भास्कर एनालिसिस:ईशनिंदा के सवाल पर कट्टरपंथियों की मुठ्ठी में पाकिस्तान? आखिर इमरान खान बेबस क्यों हैं?

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: पूनम कौशल

पाकिस्तान के सियालकोट में श्रीलंकाई मूल के एक फैक्ट्री मैनेजर को ईशनिंदा के आरोप में पहले तड़पा-तड़पा कर मारा गया और फिर सरेआम जला दिया गया। प्रियंथा कुमारा नाम के इस शख्स के केबिन में एक पोस्टर फटा हुआ मिला था जिस पर मोहम्मद लिखा था। फैक्ट्री में काम करने वाले कर्मचारियों ने इसे पैगंबर का अपमान मान लिया। उनकी हत्या में शामिल युवकों ने मीडिया से बात करते हुए गर्व के साथ कहा 'हुजूर के नाम पर जान भी कुर्बान कर देंगे।'

जब प्रियंथा कुमार को जलाया जा रहा था तब सैकड़ों की भीड़ देख रही थी। सोशल मीडिया पर उनकी मौत के वीडियो वायरल हुए जो श्रीलंका में उनके परिवार ने भी देखे। इस सनसनीखेज हत्याकांड के तार कट्टरवादी धार्मिक समूह तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान से जुड़ रहे हैं। इस समूह ने कुछ दिन पहले ही व्यापक प्रदर्शन किए थे और अपने नेता की रिहाई के लिए इमरान सरकार को मजबूर किया था। बता दें कि तहरीक-ए-लब्बैक का गठन ही पैगंबर मोहम्मद के सम्मान को बचाने और ईशनिंदा के खिलाफ आवाज उठाने के लिए हुआ है।

ये पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान में किसी को ईशनिंदा के आरोप में भीड़ ने मार दिया हो। अप्रैल 2017 में मिशाल खान को मरदान यूनिवर्सिटी में उसके साथियों ने पीट-पीट कर मार दिया था। 2012 बहावलपुर के पास हिंसक भीड़ ने एक दिमागी रूप से परेशान व्यक्ति को थाने से खींचकर मार दिया था। इसी तरह दादों में भी भीड़ ने थाने में घुसकर ईशनिंदा के आरोपी को जिंदा जलाया था।

ईसाइयों, हिंदुओं और हजारा मुसलमानों पर ईशनिंदा के आरोप लगते रहे हैं। पाकिस्तान के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के मुताबिक ईशनिंदा के आरोप में अब तक 70 से अधिक लोगों को मारा जा चुका है। हत्या सिर्फ उनकी ही नहीं हुई है जिन पर आरोप लगे, बल्कि ईशनिंदा के खिलाफ आवाज उठाने वालों को भी खामोश कर दिया गया।

1997 में ईशनिंदा के आरोपियों को बरी करने वाले जस्टिस आरिफ इकबाल भट्टी की अदालत में ही हत्या कर दी गई थी। 2011 में पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर को उनके ही सुरक्षाकर्मी ने मार दिया गया था।

पाकिस्तान के लिए ही खतरा बन गया है ईशनिंदा का मुद्दा?

पाकिस्तान पर नजर रखने वाले रक्षा विश्लेषक फरान जैफरी कहते हैं, 'ईशनिंदा के मुद्दे को पाकिस्तान में सिर्फ कट्टरवादियों ने ही नहीं बल्कि आम पाकिस्तानियों ने भी हथियार की तरह इस्तेमाल किया है। ईशनिंदा का मुद्दा पाकिस्तान की अपनी आत्मा की लड़ाई बन गया है। इसके चलते पाकिस्तान के बरेलवी समुदाय में कट्टरता बढ़ रही है। मुमताज कादरी के अनुसार सलमान तासीर की हत्या करने के बाद से ही ईशनिंदा के मुद्दे का इस्तेमाल दंगा-फसाद फैलाने के लिए किया जा रहा हैं।'

