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विदेशी मंत्री का अमेरिका दौरा:वैक्सीन सप्लाई से लेकर चीन और वैश्विक कूटनीति को लेकर क्यों खास रही एस जयशंकर की विदेश यात्रा, इन 4 पॉइंट्स में समझिए

नई दिल्ली11 दिन पहलेलेखक: संध्या द्विवेदी

ऐसे वक्त में जब वैश्विक कूटनीति बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। ठीक इन सबके बीच भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पिछले महीने 24 से 28 मई के बीच अमेरिका की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान विदेश मंत्री के कामों की लिस्ट तो लंबी होनी ही थी। पांच दिन की यात्रा के दौरान वे वॉशिंगटन में अपने अमेरिकी समकक्ष एंटोनी ब्लिंकेन के अलावा रक्षा और व्यापार के क्षेत्र से जुड़े कई आला अधिकारियों से भी मिले। एस. जयशंकर की यात्रा के परिणामों को समझने के लिए इन चार कड़ियों को एक साथ जोड़कर देखना बेहद जरूरी है...

1. वैक्सीन के लिए कच्चे माल की सप्लाई सुनिश्चित करना

विदेश मंत्रालय के टॉप सोर्सेज ने दैनिक भास्कर को बताया कि ये यात्रा मुख्य तौर पर वैक्सीन के लिए कच्चे माल की सप्लाई को लेकर थी, जिसको लेकर भारतीय निर्माता पहले से इंतजार कर रहे हैं। अमेरिकी सप्लायर्स पर कानूनी प्रतिबंधों की वजह से भारतीय निर्माताओं को इसमें समस्या आ रही थी। मोदी सरकार के सामने इस समय देश में वैक्सीन की कमी को खत्म करना सबसे बड़ा मुद्दा है। अमेरिका ने घोषणा कर दी है कि वो भारत सहित विभिन्न देशों को 8 करोड़ वैक्सीन देगा। हालांकि जो भी भारत के हिस्से आएगा वो पर्याप्त नहीं होगा। एस. जयशंकर की यात्रा कच्चे माल के लिए थी न कि मात्र वैक्सीन के लिए।

भारत में वैक्सीन प्रोडक्शन की कीमत किसी भी अन्य देश के मुकाबले काफी कम है। लंबे वक्त को ध्यान में रखते हुए भारत में वैक्सीन प्रोडक्शन किया जाना तार्किक है। जयशंकर ने अमेरिका को यह दिखाने की कोशिश की कि सितंबर 2021 तक भारत 30 करोड़ वैक्सीन डोज का हर महीने उत्पादन करने लगेगा अगर वैक्सीन बनाने का सारा माल सही समय भारत को मिलता रहे। पांच महीने के वक्त में तीन से ज्यादा नए वैक्सीन निर्माता भारत में काम शुरू कर देंगे और 10 से ज्यादा नई फैक्ट्रियों में ये प्रोडक्शन शुरू हो जाएगा।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता कह चुके हैं कि भारत फाइजर, जॉनसन एंड जॉनसन और मॉडर्ना जैसी फार्मा कंपनियों के साथ वैक्सीन प्रोडक्शन को लेकर बातचीत कर रहा है। फाइजर की कोविड वैक्सीन के निर्माण में 280 इंग्रेडिएंट्स और कॉम्पोनेंट्स की जरूरत होती है जिनकी सप्लाई 19 देशों के 86 आपूर्तिकर्ताओं द्वारा की जाती है।

इसलिए वास्तविकता में सिर्फ पेटेंट नियमों में छूट या फिर वैक्सीन बनाने का लाइसेंस शेयर कर देने भर से भारतीय निर्माताओं की समस्या का समाधान नहीं होने वाला है। निर्माताओं की मदद के लिए इंग्रेडिएंट्स (यानी वैक्सीन बनाने के लिए कच्चे माल) की सप्लाई भी बेहद जरूरी है। एस. जयशंकर ने अपनी यात्रा के दौरान इस मुद्दे को सुलझाने की कोशिश की।

