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बात बराबरी की:मर्दों की नजर में औरतों के लिए शरीर की पवित्रता ही उसकी अकेली उपलब्धि है, वो चाहे और कुछ बने न बने

नई दिल्ली6 दिन पहलेलेखक: मृदुलिका झा
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वो 19वीं सदी का लंदन था, जब इंग्लैंड समेत पूरे यूरोप के अमीर मर्द अपनी बीवियों को लेकर ‘लंदन सर्जिकल होम फॉर वीमन’ पहुंचने लगे। यहां हर जनाना मर्ज का इलाज होता था- दवा से नहीं, बल्कि एक खास सर्जरी से। इसमें बीमार औरत का खतना कर दिया जाता, फिर चाहे उसे दिमागी बीमारी हो, कैंसर या मौसमी बुखार। नींद न आने, या खाना न पचने का ट्रीटमेंट भी यही था कि स्त्री के यौन अंगों का बाहरी हिस्सा तराश दिया जाए।

अस्पताल के फाउंडर का नाम डॉक्टर आइजैक ब्राउन था, जो उस दौर के मशहूर गायनेकोलॉजिस्ट थे। वे मानते थे कि औरतों की सारी परेशानियों की जड़ उनकी हवा में डोलती हुई यौन इच्छाएं हैं। उनके लिए खतना उतना ही कारगर है, जैसे बिगड़ैल घोड़े को चाबुक से फटकारना। वे फटाफट काबू आ जाएंगी।

डॉ. ब्राउन ने अपनी किताब ‘ऑन द क्यूरोबिलिटी ऑफ सर्टेन फॉर्म्स ऑफ इनसेनिटी’ किताब में दर्जनों ऐसी बीमारियों का जिक्र किया, जो खतने से ठीक हो जातीं। डॉक्टरी भाषा में इस सर्जरी को क्लिटोरेक्टॉमी कहा गया।

बीवियों का इलाज करवाकर घर लौटे हजारों मर्द डॉ ब्राउन को लंबी-लंबी चिट्ठियां लिखने लगे। वे खुश थे कि कैसे उनके जादुई इलाज ने पागल, मिरगी या हिस्टीरिया के दौरे में लोटती, आलसी या बदसूरत दिखती उनकी स्त्री को बकरी जैसा सीधा और रेशम-सा मुलामय चेहरे वाला बना दिया।

लगभग दशक भर बाद रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ने डॉक्टर ब्राउन के इस हर मर्ज की एक दवा वाले टोटके पर लगाम कसी। इसलिए नहीं कि उन्हें इलाज के इस तरीके पर एतराज था, बल्कि इसलिए कि डॉक्टर ने अस्पताल का लाइसेंस नहीं लिया था। औरतों पर खतने की प्रैक्टिस हालांकि अब तक चली आ रही है। पहले ये अस्पतालों में होती, अब घरों में परंपरा के नाम पर हो रही है। इसे मॉडर्न भाषा में फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM) कहा गया।

माना जाता है कि इससे औरतें कई बीमारियों से बची रहेंगी। साथ ही शादी तक उनकी यौन इच्छाएं भी कंट्रोल रहेंगी, जिससे वे अपने पति को वर्जिनिटी का बेशकीमती तोहफा दे सकेंगी।

हाल ही में अफ्रीकन मुल्कों की लड़कियां इस प्रथा के खिलाफ उठ खड़ी हुईं। साइंस और डेटा के हवाले से वे बताने लगीं कि इस प्रक्रिया के दौरान कुछ सालों में कितनी बच्चियां दर्द से मरीं और कितनी इंफेक्शन से। ये अलग बात है कि उनकी दलीलें खाली घर में गूंजकर लौटती आवाज बनकर रह गई। वे पिट रही हैं, और इससे भी काम न बने तो घर से निकाल दिया जा रहा है। जिद बस ये, कि लड़कियां किसी भी तरह खतना करवाकर पाक-साफ बनी रहें।