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा है कि सियालकोट घटना में शामिल लोगों को सख्त सजा दी जाएगी, लेकिन विश्लेषक और मानवाधिकार कार्यकर्ता उनके बयान पर भरोसा नहीं करते। ब्रिटेन की लिंकन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई कर चुके पाकिस्तान के पूर्व जज और सुप्रीम कोर्ट के वकील अदनान खान कहते हैं, 'इमरान खान के बयानों को गंभीरता से नहीं लिया जा सकता है। इस बात पर भी सवाल हैं कि उन्होंने पाकिस्तान की प्रगतिशील छवि दिखाने की कोई संजीदा कोशिश की हो। सियालकोट की घटना का पाकिस्तान के भीतर भी बहुत गहरा असर हुआ है। पाकिस्तान में श्रीलंका के खिलाफ ये दूसरा हमला है। पहले क्रिकेट टीम पर हमला हो चुका है।'

अदनान खान कहते हैं कि जो घटना हुई है इसका कानून से कोई मतलब नहीं है। ये भीड़ की हिंसा का मामला है।
अदनान खान कहते हैं कि जो घटना हुई है इसका कानून से कोई मतलब नहीं है। ये भीड़ की हिंसा का मामला है।

ईशनिंदा और इससे जुड़ी घटनाएं सिर्फ पाकिस्तान के समाज को ही नहीं बल्कि उसकी विदेश नीति को भी प्रभावित कर रही हैं। फरान जाफरी कहते हैं कि इससे पाकिस्तान सिर्फ आंतरिक तौर पर ही प्रभावित नहीं हो रहा है, बल्कि दुनिया के साथ पाकिस्तान के रिश्ते भी प्रभावित हो रहे हैं। पहले इन कट्टर समूहों ने फ्रांस के राजदूत को देश से निकालने का मुद्दा उठाया। इससे पाकिस्तान के रिश्ते सिर्फ फ्रांस के साथ ही नहीं, बल्कि यूरोपीय संघ के साथ भी प्रभावित हुए और अब श्रीलंका में पाकिस्तान के खिलाफ आक्रोश बढ़ा है।

पाकिस्तान की चर्चित मानवाधिकार कार्यकर्ता निदा अली कहती हैं, 'इस तरह की घटनाओं ने पाकिस्तान की छवि खराब की है। पाकिस्तान पहले से ही कई मुद्दे पर जूझ रहा है। कानून के शासन की रैंकिंग में पाकिस्तान पहले भी बहुत अच्छी स्थिति में नहीं था, इस तरह की घटनाओं से ये स्थिति और भी खराब होगी। पाकिस्तान में लोकतांत्रिक संस्थानों को बढ़ावा नहीं दिया जा रहा है। लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर हो रही हैं। पाकिस्तान की स्टेट एजेंसियों पर भी गैर न्यायिक हत्याएं करने के आरोप लग चुके हैं।'

सवालों में ईशनिंदा कानून

पाकिस्तान के आम लोग और सियासी पार्टियां ईशनिंदा कानून का बचाव करती रही हैं। पाकिस्तान पीनल कोड की धारा 295 C के तहत ईशनिंदा के आरोप में फांसी की सजा का प्रावधान हैं। इसके तहत सजा तो दी गई है, लेकिन आज तक पाकिस्तान में किसी को ईशनिंदा के आरोप में फांसी पर नहीं चढ़ाया गया है। इसके आरोप में भीड़ ने जरूर हत्याएं की हैं।

अदनान खान कहते हैं, 'जो घटना हुई है इसका कानून से कोई मतलब नहीं है। ये भीड़ की हिंसा का मामला है। सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में इस तरह की घटनाएं बढ़ रही हैं। भारत में भी भीड़ की हिंसा के मामले बढ़ रहे हैं।'

अदनान ने ईशनिंदा कानूनों पर शोधपत्र भी प्रकाशित किया है। वे कहते हैं, 'मेरी नजर में इसका पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून से कोई मतलब नहीं है। जो भीड़ इकट्ठा हुई है वो कानून के दायरे में नहीं थी। यदि उसे कानून पर यकीन होता तो वो ईशनिंदा के आरोप पर बंदे को पकड़ लेते और पुलिस के हवाले कर देते।'