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 27 मई को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) जेक सलिवन से मुलाकात की और वैक्सीन सप्लाई को लेकर चर्चा की।
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 27 मई को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) जेक सलिवन से मुलाकात की और वैक्सीन सप्लाई को लेकर चर्चा की।

सरकार के आकलन के मुताबिक भारतीय निर्माताओं को करीब 360 इंग्रेडिएंट्स की तत्काल जरूरत है। इनकी सप्लाई 10 देशों से होनी है। इनमें से 200 से ज्यादा अमेरिका से, 100 से ज्यादा जर्मनी से, फिर सिंगापुर से डेनमार्क, पोलैंड से जापान तक भी सप्लायर्स की लिस्ट में शामिल हैं। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा मार्च 2020 में डिफेंस प्रोडक्शन एक्ट लागू किए जाने की वजह से कोवीशील्ड और कोवैक्सिन के निर्माता सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटेक खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं।

राष्ट्रपति जो बाइडेन प्रशासन ने भी इस कानून को बढ़ा दिया है। इस कानून के मुताबिक जब तक अमेरिका की अपनी जरूरत पूरी नहीं हो जातीं कोई भी वैक्सीन या मेडिकल उपकरण देश के बाहर निर्यात नहीं किए जा सकते हैं। ये कानून अमेरिका में बन रही ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका वैक्सीन के कच्चे माल की आपूर्ति अमेरिकी सप्लायर्स को भारत या अन्य जगह पर करने से रोकता है। जयशंकर की यात्रा के एक हफ्ते बाद अमेरिका की तरफ से भारत की मदद के लिए महत्वपूर्ण बदलाव की घोषणा की गई।

अब अमेरिकी कंपनियां बाहर के वैक्सीन ऑर्डर ले सकेंगी
तीन जून को अमेरिका ने घोषणा की- हम एस्ट्राजेनेका (सीरम इंस्टीट्यूट की कोवीशील्ड), नोवावैक्स और सैनोफी को डिफेंस प्रोडक्शन एक्ट की प्राथमिकता रेटिंग्स से हटा रहे हैं। इस घोषणा के बाद अब अमेरिकी कंपनियां बाहर के वैक्सीन ऑर्डर ले सकेंगी और कच्चे माल की सप्लाई कर सकेंगी। इस बड़े मुद्दे को सुलझाने के लिए भारत में वैक्सीन के सबसे बड़े उत्पादक अदार पूनावाला ने एस. जयशंकर और अमेरिकी प्रशासन का शुक्रिया अदा किया है।

अमेरिका ने भारत की कोरोना वायरस से लड़ाई में पूरी मदद की है। इसका कारण ये भी है कि अगर भारत में कोरोना वायरस पर काबू नहीं पाया गया तो दुनिया भी उसके बुरे परिणाम भुगतने से बच नहीं सकती है। वैक्सीन निर्माण की प्लानिंग में जो गलती हुई है और उसके कारण वैक्सीन की जो किल्लत आई है मोदी सरकार को उसे तत्काल हैंडल करना होगा। जयशंकर की अमेरिकी यात्रा के बाद केंद्र सरकार का सोचना है कि वैक्सीनेशन कार्यक्रम को सुचारु रूप से चलाने के लिए अगस्त -सितंबर तक देश के पास पर्याप्त वैक्सीन उपलब्ध हो जाएंगी।

वैक्सीन मिसमैनेजमेंट के बावजूद भी भारत अभी सस्ती वैक्सीन निर्माण का केंद्र बना हुआ है। भारत को बस वैक्सीन टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के हक़, पेटेंट्स और इंग्रेडिएंट्स की जरूरत होगी। अगर ये सबकुछ मिल जाए तो भारत बेहतर क्वालिटी की वैक्सीन रियायती कीमतों पर न सिर्फ अपने देश के लोगों के लिए बल्कि दुनिया के लिए आज भी तैयार कर सकता है। मोदी सरकार गंभीरता के साथ कोशिश कर रही है कि वैक्सीन प्रोडक्शन में खोई हुई साख एक बार फिर वापस मिल जाए।

