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कश्मीर के नेताओं के साथ प्रधानमंत्री की बैठक:एक्सपर्ट का मानना- भाजपा कश्मीर समस्या का हल निकालने के लिए जम्मू के किसी हिंदू को CM बनाने की कोशिश करेगी

नई दिल्ली3 महीने पहले
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कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद पहली बार गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में जम्मू-कश्मीर के 8 दलों के 14 नेताओं के साथ मीटिंग की। इसमें जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती समेत गुपकार अलायंस के बड़े नेता भी मौजूद थे। इस दौरान मोदी ने संदेश दिया कि जम्मू-कश्मीर से दिल्ली और दिल की दूरी कम होगी। उन्होंने परिसीमन के बाद जल्द विधानसभा चुनाव कराए जाने की बात भी कही। इस बैठक के बाद आगे क्या कुछ बदलाव देखने को मिल सकता है, इसे कश्मीर मामलों के जानकार राहुल पंडिता से इन 6 पॉइंट्स में समझते हैं...

1. प्रधानमंत्री मोदी ने जम्मू कश्मीर के नेताओं के साथ मीटिंग की। जम्मू-कश्मीर के लोगों को इससे कितनी उम्मीदें हैं?

इस मीटिंग को लेकर जम्मू और कश्मीर के लोगों की उम्मीदें एक जैसी नहीं है। यहां तक कि कश्मीर घाटी में भी लोगों की राय मिली-जुली ही है। ज्यादातर कश्मीरी मुसलमानों को लगता है कि केंद्र सरकार ने आर्टिकल 370 खत्म करके उनका विशेष दर्जा छीन लिया है।

वे चाहते हैं कि कश्मीर की मुख्यधारा के नेता इसे वापस बहाल करवाएं। इनमें एक साइलेंट वर्ग भी है जिसे लगता है कि दिल्ली की अब तक की सरकारों ने उसके साथ सौतेला व्यवहार किया है। वे चाहते हैं कि ये दोहरापन खत्म हो। चूंकि, यह सरकार फिर से उन्हीं लोगों के साथ मीटिंग की, जो कश्मीर में आज के हालात के लिए जिम्मेदार हैं। इसलिए भी इस बैठक से ज्यादा उम्मीद नहीं है।

2. जम्मू कश्मीर के नेताओं को PM मोदी से कितनी उम्मीदें हैं?

यहां की दो मुख्य पार्टियां नेशनल कॉन्फ्रेंस और PDP अगस्त 2019 के बाद से दबाव में हैं। स्थानीय राजनीति में दोनों की अहमियत खत्म सी हो गई है। इसको लेकर लोगों में गुस्सा भी है। खास करके PDP के खिलाफ जिसने 2015 में भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई थी। यह भाजपा और PDP दोनों की बहुत बड़ी भूल थी। कश्मीर के पत्रकार मजाकिया लहजे में कहते हैं कि भाजपा और PDP का साथ आना RSS और हिजबुल मुजाहिद्दीन के बीच हाथ मिलाने जैसा था। धारा 370 खत्म होने के बाद PDP को काफी हद तक नुकसान पहुंचा है।

मोदी की मीटिंग के बाद अगर कश्मीर के लोगों को कुछ रियायतें मिलती हैं तो फारूक अब्दुला और महबूबा मुफ्ती दोनों उसका क्रेडिट लेने की कोशिश करेंगे। महबूबा ने कश्मीर मसले पर बातचीत के लिए पाकिस्तान को पार्टी बनाने की बात कहकर खुद को प्रासंगिक बनाए रखने की कोशिश की है। मुझे लगता है कि अगर इस तरह की मानसिकता के साथ कुछ होता है तो वह कश्मीर के लिए सही नहीं होगा।

5 अगस्त, 2019 को कश्मीर में धारा 370 हटने के बाद बाद पहली बार केंद्र सरकार कश्मीरी नेताओं से बात करेगी। इस बैठक में फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती समेत कश्मीर के 8 राजनीतिक दलों के 14 नेताओं को बुलाया गया है।
5 अगस्त, 2019 को कश्मीर में धारा 370 हटने के बाद बाद पहली बार केंद्र सरकार कश्मीरी नेताओं से बात करेगी। इस बैठक में फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती समेत कश्मीर के 8 राजनीतिक दलों के 14 नेताओं को बुलाया गया है।

3. परिसीमन पूरा होने के बाद जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 111 से 114 सीटें हो सकती हैं। जिसमें PoK के लिए भी 24 सीटें रिजर्व्ड होंगी। आप इसको कैसे देखते हैं?

