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Sunday जज्बात:जवानी में आंखें गईं, पढ़ाई छूट गई, पढ़िए आयुष्मान खुराना को अंधाधुंध फिल्म में ट्रेनिंग देने वाले हेमेंद्र की कहानी

6 दिन पहलेलेखक: हेमेंद्र प्रताप सिंह

मैं हेमेंद्र प्रताप सिंह, यूपी के जौनपुर का रहने वाला हूं। 10 साल पहले अपने परिवार के साथ मुंबई शिफ्ट हो गया था। तब करीब 16 साल मेरी उम्र रही होगी। टीन एज के टशन में था। कॉलेज की सबसे सुंदर और इंटेलिजेंट लड़की को डेट कर रहा था। क्रिकेट में मेरा सिक्का चलता था। मुझे लगता था कि चारों जहां मेरी मुट्ठी में हैं, लेकिन जल्द ही मेरी चमकीली दुनिया काली स्याह में बदल गई। न क्रिकेट रहा, न कॉलेज और न गर्लफ्रेंड। एक झटके में सब खत्म हो गया।

मुझे सजने-संवरने का बहुत शौक था। अच्छे से ड्रेसअप होता था और बालों में जेल लगाकर स्पाइक्स (बाल खड़े कर लेना) बनाता था। मां को यह पसंद नहीं था, इसलिए अपने बैग में जेल छुपाकर कॉलेज ले जाता था।

मैं लास्ट बेंच पर बैठता था। एक दिन की बात है। फिजिक्स की टीचर ब्लैकबोर्ड पर कुछ इक्वेशन लिख रही थी। महसूस किया कि मुझे थोड़ा धुंधला दिखाई दे रहा है। लगा कि रात में नींद ठीक से नहीं ली है इसलिए ऐसा हो रहा है, कल ठीक हो जाएगा। अगले दिन भी ऐसा ही हुआ।

एक दिन मुझे हार्डवेयर में एक मशीन का टेम्प्रेचर सेट करने के लिए नॉब घुमाना था, लेकिन मुझसे सेट नहीं हो पाया। इसी तरह केमिस्ट्री के लैब में भी हुआ, लेकिन तब टीचर को लग रहा था कि मैं मस्ती कर रहा हूं। इसके लिए डांट भी पड़ने लगी।

इसके बाद मैं लास्ट बेंच से उठकर बीच में आकर बैठने लगा। फिर भी मुझे धुंधला ही दिखाई दे रहा था, लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया। अपनी मस्ती में लगा रहा और आगे से पहली बेंच पर बैठने लगा। तब मेरे कई दोस्तों ने चेताया कि चश्मा बनवा लो, तुम्हारी आंख में दिक्कत है। मैंने मां से बात की और डॉक्टर के पास गए। डॉक्टर ने कहा कि तुम्हारी आंखों की रोशनी कम है। इसके बाद चश्मा भी लग गया।

क्रिकेट मेरा फेवरेट गेम था। बैटिंग और बॉलिंग दोनों करता था। मैं मुंबई के लालबाग इलाके में रहता था, मुझे लोग लालबाग का बादशाह बोलते थे।
क्रिकेट मेरा फेवरेट गेम था। बैटिंग और बॉलिंग दोनों करता था। मैं मुंबई के लालबाग इलाके में रहता था, मुझे लोग लालबाग का बादशाह बोलते थे।

चश्मा लगने के बाद सबको लगा कि अब मैं ठीक हो जाऊंगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जब लाइब्रेरी में गया तो पहले की तरह ही मुझे धुंधला दिखाई दे रहा था। क्रिकेट खेलने के दौरान भी मुझे बॉल दिखाई नहीं दी और बोल्ड हो गया। जब बॉलिंग कर रहा था तो हर बॉल वाइड ही जा रही थी। तब मुझे रियलाइज हुआ कि मेरी आंखों की रोशनी जा रही है।

इसके बाद मां-पापा ने मुझे मुंबई के केईम अस्पताल के आंखों के डॉक्टर से दिखाया। पहले दिन डॉक्टर ने टेस्ट किया तो कुछ पता नहीं चला। चौथे दिन MRI किया तो बताया कि मुझे ऑप्टिक न्यूराइटिस नाम की बीमारी हो गई है। इसमें ऑप्टिक नस पतली हो जाती है। यह नस ऐसी जगह होती है जहां ऑपरेशन नहीं हो सकता है।

डॉक्टर ने कहा कि एडमिट होना होगा। आंखों में इंजेक्शन लगेंगे। यह सुनते ही हम सब डर गए। पापा ने कहा कि सरकारी की बजाय हम किसी नामी प्राइवेट डॉक्टर के पास जाएंगे। हमने मुंबई के जाने माने आंखों के डॉक्टर को दिखाया। उन्होंने बताया कि यह एक ऐसी बीमारी है जिसका स्टेरॉयड से ही इलाज हो सकता है।