जो मुल्क खतना जैसे खून-खराबे पर यकीन नहीं करते थे, प्योरिटी कंट्रोल का उनके पास दूसरा तरीका था। इसमें औरत के शरीर के निचले हिस्से को लोहे से कैद कर दिया जाता। ये अंर्तवस्त्र की तरह होता, जिसपर एक ताला लगा होता। घर का पुरुष बाहर जाते हुए इस पर ताला मढ़कर जाता और रात लौटने पर खोल दिया करता।

ये चेस्टिटी बेल्ट थी, यानी शुद्धता बनाए रखने वाली बेस्ट। जैसे दूध के भगौने को खुला रखने पर उसमें कीड़े-मकोड़े, धूल-मिट्टी जाने का डर रहता है, उसी तरह स्त्री देह की पक्की रखवाली न हो, तो उसके भटकने का डर रहता है। चेस्टिटी बेल्ट की खोज के बाद इस डर से राहत मिल गई। शक्की पति पत्नी पर ताला मढ़कर निश्चिंत होकर काम पर जाते।

ये और बात है कि कई बार बीवियां किसी इंफेक्शन का शिकार होकर मर जातीं, लेकिन शुद्ध रहते हुए मौत से बड़ी भला कौन-सी चीज है!

बाद के सालों में दुनिया के कई संग्रहालयों ने अपने यहां चेस्टिटी बेल्ट सजाए। नीचे कैप्शन में पूरा वर्णन रहता कि मर्दों की सनक ने औरतों पर कैसे-कैसे जुल्म किए। जैसा कि तय था, जल्द ही इसका विरोध होने लगा। पुरुषों को डर था कि इससे स्त्रियों का उनपर से भरोसा उठ जाएगा। फिर क्या था! झटपट चेस्टिटी बेल्ट के सारे निशान मिटा दिए गए। लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम ने सबसे आखिर में साल 1996 में इसे डिस्प्ले से हटाया। अब किसी म्यूजियम में शायद ही इसका कोई निशान मिले।

चेस्टिटी बेल्ट का चलन तो चला गया, लेकिन औरतों को लेकर पवित्रता की सनक अब भी बाकी है। नवंबर 2019 में मशहूर अमेरिकी रैपर क्लिफर्ड जोसेफ हैरिस (टीआई) ने एक पॉडकास्ट के दौरान सीना फुलाकर बताया कि वे हर साल अपनी बेटी का वर्जनिटी टेस्ट करवाते हैं। 'लेडीज लाइक अस' पॉडकास्ट में एक पिता बतौर बात करते हुए हैरिस कहते हैं- मेरी बेटी 18 की हुई, लेकिन मुझे गर्व है कि वो अब भी पवित्र है!

हैरिस को इसपर गर्व नहीं कि उनकी बेटी एक नेक इंसान है। इसपर भी नहीं कि वो बढ़िया पढ़ाई कर रही है, या फिर आगे और बेहतर कर सकेगी। एक पिता अपनी वर्जिन बेटी पर गर्वित है। शरीर की शुद्धता ही उसकी अकेली उपलब्धि है। वो चाहे और कुछ बने, न बने, लेकिन पवित्र बनी रहे। या पवित्रता का भरम देती रहे।

आर्टिकल लिखते हुए सर्च करती हूं तो कई ऐसे प्रोडक्ट के विज्ञापन दिखे जो ‘एक्टिव’ लड़की को भी वर्जिन दिखाएं। प्रोडक्ट रिव्यू में एक लड़की लिखती है- ‘मैंने पहली रात इसका इस्तेमाल किया, ताकि मेरे ससुराल वाले मुझे पसंद करने लगे।’ रिव्यू अच्छी अंग्रेजी में लिखी हुई है, यानी लड़की पढ़ी-लिखी है। शायद ससुराली भी पढ़े-लिखें हों। बड़े शहर में रहते हों। हालांकि इनमें से किसी भी बात का पवित्रता से कोई वास्ता नहीं। सबको अनछुई और काबू में रह सकने वाली औरत चाहिए।