एक शोध में ये भी सामने आया है कि जब ईशनिंदा के आरोपी को पुलिस हिरासत में लेती है तो कम से कम उसकी जान तो बच जाती है। भीड़ की हिंसा से उसे बचा लिया जाता है।

इशनिंदा कानून का इस्तेमाल व्यक्तिगत द्वेश निकालने के लिए भी होता रहा है। पाकिस्तान में आमतौर पर धार्मिक अल्पसंख्यकों पर ईशनिंदा का आरोप लगा दिया जाता है। पाकिस्तान में इस समय 80 से अधिक लोग ऐसे जिन्हें ईशनिंदा के आरोप में मौत या आजीवन कारावास की सजा दी गई है और वो जेलों में बंद हैं।

निदा अली कहती हैं कि पाकिस्तान पहले से ही कई मुद्दे पर जूझ रहा है। इस तरह की घटनाओं ने पाकिस्तान की छवि और खराब की है।
निदा अली कहती हैं कि पाकिस्तान पहले से ही कई मुद्दे पर जूझ रहा है। इस तरह की घटनाओं ने पाकिस्तान की छवि और खराब की है।

निदा अली कहती हैं, 'पाकिस्तान में ईशनिंदा कानून के तहत मौत की सजा है, लेकिन आज तक पाकिस्तान में किसी को इस आरोप में फांसी पर नहीं चढ़ाया गया है। ईशनिंदा के आरोप में गिरफ्तार लोग सुस्त न्यायिक प्रक्रिया के कारण लंबे समय तक जेल में रहते हैं। इनके मामलों की सुनवाई में देरी होती है, क्योंकि न्यायपालिका पर समाज के एक वर्ग का दबाव होता है। ये वर्ग धार्मिक मामलों में कट्टरपंथी विचार रखता है। अक्सर हम देखते हैं कि ईशनिंदा कानूनों का दुरुपयोग व्यक्तिगत द्वेश निकालने के लिए किया जाता है। लोग आपसी झगड़ों में ईशनिंदा का झूठा आरोप लगा देते हैं।'

वहीं फरान जाफरी का मानना है कि इस समस्या की जड़ में ये कानून ही है। वे कहते हैं, 'इस समस्या की सबसे बड़ी वजह ये है कि इमरान खान या पाकिस्तानी ये तर्क देते हैं कि किसी को भी ईशनिंदा के आरोपी को मारने का अधिकार नहीं है, लेकिन सरकार को है क्योंकि कानून में इसकी सजा मौत है। कट्टरवादी फिर हत्या को जायज ठहराने के लिए इस्लामी साहित्य और पाकिस्तान की खराब कानूनी व्यवस्था का हवाला देते हैं और कहते हैं कि उन्होंने जो किया सही किया। साफ-साफ कहा जाए तो ईशनिंदा से जुड़े मामलों से निपटने के लिए ना तो इमरान सरकार की इच्छा है और ना ही उनके पास शक्ति है।'

धर्म में कट्टरता नहीं रोक पा रही सरकार?

पाकिस्तान के समाज में कट्टर धार्मिक समूहों का प्रभाव बढ़ रहा है और ये आरोप भी हैं कि स्टेट एलीमेंट ऐसे समूहों को बढ़ावा दे रहे हैं ताकि उनका राजनीतिक इस्तेमाल किया जा सके। TLP कई बार अपने धरने प्रदर्शनों और इमरान सरकार को चुनौती दे चुकी है। अफगानिस्तान में तालिबान की जीत के बाद पाकिस्तान में भी तालिबान मजबूत हो रहा है।

फरान जैफरी कहते हैं, 'मुझे नहीं लगता कि इमरान खान सरकार TLP के उभार को रोक पाएगी। सरकार की ऐसी नीयत भी नहीं है। इमरान खान और उनकी पार्टी पहले TLP का खुला समर्थन कर चुके हैं। उनकी पार्टी के कई वरिष्ठ सदस्य TLP के समर्थक हैं। हाल ही में इमरान खान ने राष्ट्रीय टीवी चैनल पर कहा था कि वो और अधिकतर पाकिस्तानी TLP की विचारधारा से असहमत नहीं है, सिर्फ उनके तरीकों से असहमत हैं।'

