भास्कर रिसर्चचीते आ गए, सवाल- बचेंगे या नहीं:तनाव में चीते ब्रीडिंग-शिकार नहीं करते, पर फिनलैंड के ऊदबिलाव से पता चलेगी प्रोजेक्ट कूनो की सफलता

2 महीने पहले
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कूनो में चीते आ गए…फोटो खिंच गई, अब नामकरण की तैयारी है। ये भी मान लिया गया कि भारत में चीते विलुप्त होने का दाग भी इन अफ्रीकी चीतों के पगमार्क्स (पंजों के निशान) से धुल गया। लेकिन ये इतना भी आसान नहीं है…

इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) समय-समय पर अलग-अलग प्रजातियों के रिइंट्रोडक्शन प्रोजेक्ट्स का आकलन करता है। 2018 की ग्लोबल रिइंट्रोडक्शन पर्सपेक्टिव रिपोर्ट में संस्था ने 24 स्तनपायी यानी मैमल (अपने नवजातों को ब्रेस्टफीड कराने वाले) प्रजातियों के रिइंट्रोडक्शन प्रोजेक्ट्स का आकलन किया था। इसमें से सिर्फ 7 प्रोग्राम ही पूरी तरह सफल माने गए थे।

दरअसल, किसी भी एक इलाके से विलुप्त हो चुकी किसी प्रजाति को वहां दोबारा छोड़ना हमेशा बहुत रिस्की होता है। IUCN की रिपोर्ट में भारत के दो रिइंट्रोडक्शन प्रोजेक्ट्स को पूरी तरह सफल माना गया था। मगर ये दोनों प्रजातियां भारत की ही थीं। भारत में पहली बार किसी दूसरे देश से एक प्रजाति को लाकर यहां बसाने की कोशिश हो रही है।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस तरह की कोशिश सबसे हाल में फिनलैंड में हुई थी। वहां पाए जाने वाले यूरेशियन बीवर (ऊदबिलाव की एक प्रजाति) विलुप्त हो चुके थे। यूरोपीय देशों से यूरेशियन बीवर को वहां बसाने की कोशिश की गई, मगर फेल हो गई। बाद में 7 अमेरिकन बीवर फिनलैंड लाए गए। आज उनकी संख्या बढ़कर 10 हजार से ज्यादा हो चुकी है।

अमेरिकन बीवर और यूरेशियन बीवर के जीन्स में काफी फर्क होता है। ठीक वैसे ही भारत में कभी पाए जाने वाले एशियाटिक चीते और अब नामीबिया से लाए गए अफ्रीकी चीतों में भी जीन्स अलग-अलग हैं। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि जेनेटिक भिन्नताओं के बावजूद किसी नए माहौल में कोई प्रजाति कैसे आबादी बढ़ा सकती है, यह समझने के लिए फिनलैंड के बीवर्स का अध्ययन जरूरी है।

आइए, समझते हैं क्या होता है किसी प्रजाति का रिइंट्रोडक्शन और किस पैमाने पर इसे सफल या फेल माना जाता है।

पहले समझिए, क्या होता है किसी जानवर का किसी इलाके में रिइंट्रोडक्शन

किसी एक जगह पर पाई जाने वाले प्रजाति जब पूरी तरह खत्म हो जाए तो उसे विलुप्त यानी एक्सटिंक्ट मान लिया जाता है। जैसे भारत में चीते 1952 में विलुप्त हो गए थे।

विलुप्त हो चुकी प्रजाति को उस इलाके में दोबारा बसाने के लिए की जाने वाली कोशिश को ही रिइंट्रोडक्शन कहा जाता है। यह तीन तरीके से किया जा सकता है-

कैप्टिव ब्रीड रिइंट्रोडक्शन: विलुप्त हो चुकी प्रजाति अगर किसी जू या रिसर्च इंस्टीट्यूट में मौजूद है और उसकी ब्रीडिंग हो रही है तो पिंजरे में जन्मे जानवर को उस इलाके के जंगलों में छोड़ा जाता है, जहां वह विलुप्त हो चुका है। यह रिइंट्रोडक्शन का सबसे ज्यादा अपनाया जाने वाला तरीका है।

स्पीशीज रिलोकेशन: यदि किसी एक इलाके में विलुप्त हुई प्रजाति किसी और इलाके में मौजूद है और ब्रीडिंग कर रही है तो उस इलाके से जानवरों को वहां रिलोकेट किया जाता है जहां वह विलुप्त हो चुके हैं।

