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बात बराबरी की:भले ही ज्यादातर घरों में स्मार्ट टीवी आ गए, अलग-अलग तरह के शो बन गए; लेकिन रिमोट कंट्रोल पुरुषों के हाथ में है

नई दिल्ली5 दिन पहले
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दूसरे विश्व युद्ध के तुरंत बाद की बात है। दुनिया तबाही के बाद की हरियाली से भरी थी। सजे-संवरे ड्रॉइंगरूम में शहीद अफसरों की तस्वीरों के बीच टेलीविजन सेट होता। दफ्तर से लौटे पुरुष गुदगुदे सोफा पर बैठ, पाइप पीते हुए टीवी देखते। टीवी पर भी उसी तरह के शो आते, जिनमें सिगार पीते पुरुष जंग और बाद के हालातों पर चर्चा करते होते। पीछे शीशे की अलमारी में युद्ध में जीती ट्रॉफियां सजी होतीं। इस बीच कमरे में घर की औरत की झलक दिखती। वो फुर्ती से आकर यहां-वहां झाड़-पोंछ करती। काम करते हुए उचटती-सी नजर टीवी पर डालती और फिर काम में जुट जाती।

अब बात करते हैं 2021 की। मीडिया पर परामर्श देने वाली संस्था ऑरमैक्स मीडिया (Ormax Media) ने एक रिपोर्ट जारी की। एंड द रिमोट गोज टू (And the Remote Goes to) नाम से इस रिपोर्ट में ये समझने की कोशिश थी कि घरों में टीवी का रिमोट किसके हाथ में होता है। पहली बार साल 2012 में भारत के सभी बड़े शहरों में ये सर्वे हुआ। जिसके बाद साल 2020 के लॉकडाउन के दौरान एक बार फिर से सर्वे हुआ। इस बार देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 5 हजार से ज्यादा घरों को इसमें शामिल किया गया। इसमें दिखा कि भले ही ज्यादातर घरों में स्मार्ट टीवी आ गई, अलग-अलग तरह के शो के विकल्प बढ़े लेकिन रिमोट कंट्रोल पुरुषों के हाथ में ही रहा।

स्टडी बताती है कि शाम को जैसे ही पुरुष घर में घुसते हैं, रिमोट उनके हवाले हो जाता है। इसके बाद से देर रात तक वही टीवी देखते हैं। अगर कोई खास शो पसंद न आ रहा हो तो भले ही वे चैनल बदलते रहें लेकिन मजाल है, जो रिमोट घर की औरतों के हाथ पड़ जाए। सप्ताहांत पर भी टीवी पुरुषों के लिए आरक्षित रहती है। वे टेलीविजन सेट के सामने किसी मूर्ति की तरह स्थापित हो जाते हैं, वहीं पर चाय-नाश्ता करते और खाना खाते हैं। ठीक किसी होटल की तर्ज पर मनपसंद डिश की फरमाइश होती है और पसीने-मसाले में महकती-लहकती गृहिणी तश्तरी सजाकर हाजिर हो जाती है।

सर्वे के नतीजे जानकर लोगों को लग सकता है, इसमें एतराज जैसी भला क्या बात! आखिर सारा दिन रिमोट औरतों के पास होता है और दोपहरों में वे टीवी देखने के अलावा काम भी क्या करती हैं! सही बात है। गृहिणियां दिनभर टीवी देख सकती हैं बशर्तें, वे फुर्सत में हों। घर की सफाई, नाश्ता, बच्चे हों तो उन्हें तैयार करके स्कूल भेजना, लॉन्ड्री, खाना पकाना, पति का टिफिन बनाना- इसके बाद बचे समय में सुबह के तूफान से बिखरे घर को जमाना। ये सारे काम बिल्कुल दफ्तर जितना, या उससे ज्यादा वक्त और मशक्कत मांगते हैं। दफ्तर के घंटों में लंच या चाय-पानी ब्रेक भी होता है। कई सारे दोस्त-यार होते हैं, जिनसे गपशप हो पाती है। और सबसे बड़ी बात- दफ्तर के आठ या नौ घंटों के बाद पुरुष फ्री होते हैं। वे चाहें तो किताबें पढ़ें, चाहे वीडियो गेम खेलें या फिर गपबाजियां करें।