पहले यह बीमारी मेरी दाहिने आंख में थी, लेकिन अब बाएं आंख में भी हो गई। तीन महीने अस्पताल में रहा। स्टेरॉयड के डोज डबल लेने से मेरा वजन 126 किलो हो चुका था। मुझे अपने आप से घिन होने लगी कि यह मेरे साथ क्या से क्या हो गया।

कॉलेज में हाजिरी कम होने की वजह से मेरा नाम काट दिया गया। गर्लफ्रेंड से फोन पर बात होती थी। वो मुझसे मिलने भी आती थी। कुछ होने के बाद भी उसका प्यार कम नहीं हुआ। वो मुझे हौसला देती थी, लेकिन मैं अब धीरे-धीरे टूटता जा रहा था। पेरेंट्स और ज्यादा परेशान और हताश थे। पापा ने नौकरी छोड़ दी ताकि वे मेरे साथ हमेशा रह सकें। मां हमेशा खुद को कोसती रहती थी कि उनकी किसी गलती की सजा ही उनके बेटे को मिली है।

मुझे बाइक चलाना काफी पसंद था। 7वीं क्लास से ही बाइक चला रहा था। 12वीं में पापा ने मेरे लिए यूनिकॉर्न बाइक बुक करवाई थी। मेरी जि़ंदगी का सबसे खराब दिन था जब मेरी बाइक आने वाली थी और मैं उसे चलाने के लायक नहीं बचा।

मैं हमेशा से फिटनेस को लेकर सचेत रहा। रेगुलर जिम जाता था। यही वजह है कि कॉलेज में मेरी पर्सनालिटी की चर्चा होती रहती थी।
मैं हमेशा से फिटनेस को लेकर सचेत रहा। रेगुलर जिम जाता था। यही वजह है कि कॉलेज में मेरी पर्सनालिटी की चर्चा होती रहती थी।

घर से निकलता तो ऊंची-नीची सड़क आने से गिर जाता। स्पीड ब्रेकर आने से पांव लड़खड़ा जाते, गिर जाता। ऐसे में मुझे अपने ऊपर बहुत गुस्सा आता था। यार यह क्या हो रहा है, मैं ऐसा नहीं हूं, फिर मैं हाथों से अपने चेहरे पर मारकर अपना चेहरा बिगाड़ लेता था। पापा बोलते थे कि तुझे ब्लाइंड स्कूल में डाल दें, इस पर मुझे और गुस्सा आता था। मैं दीवार पर सिर मारता था। मुझे गली में क्रिकेट की आवाजें सुनाई देती थी तो लगता था कि मेरा खत्म हो जाना ही सही होगा।

मुंबई वाले घर में दरवाजा बंद करके डार्क रूम में पड़ा रहता था। किसी से बात करना अच्छा नहीं लगता था। पेरेंट्स से भी बात करना पसंद नहीं था। घर आने वालों की बातें मेरा हौसला गिराती थीं। कोई बोलता था कि फलां जगह सोने की आंख चढ़ाओ, यहां पूजा करो, वहां दान करो। पापा ने चार पेजों पर लोगों की बताई मन्नतें लिखी कि मेरा बेटा ठीक हो जाएगा तो मैं यह सब करुंगा। इन सब से मैं और ज्यादा परेशान होता था।

हर 6 दिन में डॉक्टर के पास जाना होता था। 45 MRI हो चुके थे। मैं थक गया था अब। मुझे लगने लगा कि मुंबई मेरे लिए नहीं है। मैंने पेरेंट्स से कहा कि मुझे गांव में रहना है। इसके बाद मां के साथ गांव चला आया। बीच-बीच में चेकअप के लिए मुंबई जाना होता था। घर के पास ही एक प्राइवेट कॉलेज में मेरा दाखिला करा दिया गया कि मैं 12वीं कर सकूं, लेकिन मैं कुछ पढ़ नहीं पा रहा था।

खाने वक्त भी दिक्कत होती थी। थाली में दाल, चपाती और चावल का पता ही नहीं चलता था। कोई और मुझे मुंह में खाना डालकर खिलाए यह मंजूर नहीं था। मैं चिड़चिड़ा होकर घर से भाग जाता था। एक दिन घर के पीछे वाले खेत की तरफ भागा। वो पानी से भरा था, लेकिन मुझे सफेद मिट्टी दिखाई दे रही थी। जैसे ही मैं खेत में घुसा मैं गिर पड़ा। सारा शरीर कीचड़ से सन गया। ऐसा जब भी होता था तो मुझे लगता था कि मैं दुनिया का मुकाबला नहीं कर पाऊंगा। अपनी लाइफ खत्म कर देनी चाहिए।