सब-स्पीशीज रिइंट्रोडक्शन: जानवरों की कई प्रजातियां दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मिलती हैं। मगर हर हिस्से में मिलने वाले जानवर की जेनेटिक बनावट थोड़ी अलग होती है। यह बनावट उस इलाके के पर्यावरण के मुताबिक होती है। जेनेटिक बदलावों के आधार पर इन्हें सब-स्पीशीज में बांटा जाता है। जब एक इलाके में विलुप्त हो चुकी सब-स्पीशीज के बजाय उसी जानवर की किसी दूसरी सब-स्पीशीज को वहां बसाने की कोशिश की जाती है तो इसे सब-स्पीशीज रिइंट्रोडक्शन कहते हैं।

भारत में दो तरह के रिइंट्रोडक्शन सफल हुए…अब तीसरे की टेस्टिंग

भारत में कैप्टिव ब्रीड रिइंट्रोडक्शन असम और स्पीशीज रिलोकेशन प्रोग्राम मध्य प्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व में सफल हो चुके हैं। चीतों के रिइंट्रोडक्शन के साथ तीसरे मेथड की टेस्टिंग हो रही है।

भारत में मिलने वाले एशियाटिक चीते अब दुनिया में सिर्फ ईरान में 12 बचे…

यह तस्वीर 11 मई, 2022 की है जब ईरान में एक मादा एशियाटिक चीते ने कैप्टिविटी में तीन शावकों को जन्म दिया। यह शावक जिंदा बचे तो ईरान में एशियाटिक चीतों की आबादी बढ़ सकती है।
यह तस्वीर 11 मई, 2022 की है जब ईरान में एक मादा एशियाटिक चीते ने कैप्टिविटी में तीन शावकों को जन्म दिया। यह शावक जिंदा बचे तो ईरान में एशियाटिक चीतों की आबादी बढ़ सकती है।

भारत में एशियाटिक चीते पाए जाते थे जो 1952 में विलुप्त घोषित कर दिए गए।

चीतों को दोबारा भारत में बसाने की कोशिशें बहुत पहले से की जा रही थीं। दुनिया में एशियाटिक चीते अब सिर्फ ईरान में बचे हैं…और वहां भी सिर्फ 12 ही हैं।

ईरान से चीते भारत लाने की बात पहली बार 1970 के आस-पास हुई थी। तब सैद्धांतिक सहमति के बाद ईरान में राजनीतिक उठापटक के चलते प्रोजेक्ट अटक गया।

2009 में फिर ईरान को प्रस्ताव दिया गया, मगर वह देने में अनिच्छा दिखाता रहा। अंतत: उसने चीते के जोड़े के बदले एशियाटिक शेर देने की मांग की, जिस पर भारत तैयार नहीं हुआ।

ईरान से बातचीत खत्म होने के बाद अफ्रीकी चीतों को भारत में बसाने की योजना पर बात शुरू हुई। अफ्रीकी चीतों की आबादी दुनिया में अभी करीब 7000 है। अफ्रीकी देश नामीबिया में इनकी तादाद सबसे ज्यादा मानी जाती है।

नामीबिया से अभी 8 चीते भारत आ चुके हैं, जिन्हें कूनो रिजर्व में छोड़ा गया है। अक्टूबर, 2022 तक दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीते आने की उम्मीद है।

फिनलैंड के बीवर बताएंगे रिइंट्रोडक्शन की सफलता के राज

फिनलैंड में लाए गए अमेरिकन बीवर्स की संख्या इतनी बढ़ गई है कि वे अब पड़ोसी रशिया में भी फैल गए हैं। रशिया और फिनलैंड दोनों इन्हें इनवेसिव यानी घुसपैठिया प्रजाति मानते हैं।
फिनलैंड में लाए गए अमेरिकन बीवर्स की संख्या इतनी बढ़ गई है कि वे अब पड़ोसी रशिया में भी फैल गए हैं। रशिया और फिनलैंड दोनों इन्हें इनवेसिव यानी घुसपैठिया प्रजाति मानते हैं।

पूरे यूरोप और उत्तरी एशिया में ऊदबिलाव की एक प्रजाति बीवर की सब-स्पीशीज यूरेशियन बीवर बसती है।

बीवर पानी और जमीन दोनों जगह रहते हैं। इनकी सबसे खास बात है लकड़ी कुतरने की इनकी क्षमता। यह लकड़ी काटकर जमा करते हैं और इससे बहते पानी को रोकने के लिए बांध बना देते हैं। इसी बांध पर वे रहते भी हैं और रुके हुए पानी से मछलियां व अन्य जीव पकड़ते हैं।