दफ्तर से लौट, टीवी के सामने बैठा पुरुष शायद ही कभी सब्जी तराशता या स्वेटर बुनता दिखे। घर उसके लिए आरामगाह होती है, जहां वो मनमर्जी से रहता है। वहीं गृहिणी के लिए घर ही उसका कार्यक्षेत्र है। वो चौबीसों घंटे इसी दफ्तर में रहती है। यही कारण है कि अगर वो इन चौबीस घंटों में अपने मनबहलाव के लिए कुछ भी करे तो उसे अपराध-बोध होने लगता है। वो टीवी के सामने बैठी तो होती है, लेकिन इस बीच कोई न कोई काम करती होती है। कभी फलियां तोड़ी जाती हैं तो कभी आटा गूंथा जाता है। या फिर टीवी का वॉल्यूम बढ़ाकर वो रसोई के काम निपटाती चलती है।

किसी महिला को कोई खास डेली-सोप पसंद हो तो वो इंतजार करती है कि जब घर खाली हो, वो सीरियल देखे। सास-बहू ड्रामा तभी चलते हैं, जब घर के पुरुष बाहर हों। वजह! औरतों को बताया जा चुका है कि ये सारे सीरियल मूर्ख लोगों ने, उन जैसे मूर्खों के लिए ही बनाए हैं। औरत की पसंद को मूर्खता का दर्जा दे दिया गया ताकि वे अपनी प्राथमिकता को लेकर हीनभावना से भरी रहें। यही वजह है कि गृहिणी के अलावा कामकाजी औरत, जो दफ्तर में पुरुषों पर भारी पड़े, वो भी डंके की चोट पर किसी सीरियल को अपनी पसंद नहीं बता पाती।

खुद को कमतर मान चुकी औरतें कभी ये भी नहीं पूछ पातीं कि चीखते-चिल्लाते और गालियां देते खिलाड़ियों से भरे क्रिकेट में ऐसा क्या है, जो मर्द सुईपटक सन्नाटे के बीच उसे देखते हैं। या फिर बासी खबरों में ऐसा क्या है, जो उसे देखना निहायत जरूरी हो जाता है। कुल मिलाकर औरतों को ये अहसास करा दिया गया कि टीवी पर पुरुष जो भी देखते हैं, वो ज्यादा प्रतिष्ठित है, जबकि औरतों की पसंद उन्हें और कुंदजहन बना रही है। लब्बोलुआब ये कि गृहिणियां अपने घरेलू टाइमटेबल में थोड़ी-बहुत गुंजाइश निकालकर टीवी देखती हैं, जबकि पुरुष रोजाना कई घंटों तक लगातार, बगैर बाधा के अपनी पसंदीदा चीजें देख पाते हैं।

औरत-मर्द के बीच का ये निहायत घरू फर्क टीवी पर प्रोग्राम बनाने वालों की नजरों से भी बचा नहीं। प्रोडक्शन हाउस ने शाम के समय को प्राइम टाइम नाम दे दिया। यानी सबसे जरूरी समय। इस वक्त लगभग वही चीजें आती हैं, जो पुरुषों के मन-लायक हों, जैसे खबरें या क्राइम पर कोई कड़ी। प्रोग्राम बना रहे लोगों को पता है कि इस समय घर का मुखिया टीवी के सामने होगा, और गृहिणी रसोई में खटपट करती होगी। वैसे ऐसा नहीं है कि प्राइम टाइम में औरत-मार्का सीरियल न आएं, लेकिन दोपहर के समय उनका पुनर्प्रसारण होता है कि खाली बैठी औरतें रसोई की राजनीति में मन बहला लें।

स्कॉटलैंड के वैज्ञानिक जॉन बेयर्ड ने साल 1925 में टेलीविजन बनाया था। तब से अब तक टीवी के दसियों अवतार बन चुके। लकड़ी के चौखटे में बंद, काली-सफेद तस्वीरों वाला टीवी बढ़कर 70-75 इंच का आने लगा है। स्क्रीन दीवार से ऐसे चिपकी होती है कि ज्यादा जगह न घेरे। टीवी तो स्मार्ट हो चुकी, अब हमारी मानसिकता की बारी है। अब उस समय का इंतजार है, जब हमारी सोच भी लकड़ी के प्राचीन चौखटे से निकलकर रंग-बिरंगी हो सकेगी। उसका भी आकार बढ़ते हुए कम से कम इतना हो जाए कि एक घर के भीतर औरत-मर्द बगैर किसी गौरव या हीनभावना के रह सकें। कि औरतों को अपनी पसंद का टीवी सीरियल बताते हुए शर्मिंदगी न हो। या फिर मर्द प्राइम टाइम को अपनी प्रतिष्ठा या बुद्धिविलास से न जोड़ें।

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