के 6 साल बाद भी केस में फैसला कब तक आएगा साफ नहीं है। मोहम्मद कहते हैं कि- ‘आरोपी पक्ष के लोग समझौता करने के लिए दबाव बनाते रहते हैं। हम उम्मीद करते हैं हमें इंसाफ मिलेगा। अखलाक की मां और पत्नी अपने जीते जी इस केस का फैसला होते हुए देख पाएंगी ऐसा तो नहीं लग रहा है।’

केस- 2 : जुनैद खान, फरीदाबाद, हरियाणा

22 जून 2017 को फरीदाबाद के रहने वाले जुनैद खान की दिल्ली-मथुरा लोकल ट्रेन में सफर करते वक्त चाकू मारकर हत्या कर दी गई। जुनैद के भाई और चचेरे भाई को भी गंभीर चोटें आईं। कथित रूप से सीट पर बैठने को लेकर विवाद शुरू हुआ, इसके बाद भीड़ ने जुनैद पर हमला कर दिया। जुनैद अपने भाइयों के साथ दिल्ली से ईद की खरीदारी करके लौट रहा था।

क्या है स्टेटस?

जुनैद लिंचिंग केस में वकील निबरास अहमद पीड़ित पक्ष की तरफ से पैरवी कर रहे हैं। अहमद ने बताया कि- ‘सेशन कोर्ट में हमारा केस चल रहा था और इसमें गवाहों की पेशी होनी थी। इन्वेस्टिगेशन एजेंसी ने जमानत याचिका की सुनवाई के ठीक पहले आरोपियों के ऊपर से 302 और 307 जैसी गंभीर धाराएं हटा दी थीं। इसके बाद आसानी से आरोपियों की जमानत हो गई। जब दोबारा आरोपियों की सुनवाई हुई तो हमने अपने पक्ष को रखा। अभी तक 2 लोगों पर धारा 302 के तहत चार्ज फ्रेम हो गए हैं, लेकिन बचे हुए आरोपियों पर हत्या के चार्ज नहीं लगाए गए हैं।’

जुनैद लिंचिंग केस में फिलहाल सभी 7 आरोपी जमानत पर बाहर हैं। मुख्य आरोपी नरेश को पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट से शर्तों के साथ जमानत मिली हुई है। वकील निबरास कहते हैं कि- ‘जैसे ही सुप्रीम कोर्ट में हमारी SLP की सुनवाई होती है तो इस मामले में आरोपी को कोर्ट या जांच एजेंसी के सामने सरेंडर करना होगा और इसके बाद हमारी मांग होगी कि इस केस में स्पीडी ट्रायल के जरिए मामले को निष्कर्ष तक पहुंचाया जाए, लेकिन अभी इस सब में कितना वक्त लगेगा कहा नहीं जा सकता।’

केस में देरी क्यों हो रही?

वकील निबरास अहमद बताते हैं कि ‘अगर जांच एजेंसी की तरफ से 302 सेक्शन नहीं हटाए गए होते तो ट्रायल जल्दी पूरा हो सकता था, लेकिन हत्या के चार्ज हटाए जाने के बाद हमने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई, इसी की वजह से केस में देरी हो रही है। कोविड संकट की वजह से कोर्ट की सुनवाई होने में दिक्कत आई, केस की डेट मिलने में देरी हुई है। रही बात सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस की तो कोई भी स्पीडी ट्रायल नहीं हो रहा है। जांच एजेंसियां भी इन मामलों में सहयोगी रुख नहीं अपना रही हैं।’

परिवारजनों की जल्दी न्याय की मांग

जुनैद का परिवार अब भी हरियाणा के फरीदाबाद में खंडावली गांव में रहता है। हम उनके घर पहुंचे और उनकी मां सायरा और भाइयों से मुलाकात की। जुनैद केस की बात शुरू होते ही जुनैद की अम्मी के आसूं छलक पड़े, वो जुनैद की पुरानी फोटो निकालकर दिखाने लगीं और कहने लगीं कि ‘आज 4 साल 3 महीने का वक्त हो गया है, लेकिन अब तक कातिलों को कोई सजा नहीं हुई है, वो सब खुले घूम रहे हैं। ये कैसा इंसाफ है? हम हर दिन जुनैद की याद में मरते रहते हैं।’