इसको लेकर कुछ भी कहना अभी जल्दबाजी होगा, लेकिन इतना तो तय है कि जम्मू की हिंदू बहुल आबादी, जिसे लगता है कि उसे जम्मू-कश्मीर की राजनीति में कम प्रतिनिधित्व मिला है। उसे साधने की कोशिश भाजपा करेगी। यह सब कुछ कैसे होता है, इसके लिए अभी इंतजार करना होगा।

4. परिसीमन के पीछे क्या राजनीति है? क्या यह जम्मू-कश्मीर में शांति और सुरक्षा के लिहाज से मददगार साबित होगा?

मैं फिर से यही कहूंगा कि अभी इसको लेकर कुछ भी कहना बहुत जल्दबाजी होगा, लेकिन मुझे लगता है कि भाजपा यहां की समस्या का हल निकालने के लिए जम्मू के किसी हिंदू को मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश करेगी। मुझे नहीं पता, यह कारगर होगा कि नहीं या इससे यहां के लोगों का भला होगा कि नहीं।

लेकिन एक चीज तो साफ है कि अगर नया कश्मीर चाहिए, जैसा कि भाजपा बनाने का दावा कर रही है तो कश्मीरी फिर से महबूबा मुफ्ती जैसे पुराने नेताओं के साथ नहीं जा सकते।

5. क्या आपको लगता है कि 370 खत्म करने से जमीनी स्थिति बदली है? अगर हां तो किस तरह के बदलाव हुए हैं?

ज्यादातर कश्मीरी मुसलमान जो आजादी का सपना देखते थे, वो चाहते थे कि कश्मीर पाकिस्तान में मिल जाए। आर्टिकल 370 हटने के बाद उस पर विराम लग गया। यह कभी मुमकिन नहीं होगा।

इतना ही नहीं आर्टिकल 370 के खत्म होने के बाद एक दिलचस्प चीज यह भी देखने को मिली कि इस्लामिक जिहाद में यकीन रखने वाले कश्मीरियों को लगा कि पाकिस्तान उनकी मदद के लिए आएगा। दूसरी तरफ पाकिस्तान को उम्मीद थी कि कश्मीरी भारत के खिलाफ आवाज उठाएंगे। इससे पहले आप, पहले आप जैसे हालात हो गए और आखिरकार कुछ नहीं हुआ।

6. पांच अगस्त को जम्मू कश्मीर में हुए नए बदलाव के दो साल पूरे हो रहे हैं। आने वाले दिनों में यहां किस तरह के बदलाव देखने को मिल सकते हैं?

मुझे लगता है कि हमें कश्मीर में जवाबी कार्रवाई के मॉडल पर फिर से विचार करने की जरूरत है। आतंकियों को मार गिराना ठीक है, लेकिन यह हमारी कामयाबी का पैरामीटर नहीं हो सकता है। कश्मीर में हम तब ही कामयाब हो सकते हैं, जब यहां के युवाओं को कट्टरपंथी बनने से रोक सकें।

पुलवामा केस में पुलिस ने संपन्न परिवार से आने वाले वैज उल इस्लाम नाम के एक युवक को गिरफ्तार किया, जो पुलवामा से बहुत दूर का रहने वाला था। वह जैश के संपर्क में आने के पहले मेडिकल की पढ़ाई कर रहा था। उन लोगों ने उसका इतना ब्रेनवाश किया कि वह उनके लिए काम करने लगा। जब सरकार वैज उल इस्लाम जैसे युवाओं तक जैश के पहुंचने से पहले पहुंचेगी, तब हम कश्मीर में स्थाई शांति बहाल होते देख सकेंगे।

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