फिनलैंड में यूरेशियन बीवर 1868 में ही विलुप्त हो गए थे। यहां 1935 में पड़ोसी देश नॉर्वे से 17 यूरेशियन बीवर लाकर छोड़े गए। मगर यह प्रोजेक्ट फेल हो गया।

नॉर्वे से लाए गए यूरेशियन बीवर्स में से सिर्फ तीन ही जिंदा बचे। इनमें से भी दो ने ब्रीडिंग की। धीरे-धीरे यह आबादी भी खत्म हो गई।

इसके बाद यहां अमेरिका से बीवर की एक अन्य सब-स्पीशीज अमेरिकन बीवर लाए गए। शुरुआती दौर में यहां 7 अमेरिकन बीवर छोड़े गए थे।

आज यहां अमेरिकन बीवर्स की आबादी 10 हजार से ज्यादा है, जबकि लगभग पूरे स्कैंडिनेविया में यूरेशियन बीवर्स की आबादी करीब 4000 है।

रिलोकेशन के समय पता ही नहीं था यूरेशियन और अमेरिकन बीवर का फर्क

अमेरिकन और यूरेशियन बीवर जेनेटिक तौर पर अलग होते हैं, यह खुलासा 1973 में हुआ था। दोनों सब-स्पीशीज में देखकर कोई अंतर समझ में नहीं आता।

जेनेटिक स्तर पर दोनों के DNA में 8 क्रोमोसोम का अंतर होता है। यूरेशियन बीवर के 48 क्रोमोसोम होते हैं, जबकि अमेरिकन बीवर के 40 क्रोमोसोम होते हैं। इंसान और चिंपांजी के DNA में 2 क्रोमोसोम का ही अंतर होता है। इससे समझा जा सकता है कि दोनों सब-स्पीशीज में कितना फर्क है।

जब तक यह जेनेटिक फर्क पता चला तब तक फिनलैंड में अमेरिकन बीवर की आबादी बढ़ना शुरू हो गई थी।

अमेरिकन बीवर को मजबूत स्पीशीज मानते हैं एक्सपर्ट…अफ्रीकन चीतों से भी यही उम्मीद

एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अमेरिकन बीवर स्पीशीज के तौर पर बहुत मजबूत होते हैं और उनमें ब्रीडिंग की क्षमता भी ज्यादा होती है। इसी वजह से फिनलैंड में भी उन्होंने अपनी आबादी बढ़ा ली।

माना जाता है कि अफ्रीकन चीतों से ही चीतों की सारी सब-स्पीशीज अलग हुई हैं। यानी मूल प्रजाति यही है। इस आधार पर उन्हें जेनेटिक तौर पर मजबूत माना जाता है।

उनकी यही जेनेटिक मजबूती उम्मीद जगाती है कि भारत के मौसम और माहौल में वह खुद को ढाल लेंगे और आबादी भी बढ़ाएंगे।

सुकून की एक और बात- चीतों के साथ दुनिया में इन 7 प्रजातियों का रिइंट्रोडक्शन हो रहा है…सभी सफल

1) ब्रिटेन में जंगली बायसन दोबारा छोड़े गए

केंट के जंगलों में छोड़े गई 3 मादा जंगली बायसन में एक थोड़ी उम्रदराज है, ताकि वह झुंड की अगुआई कर सके।
केंट के जंगलों में छोड़े गई 3 मादा जंगली बायसन में एक थोड़ी उम्रदराज है, ताकि वह झुंड की अगुआई कर सके।

पूरे यूरोप में जंगली बायसन की संख्या 7 हजार ही रह गई है। ब्रिटेन में यह विलुप्त हो चुके थे। जुलाई, 2022 में स्कॉटलैंड और आयरलैंड से तीन मादा जंगली बायसन यहां केंट में ब्लीन के जंगलों में छोड़ी गई हैं।

2) यूरोप में गिद्धों का रिइंट्रोडक्शन

पूरे यूरोप से करीब 200 सालों तक गिद्ध गायब रहे। भारत में भी गिद्धों की संख्या काफी तेजी से घट रही है।
पूरे यूरोप से करीब 200 सालों तक गिद्ध गायब रहे। भारत में भी गिद्धों की संख्या काफी तेजी से घट रही है।

पूरे यूरोप से एक समय गिद्ध गायब हो चुके थे। करीब 200 सालों तक यहां गिद्ध नहीं पाए जाते थे। मगर 1960 के दशक में रिइंट्रोडक्शन शुरू हुआ। अब बुल्गारिया और पुर्तगाल में आबादी बढ़ रही है। इस साल क्रोएशिया में भी गिद्ध छोड़े गए हैं।

