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बात बराबरी की:मर्दों... चंद लड़कियों की गलती से फेमिनिज्म जहर नहीं हो जाता, यह स्त्री और पुरुष को साथ लेकर चलने की मुहिम है

नई दिल्ली2 महीने पहले
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दक्षिण कोरिया के सिंगर सैम ई का एक गाना कोरियाई मर्दों के लिए राष्ट्रगान से भी ऊंचा ओहदा पा चुका है। गाने के बोल हैं- 'वुमैड' इज पॉइजन। फेमिनिस्ट, नो। यू आर मेंटल इलनेस। इसका हिंदी तर्जुमा करें तो पता लगता है कि फेमिनिज्म, जनाना-मर्दाना बराबरी का गीत नहीं, बल्कि एक किस्म का पागलपन है, जो मर्दों से नफरत सिखाता है। चार साल पहले आए इस रैप गाने ने जैसे दक्षिण कोरियाई पुरुषों के दिल का दर्द उकेर दिया। हालत ये है कि वहां आप खुद को फेमिनिस्ट बता दें तो आपकी नौकरी समेत परिवार भी खतरे में आ जाएगा। तो क्या वाकई फेमिनिस्ट औरतें मर्दों से नफरत करती हैं? क्या रोटी पकाते हुए या लाल लिपस्टिक लगाकर बराबरी की बात नहीं हो सकती?

हां। हो सकती है। फेमिनिज्म, स्त्री-पुरुष को अलग-अलग ग्रहों पर बसाने की मुहिम नहीं, बल्कि साथ चलने की कोशिश है। लेकिन, नेक इरादों से शुरू हुई ये कोशिश वक्त के साथ बदरंग हो रही है। ऐसा ही एक मामला लखनऊ में आया, जिसमें एक वीडियो में लड़की एक कैब ड्राइवर को बुरी तरह से पीटते हुए गालियां दे रही है। वीडियो आने के साथ ही वायरल हो गया। लोग लड़की की दबंगई की तारीफ करने लगे। सबने बिना किसी सबूत मान लिया कि लड़की को गुस्सा आया, यानी कैब वाले ने कहीं न कहीं बदसलूकी या गलती की होगी। कैब ड्राइवर हवालात पहुंच गया। इसी बीच सीसीटीवी फुटेज आई, जिसने सारा राग ही बदल दिया। पता चला कि सोशल मीडिया ने जिस कैब ड्राइवर को खलनायक बना डाला, उसकी दरअसल कोई गलती थी ही नहीं।

पहले युवती की शान में सड़क-छाप गानों से लेकर उपन्यास तक रचने को तुले लोग अब उसे फेमिनिस्ट बता रहे हैं। सोशल मीडिया उन वाकयों से अटा पड़ा है, जब लड़कियों के ओवर-रिएक्शन के कारण किसी 'मासूम' पुरुष की जिंदगी तबाह हो गई। लब्बोलुआब ये कि कैब ड्राइवर की बेवजह पिटाई के कारण लखनवी युवती ही घेरे में नहीं आई, बल्कि उसके साथ वे तमाम स्त्रियां कटघरे में हैं, जिन्होंने कभी किसी की पिटाई तो दूर, ऊंची आवाज में बात तक नहीं की। दावे किए जा रहे हैं कि पश्चिम से आया फेमिनिज्म, वहां के पिज्जा-बर्गर से भी ज्यादा खराब है। ये वो जहर है, जो सीधी-सादी औरतों को बागी बना देता है।

तो क्या फेमिनिस्ट औरतें वाकई मर्दों से नफरत करती हैं? क्या वे बसे-बसाए घर को तोड़ने की फिराक में रहती हैं? क्या तवे से गर्म रोटियां उतारकर बच्चों की थाली में परोसने वाली औरत, स्त्री-बिरादरी के पतन का कारण है? क्या खूबसूरत दिखने की चाह पुरुषों की साजिश है कि औरतें कंघी-चोटी में ही उलझी रहे? ऐसे ढेरों-ढेर सवाल हैं जो फेमिनिज्म को किसी अपराध की तरह शर्मनाक बना रहे हैं। यहां तक कि खुद औरतें भी अपने को फेमिनिस्ट कहते झिझकने लगी हैं। लखनऊ का वीडियो फेमिनिज्म की बुझती लौ पर मोटा कंबल बनकर गिरा। धपाक से ऑक्सीजन सप्लाई रुकी और लौ की रही-सही रोशनी भी खत्म हो गई। हालत ये है कि अब किसी छोटी बच्ची से हुआ बर्बर रेप तो फिर भी भूला जा सकेगा, लेकिन कैब चालक की बेवजह धुनाई अमर हो जाएगी।