मैंने दो दफा आत्महत्या की कोशिश की। अपने घर की पहली मंजिल से नीचे छलांग लगा दी। मेरा पांव फ्रैक्चर हो गया। एक दफा मुंबई वाले घर में बिजली के मेन सर्किट को पकड़ लिया। मुझे करंट लगा और गिर गया। घरवाले अस्पताल लेकर गए तब जाकर बचा। उसके बाद घरवालों ने कभी मुझे अकेला नहीं छोड़ा। मैं बहुत ज्यादा रोता था। मेरे आंसू नहीं रुकते थे। गर्लफ्रेंड का भी फोन आता था, लेकिन मैं बात नहीं करता था। मैंने उसके साथ भी अन्याय किया।

उधर मेरे पेरेंट्स का इस गुरु के यहां जाना। उस गुरु के यहां जाना, इस प्रभु के यहां जाना जारी था। मुझे भी यह सब करना पड़ता था। इससे मुझे ज्यादा तकलीफ होती थी।

एक दफा मैं मुंबई चेकअप के लिए गया था। बड़े भाई के साथ ठाणे एक डॉक्टर को दिखाने जाना था। ठाणे स्टेशन पर भाई का इंतजार कर रहा था। मैंने देखा एक इंसान हाथ में केन (नेत्रहीनों की छड़ी) लिए टक-टक करता आ रहा था। मेरे बगल की सीट खाली थी, मैंने उनसे कहा कि आप यहां बैठ जाएं। वह बोला कि नहीं मैं यहां का स्टेशन मास्टर हूं। वो टक टक करता चला गया।

पहले तो मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि मैं नेत्रहीन हो गया हूं। बाद में नेत्रहीन बच्चों का टीचर बन गया, उन्हें पढ़ाने लगा। इससे मेरा कॉन्फिडेंस बढ़ा।
पहले तो मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि मैं नेत्रहीन हो गया हूं। बाद में नेत्रहीन बच्चों का टीचर बन गया, उन्हें पढ़ाने लगा। इससे मेरा कॉन्फिडेंस बढ़ा।

बस वही से मेरी लाइफ ने करवट बदली। मैंने सोचा कि कुछ तो होगा मेरे लिए जो मैं कर सकता हूं। इसके बाद कुछ करने की ललक मेरे मन में सवार हो गई। मैंने अपने एक दोस्त कुणाल से बोला कि कोई ऐसी संस्था ढूंढो जो नेत्रहीनों के लिए काम करती हो। उसने गूगल किया तो हमें वर्ली में एक ऐसी संस्था मिल गई। मैंने कहा कि चलो ऐसे ही घूमकर आते हैं, देखते हैं कि वहां क्या होता है?

वहां हम सचिव से मिले। मेरा गणित बहुत अच्छा था, मेरे 100% आते थे। सचिव बोले कि हम नेत्रहीन बच्चों की पढ़ाई को लेकर कई प्रोजेक्ट शुरू करने जा रहे हैं। तुम डीएड कर लो, दो साल का कोर्स है। मैं राजी हो गया। मुझे लगा कि चलो कुछ तो मिला करने के लिए। मैं बस बिजी होना चाहता था। मैंने दो साल का वो कोर्स जॉइन कर लिया। उसमें नेत्रहीनों को पढ़ाने के तरीकों की ट्रेनिंग दी जाती थी।

हालांकि मैं खुद को नेत्रहीन के रूप में स्वीकार नहीं कर पा रहा था। फिर एक दिन केन दिवस आया। सभी छात्रों को छड़ी दी गई। मुझे भी छड़ी मिली। तब मैं खुद से बात करने लगा कि मेरा ये हाल हो गया कि मुझे छड़ी के सहारे चलना होगा। बीते दिन, क्रिकेट कॉलेज, बाइक, सब फ्लैश बैक से मेरी आंखों के सामने से जा रहा था। मैं बाथरुम में जाकर जोर-जोर से रोने लगा। पूरा स्कूल इकट्ठा हो गया कि क्या हो गया। मैं मानने के लिए तैयार नहीं था कि मैं नेत्रहीन हूं।

डिएड की ट्रेनिंग में नेत्रहीन बच्चों को पढ़ाना होता था। मैंने देखा कि केजी से लेकर दसवीं तक नेत्रहीन बच्चे कितने खुश रहते हैं। पढ़ने और आगे बढ़ने का जुनून है उनमें। उन्हें देखकर मुझे लगा कि मुझे एक अच्छा टीचर बनकर इनकी लिमिटेशन दूर करनी चाहिए। मैं गणित का माहिर था। एक NGO के साथ मिलकर ऐसा प्रोग्राम बनाया कि 10वीं के नेत्रहीन बच्चे 10वीं का ही गणित पढ़ें, वो भी नॉर्मल बच्चों के साथ बैठकर। इसका फायदा भी हुआ और कई बच्चों के गणित में अच्छे मार्क्स आए।