3) यूरेशियन लिंक्स अब यूरोप में फैले

जंगली बिल्ली की यह प्रजाति पूरी दुनिया में बहुत कम पाई जाती है। सभी लिंक्स में यूरेशियन लिंक्स आकार में थोड़े बड़े होते हैं।
जंगली बिल्ली की यह प्रजाति पूरी दुनिया में बहुत कम पाई जाती है। सभी लिंक्स में यूरेशियन लिंक्स आकार में थोड़े बड़े होते हैं।

करीब 200 सालों तक पूरे यूरोप से जंगली बिल्ली की यह प्रजाति विलुप्त रही। 1970 के दशक में यूरेशियन लिंक्स को रिइंट्रोड्यूस किया जाना शुरू हुआ। अब स्विट्जरलैंड, स्लोवेनिया, क्रोएशिया, फ्रांस, इटली, चेक रिपब्लिक, जर्मनी, ऑस्ट्रिया में रिइंट्रोड्यूस किया जा चुका है। पूरे यूरोप में इनकी आबादी करीब 10 हजार है।

4) रैट कंगारू 100 साल बाद ऑस्ट्रेलिया में

कंगारू जैसे पांवों वाली यह प्रजाति कूद-कूद कर ही चलती है। यूरोपीय आबादी के साथ आई बिल्लियां इनका शिकार करती थीं, जिस वजह से यह विलुप्त हो गए थे।
कंगारू जैसे पांवों वाली यह प्रजाति कूद-कूद कर ही चलती है। यूरोपीय आबादी के साथ आई बिल्लियां इनका शिकार करती थीं, जिस वजह से यह विलुप्त हो गए थे।

ऑस्ट्रेलिया में यूरोपीय आबादी के साथ आई बिल्लियों की वजह से करीब 100 साल पहले चूहे और खरगोश जैसी यह प्रजाति बिल्कुल विलुप्त हो गई थी। अब 2021 में ही इसे रिइंट्रोड्यूस किया गया है।

5) ब्लैक फुटेड फेरेट अमेरिका में आबादी बढ़ा रहे

फेरेट्स को इको-सिस्टम के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह जमीन में बिल बनाकर रहते हैं, जिससे पूरे इको-सिस्टम में कई अन्य प्रजातियों के लिए चीजें आसान हो जाती हैं।
फेरेट्स को इको-सिस्टम के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह जमीन में बिल बनाकर रहते हैं, जिससे पूरे इको-सिस्टम में कई अन्य प्रजातियों के लिए चीजें आसान हो जाती हैं।

यह प्रजाति किसी समय पूरे नॉर्थ अमेरिका में पाई जाती थी। 1987 में पूरी दुनिया में सिर्फ 18 ब्लैक फुटेड फेरेट बचे थे। अब अमेरिका में फिर बढ़ रहे हैं।

6) रेड काइट फिर से UK में बढ़ रहे

UK में चिलर्टन गांव इन रेड काइट्स का सबसे बड़ा रिजर्व माना जाता है। यह गांव इसी वजह से टूरिस्ट्स में भी लोकप्रिय है।
UK में चिलर्टन गांव इन रेड काइट्स का सबसे बड़ा रिजर्व माना जाता है। यह गांव इसी वजह से टूरिस्ट्स में भी लोकप्रिय है।

चील की प्रजाति का यह पक्षी UK में खत्म हो चुका था। 1992 में 38 प्रोटेक्टेटेड एरियाज में ब्रीडिंग शुरू हुई। अब इनकी आबादी बढ़नी शुरू हुई है।

7) जंगली घोड़े चीन में बढ़ा रहे आबादी

चीन के अलावा कजाकिस्तान और मंगोलिया के भी कुछ रिजर्व फॉरेस्ट में अभी जंगली घोड़े पाए जाते हैं। इनकी संख्या पूरी दुनिया में बहुत तेजी से घटी है।
चीन के अलावा कजाकिस्तान और मंगोलिया के भी कुछ रिजर्व फॉरेस्ट में अभी जंगली घोड़े पाए जाते हैं। इनकी संख्या पूरी दुनिया में बहुत तेजी से घटी है।

कभी यह प्रजाति पूरे यूरोप और एशिया में पाई जाती थी। चीन में इनके विलुप्त होने के बाद 1985 में UK और USA से लाकर इनकी ब्रीडिंग शुरू की गई। अब यहां 800 जंगली घोड़े हैं।