किसी सिरफिरी युवती की एक गलती ने औरतों की बराबरी की कोशिश को गहरे समंदर में धकेल दिया। इस जैसे इक्का-दुक्का मामलों की आड़ लेकर अब स्त्री-विरोधी तबका तमाम औरतों को गलत बताएगा। पान की गुमटी पर जीभ चुभलाते, भद्दे इशारे करते लड़के को अगर कोई लड़की तमाचा मारे तो तुरंत फेमिनिस्ट का टैग उसके चेहरे पर कीचड़ की तरह पोत दिया जाएगा। कैब ड्राइवरों के महिला सवारियों से बदतमीजी की खबर को फेक माना जाएगा।

दुनिया में बहुतेरे आंदोलन होते आए हैं। अमीरी-गरीबी की खाई पाटने को, रंगों को एकसार करने को, भाषाओं का फर्क मिटाने को, यहां तक कि कद-काठी में फर्क को हटाने के लिए आंदोलन। कई, कुछ हद तक कामयाब भी रहे, लेकिन फेमिनिज्म शायद अकेला ऐसा बहाव है, जो लगातार सवालों में रहा। इसकी थोड़ी वजह तो खुद औरतें हैं, जो स्वघोषित फेमिनिस्ट हैं। वे सिगरेट न पीने वाली औरतों को डरपोक मान लेती हैं। दारू के ठंडे-गर्म घूंट पीते हुए वे घर लौटने को बेताब औरत को नीची नजर से देखती हैं। रेसिपी पर चर्चा जिन्हें गाली सुनाई देती है। परिवार-बच्चे की खटराग में पिसती औरत की आंखों पर रूई का फाहा रखने की बजाए वे उन्हें गरियाती हैं कि वही औरतों की दुर्दशा का कारण हैं। इससे हो ये रहा है कि जिन औरतों को दर्द की साथिन बनना था, वे लगातार दूर हो रही हैं।

बहनों, यहां हमें भी समझना होगा कि फेमिनिज्म के मायने काफी बड़े हैं। पुरुषों को कमजोर दिखाकर हम मजबूत नहीं होंगे, बल्कि टकराव और बढ़ेगा। इतना कि हो सकता है, अगली जंग में एक ओर केवल मर्द हों और दूसरी ओर सिर्फ स्त्रियां। ये युद्ध किसी की जीत के साथ नहीं रुकेगा, बल्कि जब थमेगा, तब दोनों सेनाएं हार चुकी होंगी। ये फेमिनिज्म कतई नहीं। असल फेमिनिज्म दोनों के हाथों में हाथ डाले साथ चलने की मुहिम है। बीती को बिसारकर आगे बढ़ने की उम्मीद है।

वैसे औरतों से कहीं ज्यादा समझ की जरूरत उन पुरुषों को है, जो बात-बेबात बराबरी का रोना रोते हैं। औरतें वोट कर सकती हैं। पढ़ाई करती हैं। नौकरी में हमारी जगह हड़प लेती हैं। शादी भी बगैर दहेज करती हैं। फिर अब उन्हें और कितनी बराबरी चाहिए! इस तरह का तर्क देते पुरुष भूल जाते हैं कि कैसे पीरियड शुरू होते हुए लाखों लड़कियां घर बिठा दी जाती हैं। कैसे भरी सड़क किसी गोल्डमेडलिस्ट लड़की को भून दिया जाता है, क्योंकि उसने किसी लड़के के प्रेम को इनकार किया। कैसे भरी दोपहरी कोई बच्ची गैंगरेप का शिकार हो दम तोड़ देती है। कैसे कोई शादीशुदा औरत, घर-दफ्तर के बीच नटनी बनकर रह जाती है, जबकि वहीं उसका पति खाट तोड़ते हुए कविताएं रच रहा होता है।

आरोप लंबे हैं, काफी संगीन और तिलमिला देने वाले। औरतें हालांकि तब भी सब भुलाने को राजी हैं, बशर्तें जख्मों पर प्रेम और बराबरी का लेप किया जाए। बर्शतें फेमिनिज्म से पुरुष भी जुड़ें, किसी सहयोगी की तरह नहीं, बल्कि साथी की तरह। उतनी ही संवेदना से, और वैसी ही नम आवाज के साथ।