एक दिन मैं बच्चों को ब्लैकबोर्ड पर कुछ समझा रहा था तो बच्चों ने चिल्लाना शुरू कर दिया कि आयुष्मान खुराना, आयुष्मान खुराना। खुराना ने कहा कि आप लोग अपना काम करें, सर को डिस्टर्ब न करें, मैं मिलता हूं। दरअसल हमारे स्कूल में अंधाधुंध फिल्म का पूरा क्रू आया था। वे सब दरवाजे पर खड़े होकर मुझे पढ़ाते हुए देख रहे थे कि मैं कैसे पढ़ा रहा हूं। क्लास के बाद मैं उन्हें अपनी मेस में लेकर गया। वहां भी नेत्रहीन खाना बना रहे थे, चाय बना रहे थे। उन्हें भी किचन का काम मैंने ही सिखाया था।

मैं आयुष्मान को विक्की डोनर से जानता था। मैं उनके गानों का फैन था। मैंने आयुष्मान खुराना से हाथ मिलाया। उन्होंने पूछा कि जिम जाते हो क्या, मैंने कहा कि हां जाता हूं। मैंने उन्हें बताया कि मैं नेत्रहीनों को चलना, कंप्यूटर, मोबाइल चलाना सब सिखाता हूं। मैंने उन्हें बताया कि ब्लाइंड्स को मैंने बहुत सालों से ऑब्जर्व किया है। वो कितने तरह के होते हैं, कैसे होते हैं। उनकी आंखों की कंडीशन कैसी होती है।

मैं एक्टर्स को ट्रेनिंग देता हूं, बच्चों को पढ़ाता हूं और अब एक बैंकर हूं। लखनऊ के एक बैंक में असिस्टेंट मैनेजर हूं।
मैं एक्टर्स को ट्रेनिंग देता हूं, बच्चों को पढ़ाता हूं और अब एक बैंकर हूं। लखनऊ के एक बैंक में असिस्टेंट मैनेजर हूं।

आधे घंटे बात करके मुझे अंधाधुंध प्रोजेक्ट में ले लिया गया। मैं शाम पांच बजे स्कूल के बाद मैचबॉक्स प्रोडक्शन हाउस चला जाता था। सुबह के तीन-तीन बजे तक बैठकर पहले तो स्क्रिप्ट में बदलाव किए। फिर पूरी फिल्म में मैंने आयुष्मान खुराना को नेत्रहीन होने की ट्रेनिंग दी। क्योंकि मेरी नॉर्मल आंखें हैं, लेकिन मैं नेत्रहीन हूं, फिल्म में भी ऐसा ही था। आयुष्मान का हेयर स्टाइल, आंखों को मॉडिफाइ करना, चलना, ठोकर खाना, पियानो बजाना, अंडा उबालना, मोबाइल यूज करना सब सिखाया। उन्हें बेस्ट एक्टर अवॉर्ड मिलने पर उन्होंने मुझे थैंक्स का फोन भी किया था।

फिर मुझे 31 दिवस नाम की मराठी फिल्म के लिए काम मिला, जिसमें शशांक केतकर, रीना अग्रवाल जैसे बड़े एक्टर थे। इसके बाद गुरमीत चौधरी की शॉर्ट फिल्म शुभहो बिजोया के लिए काम मिला। फिर दो वेब सीरीज धारावी बैंक (सुनील शेट्टी और विवेक ओबोरॉय) और ब्रीद इनटू दि शैडो-सीजन-3 (अभिषेक बच्चन) के लिए काम मिला। हाल ही में की गई मराठी फिल्म दृष्टांत को तो महाराष्ट्र में कई अवॉर्ड मिल चुके हैं।

अब फिल्मों में एक्टर्स को नेत्रहीन होने की ट्रेनिंग देता हूं। बाकायदा यह मेरा प्रोफेशन बन चुका है। जिस कमजोरी के लिए मैं आत्महत्या करने जा रहा था वही मेरी पहचान और ताकत बन गई। मुझे लगता है कि जिंदगी किसी को भी 100% नहीं देती है और जिंदगी में कुछ भी तय नहीं। मैं सबसे पहले क्रिकेटर था, फिर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था, फिर नेत्रहीनों का टीचर बन गया फिर फिल्म एक्टर्स को ट्रेनिंग देने लगा और अब मैं एक बैंकर हूं।

हेमेंद्र प्रताप सिंह ने ये सारी बातें भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला को शेयर की हैं...