अमेरिका के विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकेन के साथ भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर।
अमेरिका के विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकेन के साथ भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर।

2. बाइडेन प्रशासन का चीन को लेकर सख्त रवैया

इस यात्रा का एक पहलू यह भी था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ घनिष्ठता वाले ट्रंप के सत्ता से हटने के बाद अमेरिका के नए प्रशासन और उसके दृष्टिकोण को समझा जाए। राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अमेरिकी खुफिया विभाग को कोविड-19 की उत्पत्ति को लेकर जांच करने और उसकी रिपोर्ट 90 दिनों के भीतर देने का आदेश दिया है। ये महत्व का आदेश स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि चीन इस वक्त अमेरिका की विदेश नीति में पहली प्राथमिकता पर है। और ऐसा लगता है कि बाइडेन प्रशासन भी चीन पर नर्म रवैया नहीं अख्तियार कर रहा है।

अमेरिका और चीन अभी प्रतिद्वंद्वी बने रहेंगे, भले ही कम समय के लिए। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया का क्वाड गठबंधन बाइडेन प्रशासन में मजबूत हो रहा है। जयशंकर की यात्रा से क्वाड और उसके भविष्य को लेकर भारत में और स्पष्टता आई है। हिंद प्रशांत क्षेत्र में क्वाड और उसके रोल को लेकर अमेरिका पहले से ज्यादा गंभीर है।

3. वैश्विक कूटनीति पर फोकस

भारत यह देखने में भी दिलचस्पी ले रहा है कि कैसे अमेरिका एक हाथ पर क्वाड को मजबूत करने को लेकर भी गंभीर है और साथ-साथ रूस के साथ उच्च स्तरीय बैठक भी कर रहा है। एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में 16 जून को अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन आमने-सामने मुलाकात करने वाले हैं। स्विट्जरलैंड के जिनेवा में प्रस्तावित ये सम्मेलन बताता है कि वैश्विक कूटनीति में कितने बड़े स्तर पर बदलाव आ रहा है। बाइडेन के जनवरी में राष्ट्रपति बनने के बाद ये इस तरह की पहली यात्रा होगी।

भारत ने यह गौर किया है कि बाइडेन ने चीन या फिर अमेरिका के किसी अन्य निकटतम सहयोगी की बजाए रूस के साथ यह सम्मेलन किया है। भारत को लगता है कि ये उसके लिए किसी भी तरह देखा जाए तो फायदेमंद घटना रहेगी। उसके संबंध रूस और अमेरिका दोनों के साथ ही बेहतर हैं।

4. अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश

सब जानते हैं कि वैक्सीन की किल्लत तो एक न एक दिन दूर हो जाएगी, लेकिन अर्थतंत्र को पटरी पर लाने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी। जयशंकर की अमेरिकी यात्रा के दौरान आर्थिक क्षेत्र में भारत अमेरिका के सहयोग की संभावना पर भी चर्चा हुई। अमेरिकी उद्योग का मानना है कि कोविड से जितना नुकसान 2020 में भारत के अर्थतंत्र का हुआ है उससे कम नुकसान भारत के बाजार को 2021 में हुआ है। एक सीनियर अमेरिकी अधिकारी ने जयशंकर से कहा, 'कोरोना की मार से हम निकल आए हैं, आप भी निकल जाएंगे।'

अमेरिका की इकॉनोमी आजकल काफी संतुलित है। अगर अगले दो महीने में भारत में बाजार खुल जाते हैं, फैक्ट्रियां चालू हो जाती हैं तो भारत-अमेरिका का व्यापार बढ़ सकता है। जयशंकर से ऐसे आसार अमेरिकी व्यापारियों ने जताए हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि जयशंकर की अमेरिकी यात्रा बेहद खास थी, क्योंकि इतिहास में शायद ही किसी विदेशमंत्री ने विश्व के सबसे बड़े देश की राजधानी में जाकर कूटनीति का उपयोग एक वायरस को हराने के लिए जरूरी कच्चे माल की आपूर्ति के लिए किया होगा।

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