केस- 3 : रकबर खान, अलवर, राजस्थान

20 जुलाई, 2018 की रात को हरियाणा के कोलगांव के रहने वाले रकबर खान की राजस्थान के अलवर जिले के लालावंडी गांव में कथित तौर पर गौरक्षकों ने पिटाई की। 31 साल के रकबर खान, अपने दोस्त असलम खान के साथ राजस्थान के लादपुरा गांव से गाय खरीदकर पैदल लौट रहे थे। तभी रामगढ़ पुलिस थाने के तहत आने वाले लालावंडी गांव में लोगों ने उन्हें रोका। भीड़ की पिटाई के बाद रकबर की मौत हो गई थी। वहीं असलम बचकर भागने में कामयाब रहा था।

केस का क्या स्टेटस है?

घटना के 3 साल और 2 महीने बाद भी अभी मामले की सुनवाई अलवर के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज नंबर 1 सरिता स्वामी की अदालत में चल रही है। इस केस में पीड़ित पक्ष की तरफ से पैरवी कर रहे सीनियर स्पेशल प्रॉसिक्यूशन ऑफिसर एनए नकवी ने भास्कर से बातचीत में बताया कि- 'सेशन कोर्ट अलवर में फिलहाल सबूतों पर सुनवाई चल रही है। आरोपी नवल किशोर की बाद में हुई गिरफ्तारी के बाद सप्लीमेंट्री चार्जशीट फाइल की गई है। रकबर के साथी असलम के बयान के क्रॉस एग्जामिन होना है। जल्दी फैसला आने की उम्मीद कम ही है।'

फैसले में देरी क्यों हो रही?

प्रॉसिक्यूशन वकील अशोक कुमार शर्मा ने बताया कि- ‘केस में देरी आरोपी पक्ष की वजह से हो रही है। कभी आरोपी पेश नहीं होता, कभी गवाह पेश होने में देरी होती है। ज्यूडिशियरी भी सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का पालन नहीं कर रही है। कोर्ट पर केसों का इतना दबाव रहता है कि डे टु डे सुनवाई नहीं हो पाती है। हमने HC में 319 की एप्लिकेशन लगाई थी, जिसमें अपील की गई थी कि एक और आरोपी हरीश को तलब किया जाए। अब जब तक इस अपील पर हाईकोर्ट में फैसला नहीं हो जाता तब तक HC ने सेशन कोर्ट को आखिरी फैसला सुनाने पर रोक लगाई हुई है।’

परिवारजनों की जल्दी न्याय की मांग

रकबर का परिवार अब भी हरियाणा के नूंह जिले के कोलगांव में रहता है। हम उनके घर पहुंचे तो रकबर के पिता, पत्नी और उनके बच्चों से मुलाकात हुई। रकबर की पत्नी अस्मीना से जब हमने पूछा कि रकबर लिंचिंग केस में हो रही सुनवाई से क्या वो संतुष्ट हैं? जवाब में अस्मीना कहती हैं कि- ‘केस तो ठीक चल रहा है, लेकिन वक्त ज्यादा लग रहा है। जब भी केस की सुनवाई होती है या जिक्र होता है तो रकबर को खोने के घाव फिर से हरे हो जाते हैं। मेरी मांग है कि इस केस की सुनवाई जल्द से जल्द पूरी की जाए और हमें न्याय मिले’।

तीनों ही मामलों में सालों बीत जाने के बाद भी अभी नहीं कहा जा सकता कि फैसला कब तक आएगा। सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाले इन मामलों में जल्दी सुनवाई किए जाने की सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का भी पालन होता हुआ नहीं दिख रहा है।

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