फरान जाफरी का मानना है कि ईशनिंदा से जुड़े मामलों से निपटने के लिए ना तो इमरान सरकार की इच्छा है और ना ही उनके पास शक्ति है।
फरान जाफरी का मानना है कि ईशनिंदा से जुड़े मामलों से निपटने के लिए ना तो इमरान सरकार की इच्छा है और ना ही उनके पास शक्ति है।

पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग की पूर्व प्रमुख और चर्चित मानवाधिकार कार्यकर्ता जोहरा यूसुफ कहती हैं, 'इमरान खान की सरकार अधिकारों का हनन कर रही है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के लिए काम करना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। अगवा किए जाने और गिरफ्तार होने का खतरा बना रहता है। इमरान खान ने सिखों के लिए करतारपुर कॉरिडोर खोला है और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कदम उठाए हैं। ये स्वागत योग्य है, लेकिन इससे देश में अल्पसंख्यकों के हालात में कोई बदलाव नहीं आया है।'

निदा अली कहती हैं, 'इमरान खान की पार्टी धार्मिक मामलों में दखल देने से हिचकती है। इमरान भी दूसरे मुद्दे पर ही प्रगतिशील दिखते हैं, लेकिन धर्म से जुड़े मुद्दे पर खामोश रहते हैं।'

वहीं अदनान खान का मानना है कि ये कहना गलत है कि पाकिस्तान की राजनीति में ऐसे समूह मजबूत हो रहे हैं। भारत से तुलना करते हुए वो कहते हैं, 'पाकिस्तान की राजनीति में इनका असर बढ़ रहा है, इससे इत्तेफाक नहीं रखा जा सकता है। पाकिस्तान में लोकतंत्र है और उस लिहाज से देखा जाए तो पाकिस्तान में हालात भारत से बेहतर हैं। भारत में धार्मिक पार्टियां अधिक वोट लेती हैं, जहां तक पाकिस्तान का सवाल है, वहां ऐसे कट्टरवादी समूह दो प्रतिशत से अधिक वोट नहीं ले पाते हैं। तहरीक ए लब्बैक पाकिस्तान, जो आजकल बहुत सुर्खियों में है, उसके पास संसद में एक भी सीट नहीं है।'

पाकिस्तान के समाज भी बढ़ रही है धार्मिक कट्टरता

समाज में बढ़ रही धार्मिक कट्टरता का हवाला देते हुए जोहरा कहती हैं, 'हाल ही में सिंगल नेशनल करिकुलम (राष्ट्रीय एकल पाठ्यक्रम) के जरिए इस्लामिक स्टडीज को व्यवहारिक रूप में हर विषय में शामिल कर दिया गया है। ये कुरान के अध्ययन से अलग है। सियालकोट में जो हुआ है वो इमरान खान सरकार की कट्टरवादी धार्मिक समूहों के तुष्टीकरण की नीति का नतीजा है। हाल ही में तहरीक-लब्बैक-पाकिस्तान के धरने को समाप्त कराने के लिए इमरान सरकार ने उनके नेता को रिहा कर दिया। यही नहीं इमरान खान सरकार तहरीके-तालिबान-पाकिस्तान (TTP) से भी बात कर रही है। ये वही संगठन है जिसने 2016 में पेशावर में 130 स्कूली बच्चों की हत्या कर दी थी और अब तक दसियों हजार पाकिस्तानियों को मार चुका है, जिनमें सैनिक भी शामिल हैं।'

जोहरा कहती हैं, 'मुझे लगता है कि अब TLP जैसे समूह फ्रिंज नहीं हैं, बल्कि मुख्यधारा का हिस्सा बन चुके हैं। इनकी लोकप्रियता बढ़ी है और इन्होंने चुनाव भी जीते हैं। पाकिस्तान में मानवाधिकारों के हालात लगातार खराब हो रहे हैं, क्योंकि कार्यकर्ता सरकार की दुश्मनी और कट्टरपंथियों की धमकियों के बीच पिस रहे हैं।'